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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

१८४ राजतरंगिणी

दो मातृकाओं का नाम नहीं दिया गया है। (म०
भा० : २१६:२६-४१)
पहली शताब्दी से मातृका पूजन का स्पष्ट
उल्लेख मिलता है। वराहमिहिर के वृहत्संहिता में
इसका स्पष्ट उल्लेख है। (५८:५६) मृच्छकटिक
नाटक तथा स्कन्दगुप्त के बिहार के शिलालेख में
मातृका पूजन का निर्देश प्राप्त है। चालुक्य एवं
कदंब राजवंश मातृका के उपासक थे। मालवा
के विश्वकर्मन राजा के अमात्य मयूराक्ष ने सन्
४२३ ई० में मातृकाओं का एक मन्दिर निर्माण
कराया था। पश्चिमी एशिया के 'ट्रो' संस्कृति में
प्राचीन काल से मातृका पूजा प्रचलित थी। मोहं-
जोदड़ो तथा हड़प्पा स्थित सिन्धु संस्कृति में मातृका
पूजा प्रचलित थी। इन संस्कृतियों की जो मुद्राएं
प्राप्त हुई हैं उनमें मूर्ति के सम्मुख नर किंवा पशुबलि
के चित्र अंकित हैं।
मातृकाओं की प्रतिमाओ की पूजा समस्त भारत
में प्रचलित थी। इनका स्वरूप, अर्धनग्न, एवं
शिरोभूषण, कण्ठहार, तथा मेखला युक्त प्रदर्शित
किया गया है।
उदयपुर संग्रहालय में मातृकाओं की अनेक
मूर्तियां हैं। उनकी विशेषता यह है कि प्रत्येक
मातृका मूर्ति के साथ एक नवजात शिशु बना रहता
है। यही कारण है कि शिशु के जन्म के प्रथम दिनों
तक मातृ पूजा का विधान मिलता है।
कल्हण ने मातृचक्र का उल्लेख राजतरंगिणी
३३५; ३४८ में दिया है। रा० त० १:३३३ में
देवी चक्र का उल्लेख कल्हण करता है। उसने पुनः
रा० त० १:६६ तथा ५:५५ में मन्दिर के सन्दर्भ
में मातृ चक्र का उल्लेख किया है।
मातृचक्र शिला पर श्रीचक्र तथा रज नौचक्र
तुल्य खोदा जाता है। कश्मीर में अब तक उनकी
पूजा गृहों तथा मन्दिरों में की जाती है। यह
तान्त्रिक पूजा है। शारिका स्थान अर्थात् हरिपर्वत
श्रीनगर में श्रीचक्र की पूजा होती है।

इसी प्रकार ज्वालामुखी चक्रपूजा उपेन अर्थात्
धोवन की चट्टानी पहाड़ी पर होती है। यह स्थान
वीही परगना में है। इस स्थान का विशेष महत्त्व
है। यहाँ लोग बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ पूजा करने
आते हैं।
कश्मीर में तन्त्र आधारित मातृ पूजा के प्रतीक
स्वरूप अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित हैं। तन्त्र
के अनुसार सप्त मातृका देवी, जीवन एवं मृत्यु के
अनेक रूपों को प्रकट करतो हैं। श्रीनगर के
संग्रहालय में दुर्गा का एक स्वरूप वाराही रूप में
दिया गया है। यह एक युवती की आदम कद
मूर्ति है। परन्तु मुख शुकरी अर्थात् वाराही का
बनाया गया है। अलबरूनी ने सप्त मातृ देवियों के
साथ वाराही का भी उल्लेख किया है।
कश्मीर उपत्यका में आनेवालो दरों को द्वार
कहा गया है। कालान्तर में इसे द्रंग कहने लगे थे।
द्वारो की रक्षा पर कश्मीर के राजा विशेष जोर
देते थे। द्वारदेश के सैनिक अधिकारी को द्वारपति
कहते थे। कश्मीर की स्वतंत्रता की रक्षा इन द्वारों
की सुरक्षा पर आधारित थी।
भारत ने खैबर दर्रे की सुरक्षा का व्यापक
और मजबूत प्रबन्ध नहीं किया था अतएव पश्चि-
मोत्तर सीमान्त से सर्वदा भारत पर आक्रमण होता
रहा। यूनानी, हूण, शक, मुसलमान आदि खैबर
द्वार से भारत मे प्रवेश करते थे। खैबर की सुरक्षा
शिथिल होने के कारण भारत पराधीनता की बेड़ी में
जकड़ गया। अंग्रेजों ने इस बात को प्रारम्भ से ही
समझा था। अतएव लगभग दो तिहाई सेना सीमान्त
पश्चिमोत्तर प्रदेश में लगी रहती थी। खैबर की
मोर्चे बन्दी आधुनिक शैली से किया था।
कश्मीर के राजा अत्यन्त प्राचीन काल से द्रंग
इस महत्त्व को समझते हैं। द्वारो की सुरक्षा का
विशेष ध्यान रखा जाना था। द्वारपति का स्थान
सेनापति तुल्य होता था। उन्हें द्वाराधिपति, द्वारेश
तथा द्वाराधिकारी कहा जाता था। यह पद अत्यन्त

प्रथमं तरंग १८३
श्रुतनन्दिपुराणः स व्यासान्तेवासिनो नृपः ।
सेवनं सोदरादीनां नन्दीशस्पर्धया व्यधात् ॥ १२३ ॥
१२३. वह नृप व्यास¹ के एक अन्तेवासी² से नन्दी पुराण³ सुनकर सोदर⁴ तथा अन्य
स्थानों की तीर्थयात्रा करने लगा जैसे नन्दीश⁵ से स्पर्धा करता था ।

महत्त्वपूर्ण सामरिक पद कश्मीर में माना जाता
था । इन द्वारो पर सैनिक चौकियां होती थी । बारह-
मूला के अधोभाग अर्थात् वितस्ता के संकीर्ण गह्वरो
में इस प्रकार के द्वार थे । अलबेरूनी ने उनके
वर्णन के प्रसंग में उनको संज्ञा द्वार से ही दी है । हुएन
त्सांग और ओ कुंग चीनी पर्यटकों ने भी उनका
उल्लेख किया है । उन्हे कालान्तर में द्रंग के साथ-साथ
द्वक भी कहा जाने लगा था । ईशान देवी ने द्वारो
पर मातृचक्र की स्थापना कर उसे दैवी शक्ति से
भी समन्वित किया । उसे एक धार्मिक रूप दिया ।
द्वार पर नियुक्त सेना तथा अधिकारियों में विश्वास
उत्पन्न किया कि दैवी शक्ति द्वार की सुरक्षा करने मे
उनके अनुकूल तथा सहायक है ।

कश्मीर के प्रदेशो में भी मातृचक्रो की स्थापना
दानो ईशान देवी ने इसी दृष्टि से करायी । प्रदेश
राज्य के अवयव है । उनमे विद्रोह न हो, आततायी
शान्त रहें एतदर्थ यहाँ मातृचक्र की शक्ति स्थानीय
राज अधिकारियों को बल देते रहे यही मन्तव्य
मालूम होता है । महाराष्ट्र तथा मेवाड़ में मैंने
सैनिक महत्त्व के स्थानों पर हनुमान एवं दुर्गा की
की मूर्तियाँ प्रायः स्थापित देखी हैं ।

द्वार शब्द कश्मीर मे दरों के लिये प्रयुक्त होता
रहा है । यद्यपि दरों के लिए संस्कृत में संकट शब्द
भी आता है । प्रदेश शब्द भी महत्वपूर्ण है । आजादी
के पश्चात् सूबो अर्थात् प्रान्तो के लिए प्रदेश शब्द
का व्यवहार भारत में किया जाने लगा था । परन्तु
प्रदेश शब्द बदलकर उसके स्थान पर अमेरिका की
संघ शासन प्रणाली के आधार पर उन्हें 'राज'
कहा जाने लगा है । प्राचीन काल में 'राज केवल
एक होता था । उसके अंगो को प्रदेश कहते थे ।

१२३ (१) व्यास : इस शब्द का अर्थ विस्तार,
विश्लेषण, कथावाचक तथा पुराणों की कथा कहने
वाला होता है । कल्हण यहाँ किसी का नाम नही
देता । महाभारतकार वेदव्यास का भी नाम नहीं
देता । जो पराशर के औरस तथा सत्यवती के गर्भ
से उत्पन्न हुए थे । वह वैदिक संहिताओं के पृथक्करण
कर्ता, वैदिकशास्त्र प्रर्वतकों के आद्य आचार्य, ब्रह्म-
सूत्रो के प्रणेयता महाभारत पुराणादि ग्रन्थो के रचना-
कार थे । वे वैदिक संस्कृति के पुनरुज्जीवक तत्त्वज्ञ,
सर्वज्ञ, सत्यवादी सांख्य, योगधर्मादि शास्त्रों के
ज्ञाता एवं दिव्यदृष्टिशालो थे ।

उनमे असामान्य प्रतिभा, क्रांतदर्शी द्रष्टापन,
जीवन सम्बन्धी विरागी दृष्टिकोण, अगाध विद्वत्ता, एवं
अप्रतिम संगठन कौशल्य, इन समस्त गुणोयुक्त व्यास
तुल्य मूर्तिमंत संस्कार प्रतिमा प्राचीन भारतीय साहित्य
जगत् मे क्वचित् ही मिल सकेगी । उन्हे बुद्ध साहित्य
मे केवल ऋषि ही नही देवता स्वरूप माना गया है ।
वायु, (१ : ४२-४३) कूर्म (१. ३० : ६६) गरुड़
(१ : ८७ : ५०), पुराणों मे व्यास को विष्णु का
अवतार माना गया है । इनको शिव का अवतार कूर्म
(२.११:१३६) तथा ब्रह्मा का अवतार वायु (७७,७४
-७५) ब्रह्माण्ड (३:१३:८६) पुराणो में माना गया
है । लिंग पुराण (२:४९:१७) में ब्रह्मा के पुत्र का
अवतार व्यास को माना गया है । धर्मराज युधिष्ठिर
ने महाभारत में ( आश्रः ८७ ) मे व्यास को भगवान्
की उपाधि दी है ।

वैदिक संहिता साहित्य मे व्यास का निर्देश नहीं
मिलता । सामविधान । ब्राह्मण ( १:४:३७७ )
में इनका पैतृक नाम 'पारशर्य' दिया गया है । बौद्ध
साहित्य में भगवान् बुद्ध के पूर्व जन्मो में एक जन्म
'कण्हदीपायन' अर्थात् कृष्ण द्वैपायन् दिया गया है ।

