राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
४८ राजतरंगिणी
बनाने का काम आज भी अलौकिक कार्य समझा जाता है । किन्तु कश्मीरी कलाकार की सहायता न लेकर
गुह्यकों की सहायता पुल बनाने के लिए ली गयी । इसका अर्थ है कि यह जाति इस कला में निपुण थी ।
यक्ष नाम की भी एक जाति थी, जो कश्मीर में रहती थी । यक्षों को कालान्तर में मानव विशेष समझ लिया
गया था । इसी प्रकार गुह्यकों को भी मानव विशेष समझा गया । परन्तु कल्हण के वर्णन से स्पष्ट हो जाता
है गुह्यक एक जाति थी । उस जाति के लोग कश्मीर में आबाद थे । निर्माण कला में निपुण थे । कल्हण ने
( १:५९, १८४, ३ ३४९ ) से यक्ष का उल्लेख किया है । यक्षों के सन्दर्भ में कहा जाता है । उनका उपयोग
सेतु अर्थात् पुल बनाने में किया गया था । पुराण, महाभारत में यक्ष के अन्तर्गत गुह्यक जाति मानी गयी है ।
अतएव राजा दामोदर ( ता० १:१५९ ) के काल तक यक्ष और गुह्यक दोनों जातियां कश्मीर में थीं ये
परिश्रमी थीं । शिल्प उनका मुख्य कार्य था ।
परिशिष्ट 'ठ'
यक्ष
( तरंग १ : १५९-पृष्ठ २१८ )
कल्हण कश्मीर में प्रचलित किवदन्ती की ओर संकेत करता है। प्राचीन विशाल इमारतों का
निर्माण विशाल शिलाखण्डों से किया गया है। उन्हें यक्षों ने किया था। वे मानवीय शक्ति के परे
की बात है। कल्हण ने जिन भव्य भवनों तुंग निर्माणों का वर्णन किया है उनमें बहुतों के ध्वंसावशेष
वर्तमान हैं। कश्मीरी मुसलमान उक्त निर्माणों को जिन तथा परियों का बनाया मानते हैं। किसी ग्रामीण से
पूछने पर उत्तर मिलता है। पाण्डवों ने बनाया था।
यक्ष शब्द ऋग् तथा अथर्ववेद में अनेक स्थलों पर आया है।
( ऋग्वेद १:१९०:४, ४:३:१३, ५:१०:४, ७:५६:१६, १०:८८:१३, ७:६१:५, अथर्ववेद ८:९:२५
१०:२:३२, १०:७:३८, १०:८:४३ ११:२:४ )
वायु, मत्स्य, ब्रह्माण्ड पुराणों में यक्ष शब्द प्रायः गन्धर्व तथा किन्नर के साथ आया है। यह सब
हिमालय प्रदेश की पर्वतीय जातियाँ थी। अलवेरूनी ने गन्धर्वों को गायक जाति में गिना है। उनका संगीत
तथा नृत्य पेशा माना है। ( मत्स्य : ११४:८२; ब्रह्माण्ड : २:१८:३३ )
गन्धर्वान किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् ।
कलायग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥
हरिवंश पुराण, भविष्य पर्व ( ३३:११ ) में महर्षि, वसु, अप्सरा, गन्धर्व के साथ यक्ष का उल्लेख
किया गया है। उन्हें कुबेर के भवन में निवास करना दिखाया गया है। ( वायु : ३९:५७ ) ( नीलमत :
1007-8 )
अग्नि पुराण ( १९ : १८ ) में उन्हें 'कश्यपपत्नीखसाजाता :' अर्थात् कश्यप की पत्नी खसा से
यक्षों की उत्पत्ति हुई थी।
यक्षों का वर्णन महाभारत में प्रचुर रूप से मिलता है। गुह्यकों के सन्दर्भ में यक्षों का उल्लेख
किया गया है। महाभारत मे उन्हें देव योनि में रखा है। विराट अण्ड द्वारा ब्रह्मादि के उत्पन्न होने के
पश्चात् यक्षो की उत्पत्ति बताई गयी है। महाभारत आदि पर्व ( १ : ३५ ) में यक्षों को पुलस्त्य मुनि
की सन्तान कहा गया है ( आदि पर्व ६६ : ७ )। राक्षस रावण पुलस्त्य का नाती था। अतएव यक्षों का
सम्बन्ध राक्षसों से माना गया है। यक्ष मानव थे। श्री शुकदेवजी ने यक्षों को महाभारत की कथा
सुनायी थी। ( आदि पर्व १ : १०८ )। यक्षों ने कुबेर का राजपद पर अभिषेक किया था। ( वन पर्व १ :
१०-११ ) पाण्डव भीम ने यक्षों तथा राक्षसों को पराजित किया था। ( वन पर्व १६० : ५७-५८ । )
सुन्द उपसुन्द ने यक्षों को पराजित और पीड़ित किया था। ( वन पर्व २०८ : ७ )।
यम ने यक्ष का रूप धारण कर युधिष्ठिर से प्रश्नोत्तर किया। यक्ष के प्रश्नों का उत्तर देकर धर्म-
राज युधिष्ठिर ने चारों भाइयों को यम से जीवित कराया था। ( वन पर्व ३१४ : १७ )।
१२
९० परिशिष्ट ठ
प्रायः देवताओं की मूर्तियों पर यक्षगण नभोपय से उन्हें माला पहनाते, उनपर पुष्प वर्षा करते
दिखाये जाते हैं। भगवान् बुद्ध की मूत्ति में भी शिरोभाग दोनों पाश्र्वों में उड़ते यक्ष माला सहित उत्कीर्ण
किये मिलते हैं।
ब्रह्माण्ड तथा वायु पुराणों के अनुसार ये राक्षस तथा खसा की सन्तान थे। ये अपनी माता को
खा जाना चाहते थे। अतएव उनका नाम यक्ष पड़ा। उनके आकार का वर्णन किया है। उन्हें चार हाथ
तथा चार पैर होते हैं। रात्रि में आहार निमित्त विचरण करते हैं। यमु दनि का रूप धारण कर अप्सरा
क्रथस्थला के साथ नन्दन में निवास किया था। उससे रजत नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था। यक्ष अपने पुत्र के
साथ हिमालय में निवास निमित्त आया।
ब्रह्माण्ड पुराण (२·१८ : ३३२ · ३ : ७ : ६०, १००-१७, २२:१४, ४१ : ३०, ७१ :
१:१) तथा भागवत आदि पुराणों में यक्षों की उत्पत्ति की एक और कथा है। कश्यप पिता तथा खशा
माता का पुत्र यक्ष था। (भागवत २:६:१३, ६:८:२४, १०:६:२७, ६२:१९, ८५:४१;
ब्रह्माण्ड पुराण २:३२ : १-२, ३५· १९१, ३६ : ११८।)
पुराणों में उन्हें रुद्र के अनुयायी रूप से चित्रित किया गया है। उनके स्वामी का नाम कुबेर है।
(भागवत पुराण ११ १६. १६)। मत्स्य पुराण (८.५) के अनुसार ब्रह्मा ने यक्षों का अधिनायकत्व
शूलपाणि को दिया था। यक्षों ने कच्चे पात्र में वसुधा का दोहन किया था। मत्स्य पुराण (१० : २२,)
के अनुसार वृत्र की सहायता इन्द्र के विरोध में यक्षों ने की थी। दक्ष के यज्ञ में सती के साथ गये थे।
यक्ष वृत्र के पक्ष से देवताओं से युद्ध कर रहे थे। (भागवत ६:१०:२० ४:४:४) उनके
खेलों का वर्णन भागवत पुराण (१०:९०:९) में किया गया है। हरि की भक्ति के कारण यक्षों
का मंगल होता है। (भागवत ७:७:५०)। यक्ष देवों के साथ भगवान् कृष्ण को देखने आये थे।
(भागवत ७.८:३८,) रावण ने यक्षों को परास्त किया था। (ब्रह्माण्ड पुराण ३:७:२१५,)
यक्ष पित्रों की पूजा करते थे। (भागवत पुराण ३:१०:२८,)
मत्स्य पुराण (अध्याय २३) में वर्णन मिलता है। देवगुरु बृहस्पति की पत्नी तारा के कारण शंकर
तथा चन्द्रमा में युद्ध हुआ। उसमें यक्षों के स्वामी कुबेर ने वैशाल, यक्ष, नाग तथा किन्नरों की सेना के साथ
शंकर की ओर से युद्ध में भाग लिया था।
मत्स्य पुराण (अ० १८०) में यक्षों के विषय में एक रोचक कथा दी गयी है। उससे यक्षों के
व्यवहार, आचरण तथा धर्म पर प्रकाश पड़ता है। इसका सम्बन्ध हरिकेश यक्षसे है।
पूर्णभद्र यक्षो का राजा था। उसका पुत्र हरिकेश था। हरिकेश शिव का उपासक था। पूर्णभद्र ने
अपनी पुरातन परम्परा पर पुत्र का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा—रुद्र की उपासना उचित नहीं है। हमारे
