रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 127, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथोत्तरखण्डः ।
क्षीराब्धेरुत्थितं देवं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् ।
वन्दे धन्वन्तरिं भक्त्या नानागदनिषूदनम् ॥ १ ॥
जो क्षीर समुद्रके मथनेके समय पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए
चतुर्भुज भगवान् प्रगट हुए और जो नाना रोगोंके नाश करनेवाले देव
हैं उन धन्वन्तरि भगवान्को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥
प्रायशो वपुषः शुद्धिं कृत्वा देयं तदौषधम् ।
अतः पूर्वं चिकित्सायां रेचकौषधमुच्यते ॥ २ ॥
प्रायः संपूर्ण रोगोंमें शरीरको शुद्ध करके तदनंतर औषधि देना
चाहिये । इसलिये संपूर्ण औषधियोंसे पहले रेचनी औषधियोंको
कथन करते हैं ॥ २ ॥
इच्छाभेदी रस ।
तुल्यं टङ्कणपारदं समरिचं तुल्यांशकं गन्धकं
विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् ।
गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचयेत्
यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च दध्योदनम्॥३॥
शुद्ध सुहागा, शुद्ध पारा, कालीमिर्च और शुद्ध गंधक यह सब एक
एक भाग लेवे । सोंठ दो भाग, शुद्ध जमालमोटा ९ भाग इन सबको
खरल करके शीशीमें रक्खे इसमेंसे एक रत्ती प्रमाण प्रातःकाल खाकर
ऊपरसे शीतल जल पीवे तो उत्तम रीतिसे रेचन ( दस्त ) होजाता
है । जबतक गरम जल न पीवे तबतक रेचन होता रहता है । ठीक
रेचन हो लेनेके अनंतर दहीभातका पथ्य खिलावे ॥ ३ ॥