१८४ राजतरंगिणी
आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण
द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था। कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण
किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था। (म.
आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या
सत्यवती थी। उसका नाम काली था। इसलिये इन्हें
कृष्ण कहा गया है। एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण
अर्थात् काला था। अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ गया था। यमुना द्वीप कोई देश विशेष नहीं
मानना चाहिए। नदियों में द्वीप बन जाते हैं। दो
धारायें बनकर बहने लगती है। द्वीप पर आबादी हो
जाती है। दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में
स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं। मध्य में द्वीप बना रहता है।
उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक
झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते हैं।
व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था।
इनके पुत्र शुकदेव जी थे। शुकदेव को इन्होंने सृष्टि
क्रम, युगधर्म, ब्राह्म प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं
क्रिया फलादि का उपदेश दिया था। व्यास की वंश
परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी।
शुक का विवाह पीवरी से हुआ था। उन्हें भूरिश्रवस,
प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पाँच पुत्र तथा
कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी। विष्णु पुराण
में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है।
व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है। प्रत्येक वेद
तथा उसकी शाखाओं की शिष्य परम्परा है। इसी
प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है। प्रतीत होता
है कि व्यास की इस शिष्य परम्परा में कोई
अन्तेवासी था।
व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा-
वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा। आज व्यास शब्द
से इन्हीं का बोध होता है। व्यास की वंश परम्परा
किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होंगे उन्हें व्यास
कहा जाता रहा होगा। कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप
में व्यवहृत किया है। वह आद्य व्यास नहीं बल्कि
उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई
व्यक्ति रहा होगा। पुराण का पारंगत तत्कालीन
व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने
नन्दिपुराण सुना होगा। व्यास की कोई गद्दी अथवा
पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी। वहाँ अन्तेवासी
किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन
करते रहे होंगे। उन्हीं में से किसी एक प्रमुख से
राजा ने नन्दीपुराण सुना था।
(२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप
रहने वाला शिष्य होता है। यह शब्द उस शिष्य
के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा
व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम,
पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है।
(३) नन्दी पुराण . महापुराण किंवा पुराण,
उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण
साहित्य का वर्गीकरण किया गया है। मत्स्य पुराण
में पुराणों को गुण के अनुसार सात्विक, राजसिक एवं
तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया
है। विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना
प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्विक,
राजसिक एवं तामसिक कहा गया है। सरस्वती
एवं पितरों का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों
को संकीर्ण कहा गया है। (मत्स्य ५३:६८-६९)
पद्म एवं भविष्य पुराणों में भी सात्विक, राजसिक,
तामसिकादि के प्रकार दिये गये हैं। किन्तु यहाँ
उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है।
(पद्मः उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५)
पुराणों की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही
है। प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा
प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न हैं। लगभग ११ पुराणों
का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है। नृसिंह, भागवत
के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को
महापुराण मानने में एकवाक्यता नहीं है।
उपपुराणों की संख्या भी १८ कही जाती है।
किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नही है। शिव

प्रथम तरंग १८५
उपासना के पुराण (१) कूर्म, (२) ब्रह्माण्ड,
(३) भविष्य, (४) मत्स्य, (५) मार्कण्डेय, (६) लिंग,
(७) वराह, (८) वामन, (९) शिव तथा (१०)
स्कन्द है। विष्णु उपासना के पुराण (१) गरुड,
(२) नारद, (३) भागवत, (४) विष्णु है। ब्रह्मा की
उपासना के पुराण (१) पद्म तथा (२) ब्रह्म है।
अग्नि उपासना का पुराण एक मात्र अग्नि पुराण है।
सवितृ उपासना का पुराण ब्रह्मवैवर्त है।
पुराणों के उपपुराण होते हैं। नन्दिपुराण
उपपुराण है। यह शिव उपासना का पुराण है।
नन्दिक्षेत्र कश्मीर का पवित्र स्थान है। वही
भूतेश्वरादि का स्थान है। हरमुकुट पर्वत है।
अतएव राजा जलोक ने नन्दिपुराण व्यास के
अन्तेवासी से सुना था। उससे प्रभावित होने के
कारण वह शैव मत की ओर झुक गया था।
(४) सोदर : नीलमत पुराण सोदर तीर्थ का
वर्णन करता है।
सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः।
गत्वा च शीघ्रं सद्भि तथैवोत्तरमानसम् ॥
१३१४
तत्रापि विधिवत् स्नानं विधाय दृढनिश्चयात् ।
सुखं प्राप्तो महाभाग तत्र रंस्यसि पुत्रक ॥
१३१५
तस्माद्देशात्तथा याति दक्षिणेन महानदी ।
हिरण्याभाम्वसा पूर्णा नाम्ना कनकवाहिनी ॥
१३१३
सोदर तीर्थ को इस समय नारननाग कहते
हैं। यह भूतेश्वर के ध्वंसावशेष के समीप पर्वत
मूल में है। कश्मीर का यह महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थान
है। यह एक जलस्रोत है। छोटे आयताकार कुण्ड
किंवा सरोवर में यह जल एकत्रित होकर बहता
रहता है। इसके समीप भूतेश्वर टिप्पणी में वर्णित
दो मन्दिर समूह है। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा
की थी। उनके यात्रा काल में सभी मन्दिर अत्यन्त
२४
भग्न एवं उपेक्षित थे। किसी में न तो स्टीन
के समय शिवलिंग अथवा प्रतिमाएँ थीं और जब
मैं वहाँ गया था उस समय भी। और न आज है।
मन्दिरों का निर्माण काल भिन्न-भिन्न रहा है। मन्दिर
विमान शैली के हैं। यहाँ के एक मन्दिर में केवल
दो द्वार है। यह मन्दिर २५ वर्ग फिट में है। निर्माण
में चूने का प्रयोग किया गया है। श्री स्टीन का
मत है कि बड़ा मन्दिर ही ज्येष्ठेश का मन्दिर है।
सोदर तीर्थ का वर्णन नन्दिक्षेत्र माहात्म्य में
मिलता है। भूतेश्वर, ज्येष्ठेश्वर तथा नन्दिक्षेत्र की
तीर्थ यात्रा करने वालों के लिये यहाँ पिण्ड दान देने
का विधान है। कनकवाहिनी के संगम के प्रसग में
कल्हण ने पुनः वर्णन किया है। (रा० त० २:१६९)
नन्दि क्षेत्र एवं नन्दीश क्षेत्र के अन्तर्गत नन्दिक्षेत्र
माहात्म्य वर्णित सभी स्थान आ जाते है। वे हरमुकुट
सरोवर से भूतेश्वर के मध्य तक स्थित है।
राजा जशोक नगर में ज्येष्ठरुद्र की स्थापना
की थी। आदि ज्येष्ठरुद्र के स्थान के समीप नारन
नाग का जलस्रोत है। नारन नाग किंवा सोदर तीर्थ
का अवतरण श्रीनगर में राजा की सुविधा के लिये
हुआ था। अतएव नवीन सोदर तीर्थ श्रीनगर के
समीप होना चाहिए।
यह सोदर तीर्थ श्रीनगर समीपस्थ स्थित सुदर
है। डल लेक का एक भाग सुदर खुन कहा जाता
है। इसके समीप सुदरबल ग्राम है। खुन शब्द
संस्कृत शब्द कोण का अपभ्रंश है। सुदर खुन एक
संकीर्ण जल निकलने का स्थान है। डल के पश्चिम
तरफ है। यह आदमपुर तथा सुदरबल ग्रामों के
मध्य स्थित है। यह डल लेक का सबसे गहरा
स्थान है।
श्री स्टीन सन् १८८५ ई० में इस स्थान पर
आये थे। उन्हें सुदर खुन ग्राम के छोरपर गाँव की
मसजिद के समीप २ कुण्ड मिले थे। वे डल लेक
के जल से भरे थे। ग्रामीणों ने उन्हें बताया था।
उन कुण्डो में निरन्तर बहने वाले जलस्रोत थे।

१८४ राजतरंगिणी

आज से २५०० वर्ष पूर्व स्पष्ट प्रतीत होता है कि कृष्ण
द्वैपायन नाम प्रसिद्ध हो चुका था । कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ने का कारण था। यह यमुना द्वीप में जन्म ग्रहण
किये थे अतएव द्वैपायन नाम इनका पड़ा था । ( म.
आ० ५४:२) इनकी माता कैवर्तराज की कन्या
सत्यवती थी । उसका नाम काली था । इसलिये इन्हें
कृष्ण कहा गया है । एकमत है कि इनका वर्ण कृष्ण
अर्थात् काला था । अतएव कृष्ण द्वैपायन नाम
पड़ गया था । यमुना द्वीप कोई देश विशेष नही
मानना चाहिए। नदियो मे द्वीप बन जाते है । दो
धारायें बनकर बहने लगती है । द्वीप पर आबादी हो
जाती है । दिल्ली में जमुना की दो धारायें वर्षा में
स्पष्ट दिखाई पड़ती हैं । मध्य में द्वीप बना रहता है ।
उस पर कैवर्त अर्थात् धीवर या माझी किंवा कृषक
झोपड़ी अथवा कच्चा मकान बनाकर रहने लगते है ।

व्यास का जन्म वैशाख पूर्णिमा को हुआ था ।
इनके पुत्र शुकदेव जी थे । शुकदेव को इन्होने सृष्टि
क्रम, युगधर्म, ब्राह्य प्रलय, महाप्रलय, मोक्षधर्म एवं
क्रिया फलादि का उपदेश दिया था । व्यास की वंश
परम्परा इनके पुत्र शुकदेव जी के कारण चली थी ।
शुक का विवाह पीवरी से हुआ था । उन्हें भूरिश्रवस,
प्रभु, शम्भु, कृष्ण एवं गौर नाम के पांच पुत्र तथा
कीर्तिमती नामक एक कन्या हुई थी । विष्णु पुराण
में २८ व्यासों का उल्लेख मिलता है ।

व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । प्रत्येक वेद
तथा उसकी शाखाओ की शिष्य परम्परा है । इसी
प्रकार व्यास की पुराण शिष्य परम्परा है । प्रतीत होता
है कि व्यास को इस शिष्य परम्परा में कोई
अन्तेवासी था ।

व्यास शब्द कालान्तर में प्रायः सभी कथा-
वाचकों के लिये प्रयुक्त होने लगा । आज व्यास शब्द
से इन्हीं का बोध होता है । व्यास की वंश परम्परा
किंवा शिष्य परम्परा में जो लोग रहे होगे उन्हें व्यास
कहा जाता रहा होगा । कल्हण यहाँ 'व्यास' पद रूप
में व्यवहृत किया है । वह आद्य व्यास नहीं बल्कि
उनकी वंश किंवा पुराण शिष्य परम्परा में कोई
व्यक्ति रहा होगा । पुराण का पारंगत तत्कालीन
व्यास के किसी अन्तेवासी अथवा शिष्य से राजा ने
नन्दिपुराण सुना होगा । व्यास की कोई गद्दी अथवा
पीठ कश्मीर में उस समय रही होगी । वहाँ अन्तेवासी
किंवा शिष्य रहकर पुराण का अध्ययन तथा अध्यापन
करते रहे होंगे । उन्ही में से किसी एक प्रमुख से
राजा ने नन्दीपुराण सुना था ।

(२) अन्तेवासी : अन्तेवासी का अर्थ समीप
रहने वाला शिष्य होता है । यह शब्द उस शिष्य
के लिये व्यवहार किया जाता है जो शिक्षक किंवा
व्यास के समीप निवास कर अथवा उसके आश्रम,
पीठ एवं शाला में रहकर विद्याध्ययन करता है ।