धाम मानवों से भिन्न हैं। यक्ष स्वभाव से क्रूर होते हैं। कच्चा मांस खाते हैं। कुत्सित जीवों का भक्षण
करते हैं। हिंसक होते हैं।
न हि यक्षकुलीनानां मूढ वृत्तं भवत्युत ।
गुह्यका यत यूयं वै स्वभावात्क्रूरचेतसः ॥
क्रव्यादाश्चैव किंमक्षा हिंसाशीलाइच पुत्रक ।
मैवं कार्षीर्न ते वृत्तिरेवं दृष्टा महात्मना ॥
, परिशिष्ट ४ ९१
पिता की बात न मानकर, हरिकेश काशी आकर, तपस्या करने लगा । तपस्या से प्रसन्न होकर
शिव ने हरिकेश से वर मांगने के लिए कहा । हरिकेश ने शिव भक्ति का वर मांगा । शिव ने प्रसन्न होकर यक्ष
को वरदान दिया—'यक्ष, तुम पूज्यगणों के स्वामी तथा धनपति होगे । प्राणियों से अजेय होगे । अन्नदाता
होगे । क्षेत्रपाल होगे । उद्भ्रम तथा संभ्रम नामक दो गण तुम्हारे सेवक होंगे । तुम दण्डपाणि होगे ।'
काशी तथा मथुरा दोनों स्थानों पर यक्ष लोग अपने पुरातन धार्मिक परम्परा के स्थान पर शिव
उपासना करने लगे । यक्षों ने लौकिक किंवा जातीय धर्म तथा रीतियों के स्थान पर शैव मत स्वीकार कर
लिया । उन्हें कालान्तर में शिव के गणों में सम्मिलित कर लिया गया । वे शिव के भक्त तथा अनुयायी
हो गये ।
भागवत ( २ : ६ : १३ ) में विराट् पुरुष के वर्णन के प्रसंग में देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, यक्ष,
मृग, गन्धर्व, अप्सरा, राक्षस, भूत, प्रेत, विद्याधर सर्पादि को एक वर्ग में रखकर उन्हें विराट् पुरुष माना है।
भागवत ( ६ : ८ २४ ) में नारायण कवच के वर्णन में—कूष्माण्ड, विनायक, यक्ष, राक्षस, भूत,
प्रेतादि को कौमोदकी गदा से नष्ट करने की प्रार्थना की गयी है ।
देवराज इन्द्र के विरुद्ध आते हुए यक्षों का वर्णन मिलता है । दैत्य, दानव, यक्ष, राक्षस सुवर्ण
के साज सामान से सुसज्जित होकर देवराज इन्द्र की सेना की बाढ़ रोकने के लिए आ गये थे । ( भा०
: १० : २० । )
नृसिंह अवतार के समय भगवान् के समीप जय-जयकार करने आने वालों में—सिद्ध विद्याधर महा-
नाग, मनु, प्रजापति, गन्धर्व, अप्सराऐं, चारण, यक्ष, किंपुरुष, वैताल, सिद्ध, किन्नर और सुनन्द तथा कुमुद
आदि विष्णु के सभी पार्षद यहाँ आये । ( भागवत ७ : ८ : ३८ ) यहाँ पर विष्णु के पार्षद रूप में यक्षों
का वर्णन किया गया है ।
रेवत ने कुशस्थली नामक नगर बसाया था । वहाँ से वे आनर्तादि देशों पर राज्य करते थे । उनके
पुत्र ककुद्मी थे । शारपाणि के पुत्र अनर्त थे । अनर्त के पुत्र रेवत थे । रेवत के एक शत पुत्र थे । उनमें
ककुद्मी ज्येष्ठ था । ककुद्मी की कन्या रेवती थी । रेवती का विवाह दोपावतार स्वरूप बलदेव के साथ
किया गया था । वे ब्रह्मा से भेंट करने गये थे । लौटकर अपने नगर में आये । देखा कि उनके वंशजों ने
यक्षों के भय से नगर त्याग कर दिया था । ( भागवत पुराण ९ : ३ : ३५ । )
भागवत ( १० : ६ : २७ ) में यक्षों को भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस और विनायक के वर्ग में रखा
गया है । भागवत पुराण ( १० : ३२ : १६ ) में यक्षों को पुनः देवता, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, पन्नग, दैत्य,
विद्याधर तथा मनुष्य के साथ वर्णन किया गया है । भागवत पुराण ( १० : ९० : ९ ) में भगवान् अपनी
पत्नियों के साथ विहार करने की उपमा यक्षराज कुबेर का यक्षिणियों के साथ विहार करने से दी गयी है ।
उद्धव के प्रश्नों का उत्तर देते हुए कृष्ण ने अपने विराट् स्वरूप का वर्णन किया है । 'मैं दैत्यों में
दैत्यराज प्रह्लाद, नक्षत्रों में चन्द्रमा, ओषधियों में सोमरस एवं यक्ष राक्षस में कुबेर हूँ ।' ( भागवत
११ : १६ : १६ )
यक्षों को धनकृपण कहा गया है ? 'जो मनुष्य, देवता, ऋषि, पितर, प्राणी, जाति, भाई,
कुटुम्बी और धन के भागीदारों को उनका भाग देकर सन्तुष्ट नहीं रखता और न स्वयं ही उपभोग करता है
वह यक्ष के समान धन की रखवाली करने वाला कृपण है ।' ( भा० ११ : २३ : २४ ) ।
९२ राजतरंगिणी
रामायण में सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया
था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर में निवास करती थी । ( वाल्मीकि
रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक २१-२३ । )
मत्स्य पुराण ( अध्याय १२१ ) में यक्षों के निवासस्थान के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है—'कैलास
पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान गन्धप्रभ
गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर के चैत-
रथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा यक्ष सेनापति गुह्यकों से रक्षित निवास करता है।'
'कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा में हेमशृङ्ग दिवा लोहित नामक एक महान् पर्वत है। उसके
तट पर विशोक वन है। वहाँ मणिधर यक्ष परम धार्मिक एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है।
ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र के यूप (अग्निवेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी।
त्रिककुद के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। वहाँ वैद्युत पर्वत है। उसके पाद में दिव्य मानस सरोवर
है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर नैभ्राज दिव्य वन है। यहां प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक
ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है।
वायु पुराण अध्याय ३९ में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है। शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त यशो
यक्षो के सौ पुर हैं। वायु पुराण अध्याय ६९ में यक्षों के विषय में उल्लेख है—
'पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत
हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं।
अलका नगरी के कुबेर अधीश्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस
शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीडित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के
समान अधिकारी, तेजस्वी, बलवान, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी,
लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यज्ञ परा-
यण एवं देवताओ के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है।
गन्धर्वों का प्रभाव देवताओ की अपेक्षा हीन-चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्कों में देवताओं का
चतुर्थांश प्रभाव है। गुह्यक का प्रभाव गन्धर्वों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल
