राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 912, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ङ १०३
प्रदेशों में बोलचाल में प्रयुक्त होने वाली ग्रामीण भाषा पैशाची थी । आजकल राष्ट्रभाषा हिन्दी का रूप वह
नहीं है जो भोजपुरी, मगधी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान तथा मध्यप्रदेश के ग्रामों में बोली जाती है ।
देश के अनुसार भाषा स्थानीय रूप ले लेती है । यह अवस्था मूल वैदिक भाषा की कालान्तर में हो गयी ।
वह विभिन्न स्थानों में विविध रूप लेकर स्थानीय रंग के साथ रंग पकड़ने लगी ।
पैशाची भाषा को दरद भाषा भी कहा जाता है। यह उचित ही मालूम पड़ता है । नाग लोग
कश्मीर के मूल निवासी थे । पिशाच कश्मीर के उत्तर-पश्चिम से आये थे । दरदिस्तान इस दिशा में
पड़ता है । अतएव भाषा का पैशाची से साम्य,होना स्वाभाविक है ।
पैशाची रूप चूलिका पैशाची है । पांचाल पैशाची तथा शौरसेनी पैशाची है । वररुचि ने प्राकृत
प्रकाश में 'प्रकृतिः शौरसेनी' कहा है । शौरसेनी को पैशाची भाषा का आधार माना है । शौरसेनी भाषा
ब्रज मण्डल अर्थात् मथुरा के समीपस्थ प्रदेश में बोली जाती थी । आधुनिक खड़ी बोली की एक प्रकार से
जनक मानी जाती है । शौरसेन में प्रचलित प्राकृत भाषा संस्कृत की अपभ्रंश के अतिरिक्त और क्या हो
सकती है ।
पैशाची भाषा में संस्कृत शब्दों की बहुलता है । पुरुषोत्तम कहते हैं संस्कृत शौरसेन्यो विकृति :-
( १९: ३) । संस्कृत और शौरसेनी भाषा का प्रकृत रूप पैशाची भाषा है ।
पैशाची भाषा के अक्षरों के उच्चारण में किंचित् अन्तर हो जाता है । पैशाची भाषा में 'ण' के
स्थान पर 'न' का प्रयोग करते हैं । गुण को गुन, गणना को गनना कहते हैं । शुद्ध संस्कृत से पैशाची प्रच-
लित हिन्दी के बहुत समीप आ जाती है । संस्कृत के 'इव' के स्थान पर 'यिव' हो जाता है । 'ष' का 'स',
'क' का 'ग', 'च' का 'ज', 'ज्ञ' का 'ञ्ज', उच्चारण होने लगता है ।
चण्ड ने प्राकृतिक लक्षण में 'ण' के स्थान पर 'न' तथा 'र' के स्थान पर 'ल' होने का प्रयोग किया
है । 'अरे' का 'अले', 'र्म' के स्थान पर 'म्म' प्रयुक्त होता है । जैसे 'धर्म' के स्थान पर 'धम्म' । 'गत्वा' के
स्थान पर 'गन्तू' पांडित्य के स्थान पर 'पंडितून' । इसी प्रकार 'क्ष' के स्थान पर 'ख' हो जाता है । 'फल'
का 'फर' हो जाता है ।
पिशाचराज निकुम्भ का वर्णन नीलमत पुराण में आता है । उसे कश्मीर के राजनीतिक तथा
सामाजिक जीवन में हाथ बँटाते देखते हैं । पिशाचराज निकुम्भ से तथा चन्द्रदेव ब्राह्मण से सम्बन्ध
अच्छा था ।
मम वाक्यमनादृत्य यस्मादृष्टं प्रभाषथ ।
तस्मात्पिशाचैः सहिता वत्स्यध्वं नात्र संशयं ॥ 201 = २६७ २६८
× × ×
तत्र सन्ति पिशाचा ये दैत्यपक्षाः सुदारुणाः ।
तेषां तु निग्रहार्थाय पिशाचाधिपतिर्बली ॥ 204 = २७७ २७८
× × ×
तत्र कोट्यश्च पञ्चैव पिशाचानां दुरात्मनाम् । 207 = २८०
× × ×