(३) नन्दी पुराण : महापुराण किंवा पुराण,
उपपुराण और उपोपपुराण तीन वर्गों में पुराण
साहित्य का वर्गीकरण किया गया है । मत्स्य पुराण
में पुराणो को गुण के अनुसार सात्त्विक, राजसिक एवं
तामसिक पुनः तीन वर्गों में वर्गीकृत किया गया
है । विष्णु ब्रह्मा एवं अग्नि-शिव की उपासना
प्रतिपादित करने वाले पुराणों को क्रम से सात्त्विक,
राजसिक एवं तामसिक कहा गया है । सरस्वती
एवं पितरो का माहात्म्य कथन करने वाले पुराणों
को संकीर्ण कहा गया है । ( मत्स्य ५३:६८-६९ )
पद्म एवं भविष्य पुराणो में भी सात्त्विक, राजसिक
तामसिकादि के प्रकार दिये गये है । किन्तु यहाँ
उनका वर्गीकरण और प्रकार से किया गया है ।
(पद्म : उ० २६३:८१-८५ भविष्य : ३:२८:१०-१५)

पुराणो की श्लोक संख्या में एकवाक्यता नही
है । प्रत्येक पुराण के वक्ता, देवता, गुण तथा
प्रसंग एवं स्थल भिन्न-भिन्न है । लगभग ११ पुराणो
का प्रसंग एवं स्थल नैमिषारण्य है । नृसिंह, भागवत
के विष्णु एवं देवी, वायु तथा शिव पुराणों को
महापुराण मानने मे एकवाक्यता नहीं है ।

उपपुराणो की संख्या भी १८ कही जाती है ।
किन्तु उनकी नामावली में मतैक्य नहीं है । शिव

प्रथम तरंग
१८५


उपासना के पुराण (१) कूर्म, (२) ब्रह्माण्ड,
(३) भविष्य, (४) मत्स्य, (५) मार्कण्डेय, (६) लिङ्ग,
(७) वराह, (८) वामन, (९) शिव तथा (१०)
स्कन्द हैं । विष्णु उपासना के पुराण (१) गरुड़,
(२) नारद, (३) भागवत, (४) विष्णु हैं । ब्रह्मा की
उपासना के पुराण (१) पद्म तथा (२) ब्रह्म हैं ।
अग्नि उपासना का पुराण एक मात्र अग्नि पुराण है ।
सवितृ उपासना का पुराण ब्रह्मवैवर्त है ।
पुराणों के उपपुराण होते हैं । नन्दिपुराण
उपपुराण है । यह शिव उपासना का पुराण हैं ।
नन्दिक्षेत्र कश्मीर का पवित्र स्थान है। वहो
भूतेश्वरादि का स्थान है । हरमुकुट पर्वत है ।
अतएव राजा जलोक ने नन्दिपुराण व्यास के
अन्तेवासी से सुना था । उससे प्रभावित होने के
कारण वह शैव मत की ओर झुक गया था ।
(४) सोदर : नीलमत पुराण सोदर तीर्थ का
वर्णन करता है ।
सोदरस्य च नागस्य स्नानं कृत्वा विधानतः ।
गत्वा च शीघ्रं सङ्गम तथैवोत्तरमानसम् ॥
१३१४
तत्रापि विधिवत् स्नानं विधाय दृढ़निश्चयान् ।
सुरतं प्राप्सो महाभाग तत्र रंस्यसि पुत्रक ॥
१३१५
तस्माद्देशात्तथा याति दक्षिणेन महानदी ।
हिरण्याभाम्भसा पूर्णा नाम्ना कनकवाहिनी ॥
१३१३
सोदर तीर्थ को इस समय नारननाग कहते
हैं। यह भूतेश्वर के ध्वंसावशेष के समीप पर्वत
मूल में है । कश्मीर का यह महत्वपूर्ण तीर्थ स्थान
है । यह एक जलस्रोत है। छोटे आयताकार कुण्ड
किंवा सरोवर में यह जल एकत्रित होकर बहता
रहता है । इसके समीप भूतेश्वर टिप्पणी में वर्णित
दो मन्दिर समूह हैं। श्री स्टीन ने यहाँ की यात्रा
की थी। उनके यात्रा काल में सभी मन्दिर अत्यन्त
२४


भग्न एवं उपेक्षित थे । किसो में न तो स्टीन
के समय शिवलिंग अथवा प्रतिमाएं थी और जब
मैं वहाँ गया था उस समय भी । ओर न आज हैं ।
मन्दिरों का निर्माण काल भिन्न-भिन्न रहा है । मन्दिर
विमान शैली के है। यहाँ के एक मन्दिर में केवल
दो द्वार है । यह मन्दिर २५ वर्ग फिट में है। निर्माण
में चूने का प्रयोग किया गया है । श्री स्टीन का
मत है कि बड़ा मन्दिर ही ज्येष्ठेश का मन्दिर है ।
सोदर तीर्थ का वर्णन नन्दिक्षेत्र माहात्म्य में
मिलता है । भूतेश्वर, ज्येष्ठेश्वर तथा नन्दिक्षेत्र की
तीर्थ यात्रा करने वालों के लिये यहाँ पिण्ड दान देने
का विधान है। कनकवाहिनी के संगम के प्रसंग में
कल्हण ने पुनः वर्णन किया है । (रा० त० २:१६९)
नन्दि क्षेत्र एवं नन्दोश क्षेत्र के अन्तर्गत नन्दिक्षेत्र
माहात्म्य वर्णित सभी स्थान आ जाते हैं । वे हरमुकुट
सरोवर से भूतेश्वर के मध्य तक स्थित है ।
राजा जलोक नगर में ज्येष्ठरुद्र की स्थापना
की थी । आदि ज्येष्ठरुद्र के स्थान के समीप नारन
नाग का जलस्रोत है । नारन नाग किंवा सोदर तीर्थ
का अवतरण श्रीनगर में राजा की सुविधा के लिये
हुआ था। अतएव नवीन सोदर तीर्थ श्रीनगर के
समीप होना चाहिए ।
यह सोदर तीर्थ श्रीनगर समीपस्थ स्थित सुदर
है । डल लेक का एक भाग सुदर खुन कहा जाता
है। इसके समीप सुदरवल ग्राम है । खुन शब्द
संस्कृत शब्द कोण का अपभ्रंश है। सुदर खुन एक
संकीर्ण जल निकलने का स्थान है। डल के पश्चिम
तरफ है। यह आदमपुर तथा सुदरबल ग्रामो के
मध्य स्थित है । यह डल लेक का सबसे गहरा
स्थान है ।
श्री स्टीन सन् १८८५ ई० में इस स्थान पर
आये थे । उन्हें सुदर खुन ग्राम के छोरपर गाँव की
मसजिद के समीप २ कुण्ड मिले थे । वे डल लेक
के जल से भरे थे । ग्रामीणो ने उन्हें बताया था ।
उन कुण्डों में निरन्तर बहने वाले जलस्रोत थे ।

१८४ राजतरंगिणी
प्रतिष्ठां ज्येष्ठरुद्रस्य श्योनगर्यां वितन्वता ।
तेन नन्दीशसंस्पर्धं न मेने सोदरं विना ॥ १२४ ॥
१२४. राजा जिस समय ज्येष्ठ रुद्र की प्रतिष्ठा श्योनगर में करता रहा था उसने अनुभव
किया कि बिना सोदर तीर्थ के वह नन्दीश से स्पर्धा नहीं कर सकता था ।

मै सुदर बल ग्राम में आया हूँ। ग्राम की आबादी
बढ़ गयी है। ग्राम तथा डल लेक तक पक्की सड़क
बन गयी है। बिजली लग गयी है। मकान अच्छे
और कुछ पक्के बन गये हैं। वहाँ नावें डल तट पर
मिलती है। उस पार होकर ले जाई जाती है। तट
से कुछ हटकर लेक में कमल खूब लगे हैं। मृणाल
दण्ड पर कमल पत्र तथा प्रफुल्लित कमल झूम रहे
थे। कमलगट्टा अर्थात् कमल का बीज हरा अत्यन्त
स्वादिष्ट होता है। ये तोड़ कर सूखने के लिये तट
पर बिछाये गये थे।

मैंने ग्रामीणों से श्री स्टीन वर्णित स्थान के
विषय मे जिज्ञासा की। ग्रामीणों ने बताया कि उन
सब स्थानों पर अब खेत हो गये हैं। काश्त होने
लगी है। जलस्रोत सूख गया है। अब कुछ नहीं है।
मैंने अपने कश्मीर भ्रमण मे अनुभव किया है।
जहाँ भी कहीं देवस्थान, तीर्थ, मन्दिरादि जियारत,
मजार किंवा मस्जिदों मे परिणत हो जाते हैं वहाँ
ग्रामीण सत्य बात बताने से हिचकते हैं। उस स्थान
का सम्बन्ध किसी मुसलिम पीर, संत महात्मा या
जियारत से जोड़ देते हैं।

लगभग शताब्दो पूर्व कश्मीरी ब्राह्मण यहाँ
तीर्थ यात्रा निमित्त आते थे। ग्राम के समीप भट्टपुर
स्थान है। भट्ट शब्द भट्ट का अपभ्रंश है। भट्ट ब्राह्मण
लोग यहाँ आबाद थे। वे यहाँ के पुरोहित थे। अब
वहाँ पर किसी ब्राह्मण की आबादी नही है।

श्रीम्तीन को इस स्थान पर कोई ध्वंसावशेष
नहीं मिला था। स्थानीय ग्रामीणों से उन्हें मालूम
हुआ था। ग्राम में अत्यधिक अलंकृत शिला-
खण्ड पड़े थे। उन्हें कश्मीरराज महाराज रणवीर
सिंह जी श्रीनगर में मन्दिर निर्माण निमित्त उठवा
ले गये थे। इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थान
जलोक निर्मित सोदर तीर्थ था। यहाँ से मूल सोदर
तीर्थ अर्थात् नारन नाग भूतेश्वर मे ३२ मीलों का
अन्तर है।

सोदर तीर्थ की पूर्व दिशा में ईशेश्वर, सुरेश्र्वरी,
तथा उत्तर पश्चिम अमृत भवन, उत्तर पूर्व तिलप्रस्था
और दक्षिण में सारिका पर्वत के प्राचीन पवित्र
तीर्थस्थान थे।

(५) नन्दीशः अमर कोश (१:४३) में नन्दीके
६ नाम यथा-शृंगी, भृङ्गी, रिटि, तुण्डि, नन्दिक
तथा नन्दिकेश्वर दिया है। यहाँ पर नन्दीश का
अर्थ शिव है। नन्दी शिव के पार्षद है। द्वारपाल हैं।
वाहन है। यह शंकर के वरदान के कारण शिलाद
ऋषि को भूमि जोतते समय मिले थे। ऋषि पुत्र
स्वरूप भगवान् शंकर की तपस्या किया था। तप
द्वारा अमरत्व की प्राप्ति की थी। शिव ने इन्हें
पुत्रवत् माना था। अपने गणों में स्थान दिया था।

मत्स्य पुराण के अनुसार नन्दीश वास्तु शास्त्र
का एक ग्रन्थकार है। मनु के एक पुत्र नन्दीश
हैं। कश्यप कुल का गोत्र तथा भार्गव कुल का
एक मंत्रकार हुआ है। भागवत मतानुसार निषाध
तथा वायु पुराण मतानुसार नल का पुत्र था। नल
का पुत्र पुण्डरीक था किन्तु यहाँ पर नन्दीश का अर्थ
शंकर किंवा शिव मानना चाहिए।