सोलहवां भाग देवताओ का प्रभाव शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है।
पिशाचों का प्रभाव यक्षों से तीन गुना हीन होता है। रूप, आयु, बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र,
बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले वर्ग सुर तथा असुरों
की अपेक्षा हीन होते हैं।
उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। (१) यक्ष देवयोनि मे थे। ये
मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचों के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा
असुरों के वर्ग में उन्हें रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। (५) उनका आवास कैलास के
समीप था। (६) उनका आसुरी आचरण मांसादि खाने तथा रक्तपात करने का था। (७) किन्तु
कालान्तर में वे शिव के अनुयायी होकर शैवमतावलम्बी हो गये थे । (८) कुबेर उनका राजा था। (९)
वे युद्ध में भाग लेते थे। (१०) क्रूरकर्मा थे। (११) मत परिवर्तन के कारण शिव के गण बन गये
परिशिष्ट ठ ९३
थे । ( १२ ) गुह्यक लोग यक्षों की एक शाखा थे । ( १३ ) उनका सम्बन्ध भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा
तथा पर्वतीय भागों में रहने के कारण असुरों से होना स्वाभाविक था । उनका आचार-विचार प्रारम्भ से
ही असुरों से मिलता था । ( १४ ) यक्ष कश्मीर के सीमान्त मेरु के दक्षिण तथा कैलास के पश्चिम अर्थात्
कश्मीर की उत्तरी-पूर्वी तथा उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर रहते थे ।
कल्हण ने यक्षों का विवेचन यहाँ शिल्पी के रूप में किया है । वे सेतु निर्माण करने में
निपुण थे । पुराणों में यक्षों को वस्तुपरक माना गया है । कहीं-कहीं उन्हें इतर योनि भी माना गया है ।
उन्हें आंखों में पड़नेवालों के रूप में भी चित्रित किया गया है । कल्हण ने इन सब कपोल कल्पनाओं को न
मानते हुए वास्तविकता का परिचय दिया है । उसने यक्षों को एक जाति के रूप में चित्रित किया है ।
जिनका मुख्य काम शिल्प था । राज्य में जलाभाव को दूर करने के लिए राजा ने यक्षों द्वारा शासन
स्थिर बनाने की योजना बनायी थी । उसका अर्थ बांध बनाना भी माना जाता है । यक्ष राजा
दामोदर के समय गुह्यकों के साथ कश्मीर में आबाद थे । गुह्यक और यक्ष दोनों शिल्पी थे । कल्हण ने
गुह्यकों का विवरण केवल सेतु निर्माण के सम्बन्ध में किया है और यक्षों का बांध बनाने के सम्बन्ध
में किया है । अतएव गुह्यक यदि सेतु बनाने में प्रवीण थे तो यक्ष जलाभाव दूर करने के लिए बांध बनाने
में चतुर थे ।
नीलमत पुराण में यक्षों का उल्लेख निम्न श्लोकों में मिलता है—
दनायुषाया वृत्रस्तु भद्रास्तु सुरभेः सुताः ।
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव खसायास्तनयाः स्मृताः ॥ 48 = ७१-७२
× × ×
देवपत्न्यस्तथा सर्वा देवानां याश्च मातरः ।
विद्याधरगणा यक्षाः सागरा सरितस्तथा ॥ 152 = २०४
× × ×
आश्रयानि तथा नद्यश्चक्रस्तीर्थान्यनेकंशः ।
गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः शैलेन्द्राश्च सगूह्यकाः ॥ 106 = २३९ २४०
× × ×
दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह ।
वर्जयन्ति च ते मांसं मांसादा दिनपञ्चकम् ॥ 447 = ५५८
× × ×
वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः ।
नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गरुदारुणौ ॥ 586 = ७०७
× × ×
विद्याधराश्च यक्षाश्च विरमः मत्स्यवर्धनः ।
मन्द्राशो गजनेत्राश्च कण्टारः कुमुदस्तथा ॥ 922 = १०८८-१०८९
९४ राजतरंगिणी
तीर्थैर्देवैश्च ऋषिभिर्गन्धर्वैर्यक्षराक्षसैः ।
अभिगच्छेत मेधावी जन्मसांपद्वयंशालान् ॥ १३८० - १५९८
वात्स्यायन कामसूत्र में यक्षरात्रि का उल्लेख करता है । यशोधर उस पर भाष्य करते यक्षरात्रि को
सुख रात्रि कहता है । वर्ष क्रिया कौमुदी, कृत्य तत्त्व, तथा धर्म सिन्धु दीपमाला नाम सुखरात्रि देते हैं । हेम-
चन्द्र देशी नाममाला में जक्खरत्ति को दीपावली का समानार्थक मानता है । दीवाली ही दीपावली है ।
दीपमाला है । यह नीलमत में वर्णित यक्षरात्रि है । नीलमत दीपमाला अर्थात् दीपावली को यक्षरात्रि अभि-
हित कर उस दिन यक्षो की पूजा का विधान किया है । वाराणसी क्षेत्र में नगर से दस मील दूर जखिनी
ग्राम है । मैने उसपर पहले ध्यान नही दिया । कुछ चलने पर एक मन्दिर मिला । उसमे दखिनी देवी
स्थापित थी । जखिनी शब्द यक्षिणी का अपभ्रंश है । कालान्तर में यक्ष लोगों के मूल स्वरूप को लोग
भूलकर उन्हें मायाकालीन देवता मानने लगे ।
✕ परिशिष्ट 'ङ'
पिशाच
( तरंग १ : १८४ पृष्ठ १२५ )
नीलमतपुराण पिशाचों का कश्मीर में निवास बताता है। आज कल पिशाच का अर्थ भूत, प्रेत
तथा राक्षस लगाया जाता है । पिशाच शब्द का यह अर्थ भ्रामक है ।
: नीलमत बालुकार्णव में पिशाचों के निवास का वर्णन करता है। उनके राजा का नाम
निकुम्भ था ।
✕ : ✕ ✕ ✕
" निकुम्भो नाम धर्मात्मा कुबेरेण तु योजितः ।
चैत्र्यां याति सदा योद्धं पिशाचैर्बहुभिः सह ॥ 205 = २७८
✕ ✕ ✕ ✕
पञ्चकोटयः पिशाचानां निकुम्भस्यानुयायिनाम् ।
गत्वा निकुम्भस्तैः सार्धं षण्मासान् योध्यते सदा ॥ 207 = २७८
✕ ✕ ✕ ✕
तत्रापि कोटयः पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् ॥ 207 = २८०
✕ ✕ ✕ ✕
निकुम्भः पुनरायाति पञ्चकोटिवृतो बली ।
शुक्लाश्वयुक्पञ्चदश्यां नित्यं देवप्रसादतः ॥ 201 = २८२
✕ ✕ ✕ ✕
दत्तेति सहितस्तेन ससैन्येनेह वत्स्यथ ।
षण्मासान् मानवैः सार्धं निकुम्भो निसंते सदा ॥211 = २८४
✕ ✕ ✕ ✕
रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः ।
कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२७-४२८
✕ ✕ ✕ ✕
एतस्मिन्नेव काले तु नीलो नागपतिर्विभुः ।
सेव्यमानो निकुम्बेन पिशाचेन महात्मना ॥ 330 = ४३१
✕ ✕ ✕ ✕
अश्वयुज्यां निकुम्भस्तु निर्भयमायाति काश्यप ।
हत्वा पिशाचान् संग्रामे बालुकार्णवगान् बहून् ॥ 376 = ४८३ ४८४
: ✕ ✕ ✕
९६ राजतरंगिणी
ततः पूजा निकुम्भस्य कर्तव्या पूजारेण तु ।
आदित्यपुत्रो रेवन्तः साश्वैः पूज्यश्च मानवैः ॥ ३४२ = ४८९
x x x x
तस्मिन्नहनि पूर्णार्द्धे निकुम्भस्यानुयायिनः ।
आविशन्ति नरान् सर्वान् पिशाचा घोरदर्शनाः ॥ ३१२ = ४९९-५००
x x x x
तस्यां विप्र चतुर्दश्यां निकुम्भः शंकरं सदा ।
संपूजयति धर्मात्मा सानुयात्रो महाबलः ॥ 553 = ९०५-१०६
x x x x
पूजनीयो निकुम्भस्तु पिशाचाधिपतिर्बली ।
पिशाचानां च दातव्या बलयश्च सुसंस्कृताः ॥ 355 = ६०७-१०८
x x x x
चैत्रमासि सिते पक्षे पञ्चदश्यां द्विजोत्तम ।
