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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 899, कुल 984 में से

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पृष्ठ 899

९२ राजतरंगिणी
रामायण में सुग्रीव ने बन्दरों को सीता के खोजने के लिए जिन देशों तथा जातियों का नाम लिया
था उनमें यक्ष का भी नाम है। यह जाति कैलास के समीप उत्तर में निवास करती थी । ( वाल्मीकि
रामायण किष्किन्धा काण्ड सर्ग ४३ श्लोक २१-२३ । )
मत्स्य पुराण ( अध्याय १२१ ) में यक्षों के निवासस्थान के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है—'कैलास
पर्वत के पूर्व और उत्तर दिशा में दिव्य सुवेल नामक पर्वत तक फैला रत्नों की तरह जाज्वल्यमान गन्धप्रभ
गिरि है। उसके समीप अच्छोद सरोवर है। उस सर से अच्छोद नदी निकली है। नदी के तट पर के चैत-
रथ वन है। उसके समीपस्थ पर्वत पर मणिभद्र क्रूरकर्मा यक्ष सेनापति गुह्यकों से रक्षित निवास करता है।'
'कैलास के दक्षिण और पूर्व दिशा में हेमशृङ्ग दिवा लोहित नामक एक महान् पर्वत है। उसके
तट पर विशोक वन है। वहाँ मणिधर यक्ष परम धार्मिक एवं सौम्य गुह्यकों द्वारा रक्षित निवास करता है।
ककुद्मी कैलास के पश्चिम ककुद्मान पर्वत पर रुद्र के यूप (अग्निवेश्वर) की उत्पत्ति हुई थी।
त्रिककुद के सम्मुख त्रैककुद कज्जल तुल्य शैल है। वहाँ वैद्युत पर्वत है। उसके पाद में दिव्य मानस सरोवर
है। उससे सरयू नदी निकली है। उसके तट पर नैभ्राज दिव्य वन है। यहां प्रहेति का पुत्र कुबेर का सेवक
ब्रह्मघाती पौरुषशाली राक्षस निवास करता है।
वायु पुराण अध्याय ३९ में यक्षों का निवास स्थान दिया गया है। शतशृंग पर्वत पर अत्यन्त यशो
यक्षो के सौ पुर हैं। वायु पुराण अध्याय ६९ में यक्षों के विषय में उल्लेख है—
'पुण्यजन नामक यक्ष, गुह्यक नाम से प्रसिद्ध यक्ष, एवं देवजन नामक यक्षादि गुह्यकों के अन्तर्गत
हैं। अगस्त्य, पौलस्त्य तथा विश्वामित्र के गोत्रों में उत्पन्न होने वाले राक्षस तथा यक्षों के राजा कुबेर हैं।
अलका नगरी के कुबेर अधीश्वर हैं। यक्ष केवल आँखों से देखकर रक्त मास एवं चर्बी पी जाते हैं। राक्षस
शरीर के भीतर प्रवेश कर पी जाते हैं। पिशाच पीडित कर पीते हैं। सभी लक्षणों से सम्पन्न देवताओं के
समान अधिकारी, तेजस्वी, बलवान, ऐश्वर्यशाली, इच्छानुसार रूप धारण करने वाले, शक्तिशाली, विक्रमी,
लोकों द्वारा पूजनीय, सूक्ष्म स्वरूप धारण करने वाले, तेजस्वी, यक्षादि के योग्य वरदान देने वाले, यज्ञ परा-
यण एवं देवताओ के समान धर्मात्मा होते हैं, उन्हें असुर कहा जाता है।
गन्धर्वों का प्रभाव देवताओ की अपेक्षा हीन-चौथाई हीन होता है। अर्थात् गन्धर्कों में देवताओं का
चतुर्थांश प्रभाव है। गुह्यक का प्रभाव गन्धर्वों के प्रभाव का चतुर्थांश होता है। अर्थात् गुह्यकों में केवल
सोलहवां भाग देवताओ का प्रभाव शेष रहता है। राक्षसों का प्रभाव गुह्यकों अर्थात् यक्षों तुल्य होता है।
पिशाचों का प्रभाव यक्षों से तीन गुना हीन होता है। रूप, आयु, बल, धर्म, ऐश्वर्य, बुद्धि, तपस्या, शास्त्र,
बल एवं पराक्रम में गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पिशाच चार देवयोनियों में उत्पन्न होने वाले वर्ग सुर तथा असुरों
की अपेक्षा हीन होते हैं।
उक्त उद्धरणों से यक्षों के सम्बन्ध में कुछ बातें स्पष्ट होती हैं। (१) यक्ष देवयोनि मे थे। ये
मानव थे। (२) उन्हें गन्धर्व, राक्षस तथा पिशाचों के वर्ग में रखा गया है। (३) सुरों की अपेक्षा
असुरों के वर्ग में उन्हें रखा गया है। (४) वे हिमालय निवासी थे। (५) उनका आवास कैलास के
समीप था। (६) उनका आसुरी आचरण मांसादि खाने तथा रक्तपात करने का था। (७) किन्तु
कालान्तर में वे शिव के अनुयायी होकर शैवमतावलम्बी हो गये थे । (८) कुबेर उनका राजा था। (९)
वे युद्ध में भाग लेते थे। (१०) क्रूरकर्मा थे। (११) मत परिवर्तन के कारण शिव के गण बन गये