नन्दीश की पूजा नन्दकोल झील कश्मीर में
होती थी। नन्दकोल का प्राचीन नाम कालोदक
अथवा नन्दिसर है। इसका यह नाम इस लिये पड़ा
है कि काल अर्थात् शिव का और उनके पार्षद
नन्दी का भी स्थान होने के कारण नन्दिसर नाम
पड़ा है। इन सब तीर्थ स्थानों के क्षेत्र का नाम
नन्दिक्षेत्र कल्हण ने दिया है।

प्रथम तरंग । १८७


नन्दिक्षेत्र के उत्तर ओर कालोदक सतसरनी दर्रा
दक्षिण तरफ हरमुकुट पर्वत तत्पश्चात् ब्रह्मसर नाग
और धुर दक्षिण में भूतेश्वर है। पश्चिम सरबल नाग
तथा पर्वतमाला है।

१२४ (१) ज्येष्ठ रुद्र अथवा ज्येष्ठेश : नन्दि-
क्षेत्र में भूतेश्वर में ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर तथा लिंग था।
सोदर तीर्थ के श्रीनगर में अवतीर्ण होने के पश्चात्
यह स्वाभाविक था कि ज्येष्ठ रुद्र किंवा ज्येष्ठेश का भी
मन्दिर राजा सोदर तीर्थ के समीप निर्माण कराता।
अन्यथा सोदर तीर्थ श्रीनगर में लाने के पश्चात्
भी राजा को बत्तीस मिल की नित्य यात्रा ज्येष्ठरुद्र
के दर्शन निमित्त करनी पडती। प्रतिदिन ३२ मिल
आने ओर जाने में कुल ६४ मिल दुर्गम पर्वतीय मार्ग
से चलना पड़ता। अतएव राजा ने ज्येष्ठ रुद्र की
स्थापना श्रीनगर में की। यह स्थान कहाँ था और यह
अब किस अवस्था में है। यह विचारणीय विषय है।

इस समय शिव ज्येष्ठेश की संज्ञा उस लिंग से दी
जाती है जो श्रीनगर में ज्येष्ठ नाग के पास स्थित है।
डल लेक के गगरीबल के दक्षिण पश्चिम उठती पहाड़ो
ढाल पर तथा जेथर ग्राम के कुछ ऊपर है। श्रीनगर
एवं कश्मीर के ब्राह्मणो का यह पवित्र तीर्थ स्थान
अत्यन्त प्राचीन काल से रहा है। इसका विस्तार से
उल्लेख ज्येष्ठ माहात्म्य में मिलता है।

गाया है। भगवान् शिव ने ज्येष्ठा अर्थात् पार्वती
का उद्धार एक दैत्य से यहाँ किया था। यहीं पर देवी
से विवाह किया। विवाह के पश्चात् शिव का नाम
ज्येष्ठेश पड़ गया !

समीपवर्ती ग्राम जेथर का नाम माहात्म्य में
ज्येष्ठेश्वरक दिया गया है। श्री साहिबराम ने ज्येष्ठेश्वर
की पूजा का उल्लेख अपने तीर्थ में किया है। उन्हें
ज्येष्ठ रुद्र कहा है। काश्मीरी उसे ज्येष्ठ लुदर कहते
हैं। यह शब्द ज्येष्ठ रुद्र का अपभ्रंश है। चतुर्थ
तरंगिणी में 'ज्येष्ठ रुद्रास्य पर्वत' (५९२) उल्लेख
से प्रकट होता है कि स्थान का नाम ज्येष्ठ रुद्र से
सम्बन्धित था। श्रीपंचमी अर्थात् वैशाख बदी पंचमी
को यहाँ काश्मीरियों का जमघट होता था। माहात्म्य
में यही दिन ज्येष्ठेश की तीर्थ यात्रा के लिये निश्चित
किया गया है।

डल झील को वहींपर (श्लोक ८१३) में 'ज्येष्ठ-
रुद्रसमीपस्थम् सरत' कहा गया है। अर्थात् डल लेकका
प्राचीन एक नाम सर था। उलर लेक का नाम महा-
पद्मसर देकर दोनों के नामों में स्पष्ट अन्तर दिखाया
गया है। डल को सर तथा उलर को महापद्मसर
कहते थे। श्लोक ८०६ में 'ज्येष्ठ रुद्रसमीपस्य-
गिरिः' शब्द आया है। शंकराचार्य पर्वत का काला-
न्तर में एक नाम ज्येष्ठरुद्र भी पड़ गया था। जेथर
से इस पर्वत के पूर्वीय मूल तक का अन्तर कठिनता
से एक मिल होगा। महादेव माहात्म्य के दो उल्लेखो
से भी यह बात स्पष्ट हो जाती है। शिव को वहाँ
(२:८) इस प्रकार दिखाया गया है कि जैसे वह
सारिका किंवा हर पर्वत पर से चारों ओर के
अतिरम्य प्राकृतिक दृश्य का अवलोकन कर रहे हैं।
वहाँ से वह पूर्व दिशा में डल लेक, तथा दक्षिण दिशा
में ज्येष्ठ रुद्र पर्वत देख रहे हैं। इसी प्रकार १:१०
में पार्वती को वितस्ता के तट से ज्येष्ठरुद्र का उत्तुङ्ग
स्थान देखते दिखाया गया है। सारिका पर्वत पर
चढ़कर यदि चारों ओर देखा जाय तो शंकराचार्य
पर्वत अथवा ज्येष्ठ रुद्र जिसे मुसलिम लेखको ने
तख्त सुलेमान लिखा है दक्षिण दिशा में गौरव पूर्ण
शिखर ऊँचा किये दिखाई देता है। यहाँ के मन्दिर
के शिखर पर लगी बिजुली का प्रकाश रात्रि में समस्त
कश्मीर उपत्यका में चमकता दिखाई पड़ता है जैसे यह
रात्रि में उपत्यका की एक सजग प्रहरी की तरह
रक्षा कर रहा है। शंकराचार्य पर्वत तथा वितस्ता
के मध्य संकीर्ण स्थान है। वहाँ तट से खड़ा होकर
बिना मस्तक ऊपर उठाये शंकराचार्य पर्वत पर स्थित
मन्दिर को कोई नहीं देख सकता। मैंने इन दोनो
बातों का स्वयं अनुभव किया और सत्य पाया है।

१८८ राजतरंगिणी
कल्हण के वर्णन (१:३४१) से यह बात
मिलती है। यह स्थान डल लेक के दक्षिण दिखाया
गया है। इस शंकराचार्य पर्वत का तत्कालीन नाम
ज्येष्ठ रुद्र राजा गोपादित्य के समय में गोपाद्रि
पड़ गया था । उल्लेख मिलता है कि राजा गोपादित्य
ने ज्येष्ठेश में देवस्थान का निर्माण करा कर गोपाद्रि
मे एक अग्रहार आर्यावर्त के ब्राह्मणों को दिया था ।
कल्हण ने गोपाद्रि शब्द पुनः शंकराचार्य किंवा
ज्येष्ठ रुद्र पर्वत के लिए और इसी के लिए गोपाचल
शब्द का प्रयोग रा० त० ८:११०७ में किया है।
गोपाद्रि का अपभ्रंश आज कल का यथा-
स्थान स्थित ग्राम गुपकर है। वह ग्राम बड़ा है।
शंकराचार्य पर्वत के मूल पूर्वदिशा में स्थित है।
जेथर ग्राम से आध मिल दूर है। इससे प्रकट होता
है कि जेथर ग्राम के अत्यन्त समीप राजा गोपादित्य
ने उक्त देवस्थान निर्मित किया था।
श्री स्टीन का मत है कि राजा जलोक द्वारा
निर्मित ज्येष्ठ रुद्र का स्थान श्रीनगर में डल लेक के
दक्षिण दिशा में जेथर ग्राम के समीप होना चाहिए ।
इस देव स्थान के पूर्व में जेथर तथा शंकराचार्य
पर्वत होना चाहिए। वर्तमान स्थिति इन स्थानों
की ऐसी है कि वहाँ कोई प्राचीन स्मारक तथा
ध्वंसावशेष नहीं है जिससे निश्चित रूप से निर्णय
किया जाय कि ज्येष्ठेश का मन्दिर किस स्थान पर था।
जनरल कनिंघम ने (एनसियेण्ट ज्योग्रेफी आफ
इण्डिया पृष्ठ ८१ वाराणसी) शंकराचार्य पर्वत
किंवा तख्त सुलेमान को ज्येष्ठेश्वर पर्वत माना है।
उन्होंने ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर ही वर्तमान शंकराचार्य
मन्दिर माना है। किन्तु डाक्टर वूहलर ने इसे ठीक
नही माना है। उनका कहना है कि कश्मीरी पण्डितो
की परम्परा शंकराचार्य पर्वत स्थित मन्दिर किंवा
देव स्थान को राजा जलोक द्वारा स्थापित ज्येष्ठ रुद्र
का मन्दिर नहीं मानती। श्री फरगुसन (हिस्टोरी
आफ इण्डियन आर्किटेक्चर पृष्ठ २८२) ने भी इस मन्दिर
को प्राचीन मन्दिर नही माना है। उन्होंने कहा है
कि वर्तमान वृत्ताकार मन्दिर का भीतरी कक्ष
जिसमें शिवलिंग स्थापित है उसका मुस्लिम काल
में निर्माण किया गया था ।
प्राचीन मन्दिरों के ध्वंसावशेष गुपकर में
अनेक स्थानो पर बिखरे मिलते हैं। गगरीबल के
पश्चिमी तट पर सैय्यद निजामुद्दीन साहब की जियारत
में तथा ग्राम की अन्य मुसलिम इमारतों में
मन्दिरों के बड़े अलंकृत शिलाखण्ड लगे मिलते हैं ।
श्री स्टीन को उक्त जियारत के मार्ग में एक
ओर दस फिट गोला एक विशाल शिवलिंग क्षत-
विक्षत दिखाई दिया था। ज्येष्ठ नाग के समीप
भी उन्हें एक विशाल शिवलिंग पर्वत मूल में भग्ना-
वस्था मे मिला था। जेथर में उन्हें ऊपर भूमि पर
कोई विशेष ध्वंसावशेष नही मिले थे ।
मैने यहाँ काफी समय खोज में व्यतीत किया है।
श्री स्टीन तथा कल्हण वर्णित गुपकर ग्राम का रूप
इस समय बिल्कुल बदल गया है। यहाँ पर पूर्व
समय आबादी थी। स्वर्गीय राजा हरी सिंह
अन्तिम डोगरा राजा कश्मीर ने इस स्थान को अपने
प्रासाद निर्माण निमित्त ले लिया था।
वर्तमान जेठा देवी से लेकर राजा श्री कर्ण सिंह
के वर्तमान राज प्रासाद तक की भूमि जो शंकराचार्य
मन्दिर के पृष्ठ भाग में है। नव प्रासाद निर्माण निमित्त
ले ली गयी है। उस पर स्वर्गीय राजा श्री हरी सिंह
जी ने अपने तथा तत्कालीन युवराज श्री कर्ण सिंह के
लिये एक और प्रासाद बनवाया था। आजादी के
पश्चात् आज कल वह प्रासाद एक होटल के रूप
में परिणत कर दिया गया है।
श्री स्टीन के मानचित्र तथा वर्णन के आधार
पर मैने अनुसन्धान आरम्भ किया। नक्शा से कुछ
सहायता नहीं मिली। सब कुछ बदल गया है। केवल
पहाड़ी ढल तथा नाग अर्थात् झरनों का अस्तित्व यथा
स्थान है। प्राचीन मार्ग तथा सड़क भी समाप्त हो गये
हैं। नवीन मार्ग तथा सड़क नवीन ढंग से मूल स्थान से
हटकर बनाये गये हैं। स्थानीय लोगों से बातें कीं।