योद्धुं याति निकुम्भस्तु पिशाचान्वालुकार्णवे ॥ 659 = ७८१
x x x x
पिशाचं मृण्मयं कृत्वा काक्षं च द्विजसत्तमः
गन्धैर्माल्यैस्तथा वस्त्रैरलङ्कारैश्च पूजयेत् ॥
भक्ष्यैश्च लोपिकापूपैर्मांसैः पानैस्तथैव च ॥ 66 = ७८३-७८४
x x x x
निकुम्भे निर्गते ह्यद्य तथा चैवाप्यनागते ।
षण्मासमध्ये कर्तव्या यात्रा देवगृहे नृपैः ॥ 810 = १०१२-१०१३
x x x x
अक्षोटनागपटकश्च श्येनो वह्लिकाध्वरी ।
क्षीरकुम्भो निकुम्भश्च विकुम्भः समरप्रियः ॥ 953 = ११०१-११०२
वर्णन आता है कि ये ६ मास हिमालय तथा ६ मास शाद्वल अर्थात् हरित भूमि में रहते थे ।
पिशाच का दैत्यों से सहयोग था । वे ६ योजन लम्बे बालुकार्णव के ओसिस में रहते थे । वर्णन
किया गया है कि कुबेर ने पिशाचराज निकुम्भ को उक्त पिशाचों को नियन्त्रण में रखने के लिये आदेश
दिया । निकुम्भ अपने पाँच कोटि पिशाचों के साथ उनसे युद्ध करता था । शेष समय वह हिमालय पर
निवास करता था । कश्यप के शाप के कारण पिशाच ६ मास तक कश्मीर उपत्यका में निवास करते थे ।
चारों युगों के बीत जाने के पश्चात् वे कश्मीर उपत्यका से उत्पाटित हो गये और यहां नाग तथा मानव
निवास करने लगे ।
हिमाचले तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी । नी० ११० = २८३
नानादेशसमुत्थैस्तु ततः प्रभृति मानवैः ।
षण्मासान् वसते देशः षण्मासान् पिशिताशनैः । नी० २२७ = ३०२-३०३
राजतरंगिणी (४ : ७१०) में आश्वयुज का उल्लेख कल्हण ने किया है । पूर्णमासी के दिन करता
परिशिष्ट ङ ९७
हैं। नीलमत में इस दिन के सम्बन्ध में एक प्रथा मिलती है। इस दिन लोग एक दूसरे पर कीचड़ फेंककर
परिहास उत्सव मनाते थे कि पिशाच भय से भाग जाय। क्योंकि पिशाच इस दिन मानव घर में प्रवेश
करना चाहता है। यह प्रथा लोग भूल गये हैं। लोप हो गयी है। कल्हण ने अश्वाज गाली प्रथा का उल्लेख
(७ : १५५१) में किया है। अलबेरूनी ने एक प्रथा का उल्लेख किया है। इसको 'पुहपो' कहते थे। उस
दिन लोग परस्पर परिहास करते थे। पशुओं से खेलते थे। श्री स्टीन ने प्रकट किया है। 'पुहपो' शायद
पिशाच का अपभ्रंश बन गया है। ऋग्वेद में पिशाची शब्द का उल्लेख एक बार किया गया है। अथर्व वेद
में पिशाच शब्द का उल्लेख प्रेत के अर्थ में किया गया है। उसे मानव शत्रु रूप में चित्रित करने का प्रयास
किया गया है। (२:१८:१-५; २:१८:४; ४२०:६-९; ४: ३६ : ४; ४ : ३७ : १०; ५:
२९: ४, ५, १४; ६ : ३२: २; ८ : २ : १२; १२ : १ : ५०)
अथर्व वेद (१ : २५ : ९) में पिशाचों को मांस भोजी बताया गया है। गोपाद ब्राह्मण ( : १: १ :
१०) में पिशाचों के सम्बन्ध में पिशाच वेद तथा आश्वलायन श्रौत सूत्र (१० : ७:६) में पिशाच
विद्या का उल्लेख है। उन्हें किमिदिन तथा यातुधान अथर्व वेद में कहा गया है।
तैत्तिरीय संहिता में वर्णन मिलता है। पिशाचों का उल्लेख असुरों तथा राक्षसों के साथ किया गया
है। काठक संहिता (२७ : २४) में भी इसी प्रकार उल्लेख मिलता है। उन्हें देवों, मनुष्यों तथा पितरों
का विरोधी बताया गया है।
देवा मनुष्याः पितरस्तेऽन्यत आसन्न सुर ।
रक्षांसि पिशाचास्तेऽन्यतः ।
— तैत्तिरीय संहिता काण्ड २ प्रपाठक ४ अनुवाक १
जैमिनी ब्राह्मण में पिशाच को स्पष्ट मानव रूप की संज्ञा दी गयी है। इक्ष्वाकु राजा त्रयारुण की
माता पिशाच कन्या थी।
पिशाची वा इयं त्र्यारुणस्य जाया।
यही बात पंचविंश ब्राह्मण तथा शातायन ब्राह्मण में मिलती है।
बृहद्देवता में उन्हें मानव माना गया है। ये आर्यों के साथ विवाह सम्बन्ध करते थे :
अविन्दन्त पिशाची तां जाया तस्य च भूपतेः। ५:१०
पिशाचीमदहत्त्वां स यत्र चोपविवेश ॥ ५:२२
पुराणों में पिशाच वर्णन मिलता है। उन्हें राक्षस गन्धर्व और नाग जाति के साथ रखा गया है।
ब्रह्माण्ड पुराण में उनके रूप तथा चरित्र का वर्णन किया गया है :
कपिशायाञ्च कूष्माण्डाज्जज्ञिरे च पुनः पुनः ।
मिथुनेन पिशाचांश्च वर्णेन कपिशेन तु ॥
कपिशत्वात् पिशाचास्ते सर्वे च पिशिताशना.।
युग्मानि षोडशाद्यानि चक्ष्मानस्तदन्यः ॥ (ब्रह्माण्डपुराण : ३ : ७ : ३, ४५)
मार्कण्डेय, वायु, ब्रह्माण्ड तथा वामन पुराण में नदियों के उल्लेख के। समय एक 'पिशाचिका' नदी
का भी उल्लेख आया है। यह नदी कहां थी अभी निश्चय नहीं हो सका है। राक्षस, गन्धर्व, दैत्य एवं
१३
५८ राजतरंगिणी
पिशाच एक वर्ग के माने जाते थे । उनमें तथा आर्य मानव में मुख्य भेद उनके रहन-सहन तथा व्यवहार में
था । पिशाच जाति घुमन्तू जाति थी । उसका कोई निश्चित स्थान नही था । वे पशुओ के खाल पहनते थे ।
उनके केश लम्बे होते थे । वे खानाबदोश पर्वतीय जाति थे । उनके आचरण के विषय में ब्रह्माण्ड पुराण में
उल्लेख मिलता है ।
हीना देवैस्त्रिभिः पादैर्गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः ।
गन्धर्वैस्त्र्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः ।
ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः ।
एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ।। ( ३ : ७ : १६७-१६८ )
पिशाचों ने महाभारत के युद्ध में भाग लिया था ।
पिशाचा दरदाश्चैव पुण्ड्राः कुण्डीविषैः सह ।
मद्रका लडकाश्चैव सगणाः परतंगणाः ।
बाह्लिकाश्चिनिराश्चैव चोलाः पाण्ड्याश्च भारत ।
एते जनपदा राजन् दक्षिणं पक्षमाश्रिता ।। ६ : ५६ : ४९-५० ।
राजा दुर्योधन के पक्ष में पिशाच थे ।
त्रीणि सादिसहस्राणि दुर्योधनपुरोगमाः ।
शकाः काम्बोजबाह्लीका यवनाः पारदास्तथा ।
कुणिन्दास्तंगणाश्चैवाः पैशाचाश्च समन्दराः ।
अभ्यद्रवन्त शैनेयं शलभाः पावकं यथा ।
युक्ताश्च पर्वतीयानां रथाः पाषाणयोधिनाम् ।
शूरा पञ्चशते राज्ञा शैनेयं समुपाद्रवन् ।। ८ : ९० : १३ : १५ ।
द्वितीये दिवसे प्राप्ते भीष्मः शान्तनवो युधि ।
आसुरानकरोद् व्यूहान् पैशाचानथ राक्षसान् ।। ६ : १०४-११८ ।
प्रश्न उत्पन्न होता है । पिशाचों का जन्म स्थान तथा उनका प्रदेश कहाँ था । उनके निवास स्थान
और जन्म भूमि के विषय में यथेष्ट प्रमाण प्राप्त हैं । उनसे उनके देश किंवा प्रदेश का निश्चित रूप प्रकट हो
जाता है ।
वायु पुराण पिशाचों का स्थान मेरु पर्वत के दक्षिण दिशाचक्र निश्चित करता है : उनका सम्बन्ध
कुबेर से स्थापित किया गया है । तामेरू, फारमोरक औरमिक के साथ पिशाचों का उल्लेख इसे प्रमाणित
करता है कि ये इन्हीं क्षेत्रों के समीप के रहने वाले थे ।
एष शृंगो महा... गन्धर्वैर्पिशाचकाः ।
यक्षशैलोऽथ वै... ।
इत्येते देवचरिता... ।
दिक्पाला दक्षिणे .. ।। वायु पुराण
।
परिशिष्ट ड ९९
पिशाचके गिरिवरे हर्म्यप्रासादमण्डितम् ।
