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सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 909, कुल 984 में से

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पृष्ठ 909

१०० राजतरंगिणी
है। वश्मीर का पुराना ढंग दिशा का नौलम्त है। अतएव उनमें बसने वाले पिशाचों का अलौकिक
मौलिक वर्णन होना स्वाभाविक है। इसलिये नीलमत में पिशाच मानव थे। अन्य ग्रन्थों में उन्हें माया
कालीन तथा काल्पनिक व्यक्ति अनभिज्ञता के कारण बना दिया है।
मेरु पर्वत के विषय में तीन पर्वतों का नाम लिया जाता है। वर्तमान पामीर गांठ, अफगानिस्तान
का मरव पहाड़ी प्रदेश तथा उत्तरी ध्रुव ।
मरुत् को मरवत कहते हैं। यह जिला यलू में मरवत तहसील है। हिन्दुकुश के पूर्वीय भाग में गरुत्त
जाति का रहना कहा जाता है। मरवत तहसील की मरवत जाति प्राचीन ग्रन्थों में वर्णित मरुत्त जाति है ।
राक्षसों का निवास स्थान पषूफी जिला बलुचिस्तान की उत्तर दिशा में था। इसही बलूचिस्तान में
रक्षासो एक बड़ा कबीला है। प्राचीन राक्षस वंश की संतानें हैं।
कपिशा पिशाचों की मातृ-भूमि कही जाती है। काफिरिस्तान तथा उसके समीपवर्ती देश में उनके
निवास का वर्णन मिलता है।
यश्र्कई काफिरिस्तान का एक कबीला है। यश्र्कई शब्द पिशाच का अपभ्रंश मालूम होता है।
पंजाब के वाह्लीक पिशाचो के वंशज माने जाते हैं।
मिलिन्द पन्ह से भी प्रकट होता है कि पिशाचों का निवास स्थान गन्धार कश्मीर उत्तर-पश्चिम
भारत था।
उनके निवास स्थान के विषय में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उत्तर कुरु, हिमरन्त, काश्मीर,
पंजाब, काफिरिस्तान, पामीर पर्वत के दक्षिण तथा पूर्वीय हिन्दुकुश पर्वत माला में रहते थे ।
पिशाच मानव थे। सुर तथा असुर योनियों में पिशाच जाति को 'देवयोनयः' अमर कोषकार ने
माना है।
विद्याधराप्सरो - यक्ष - रक्षो - गन्धर्व - किन्नराः ।
पिशाचो गुह्यको सिद्धो भूतोऽमी देवयोनयः ।
अमरकोश १ : १ : ११
देवताओं की जाति के १० भेद माने गये हैं। ये हैं- (१) विद्याधर, (२) अप्सरस्, (३) यक्ष,
(४) रक्षस्, (५) गन्धर्व, (६) किन्नर, (७) पिशाच, (८) गुह्यक, (९) सिद्ध, (१०) भूत ।
असुरों के १० भेद माने गये हैं :
असुरा दैत्य-दैतेय-दनुजेन्द्रारि-दानवाः ।
शुक्रशिष्या दितिसुताः पूर्वदेवाः सुरद्विषः ।
अमरकोश १:१:१२
(१) असुर, (२) दैत्य, (३) दैतेय, (४) दनुज, (५) इन्द्रारि, (६) दानव, (७)
शुक्रशिष्य, (८) दितिसुत, पूर्व देव, (१०) सुरद्विष ।
पिशाचो को असुर वर्ग में नही मानकर उन्हें देव वर्ग में रखा गया है। प्रश्न उपस्थित होता है।
मानव से पिशाच लोग हीन क्यों माने जाने लगे ।
(१) पिशाच लोगों की विवाह प्रथा तिरस्कृत मानी गयी है। उसे दूषित कहा गया है। आठ
प्रकार के विवाह-ब्रह्म, देव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस, तथा पिशाच-स्मृतियों ने माना