प्रथम तरंग [१८९]

[बायाँ स्तम्भ]
जांच किया । किन्तु विशेष सहायता न मिली ।
स्तीन वर्णित लिंग तथा कल्हण वर्णित मन्दिर का
लेश मात्र वहाँ चिन्ह नही मिला । सब कुछ समयर
कर आधुनिक मैदान तथा इमारतो में परिणत हो
गया है ।
श्री स्तीन जहाँ ज्येष्ठेश्वर का स्थान निश्चित
करते हैं वहाँ इस समय भव्य राजप्रासाद एवं होटल
है । नकशे की सड़क का अस्तित्व लोप हो गया है ।
दो दिन तक मैं स्थानो का निरीक्षण करता रहा
किन्तु कुछ पता नही चला ।
मेरा ड्राइवर ब्राह्मण था । वह राजा हरीसिंह
के समय से ही राजकर्मचारी था । ड्राइवरी करते
करते वृद्ध हो गया था । इस समय सरकारी ड्राइवर
था । कश्मीर के मुख्य मंत्री श्री बख्शी गुलाम मुहम्मद
ने एक कार के साथ उसे मेरे साथ लगा दिया था ।
वह इस स्थान से परिचित था । बहुत दिन पूर्व उसका
यहाँ पर क्वार्टर था । उसमें रहता था । क्वार्टरों
का भी अब लोप हो चुका है । मैंने उससे पुरानी
सड़क का स्थान पूछा । नकशा दिखाया । पुराने ग्राम
का चिह्न भी बताया ।
मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि डोगरा
हिन्दू राज्य में शिवलिंग हटाया जा सकता था । वे
धर्मपरायणता के लिये प्रसिद्ध थे । मैने ड्राइवर से
उसकी बाल्यावस्था की कुछ बातें स्मरण करने के
लिये उत्साहित किया । वह राजभक्त सेवक था ।
वह जानकर इस स्थान के विषय में कुछ नहीं बता
रहा था । मैंने इसे लक्ष्य किया । उसने काश्मीर के
पुरातत्व विभागीय युवक से जिसे मैंने अपने साथ ले
लिया था दबी जबान में धीरे से कहा—यहाँ शिव
लिंग था । उस स्थान पर जहाँ राज्य प्रासाद या
होटल का इस समय मैदान है । इस बात से मुझे
एक जानकारी का स्रोत मिला ।
इस स्थान पर आने के पूर्व मैं जेठा देवी गया
था । मुझे श्रीनगर में कुछ ब्राह्मणों ने बताया कि जेठा
देवी के स्थान पर ही ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर था । मैं


[दायाँ स्तम्भ]
वहाँ पहुँचा । स्थान देखा । मुझे निराशा हुई । स्थान
आधुनिक था । प्राचीनता नाम की किसी वस्तु का
दर्शन नहीं मिला । प्रथम क्रिया हुई । यह स्थान
ज्येष्ठेश्वर का नही हो सकता । यहाँ देवी की संवत्
२००३ विक्रमी में एक मूर्ति स्थापित की गई थी ।
शिवलिंग कहीं नहीं था । मैं बहुत देर तक वहाँ
बैठा और आस-पास घूमता रहा । कुछ समय
पश्चात् एक वृद्ध ब्राह्मण वहाँ आ गये । मेरा कौतूहल
जानकर वे चकित हुए । मैने अपना सन्देह इस स्थान
के विषय में प्रकट किया ।
ज्येष्ठा अर्थात् वर्तमान जेठा देवी के स्थान के
पार्श्व में एक नाला बहता था । ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर
नाला के वाम पार्श्व में पुरानी अर्थात् श्री स्तीन के
नकशा के लुप्त वालो सड़क के समीप होना चाहिये था ।
ज्येष्ठा देवी का स्थान ज्येष्ठ रुद्र से ऊपर तथा
नाला के तटपर है । राज प्रासाद मे होकर यहाँ का
मार्ग जाता है । पूर्व काल में यह मार्ग एक सड़क
के रूप में था । इस समय सड़क बिगड़ गयी है ।
पगडण्डी का रूप ले ली है । ऊपर पहुँचने पर एक
सुरम्य स्थान मिलता है । यहाँ पर नाग अर्थात्
जलस्रोत है । स्रोत का प्रथम स्वरूप नव निर्मित
ज्येष्ठा देवी के मन्दिर के सम्मुख है । एक कुण्ड में
स्रोत जल आता है । वहाँ से जल निकल कर नीचे
बने चौकोर दूसरे कुण्ड में आता है । यहाँ पुरुष
स्नान करते हैं । वहाँ से जल निकलकर तीसरे
अर्थात् सबसे निचले कुण्ड में आता है । यह कुण्ड भी
चौकोर है । यह मिट्टी तथा पत्थर की दिवाल से
घेरा गया है । जहाँ महिलाएँ स्नान करती हैं ।
प्रथम कुण्ड के ऊपर मैदान है । जहाँ धर्मशाला
बनी है । धर्मशाला के बायें भाग में दो कूप जैसे
बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये हैं । इसमें होटल वाले शीत
काल में बरफ एकत्रित कर रखते हैं । उसका प्रयोग
ग्रीष्म काल में करते हैं । इन गड्ढों की गहरी
खुदाई की गयी थी । परन्तु उसमें से कोई महत्त्व-
पूर्ण वस्तु प्राप्त नही हुई ।

१९० राजतरंगिणी
विस्मारितो नित्यकृत्यं कार्यव्यग्रतयैकदा ।
विदूरसोदरजलास्नावनालाभदुर्मनाः ॥ १२५ ॥
अपश्यन्निर्गमात्स्थानादकस्मादुत्थितं पयः ।
स सोदरात्रिसंवादि वर्णस्वादादिभिर्गुणैः ॥ १२६ ॥
१२५,१२६. कार्य व्यग्रता के कारण एकदिन राजा सुदूर स्थित सोदर तीर्थ में नित्यकृत्या-
नुसार स्नान करना भूल गया । यह इस विस्मृति के कारण दुर्मन हो गया। एक जल हीन स्थान में
अकस्मात् एक जल स्रोत उद्भूत हो गया था । वह जल वर्ण, स्वाद एवं अन्य गुणों मे सोदर तीर्थ
के जलतुल्य था।
यहाँ पर कोई प्राचीन वस्तु नहीं मिली । यहाँ
ब्राह्मणों के दो घर हैं। वे देवी की पूजा करते हैं।
अखरोट के कुछ वृक्ष हैं। उनका फल बेचकर जीविको-
पार्जन करते हैं। स्थान सुन्दर है। यहाँ से डल
लेक तथा पर्वतों का अच्छा दृश्य मिलता है। सारिका
पर्वत का भी अच्छा दृश्य मिलता है। हरमुकुट पर्वत
शिखर माला भी दूर पर दिखाई देती हैं। निस्सन्देह
यह स्थान देवी पार्वती के तपस्या योग्य है। यहाँ
शान्ति मिलती है। तरुछाया में बैठकर प्रकृति की
शोभा निरखने में आनन्द मिलता है।
मुझे परेशान देखकर उस वृद्ध ब्राह्मण ने कहा—
"मैं पाँच वर्ष का था। उस समय नीचे वाला महल
राजा बनवा रहे थे। वहाँ पर एक बहुत बड़ा शिव-
लिंग था। उस लिंग तथा देवस्थान के कारण भूमि
पर कब्जा पाना कठिन हो रहा था। राज्य प्रासाद
के किसी खुले या बन्द भाग में शिवलिंग रहने देने
का अर्थ था। जनता दर्शन और तीर्थ यात्रा के लिये
आती। अतएव राजा हरी सिंह ने शिवलिंग उखड़-
वाकर फेंकवा दिया। सलाहकारों के सुझाव पर
शिवलिंग कही गाड़ दिया गया। मैदान चौरस कर
दिया गया। मुमकिन है। वह शिवलिंग कहीं मैदान
या मकान के नीचे दबा पड़ा हो।"
मुझे इस कथन में सच्चाई मालूम हुई। ज्येष्ठा
देवी जाने का मार्ग पैलेस अर्थात् होटल से होकर
जाता है। वह मार्ग भी राजा ने बन्द करवा दिया
था। राजा कर्ण सिंह के राजा होने पर वह मार्ग
खुल गया है। लोग ज्येष्ठा के मन्दिर तक इस मार्ग
से जा सकते हैं। अब लोग यात्रा करने आने लगे
हैं। यद्यपि मैंने स्वयं देखा कि मार्ग के द्वार पर
साइन बोर्ड लगा था—"प्राइवेट रोड।"
नीचे उतर कर आया। वृद्ध ड्राइवर से सब
बातें बतायीं। वह चकित हुआ। वह स्थान तो
नहीं बता सका कि शिवलिंग इस समय कहाँ गड़ा है
परन्तु यह स्वीकार किया कि यहाँ शिवलिंग था।
किस स्थान पर वह था यह निश्चयात्मक रूप से
नहीं बता सका।
उसने एक बात और बताई। उसका समीप
ही क्वार्टर था। वह वृद्धों से सुनता आया था।
एक शेर शिवलिंग की नित्य परिक्रमा करने आता था।
ज्येष्ठा देवी की भी परिक्रमा करता था। मेरी सन्देह
दृष्टि देखकर उसने निश्चयात्मक ढंग से विश्वासपूर्ण
वाणी में कहा—मैं छोटा था। अपने क्वार्टर में रहता
था। मैंने स्वयं देखा है। शेर का एक बच्चा आता
था। शिवलिंग की परिक्रमा करता था। ज्येष्ठा देवी
की परिक्रमा करता था। यहाँ आबादी बढ़ने लगी।
बहुत दिन हुआ उसका आना बन्द हो गया। और
फिर तो यह देवस्थान ही समाप्त हो गया।
मैं यह सब सुनकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचा।
प्राचीन शिवलिंग पैलेस जो अब होटल हो गया है
उसके मैदान अथवा इमारत के नीचे कही गड़ा है।
अथवा डल लेक में खण्डित मूर्ति या लिंग की तरह