यक्षगन्धर्वचरितं कुबेरभवनं महत् ॥ वायु० ३९ : ५०
मत्स्य पुराण भी महाभारत के समान पिशाचों का स्थान हिमवत् अर्थात् हिमालय मानता है । महा-
भारत उन्हें पंजाब तथा उत्तरीय हिमालय का निवासी मानता है ।
रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतस्तु ते । ११४ : ८२
मत्स्य पुराण पिशाचों को कश्यप एवं कद्रू की सन्तान मानता है । ( मत्स्य १७१ : ६१ )
पाणिनि सूत्र के परिशिष्ट गण पाठ में अन्य ग्यारह जातियों के साथ पिशाचों का उल्लेख किया
गया है । एक मत है कि राक्षस लोग उत्तरी बलूचिस्तान के चगायी जिला के रहने वाले राशनीस है । भरूत
जाति इसी प्रकार बन्नू जिले की तहसील मरावत के निवासी थे । अशनी तथा कर्पपाण जातियाँ शिनिवारी
तथा करशबुन पूर्वीय हिन्दुकुश क्षेत्र की रहने वाली कही गयी हैं ।
ब्रह्माण्ड पुराण तथा वायु पुराण क्रोधा की कन्या कपिशा का उल्लेख करता है । उसका अपर
नाम क्रोधवशा है । वह पुलह की पत्नी थी । उसी की सन्तान पिशाच हैं । पिशाचों का स्थान ब्रह्माण्ड
पुराण भी हैमवत मानता है ।
पिशाचों के सोलह गणों का वर्णन मिलता है । किन्तु उनका वर्णन काल्पनिक प्रतीत होता है ।
( ब्रह्माण्ड ३ ७:३८१ ) उनके आकृति वर्णन से वे पर्वतीय प्रतीत होते हैं । ( वायु : ५९ : २९२-९६ )
पुराणों में राक्षस, दैत्य, गन्धर्व, नाग जातियों के साथ उनका उल्लेख किया गया है ( मत्स्य: १५२ : ८ )
वे राक्षसों से हीन श्रेणी के धन, सौन्दर्य, आदि में कहे गये हैं । ( ब्रह्माण्ड : ३ ७ १६७-१६८ )
महाभारत उनके स्थान के विषय में कहता है कि पिशाच लोग सरस्वती तट पर तपस्या निमित्त
ठहर गये ।
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशांपते ।
एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः ।
तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये वत्तियः ।
महाभारत युद्ध में पिशाच कौरव तथा पाण्डव दोनों के पक्षो से युद्ध किये थे । उनके एक युद्ध का
नामकरण उन्हीं के नामपर हुआ था । उनके विवाह प्रथा की महाभारत ने निन्दा की है । उनके धार्मिक
कर्म काण्ड की भी निन्दा की गयी है जिसमें जीवित प्राणियों का वध किया जाता था । कुछ पिशाचों ने
सरस्वती के तटपर तपस्या कर हिंसक प्रवृत्ति का त्याग किया था । महाभारत से प्रतीत होता है कि वे पंजाब
तथा उत्तरी हिमालय क्षेत्र में रहते थे ।
पिशाचों के साथ महाभारत में वर्णित सभी जातियों का ऐतिहासिक अस्तित्व ऐतिहासिकों ने मान
लिया है । कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि पिशाचों को भी क्यों न ऐतिहासिक जाति माना जाय । पिशाचों
के साथ दरद, पुण्ड्र, तंगण, परतंगण, बाह्लीक, चोल, पाण्ड्य, शक, कम्बोज, यवन, पारद, कुनिन्द,
अम्बष्ठ आदि जातियों का उल्लेख मिलता है ।
राजतरंगिणी ( ५ : ४६९ ) में उल्लेख मिलता है कि उनके नाम पर पिशाचपुर स्थान था निस्सन्देह
उक्त स्थान पर पिशाचों की प्रचुर आबादी रही होगी ।
उक्त प्रमाणों से निश्चय होता है कि ये मेरु पर्वत के दक्षिण में रहते थे। उनका निवास स्थान हिमालय
पर्वतीय खण्ड था। ब्रह्माण्ड पुराणसे पता चलता है कि पिशाचक पर्वत मेरु के दक्षिण में है। मेरु वर्तमान पामीर
१०० राजतरंगिणी
है। कश्मीर का पुराण इस दिशा का नीलमत है। अतएव उसमें वहां के रहने वाले पिशाचों का अत्यधिक
मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत के पिशाच मानव थे।' अन्य प्रमाणों ने उन्हें गाथा
कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है।
मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर पर्वत, अफगानिस्तान
का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव ।
मरुत को मरवत कहते हैं। यह जिला बन्नू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में मरुत
जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत जाति है।
राक्षसों का निवास स्थान धड़की जिला बलूचिस्तान की उत्तर दिशा में था। उत्तरी बलूचिस्तान में
रक्षानी एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं।
कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके
निवास का वर्णन मिलता है।
यशई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यशई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है।
पंजाब के वाहीक पिशाचों के वंशज माने जाते हैं।
मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गान्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम
भारत था।
उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमवन्त, काश्मीर,
पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दूकुश पर्वत माला में रहते थे।
पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोशकार ने
माना है ।
विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ।
अमरकोश १ : १ : ११
देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। वे हैं— ( १ ) विद्याधर, ( २ ) अप्सरस्, ( ३ ) यक्ष,
( ४ ) रक्षस्, ( ५ ) गन्धर्व, ( ६ ) किन्नर, ( ७ ) पिशाच, ( ८ ) गुह्यक, ( ९ ) सिद्ध, ( १० ) भूत ।
असुरों के १० भेद माने गये हैं :
असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः ।
शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः ।
अमरकोश १:१:१२
( १ ) असुर, ( २ ) दैत्य, ( ३ ) दैतेय, ( ४ ) दनुज, ( ५ ) इन्द्रारि, ( ६ ) दानव, ( ७ )
शुक्रशिष्य, ( ८ ) दितिसुत, पूर्व देव, ( १० ) सुरद्विप ।
पिशाचों को असुर वर्ग में नहीं मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है।
मानव मे पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे ।
( १ ) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ
प्रकार के विवाह—ब्रह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच—स्मृतियों ने माना
परिशिष्ट ङ १०१
हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन
तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह
करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व
(७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है।
· स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच
विवाह माना गया है।
ब्रह्माण्ड पुराण कहता है :
हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः ।
गन्धर्वैभ्यस्त्रिभिः पादैर्हीना गुह्यकराक्षसाः ।
ऐश्वर्यैहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः ।
एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥
३·७·१६७-१६८
· आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पश्राई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफ़रिस्तान में
कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। वे विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग
करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें
पिशाच की संज्ञा दी। मैने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवी शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र
पुस्तकें देखी है। उनमें काफ़रिस्तान तथा चित्रराल के रहने वालो की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र है।
लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास
का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियोँ को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी।
(एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२.९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हनेवे' कहते है। उसका
शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामो को करने वाला कहता
है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे।
पैशाचश्चासुरंश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन । १३:२४१२; १:२९९५
(३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का
श्राद्धादि कर्म नही करते थे। अपितु श्राद्धों को नष्ट करते थे।
· (४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमास भक्षी कहा गया है। शत्रुओ के
रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत-
एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रचलित
हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मास खाते थे। सीमान्त
प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। वे कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीतनर का
कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनकं वहाँ यह रिवाज था कि शत्रु को
मारकर उनका वे रक्त पीते थे। (ओ. डब्लू. लोतनर : लैगुवेज एण्ड रेसेस आफ दर्पिस्त ।)
(५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था।
· (६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना
की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है। · · ·
१०० राजतरंगिणी
है। वश्मीर का पुराना ढंग दिशा का नौलम्त है। अतएव उनमें बसने वाले पिशाचों का अलौकिक
मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत में पिशाच मानव थे। अन्य ग्रन्थों में उन्हें माया
कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है।
मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर गांठ, अफगानिस्तान
का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव ।
मरुत् को मरवत कहते हैं। यह जिला यलू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में गरुत्त
जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत्त जाति है ।
राक्षसों का निवास स्थान पषूफी जिला बलुचिस्तान की उत्तर दिशा में था। इसही बलूचिस्तान में
रक्षासो एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं।
कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके
निवास का वर्णन मिलता है।
यश्र्कई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यश्र्कई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है।
पंजाब के वाह्लीक पिशाचो के वंशज माने जाते हैं।
मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गन्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम
भारत था।
उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमरन्त, काश्मीर,
पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दुकुश पर्वत माला में रहते थे ।
पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोषकार ने
माना है।
विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ।
अमरकोश १ : १ : ११
देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। ये हैं- (१) विद्याधर, (२) अप्सरस्, (३) यक्ष,
(४) रक्षस्, (५) गन्धर्व, (६) किन्नर, (७) पिशाच, (८) गुह्यक, (९) सिद्ध, (१०) भूत ।
असुरों के १० भेद माने गये हैं :
असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः ।
शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः ।
अमरकोश १:१:१२
(१) असुर, (२) दैत्य, (३) दैतेय, (४) दनुज, (५) इन्द्रारि, (६) दानव, (७)
शुक्रशिष्य, (८) दितिसुत, पूर्व देव, (१०) सुरद्विष ।
पिशाचो को असुर वर्ग में नही मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है।
मानव से पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे ।
(१) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ
प्रकार के विवाह-ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच-स्मृतियों ने माना
परिशिष्ट ङ १०१
हैं। प्रथम चार प्रकार के विवाह विहित तथा शेष चार अविहित माने गये हैं। पिशाच विवाह अत्यन्त हीन
तथा निकृष्ट कहा गया है। पति धोखा द्वारा कन्या को प्राप्त कर लेता है। कन्या को धोखा देकर विवाह
करना सभी अवस्थाओं में अनुचित माना गया है। पिशाच विवाह की परिभाषा महाभारत आदि पर्व
(७३:९-१२) में दी गयी है। कन्या को चुरा कर विवाह कर लेना पिशाच विवाह कहा गया है।
स्कन्द पुराण के विवाह संस्कार अध्याय बलपूर्वक कन्या का अपहरण कर विवाह करना पिशाच
विवाह माना गया है।
ब्रह्माण्ड पुराण कहता है :
हीना देवा स्त्रिभिः पादै गन्धर्वाप्सरसः स्मृताः ।
गन्धर्वेभ्यस्त्रिभिः पादैहींना गुह्यकराक्षसाः ।
ऐश्वर्यहीना रक्षोभ्यः पिशाचास्त्रिगुणं पुनः ।
एवं धनेन रूपेण आयुषा च बलेन च ॥
३:७:१६७-१६८
आधुनिक लमगान प्राचीन लम्पक के पड़ोसी पसाई काफिर रहते थे। पिशाच भूमि कफरिस्तान में
कुछ समय पूर्व तक कन्या भगा ले जाकर विवाह करना प्रचलित था। ये विवाह में अश्लील शब्दों का प्रयोग
करते थे। तोरणों को तोड़ देते थे। उनके इन चरित्रों के कारण आर्य होते हुए भी शेष आर्यों ने उन्हें
पिशाच की संज्ञा दी। मैंने पर्यटकों द्वारा लिखित उन्नीसवीं तथा बीसवीं शताब्दी के प्रथम दशक की सचित्र
पुस्तकें देखी हैं। उनमे काफ़रिस्तान तथा चित्राल के रहने वालों की तस्वीरे हैं। उनके रूप विचित्र हैं।
