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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 906, कुल 984 में से

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पृष्ठ 906

परिशिष्ट ड ९९
पिशाचके गिरिवरे हर्म्यप्रासादमण्डितम् ।
यक्षगन्धर्वचरितं कुबेरभवनं महत् ॥ वायु० ३९ : ५०
मत्स्य पुराण भी महाभारत के समान पिशाचों का स्थान हिमवत् अर्थात् हिमालय मानता है । महा-
भारत उन्हें पंजाब तथा उत्तरीय हिमालय का निवासी मानता है ।
रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतस्तु ते । ११४ : ८२
मत्स्य पुराण पिशाचों को कश्यप एवं कद्रू की सन्तान मानता है । ( मत्स्य १७१ : ६१ )
पाणिनि सूत्र के परिशिष्ट गण पाठ में अन्य ग्यारह जातियों के साथ पिशाचों का उल्लेख किया
गया है । एक मत है कि राक्षस लोग उत्तरी बलूचिस्तान के चगायी जिला के रहने वाले राशनीस है । भरूत
जाति इसी प्रकार बन्नू जिले की तहसील मरावत के निवासी थे । अशनी तथा कर्पपाण जातियाँ शिनिवारी
तथा करशबुन पूर्वीय हिन्दुकुश क्षेत्र की रहने वाली कही गयी हैं ।
ब्रह्माण्ड पुराण तथा वायु पुराण क्रोधा की कन्या कपिशा का उल्लेख करता है । उसका अपर
नाम क्रोधवशा है । वह पुलह की पत्नी थी । उसी की सन्तान पिशाच हैं । पिशाचों का स्थान ब्रह्माण्ड
पुराण भी हैमवत मानता है ।
पिशाचों के सोलह गणों का वर्णन मिलता है । किन्तु उनका वर्णन काल्पनिक प्रतीत होता है ।
( ब्रह्माण्ड ३ ७:३८१ ) उनके आकृति वर्णन से वे पर्वतीय प्रतीत होते हैं । ( वायु : ५९ : २९२-९६ )
पुराणों में राक्षस, दैत्य, गन्धर्व, नाग जातियों के साथ उनका उल्लेख किया गया है ( मत्स्य: १५२ : ८ )
वे राक्षसों से हीन श्रेणी के धन, सौन्दर्य, आदि में कहे गये हैं । ( ब्रह्माण्ड : ३ ७ १६७-१६८ )
महाभारत उनके स्थान के विषय में कहता है कि पिशाच लोग सरस्वती तट पर तपस्या निमित्त
ठहर गये ।
यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशांपते ।
एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः ।
तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये वत्तियः ।
महाभारत युद्ध में पिशाच कौरव तथा पाण्डव दोनों के पक्षो से युद्ध किये थे । उनके एक युद्ध का
नामकरण उन्हीं के नामपर हुआ था । उनके विवाह प्रथा की महाभारत ने निन्दा की है । उनके धार्मिक
कर्म काण्ड की भी निन्दा की गयी है जिसमें जीवित प्राणियों का वध किया जाता था । कुछ पिशाचों ने
सरस्वती के तटपर तपस्या कर हिंसक प्रवृत्ति का त्याग किया था । महाभारत से प्रतीत होता है कि वे पंजाब
तथा उत्तरी हिमालय क्षेत्र में रहते थे ।
पिशाचों के साथ महाभारत में वर्णित सभी जातियों का ऐतिहासिक अस्तित्व ऐतिहासिकों ने मान
लिया है । कोई कारण नहीं प्रतीत होता कि पिशाचों को भी क्यों न ऐतिहासिक जाति माना जाय । पिशाचों
के साथ दरद, पुण्ड्र, तंगण, परतंगण, बाह्लीक, चोल, पाण्ड्य, शक, कम्बोज, यवन, पारद, कुनिन्द,
अम्बष्ठ आदि जातियों का उल्लेख मिलता है ।
राजतरंगिणी ( ५ : ४६९ ) में उल्लेख मिलता है कि उनके नाम पर पिशाचपुर स्थान था निस्सन्देह
उक्त स्थान पर पिशाचों की प्रचुर आबादी रही होगी ।
उक्त प्रमाणों से निश्चय होता है कि ये मेरु पर्वत के दक्षिण में रहते थे। उनका निवास स्थान हिमालय
पर्वतीय खण्ड था। ब्रह्माण्ड पुराणसे पता चलता है कि पिशाचक पर्वत मेरु के दक्षिण में है। मेरु वर्तमान पामीर