प्रथम तरंग १९१
प्रादुर्भूते ततस्तस्मिंस्तीर्थे कृतनिमज्जनः ।
स नन्दिरुद्रस्पर्धायां मानी पर्याप्तिमासदत् ॥ १२७ ॥
१२७. उस प्रादुर्भूत नवीन तीर्थ में मानी राजा ने स्नान किया तो उसे सोदर तीर्थ स्नान
जैसी प्रसन्नता हुई । नन्दि रुद्र की स्पर्धा कार्य सम्पन्न होता देख उसे सन्तोष हुआ ।
तेन जातु परीक्षार्थं निक्षिप्तः सोदरान्तरे ।
सपिधानाननः स्वर्णशृङ्गारः सुचिरोदरः ॥ १२८ ॥
१२८. उस उत्पन्न सोदर तीर्थ को परीक्षा लेने के लिये कि वास्तव मे वह जल मूल सोदर
तीर्थ का है या नहीं । राजा ने एक सुवर्ण शृङ्गार का मुख शीशा से बन्द किया । उसे मूल सोदर
तीर्थ में छोड़ दिया ।
दिनद्वयेन सार्धेन श्रीनगर्युद्भूवाम्भसः ।
उन्मग्नः स महीभर्तुस्तस्य चिच्छेद संशयम् ॥ १२६ ॥
१२६. ढ़ाई दिन के पश्चात् वह सुवर्ण शृङ्गार श्रीनगर समीपस्थ उद्भूत सोदर तीर्थ मे
निकल आया तो उस राजा का सन्देह दूर हो गया ।
नूनं नन्दीश एवासौ भोक्तुं भोगानवातरत् ।
दृष्टादृष्टक्रियासिद्धिर्न भवेत्तादृगन्यथा ॥ १३० ॥
१३०. प्रतीत होता था कि राजा स्वयं नन्दीश था । भूमि पर भोग भोगने के लिये अवतार
लिया था अन्यथा इस प्रकार के अलौकिक कार्य किस प्रकार देखना सम्भव था ।


प्रवाह कर दिया गया है। और यही स्थान ज्येष्ठ
रुद्र का स्थान था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १२६ में 'सोदरा' का 'मोदर',
'वर्णश्या' का पाठभेद 'वर्णरिवा' मिलता है।
श्लोक संख्या १२८ में 'जातु' का पाठभेद 'तत्र'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१२६. (१) मै बदायूँ उत्तर प्रदेश में एक
समय गया था। बदायूं की पुरानी आबादी एक
ऊँचे स्थान पर है । नगर में अनेक कूप है । मुझे
बताया गया यदि एक कूप में सन्तरा छोड़ दिया जाय
तो दूसरे कूप में निकल आता है । यही बात मुझे
नैपाल में मालूम हुई। वहाँ गुह्येश्वरी देवी का मन्दिर
है। मै दर्शन करने गया । वहाँ के कुण्ड के विषय मे
यही कहा गया । समय-समय पर उसमें फल निकल
आता था ।


कल्हण का यह वर्णन महत्त्वपूर्ण है। ढाई दिन
में स्वर्ण शृंगार नवीन सोदर तीर्थ में निकल आया ।
यह दोनों स्थानो के मध्य की दूरी और यात्रा मे लगने
वाले समय की ओर संकेत करता है। राजा की शक्ति
की ओर भी संकेत करता है। स्वर्ण शृंगार को एक
स्थान से दूसरे स्थान पहुँचने में ढाई दिन का समय
लग गया । यद्यपि राजा राज कार्य की व्यस्तता
के बावजूद प्रतिदिन सोदर तथा विजयेश्वर की
यात्रा करता था । कल्हण राजा की अलौकिक
शक्ति के वर्णन की भूमिका प्रस्तुत करते हुए निम्न-
लिखित श्लोक में उसकी तुलना नंदीश से कर
देता है ।
१३०. (१) अवतार : प्रायः सभी धर्म किसी न
किसी रूप में अवतारवाद के सिद्धान्त को स्वीकार
करते हैं । देवताओ का मनुष्य रूप धारण करना
तथा मानवों से सम्पर्क स्थापित करना अनादि काल

१९२ राजतरंगिणी
से मान्यता प्राप्त करता आया है। अवतार का
साधारण अर्थ होता है। ईश्वर किंवा देवताओं का
शक्ति द्वारा भौतिक जगत् में मूर्तिमान आविर्भाव
होना। अवतार का प्राचीन शब्द प्रादुर्भाव है।
वैष्णव सम्प्रदाय में अवतार को विशेष महत्त्व
दिया जाता है। पांचरात्र भगवान् विष्णु के व्यूह,
विभव, अन्तर्यामी, तथा आचार्यावतार का सिद्धान्त
स्वीकार करता है। शैव सम्प्रदाय के ग्रन्थों में भग-
वान् शंकर के नाना प्रकार की लीलाओं का वर्णन
मिलता है। श्रीमद्भागवत (१०:२१:१४) भगवान्
के अवतार का प्रयोजन उपस्थित करता है।
नृणां निःश्रेयसायापि व्यक्तिर्भगवतो भुवि ।
अव्यक्तस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥
अवतार-वाद का पुराणों में सविस्तार उल्लेख
किया गया है। वैदिक साहित्य में अवतारवाद का
रूप मिलता है। प्रजापति ने प्राणियों की रक्षा
निमित्त अनेक रूप धारण किया था। शतपथ ब्राह्मण
(१४:१:१) में मत्स्य, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:
५) में कूर्म, जैमिनी ब्राह्मण में (३:२७२) वाराह,
तैत्तिरीय संहिता (७:१.५:१) तथा शतपथ (१४:
१:२:११) तथा तैत्तिरीय आरण्यक में नृसिंह तथा
तैत्तिरीय संहिता (२:१.३:१) में वामन अवतारों
का संकेत प्राप्त होता है। स्वयं ऋग्वेद में (१:
१५४:३) में त्रिविक्रम विष्णु का तीन पदों में विश्व
को नापने का उल्लेख है।
कालान्तर में प्रजापति के स्थान पर विष्णु की
प्रमुखता हुई। उस समय से विष्णु के अवतारों का
वर्णन मिलने लगा। अवतारों के रूप, लीला तथा
घटना वैविध्य का वर्णन वेद पर ही अधिकतया
आश्रित है।
विष्णु के चौबीस अवतार माने जाते हैं। दशा-
वतार विशेष प्रचलित हैं। उनमें दो जल प्राणी मत्स्य
तथा कच्छप हैं। ये बन जो
दो थलचारी वरा॑ है।
बनजो हैं। दोनों का तथा
भाग वराह तथा सिंह का है। एक वामन अवतार
है। वे सर्व हैं। तीन राम हैं। परशुराम, दाशरथि
राम तथा बलराम । बुद्ध ग्यारह हैं। कल्कि
अनुपः हैं।
महाभारत में बुद्ध का नाम नहीं मिलता है।
वहाँ पर 'हंस' को अवतार मान कर दस संख्या की
पूर्ति की गयी है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल
ठीक है। महाभारत काल के पूर्व भगवान् बुद्ध का
जन्म नहीं हुआ था। महाभारत के लगभग ढाई
हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ था।
अतएव महाभारत में बुद्ध का अवतार न होना तर्क
सम्मत है।
बौद्ध धर्म के महायान पंथ में अवतारवाद की
कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्व कर्मफल की पूर्णता
होने पर बुद्ध रूप में अवतरित होते हैं। जातक कथाएँ
इस प्रकार के आख्यानों से भरी पड़ी हैं। तिब्बत में
दलाईलामा के रूप में अवतार का संकेत मिलता है।
लामा लोजंग-ग्या-मत्सो (सन् १६१५-१६८२ ई०)
ने इस परम्परा की स्थापना की। तिब्बती मान्यता
है। दलाईलामा की मृत्यु के पश्चात् उनकी
आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है। इस
मत का प्रचार मंगोलिया के मठों में विशेष रूप
से था। परंतु चीन में अवतारवाद की कल्पना
मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी।
पारसी धर्म की परम्परा वैदिक तथा हिन्दुओं
की अनेक मान्यताओं से मिलती है। ये राजा को
पवित्र तथा देवी शक्ति सम्पन्न मानते हैं। पारसी
ग्रन्थों में 'बहूशों हुरेनाट' राजा में अद्भुत तेज सत्ता
थी। वह कालान्तर में मर्दशिर राजा और सस्सनवंशी
राजाओं में थी।
शामी अर्थात् सेमेटिक लोगों में कुछ कम या
ज्यादा अवतारवाद के अंकुर मिलते हैं। यहाँ
राजा भौतिक तथा दैवी शक्ति का प्रतीक माना
था।
अर्थात् बेबोलोनिया में अवतारवाद की
विकास हुआ था। किश का राजा

प्रथम तरंग १९३
राजंस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् ।
ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥
१३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था। मध्य मार्ग में एक अबला मिली। उसने
राजा से भोजन की याचना की।
यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते ।
व्यवृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाशयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥
१३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली
रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की।
स सत्त्वहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् ।
अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥
१३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था। उसने उससे
कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो।' उसने राजा से कहा।

उरुमुरु अपने जीवन काल में ही ईश्वर का
अवतार माना जाता था। नरामसिन राजा कहता
था। उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने
अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा
रखा था।
मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी।
वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था।
मिस्री लोगों का विश्वास था। 'रा' देवता रानी के
साथ सहवास करता था। उससे अलौकिक शक्ति
सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था।
यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के
समान थी। वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र
तुल्य मानते थे। जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि-
ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे।
यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष
में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक
झुकाव है।
ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस
मान्यता को स्वीकार करता है। महात्मा ईसा में
अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है।
इसलाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक
शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है।
२५

कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक
ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है। उसकी तुलना
नन्दीश के अवतार से करता है।
१३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ
भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का
उल्लेख किया है। राजा जलोक का झुकाव बुद्ध
धर्म की ओर अधिक नहीं था। अपितु वर्णाश्रम
धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था। बौद्धों
में आतंक व्याप्त हो गया होगा। राज्याश्रय के अभाव
में वे भय का अनुभव करते। वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों
द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ
यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है। राजा जलोक के
समय बौद्धधर्मावलम्बियो की क्या स्थिति हो गयो
थी। यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद
'यथेच्छ' मिलता है।
श्लोक संख्या १३३ में 'मांस' का पाठभेद 'दातु'
मिलता है।