लम्बे-लम्बे बाल हैं। वस्त्र मैला है। निसंदेह यह लोग प्राचीन पिशाचों की संतान है। श्री एम. सी. दास
का कहना है कि तिब्बत में अनेक स्थानों पर लड़कियों को पकड़कर विवाह करने की प्रथा प्रचलित थी।
(एम. सी. दास जे. एम. एस. बी ४२ ९ (२) पैशाची भाषा में पुत्र वधू को 'हुनेवे' कहते हैं। उसका
शाब्दिक अर्थ होता है मारखाने वाली औरत। महाभारत उन्हें न करने योग्य कामों को करने वाला कहता
है। विहित कर्म यज्ञ पिशाच नहीं करते थे।
पैशाचश्चासुराश्चैव न कर्तव्या कदाचन । १३:२४१२; १:२९१५
(३) पिशाचों को पितरों का विरोधी बताया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि वे पितरों का
श्राद्धादि कर्म नहीं करते थे। अपितु श्राद्धो को नष्ट करते थे।
(४) पिशाच लोग युद्ध में शत्रुओं का रक्त पीते थे। उन्हें नरमांस भक्षी कहा गया है। शत्रुओं के
रक्त पीने की प्रथा तिब्बत में भी किसी समय प्रचलित थी। पिशाचों का देश तिब्बत की सीमा पर था अत-
एव यह प्रथा तिब्बत के प्रभाव के कारण पिशाचों अथवा पिशाचों के प्रभाव के कारण तिब्बत में प्रवृत्तित
हो गयी थी। भारतीय आर्य इस प्रथा को अत्यन्त घृणित मानते थे। पिशाच कच्चा मांस खाते थे। कौलन्द
प्रदेश के दरदिस्तान तथा चित्राल पिशाचों का स्थान थे। ये कच्चा मांस खाते थे। डाक्टर लीटनर का
कहना है। दो काफ़िरिस्तान के काफिरों ने स्वीकार किया था कि उनके यहां यह रिवाज था कि शत्रु को
मारकर उनका ये रक्त पीते थे। (जो. डब्लू. लोतनर : लेंगुवेज एण्ड रेसेज आफ़ डार्डिस्टैन्ड ।)
(५) उनका यौन सम्बन्ध अनुचित होता था।
(६) पिशाच भाषा आर्य भाषा थी। महाकवि गुणाढ्य ने पैशाची भाषा में वृहत्कथा की रचना
की थी। कश्मीरी महाकवि सोमदेव भट्ट ने उसे संस्कृत में कथासरित्सागर के नाम से लिखा है।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार ११ भाषाओं की मूल पैशाची भाषा थी ।
प्राकृत भाषा के वैयाकरणों ने पैशाची को भूत भाषा कहा है । पैशाची भाषा की गणना संस्कृत तथा
पाली भाषाओं से किया है । षड् भाषा चन्द्रिका तथा शेषकृष्ण की प्राकृत चन्द्रिका में एकादश भेद बताये
गये हैं । प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषा तुल्य पैशाची भाषा की कवियों ने प्रशंसा की है ।
राजशेखर ने सारस्वतेय पुरुष का वर्णन काव्य मीमांसा में किया है और शरीर की तुलना निम्न-
लिखित रूपक के साथ किया है :
शब्दार्थ—शरीर
संस्कृत—मुख
प्राकृत—बाहु
अपभ्रंश—जघन
पैशाची—पाद
चातुर्वर्ण का वर्णन करते हुए उपमा दिया है कि ब्राह्मण मुख, क्षत्री बाहु, वैश्य उदर तथा शूद्र पाद
है उसी प्रकार राजशेखर ने संस्कृत की ब्राह्मण, प्राकृत की क्षत्री, अपभ्रंश की वैश्य तथा पैशाची की शूद्र से
उपमा दी है । संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ तथा पैशाची को निम्नकोटि की भाषा में रखा है । उक्त चारों
भाषाओं को एक ही शरीर का विभिन्न अंग माना है । इस शरीर की आत्मा मूल आर्य वैदिक भाषा है ।
अहो श्लाघनीयासि शब्दार्थो ते शरीरं संस्कृतं मुखं ।
प्राकृतं बाहू, जघनं अपभ्रंशः पैशाचं पादौ ॥
भाषा का प्रयोजन अन्तर भावना को अभिव्यक्ति करना है । भाषा विचार का पात्र मात्र है । भाषा प्रयो-
जन मानव विचार को समझना है । एक ही अर्थ विभिन्न भाषाओं में विभिन्न उच्चारणों द्वारा प्रकट किये जाते
हैं । उनका कार्य मानसिक भावना, विचार तथा प्रयोजन को प्रकट करना है । शरीर की उपमा शब्दार्थ से
इसीलिए दी गयी है । शब्द किसी भाषा किसी लिपि में लिखा जाकर अर्थ का द्योतक होता है । अतएव,
राजशेखर ने शब्दार्थ को शरीर माना है । पैशाची भाषा को सरल भाषा की कोटि में रखा है ।
'सुभव्योऽपभ्रंशः सरलरचनं भूतवचनम् ।' इसी प्रकार गुणाढ्य कृत वृहत्कथा की भाषा के विषय
में कहा गया है—भूतभाषामयी प्राहुरद्भुता तां वृहत्कथाम् ।' मूलग्रन्थ इस समय उपलब्ध नहीं है । इसकी
निकटवर्ती पस्तो तथा दरद भाषायें हैं ।
अपभ्रंश कवि 'अब्दुर्रहमान' ने 'संदेह रासक' में पैशाची भाषा की कविता का आदर पूर्ण शब्दों में
उल्लेख किया है ।
अवहट्ठय सक्कय पाइडअम्मि पेसाइ अम्पिभासाए लक्खणछन्दारहणो सुकइत्तं भूतियं जेहि - ।
भूत शब्द राक्षस तथा पिशाच के साथ जोड़ा गया है । 'भूत वचन' 'भूतभाषित' 'भौतिकी' आदि शब्द पैशाची
भाषा के पर्याय स्वरूप वर्णन किये गये हैं ।
भोजदेव ने उत्तम पात्रों को पैशाची भाषा बोलने का निषेध किया है—'नाद्युत्तमपात्रप्रयोज्या
पैशाची ।
धनिक धनंजय ने 'दशरूपक' में पैशाची को नीच पात्रों द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा है ।
पिशेल किंवा पिशाच भाषा को जनता द्वारा बोली जाने वाली भाषा कहा गया है । मालूम होता
है । पंडित तथा सुसंस्कृत सभ्य समाज की भाषा संस्कृत मानी जाती थी । पश्चिम उत्तर हिमालय पर्वताश्रयी
परिशिष्ट ङ १०३
प्रदेशों में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ग्रामीण भाषा पैशाची थी । आजकल राष्ट्रभाषा हिन्दी का रूप वह
नहीं है जो भोजपुरी, मगधी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के ग्रामों में बोली जाती है ।
देश के अनुसार भाषा स्थानीय रूप ले लेती है । यह अवस्था मूल वैदिक भाषा की कालान्तर में हो गयी ।
वह विभिन्न स्थानों में विविध रूप लेकर स्थानीय रंग के साथ रंग पकड़ने लगी ।
पैशाची भाषा को दरद भाषा भी कहा जाता है। यह उचित ही मालूम पड़ता है । नाग लोग
कश्मीर के मूल निवासी थे । पिशाच कश्मीर के उत्तर-पश्चिम से आये थे । दरदिस्तान इस दिशा में
पड़ता है । अतएव भाषा का पैशाची से साम्य,होना स्वाभाविक है ।
पैशाची रूप चूलिका पैशाची है । पांचाल पैशाची तथा शौरसेनी पैशाची है । वररुचि ने प्राकृत
प्रकाश में 'प्रकृतिः शौरसेनी' कहा है । शौरसेनी को पैशाची भाषा का आधार माना है । शौरसेनी भाषा
ब्रज मण्डल अर्थात् मथुरा के समीपस्थ प्रदेश में बोली जाती थी । आधुनिक खड़ी बोली की एक प्रकार से
जनक मानी जाती है । शौरसेन में प्रचलित प्राकृत भाषा संस्कृत की अपभ्रंश के अतिरिक्त और क्या हो
सकती है ।
पैशाची भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता है । पुरुषोत्तम कहते हैं संस्कृत शौरसेन्यो विकृति :-
( १९: ३) । संस्कृत और शौरसेनी भाषा का प्रकृत रूप पैशाची भाषा है ।
पैशाची भाषा के अक्षरों के उच्चारण में किंचित् अन्तर हो जाता है । पैशाची भाषा में 'ण' के
स्थान पर 'न' का प्रयोग करते हैं । गुण को गुन, गणना को गनना कहते हैं । शुद्ध संस्कृत से पैशाची प्रच-
लित हिन्दी के बहुत समीप आ जाती है । संस्कृत के 'इव' के स्थान पर 'यिव' हो जाता है । 'ष' का 'स',
