राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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न पिशाचैस्तु वत्स्यामो दारुणैर्दाह्यप्रियैः ।
एवं ब्रुवति नागेन्द्रे नीलं विष्णुरभाषत ॥ 213 = २८६
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अल्पवीर्या पिशाचाश्च भविष्यन्तीह सर्वदा ।
वीर्योपेता गमिष्यन्ति षण्मासं यातुज्ञानेवम् ॥ 215 = २८८
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पिशाचैः सह संपर्कस्तत्र नित्यं यदा नृणाम् ।
तदा तेषां मतिः पापात्सततं नापसर्पति ॥ 244 = ३३१
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रज्जुबद्धेन तु यथा पक्षिणा नृपदारकाः ।
कल्पमानाः पिशाचैस्तु निर्वेदं परमं ययौ ॥ 327 = ४२८
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हिमेन शीतेन तथा पिशाचैः संपीड्यमानो द्विजवृद्धवर्यः ।
यग्राम तत्रैव विमूढचेता श्रमन्ययौ यत्र स नागराजः ॥ 328 = ४२९
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दैत्यदानवयक्षाश्च पिशाचाः राक्षसैः सह ।
वर्जनीयं तदा मांसं प्रयत्नादपि काश्यप ॥ 447 = ५५८, ५५७
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वेदोपवेदवेदाङ्गविद्यास्थानानि कृत्स्नशः ।
नागा यक्षाः पिशाचाश्च तथैव गुरुदासणी ॥ 586 = ७०७
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पूज्याः पिशाचाश्च तथा बलिपूर्वेण कर्मणा ।
देशानुसारः कर्तव्यो जनः कार्यः स्वधिष्ठितः ॥ 837 = १०००-१०१०
पुराणो में निकुम्भ को इक्ष्वाकुवंशीय हर्यश्व राजा का पुत्र माना गया है ।
विष्णु पुराण ४ : २ : १३; वायु पुराण ८८ : ६२; भागवतपुराण ६ : ९ : २४-२५; मत्स्य पुराण
१२ : ३३; पद्म पुराण : ८ ।
महाभारत निकुम्भ को प्रह्लाद का तृतीय पुत्र (आदि पर्व ६५ : १९) तथा एक विख्यात दानव
(आदि पर्व ६५ : २६) और हिरण्यकश्यप के कुल में उत्पन्न सुन्द उपसुन्द के पिता रूप में चित्रित
करता है । (आदि पर्व २०८ : २-३), शल्य पर्व (४५ : ५६) के अनुसार यह स्कन्द का एक सैनिक
था । रामायण में निकुम्भ एक राक्षस योद्धा था । इसका वध नील ने किया था । (वाल्मीकीय रामायण युद्ध
काण्ड ७३) । निकुम्भ नाम के अनेक व्यक्तियों का उल्लेख पुराणों में आया है । परन्तु इक्ष्वाकुवंशीय