१९२ राजतरंगिणी

से मान्यता प्राप्त करता आया है। अवतार का
साधारण अर्थ होता है। ईश्वर किंवा देवताओं का
शक्ति द्वारा भौतिक जगत् मे मूर्तिमान आविर्भाव
होना। अवतार का प्राचीन शब्द प्रादुर्भाव है।
वैष्णव सम्प्रदाय में अवतार को विशेष महत्त्व
दिया जाता है। पांचरात्र भगवान् विष्णु के व्यूह,
विभव, अन्तर्यामी, तथा आचार्यावतार का सिद्धान्त
स्वीकार करता है। शैव सम्प्रदाय के ग्रन्थो में भग-
वान् शंकर के नाना प्रकार की लीलाओं का वर्णन
मिलता है। श्रीमद्भागवत (१०:२१:१४) भगवान्
के अवतार का प्रयोजन उपस्थित करता है।
नृणां निःश्रेयसायापि व्यक्तिर्भगवतो भुवि ।
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः ॥
अवतार-वाद का पुराणों में सविस्तार उल्लेख
किया गया है। वैदिक साहित्य में अवतारवाद का
रूप मिलता है । प्रजापति ने प्राणियों की रक्षा
निमित्त अनेक रूप धारण किया था। शतपथ ब्राह्मण
(१८.१:१) में मत्स्य, शतपथ ब्राह्मण (७:५:१:
५) में कूर्म, जैमिनी ब्राह्मण में (३.२७२) वाराह,
तैत्तिरीय संहिता (७:१.५१) तथा शतपथ (१४:
१:२:११) तथा तैत्तिरीय आरण्यक में नृसिंह तथा
तैत्तिरीय संहिता (२१.३.१) में वामन अवतारों
का संकेत प्राप्त होता है। स्वयं ऋग्वेद मे (१:
१५४.३) में त्रिविक्रम विष्णु का तीन पदों में विश्व
को नापने का उल्लेख है।
कालान्तर में प्रजापति के स्थान पर विष्णु को
प्रमुखता हुई। उस समय से विष्णु के अवतारों का
वर्णन मिलने लगा। अवतारों के रूप, लीला तथा
घटना वैविध्य का वर्णन वेद पर ही अधिकतया
आश्रित है।
विष्णु के चौबीस अवतार माने जाते हैं। दशा-
वतार विशेष प्रचलित हैं। उनमें दो जल प्राणी मत्स्य
तथा कच्छप हैं। वे वन जी हैं।
दो थलचारी वराह तथा नृसिंह हैं। वे भी
वनचरो हैं। दोनों का अधोभाग मनुष्य तथा शिरो-
भाग वराह तथा सिंह का है। एक वामन अवतार
है। वे खर्व हैं। तीन राम हैं। परशुराम, दाशरथि
राम तथा बलराम । बुद्ध सकृपः हैं। कल्कि
अकूपः हैं।
महाभारत में बुद्ध का नाम नहीं मिलता है।
वहाँ पर 'हंस' को अवतार मान कर दश संख्या की
पूर्ति की गयी है। यह ऐतिहासिक दृष्टि से बिल्कुल
ठीक है। महाभारत काल के पूर्व भगवान् बुद्ध का
जन्म नहीं हुआ था। महाभारत के लगभग ढाई
हजार वर्ष पश्चात् भगवान् बुद्ध का जन्म हुआ था।
अतएव महाभारत में बुद्ध का अवतार न होना तर्क
सम्मत है।
बौद्ध धर्म के महायान पंथ में अवतारवाद की
कल्पना दृढ़ मूल है। बोधिसत्त्व कर्मफल की पूर्णता
होने पर बुद्ध रूप में अवतरित होते हैं। जातक कथाएँ
इस प्रकार के आख्यानों से भरी पड़ी हैं। तिब्बत में
दलाईलामा के रूप में अवतार का संकेत मिलता है।
लामा लोजंग-ग्या-मत्सो (सन् १६१५-१६८२ ई०)
ने इस परम्परा की स्थापना की। तिब्बती मान्यता
है। दलाईलामा को मृत्यु के पश्चात् उनकी
आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है। इस
मत का प्रचार मंगोलिया के मठों में विशेष रूप
से था। परंतु चीन में अवतारवाद की कल्पना
मान्यता प्राप्त नहीं कर सकी।
पारसी धर्म को परम्परा वैदिक तथा हिन्दुओं
की अनेक मान्यताओं से मिलती है। वे राजा को
पवित्र तथा दैवी शक्ति सम्पन्न मानते हैं। पारसी
ग्रन्थों में 'बहूशों हूरेनाट' राजा में अद्भुत तेज सत्ता
थी। वह कालान्तर में अर्दशिर राजा और सस्सनवंशी
राजाओं में थी।
शामी अर्थात् सेमेटिक लोगों में कुछ कम या
ज्यादा अवतारवाद के अंकुर मिलते हैं। यहाँ
राजा भौतिक तथा दैवी शक्ति का प्रतीक माना
जाता था।
बाबुल अर्थात् बेबोलोनिया में अवतारवाद की
मान्यता का विकास हुआ था। किश का राजा

प्रथम तरंग १९३
राज्ञस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् ।
ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥
१३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था । मध्य मार्ग में एक अबला मिली । उसने
राजा से भोजन की याचना की ।
यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते ।
व्यघृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाश्रयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥
१३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली
रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की ।
स सत्यहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् ।
अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥
१३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था । उसने उससे
कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो ।' उसने राजा से कहा ।
उरुमुश अपने जीवन काल में ही ईश्वर का कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक
अवतार माना जाता था । नरामसिन राजा कहता ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है । उसकी तुलना
था । उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने नन्दीश के अवतार से करता है ।
अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा
रखा था । १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ
मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी । भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का
वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था । उल्लेख किया है । राजा जलोक का झुकाव बुद्ध
मिस्री लोगों का विश्वास था । 'रा' देवता रानी के धर्म की ओर अधिक नहीं था । अपितु वर्णाश्रम
साथ सहवास करता था । उससे अलौकिक शक्ति धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था । बौद्धों
सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था । में आतंक व्याप्त हो गया होगा । राज्याश्रय के अभाव
यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के में वे भय का अनुभव करते । वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों
समान थी । वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ
तुल्य मानते थे । जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है । राजा जलोक के
ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे । समय बौद्धधर्मावलम्बियों की क्या स्थिति हो गयी
यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष थी । यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है ।
में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक
झुकाव है । पाठभेद :
ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद
मान्यता को स्वीकार करता है । महात्मा ईसा में 'यथेच्छ' मिलता है ।
अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है ।
इस्लाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक श्लोक संख्या १३३ में 'मांसं' का पाठभेद 'दातुं'
शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है । मिलता है ।
२५

१९४ राजतरंगिणी
बोधिसत्त्वोऽसि भूपाल कोऽपि सत्त्वोर्जितव्रतः ।
कारुण्यं प्राणिषु दृढं यस्येदृक्ते महात्मनः ॥ १३४ ॥
१३४. 'निश्चय आप कोई बोधिसत्त्व हैं भूपाल ! और कौन ऐसा सत्यव्रती हो सकता
हे ? महात्मन ! आपने जीवित प्राणियों में दृढ़ करुणा दिखायी है।
बौद्धभाषामजानानो माहेश्वरतया नृपः ।
को बोधिसत्त्वो यं भद्रे मां वेत्सीति जगाद ताम् ॥ १३५ ॥
१३५. शिव उपासक होने के कारण नृप बौद्ध भाषा नहीं समझ सका । राजा ने जिज्ञासा
की—' भद्रे ! बोधिसत्त्व क्या ? जिसे तुमने मुझे समझा है ?'
पुनर्वभाषे सा भूपं श्रोतव्यं मत्प्रयोजनम् ।
“अहं ह्युत्थापिता बौद्धैः क्रोधाद्विप्रकृतैस्त्वया ॥ १३६ ॥
१३६. उसने पुनः उस भूप से कहा — 'प्रयोजन सुनिए मैं उन बौद्धों द्वारा भेजी गयी हूँ
जिन्हें अपने क्रोध के कारण आपने दुःखी कर दिया है ।
पादटिप्पणियाँ :
१३३(१) शरीर मांस ग्रहण : कल्हण इस श्लोक
के द्वारा राजा जलोक का चरित्र महत्त्वपूर्ण बना देता
है । राजा का पवित्र चरित्र निखर उठा है । कृत्या
बौद्धो द्वारा भेजी गयी थी । परन्तु राजा ने असीम
धैर्य, मेधा एवं दयाशीलता का परिचय दिया है ।
कृत्या के प्रति किंचित् मात्र क्रोध, क्षोभ किंवा द्वेष
उसमें उत्पन्न नही हुआ ।
यद्यपि राजा बौद्ध धर्म विरोधी था, परन्तु इस
श्लोक से स्पष्ट प्रकट होता है । राजा अहिंसक था ।
उसने बौद्धो के प्रति हिंसा वृत्ति का वरण नहीं किया
था । उन्हें ताडित नही किया था । उसने राजा
शिवि के समान प्राणी रक्षा के लिये अपना मास देना
पसन्द किया । अपने जीवन की आहुति देना स्वीकार
किया । परन्तु किसी प्राणी को कष्ट देना, उसकी
हत्या करना, उसने अपनी जीवन रक्षा निमित्त भी
उचित नहीं समझा । कल्हण राजा के अलौकिक
गुणों का वर्णन करते हुए, उसे महाभारत वर्णित
ययाति राजा के पौत्र राजा शिवि औशीनर के समकक्ष
कर देता है ।
जिस प्रकार राजा शिवि ने कपोत की रक्षा के
निमित्त अपना मांस काटकर तराजू पर रखना
आरम्भ किया। अपने वचन का पालन किया।
शरणागत की रक्षा की । यहाँ कल्हण राजा
जलोक को और ऊपर उठा देता है । राजा किसी का
भी मांस कृत्या को दे सकता था । वह अपना मांस देने
के लिये न तो वचनबद्ध था और न प्रतिज्ञा किया
था । परन्तु किसी भी प्राणी को उसके कारण कष्ट
न हो, अतएव अपना मांस स्वतः देने पर कटिबद्ध
हो गया !
१३४ (१) बोधिसत्त्व : इस शब्द का अर्थ
होता है बुद्ध प्राप्ति का अधिकारी व्यक्ति किंवा पात्र ।
वह व्यक्ति जिसने बुद्धत्व प्राप्त नहीं किया है।
वह महापुरुष जो आगे चलकर बुद्ध हो गया ।
भगवान् बुद्ध के जन्म काल से उनके बोध गया में
बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व काल के जीवन का सम्बोधन
बौद्ध ग्रन्थों में बोधिसत्त्व नाम से किया गया है।
बुद्धत्व प्राप्ति के पश्चात् बोधिसत्त्व स्वयं बुद्ध
हो जाते हैं ।
कल्हण ने यहाँ अबला विप्रा कृत्या से राजा
जलोक के गुणों की प्रशंसा कराने के साथ ही उन्हें
मन्दोश अवतार के समान बुद्ध अवतार होने की ओर
भी संकेत किया है। वह राजा जलोक में अवतार की