'क' का 'ग', 'च' का 'ज', 'ज्ञ' का 'ञ्ज', उच्चारण होने लगता है ।
चण्ड ने प्राकृतिक लक्षण में 'ण' के स्थान पर 'न' तथा 'र' के स्थान पर 'ल' होने का प्रयोग किया
है । 'अरे' का 'अले', 'र्म' के स्थान पर 'म्म' प्रयुक्त होता है । जैसे 'धर्म' के स्थान पर 'धम्म' । 'गत्वा' के
स्थान पर 'गन्तू' पांडित्य के स्थान पर 'पंडितून' । इसी प्रकार 'क्ष' के स्थान पर 'ख' हो जाता है । 'फल'
का 'फर' हो जाता है ।
पिशाचराज निकुम्भ का वर्णन नीलमत पुराण में आता है । उसे कश्मीर के राजनीतिक तथा
सामाजिक जीवन में हाथ बँटाते देखते हैं । पिशाचराज निकुम्भ से तथा चन्द्रदेव ब्राह्मण से सम्बन्ध
अच्छा था ।
मम वाक्यमनादृत्य यस्मादृष्टं प्रभाषथ ।
तस्मात्पिशाचैः सहिता वत्स्यध्वं नात्र संशयं ॥ 201 = २६७ २६८
× × ×
तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः ।
तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ 204 = २७७ २७८
× × ×
तत्र कोट्यश्च पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् । 207 = २८०
× × ×
१०४ राजतरंगिणी
न पिशाचैस्तु वत्स्यामो दारुणैर्दाह्यप्रियैः ।
एवं ब्रुवति नागेन्द्रे नीलं विष्णुरभाषत ॥ 213 = २८६
x x x
अल्पवीर्या पिशाचाश्च भविष्यन्तीह सर्वदा ।
वीर्योपेता गमिष्यन्ति षण्मासं यातुज्ञानेवम् ॥ 215 = २८८
x x x
पिशाचैः सह संपर्कस्तत्र नित्यं यदा नृणाम् ।
तदा तेषां मतिः पापात्सततं नापसर्पति ॥ 244 = ३३१
x x x
रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः ।
कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२८
x x x
हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः संपीड्यमानो द्विजवृद्धवर्यः ।
यग्राम तत्रैव विमूढचेता श्रमन्ययौ यत्र स नागराजः ॥ 328 = ४२९
x x x
दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह ।
वर्जनीयं तदा मांसं प्रयत्नादपि काश्यप ॥ 447 = ५५८, ५५७
x x x
वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः ।
नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गुरुदासणी ॥ 586 = ७०७
x x x
पूज्याः पिशाचाश्च तथा बलिपूर्वेण कर्मणा ।
देशानुसारः कर्तव्यो जनः कार्यः स्वधिष्ठितः ॥ 837 = १०००-१०१०
पुराणो में निकुम्भ को इक्ष्वाकुवंशीय हर्यश्व राजा का पुत्र माना गया है ।
विष्णु पुराण ४ : २ : १३; वायु पुराण ८८ : ६२; भागवतपुराण ६ : ९ : २४-२५; मत्स्य पुराण
१२ : ३३; पद्म पुराण : ८ ।
महाभारत निकुम्भ को प्रह्लाद का तृतीय पुत्र (आदि पर्व ६५ : १९) तथा एक विख्यात दानव
(आदि पर्व ६५ : २६) और हिरण्यकश्यप के कुल में उत्पन्न सुन्द उपसुन्द के पिता रूप में चित्रित
करता है । (आदि पर्व २०८ : २-३), शल्य पर्व (४५ : ५६) के अनुसार यह स्कन्द का एक सैनिक
था । रामायण में निकुम्भ एक राक्षस योद्धा था । इसका वध नील ने किया था । (वाल्मीकीय रामायण युद्ध
काण्ड ७३) । निकुम्भ नाम के अनेक व्यक्तियों का उल्लेख पुराणों में आया है । परन्तु इक्ष्वाकुवंशीय
परिशिष्ट ङ १०५
निकुम्भ के स्थलों के अतिरिक्त सभी राक्षसादि वर्ग में रखे गये हैं। कश्मीर के नीलमत पुराण ने उसे
पिशाचवंशीय माना है ।
पिशाच आर्य जाति की एक शाखा है । पर्वतीय प्रदेशो में निवास करती थी । हिन्दुकुश,
कपिशा, कफरिस्तान, गान्धार, चितराल, कश्मीर के उत्तर तथा पामीर के दक्षिण बिखरे हुए थे। उनके
रूप का वर्णन तथा उनका चित्र पर्यटकों ने उक्त क्षेत्रों के लोगों का उन्नीसवी तथा बीसवी शताब्दी के
आरम्भ में लिया है । उसे देखने से स्पष्ट होता है कि वे प्राचीनकालीन पिशाच जाति के वंशज हैं। उनका
लम्बा बाल रखना, धर्म के प्रति कम आस्था, स्नानादि से दूर रहना, अश्लील शब्दो का विवाह काल में
प्रयोग, कन्या को भगा ले जाकर विवाह कर लेना यह सब बातें कुछ दिन पूर्व तक प्रचलित थी। वे खाल
के नमस्तीन आदि पहनते हैं । पोस्तीन अर्थात् भैंड़ों के कोमल बाल वाले खालों के वस्त्र तथा टोपी साधा-
रणतया प्रयोग करते हैं । कच्चा मांस पूर्वकाल में खाते थे । घुमन्तू जाति थे। जानवरों को पालना मुख्य
उद्यम था।
मैं अक्टूवर मास में कश्मीर दो बार इसका अध्ययन करने के लिए गया। मैंने देखा कि नीलमत
में वर्णित प्रथा अभी तक चली आती है। बकरियों, भैंड़ों, जानवरों और टट्टुओं पर समस्त गृहस्थी रखे वे
शीत ऋतु में पर्वतों से नीचे मैदान में उतरते हैं। उनके बाल लम्बे होते हैं। मुसलमान धर्म स्वीकार कर
लेने के कारण उनके पूर्व जीवन में विशेष परिवर्तन हो गया है। परन्तु उनका रहन-सहन, उनका
व्यवहार, उनकी भाषा पैशाची से मिलती है ।
पिशाच जाति आर्यों की शाखा होने पर भी अपने कर्मों के कारण, सभ्य समाज से दूर होने के
कारण, शेष भारत से कालान्तर में सम्बन्ध न होने के कारण, दुर्गम शीत प्रधान उपत्यकाओ में रहने के
कारण आर्य धर्म पालन में तथा युग के साथ चलने में असमर्थ हो गयी । उनके कर्मों के कारण उनका नाम
पिशाच रख दिया गया ।
वायु पुराण (अ० ९७ : ५५) के अनुसार—ब्रह्मा ने सर्व प्रथम देव, असुर, पित्र तथा प्रजा नामक
चार प्रकार की सृष्टि की । स्थावर-चरादि अन्यान्य भूतों को उत्पन्न किया । यक्ष, पिशाच, नर, किन्नर,
अप्सरा, गन्धर्व, राक्षस, पक्षी, पशु, मृग, उरग, अव्यय, व्यय, स्थावर, जंगम आदि समस्त पदार्थों को
बनाया ।
भगवान् शंकर देवी पार्वती के साथ कैलास पर थे। वहां विविध रूप धारण करने वाले नाना
प्रकार के भूत, भयंकर मायावी पिशाच, अनेक प्रकार के अस्त्रों से सुसज्जित अग्नि तुल्य दीप्त भगवान् की
सेवा कर रहे थे।
वायु पुराण (अ० ३१) में देव वंश का वर्णन है। उसमें असुर, सुपर्ण, यक्ष, गन्धर्व, पिशाच,
उरग, राक्षस, पित्र तथा नासत्य आठों को देव योनि माना गया है। वायु पुराण (३९:५७) में
पिशाच नामक गिरि का वर्णन किया गया है। उस पर कुबेर का भवन है। उसने कोठे तथा छत थे ।
यक्ष तथा गन्धर्व विचरण करते थे । अध्याय ४२:३१ में पिशाचक पर्वत का वर्णन पुनः अलकनन्दा
नदी के प्रसंग मे किया गया है। अलकनन्दा समुद्र की ओर हिमालय से गिरती, बहती जाती है।
नदी का रंग इस यात्रा में स्थान भेद से परिवर्तित हो जाता है। वह ताम्राभ से श्वेतोहर, सुमूल, वसुधा,
हेमकूट, देवशृंग, शैलश्रेष्ठ पिशाचक, पंचकूट, देव निवास, कैलास के शिखर कन्दरामय पार्श्व देश से बहती;
अचलोत्तम हिमालय पर गिरती; शैलो, स्थलों को सींचती, वनों एवं कन्दराओ को आर्द्र करती, दक्षिण
समुद्र में गिरती है ।
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