प्रथम तरंग १९५
लोकालोकाद्रिपार्श्वस्थास्तामस्यः कृतिका वयम् ।
बोधिसत्त्वैकशरणाः काङ्क्षन्त्यस्तमसः क्षयम् ॥ १३७ ॥
१३७. 'हम लोकालोक' पर्वत के पार्श्व की तम² निवासिनी कृत्या³ हैं। तम मुक्ति की
आकांक्षा में बोधिसत्त्व के शरण में रहती हैं।'
लोके भगवतो लोकनाथादारभ्य केचन ।
ये जन्तवो गतक्लेशा बोधिसत्त्वानवेहि तान् ॥ १३८ ॥
१३८. 'भगवान् लोकनाथ' से आरम्भ होकर अबतक इस लोक में कुछ प्राणी गतक्लेश२
हो चुके हैं उन्हें ही बोधिसत्त्व कहा जाता है।
मान्यता हिन्दू और बौद्ध दोनों से दिलाता है। कृत्या
राजा के मास को स्पृहा करती थी। उसने स्वयं
स्वीकार किया। राजा जलोक बोधिसत्त्व है। कल्हण
ने काश्मीर में निवासित बौद्ध एवं हिन्दू दोनों धर्मों-
वलम्बियों के अवतार रूप में जलोक को उपस्थित
किया है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३६ में 'हृत्या' का पाठभेद
'अहंकृत्या' मिलता है ।
श्लोक संख्या १३७ में 'तमसः' का पाठभेद
'तपसः' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१३७ (१) लोकालोक पर्वत : पौराणिक गाथा
के अनुसार सातों समुद्रों को परिवेष्टित करने वाली
यह पर्वत श्रेणी है । 'लोकालोकश्चक्रवालः' पृथ्वी को
घेरने वाले दो पर्वत लोकालोक तथा चक्रवाल हैं ।
(अमरः शैल वर्गः ३:२) इसका अर्थ दृश्य एवं
अदृश्य लोक होता है। कृत्या का निवास स्थान यहाँ
वर्णन किया गया है। वे अदृश्य लोक अथवा अन्धकार
में निवास करनेवाली होती हैं । अतएव उन्हें स्पष्ट
नहीं देखा जा सकता ।
(२) तम : यहाँ तम शब्द तामस
प्रकृति, अन्धकार, तमोगुण एवं पाप के लिए प्रयुक्त
किया गया है। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' इस अर्थ
में मैं समझता हूँ कल्हण ने तम शब्द का प्रयोग
किया है। तमस् का अर्थ कूप नरक का अन्धकार
तथा केश भी होता है। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त
(१०:१२०:३) में तमस् शब्द आया है। यहाँ
इसका अर्थ अन्धकार किया गया है। तम आसीत्
तमसा........? प्रारम्भ में तमस् ही तमस् था । सब-
कुछ तम से आवृत्त था।
(३) कृत्या : आभिचारिक कर्म के अर्थ में
अनेक स्थानों पर कृत्या शब्द का प्रयोग किया गया
है। (ऋ०:१०:८५:२८;२९) अथर्ववेद (५:१४:
११) में मनाया गया है कि कृत्या अपने कर्त्ता के
पास लौट जाय। अमरकोष में (नानार्थ वर्ग
३:१५८) में कृत्या का अर्थ दिया गया है-कृत्या
क्रियादेवतयोःस्त्रिपु भेद्ये धनादिभिः ।' कार्य, भूत प्रेत
आदि अधम देवता, धन, स्त्री, भूमि से भेद डाले जाने
वाले पराये राज्य के व्यक्ति इसका अर्थ किया गया
है। इसका उल्लेख एक देवी विशेष के अर्थ में भी
आता है। मारण कार्य के लिये विशेष रूप से
बलिदानादि द्वारा इसको पूजा की जाती है। यह
एक शक्ति विशेष अथवा देवी है। अभिचार क्रिया
द्वारा किसी का वध करने के लिये अनुष्ठान विशेष
द्वारा उत्पन्न की जाती है। कृत्या को तम शक्ति
भी संज्ञा दी गयी है।
१३८ (१) लोकनाथ : लोकनाथ से यहाँ
अर्थ भगवान् बुद्ध से है। इस शब्द का अर्थ ब्राह्मण,
विष्णु, शिव, राजा तथा बुद्ध होता है।
(२) क्लेश : कल्हण यहाँ भगवान् बुद्ध के
प्रसिद्ध शब्द 'दुःख' का उल्लेख न कर क्लेश शब्द
का प्रयोग करता है। यहाँ पर क्लेश का अर्थ दुःख

१९६ राजतरंगिणी
सागसेऽपि न कुप्यन्ति क्षमया चोपकुर्वते ।
बोधिं स्वस्यैव नेच्छन्ति ते विश्वोद्धरणोद्यताः ॥ १३९ ॥
१३९. वे पापियों पर भी क्रोध नहीं करते। वे अपनी क्षमाशीलता द्वारा बुरे का बदला
भले से देते हैं। वे केवल अपने लिये बोधि नहीं चाहते, अपितु विश्व की मुक्ति निमित्त उद्यत
रहते हैं।
विहारतूर्यनिर्घोषैरुन्निद्रः प्रेरितः खलैः ।
पुरा भवान्व्यधात्क्रोधाद्विहारोद्दलनं यदा ॥ १४० ॥
१४०. एक दिन विहार के तूर्य घोष द्वारा आपकी निद्रा भंग हो गयी। कतिपय खलों की
प्रेरणा से आपने क्रोधित होकर विहारों के दलन का आदेश दे दिया।
मानना बौद्धदर्शन तथा सिद्धान्त से अधिक मेल
खायेगा। योगशास्त्र के अनुसार क्लेश मुख्यतया
पाँच प्रकार के होते हैं यथा-अविद्या, अस्मिता,
राग, द्वेष तथा अभिनिवेश।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३९ में 'क्षमया' का 'कृपया',
'बोधिं' का 'हितं' 'नेच्छन्ति' का 'नेष्यन्ति' 'श्वोद्ध-
रणा' का 'श्यद्धरणो' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१४० (१) विहार दलन : विहारों के दलन
करने के आदेश से मालूम होता है कि राजा जलोक
बौद्धों का घोर विरोधी था और वर्णाश्रम धर्म के उद्धार
निमित्त तुल गया था। कल्हण विहारों के नष्ट
करने तथा भिक्षुओं के निकाले जाने का उल्लेख
पुनः रा० त० १.१४०,१४१ में करता है। बौद्ध
विहारों में हिन्दू देवता रखने की प्रथा बौद्धधर्म के
पतन के साथ प्रारम्भ हो गयी थी। कपिलवस्तु के
समीप अनेक प्राचीन बौद्ध मन्दिरों में पौराणिक
मूर्तियाँ प्राप्त हुई है। भगवान् बुद्ध को अवतार मान-
कर कालान्तर में हिन्दुओं ने बुद्ध पूजा प्रारम्भ कर
दी थी। अतएव देवमन्दिरों में बुद्ध मूर्ति के साथ
पौराणिक देवी देवताओं की मूर्तियों के रखने की
प्रथा चल पड़ी थी। आज भी एक ही मन्दिर में
शिव, विष्णु, नरसिंह, दुर्गा, गणेश आदि देवताओं की
प्रतिमायें स्थापित की जाती है। विहारों को हिन्दू
मन्दिर में परिवर्तित कर देना साधारण बात हो गयी
थी। यह समय-समय पर भारत में होता रहा है।
कृत्या के इस संवाद से यह बात और स्पष्ट हो
जाती है कि राजा का विचार बौद्धों के प्रति अच्छा
नहीं था। उग्र था। इसका कारण बौद्धों की राज्य के
प्रति निष्ठा में कमी होना हो सकता है। बौद्ध संघ-
शरण में विश्वास रखते थे। देश एवं राष्ट्र का
उनमें स्थान न था। देश एवं संघ के मतवैभिन्य
अथवा शासन वैभिन्य में किसको प्राथमिकता दी
जायगी यह प्रश्न मूर्तमान सर्वदा खड़ा होता रहा है।
बौद्ध जीवन से विरक्त होते थे। संघ शासन में
अनुशासित थे। उनकी निष्ठा संघ की अपेक्षा राज्य
के प्रति कम होती थी। यह प्रश्न मध्ययुग के प्रारम्भ
काल में यूरोप में भी उग्र रूप से खड़ा हो गया था।
चर्च और राज्य दोनों के निष्ठाकाल में किसको प्राय-
मिकता दी जायगी इस प्रश्न को लेकर शताब्दियों
तक राज्य एवं चर्च में संघर्ष होता रहा है। बुद्धधर्म
प्रवर्तक धर्म था। वह लोगों का मत परिवर्तित कर
संघ में सम्मिलित करने में मिलते इस्लाम की तरह
विश्वास करता था। सम्भव है। बौद्धों की इन मनो-
वृत्तियों के कारण राजा जलोक बौद्धधर्म विरोधी
हो गया होगा। उसके स्थानपर वर्णाश्रम धर्म को
प्रश्रय दिया था।
अनेक अनुवाद-कर्त्ताओं ने 'विहार नष्ट करने
का आदेश राजा ने दिया' यह अनुवाद किया है।

प्रथम तरंग १६७
'महाशाक्यः स नृपतिर्न शक्यो बाधितुं त्वया ।
तस्मिन्दृष्टे तु कल्याणि भविता ते तमःक्षयः ॥ १४१ ॥
अस्मद्गिरा प्रेषणीयो विहारकरणाय सः ।
दत्त्वा स्वहेमसंभारं त्वया मलिनितः खलैः ॥ १४२ ॥
तस्मिन्कृते न जायेत विहारच्छेदवैशसम् ।
तस्य तत्प्रेरकाणां च प्रायश्चित्तं कृतं भवेत् ॥ १४३ ॥
क्रुद्धैर्वादिभिरनुध्याता त्वद्वधाय प्रधाविता ।
अनुशिष्टा समाहूय बोधिसत्त्वैस्तदेत्यहम् ॥ १४४ ॥
१४१-१४४. 'उत्तेजित भिक्षुओं ने मेरे लिये सोचा । आपके वध निमित्त मुझे भेजा । उस
समय बोधिसत्त्वों ने मुझे बुलाया । निम्नलिखित उपदेश दिये- 'कल्याणि ! वह राजा महाशाक्य'
हैं। तुम उनका वध नहीं कर सकती । किन्तु उनका दर्शन करते ही तुम्हारा तम कम हो जायगा ।
खलों की प्रेरणा द्वारा उसने दोष किया है, हमारे नाम से तुम उसे प्रेरित करना कि वह
अपना हेम संभार देकर विहार का निर्माण करा दे । ऐसा करने से विहार उच्छेद के दोष का
भागी राजा न रहेगा और जिन खलों ने उसे उत्तेजित किया है उनके और उसके दोषों का
इस प्रकार प्रायश्चित्त हो जायगा ।
कुछ ने 'विहार गिराने का राजा ने आदेश दिया' यह अनुवाद अंग्रेजी तथा हिन्दी में किया है। यहाँ दलन शब्द का प्रयोग किया है। दलन का अर्थ 'दबाना' अर्थात् विहारों को कुचलने किंवा दबाने का था। यह अर्थ अधिक समीचीन मालूम पड़ता है।
महासम्मत था। महावंश में उल्लेख है क्षत्रिय वंशों में शिरोमणि महासम्मत वंश में महामुनि (बुद्ध) ने जन्म लिया।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या १४१ में 'महाशाक्य' का पाठभेद 'महासत्त्व' मिलता है ।
श्लोक संख्या १४२ में 'स्वहेम' का पाठभेद 'दत्वाम्ब हेम' मिलता है ।
श्लोक संख्या १४४ में 'अनुशिष्टा' का 'अनुदिष्टा' तथा 'सत्त्वं' का पाठभेद 'सत्यं' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१४१ ( १ ) महाशाक्य : एक मत है कि शुद्ध पाठ महासम्मत है। महासम्मत तथा महाशाक्य में नाम मात्र का भेद है। महावंश (२:२३) के अनुसार भगवान् बुद्ध के वंश का नाम
त्रिपिटक के अनुसार भगवान् बुद्ध शाक्य वंशीय थे । देवदह शाक्य थे । उनके पुत्र सिंहहनु थे । सिंहहनु के पुत्र शुद्धोधन थे । शुद्धोधन के पुत्र गौतम अर्थात् बुद्ध थे । गौतम गोत्र था । शाक्य क्षत्रियों की एक शाखा थी। यह शाखा राजा इक्ष्वाकु के रक्त से सम्बन्धित थी । भगवान् बुद्ध शाक्य मुनि हैं। उन्हें शाक्य में सर्वश्रेष्ठ होने के कारण उनको महाशाक्य की संज्ञा दी गयी है। महासम्मत शब्द का सम्बन्ध भगवान् बुद्ध के वंश किंवा जाति से था। महाशाक्य भगवान् का नाम शाक्यों में सर्व श्रेष्ठ किंवा महान् होने के कारण दिया गया था। वह विशेषण है। महाशाक्य शब्द का प्रयोग महासम्मत के स्थानपर अधिक उपयुक्त लगता है।