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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 984 में से

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पृष्ठ 272

प्रथम तरंग । १८७


नन्दिक्षेत्र के उत्तर ओर कालोदक सतसरनी दर्रा
दक्षिण तरफ हरमुकुट पर्वत तत्पश्चात् ब्रह्मसर नाग
और धुर दक्षिण में भूतेश्वर है। पश्चिम सरबल नाग
तथा पर्वतमाला है।

१२४ (१) ज्येष्ठ रुद्र अथवा ज्येष्ठेश : नन्दि-
क्षेत्र में भूतेश्वर में ज्येष्ठ रुद्र का मन्दिर तथा लिंग था।
सोदर तीर्थ के श्रीनगर में अवतीर्ण होने के पश्चात्
यह स्वाभाविक था कि ज्येष्ठ रुद्र किंवा ज्येष्ठेश का भी
मन्दिर राजा सोदर तीर्थ के समीप निर्माण कराता।
अन्यथा सोदर तीर्थ श्रीनगर में लाने के पश्चात्
भी राजा को बत्तीस मिल की नित्य यात्रा ज्येष्ठरुद्र
के दर्शन निमित्त करनी पडती। प्रतिदिन ३२ मिल
आने ओर जाने में कुल ६४ मिल दुर्गम पर्वतीय मार्ग
से चलना पड़ता। अतएव राजा ने ज्येष्ठ रुद्र की
स्थापना श्रीनगर में की। यह स्थान कहाँ था और यह
अब किस अवस्था में है। यह विचारणीय विषय है।

इस समय शिव ज्येष्ठेश की संज्ञा उस लिंग से दी
जाती है जो श्रीनगर में ज्येष्ठ नाग के पास स्थित है।
डल लेक के गगरीबल के दक्षिण पश्चिम उठती पहाड़ो
ढाल पर तथा जेथर ग्राम के कुछ ऊपर है। श्रीनगर
एवं कश्मीर के ब्राह्मणो का यह पवित्र तीर्थ स्थान
अत्यन्त प्राचीन काल से रहा है। इसका विस्तार से
उल्लेख ज्येष्ठ माहात्म्य में मिलता है।

गाया है। भगवान् शिव ने ज्येष्ठा अर्थात् पार्वती
का उद्धार एक दैत्य से यहाँ किया था। यहीं पर देवी
से विवाह किया। विवाह के पश्चात् शिव का नाम
ज्येष्ठेश पड़ गया !

समीपवर्ती ग्राम जेथर का नाम माहात्म्य में
ज्येष्ठेश्वरक दिया गया है। श्री साहिबराम ने ज्येष्ठेश्वर
की पूजा का उल्लेख अपने तीर्थ में किया है। उन्हें
ज्येष्ठ रुद्र कहा है। काश्मीरी उसे ज्येष्ठ लुदर कहते
हैं। यह शब्द ज्येष्ठ रुद्र का अपभ्रंश है। चतुर्थ
तरंगिणी में 'ज्येष्ठ रुद्रास्य पर्वत' (५९२) उल्लेख
से प्रकट होता है कि स्थान का नाम ज्येष्ठ रुद्र से
सम्बन्धित था। श्रीपंचमी अर्थात् वैशाख बदी पंचमी
को यहाँ काश्मीरियों का जमघट होता था। माहात्म्य
में यही दिन ज्येष्ठेश की तीर्थ यात्रा के लिये निश्चित
किया गया है।

डल झील को वहींपर (श्लोक ८१३) में 'ज्येष्ठ-
रुद्रसमीपस्थम् सरत' कहा गया है। अर्थात् डल लेकका
प्राचीन एक नाम सर था। उलर लेक का नाम महा-
पद्मसर देकर दोनों के नामों में स्पष्ट अन्तर दिखाया
गया है। डल को सर तथा उलर को महापद्मसर
कहते थे। श्लोक ८०६ में 'ज्येष्ठ रुद्रसमीपस्य-
गिरिः' शब्द आया है। शंकराचार्य पर्वत का काला-
न्तर में एक नाम ज्येष्ठरुद्र भी पड़ गया था। जेथर
से इस पर्वत के पूर्वीय मूल तक का अन्तर कठिनता
से एक मिल होगा। महादेव माहात्म्य के दो उल्लेखो
से भी यह बात स्पष्ट हो जाती है। शिव को वहाँ
(२:८) इस प्रकार दिखाया गया है कि जैसे वह
सारिका किंवा हर पर्वत पर से चारों ओर के
अतिरम्य प्राकृतिक दृश्य का अवलोकन कर रहे हैं।
वहाँ से वह पूर्व दिशा में डल लेक, तथा दक्षिण दिशा
में ज्येष्ठ रुद्र पर्वत देख रहे हैं। इसी प्रकार १:१०
में पार्वती को वितस्ता के तट से ज्येष्ठरुद्र का उत्तुङ्ग
स्थान देखते दिखाया गया है। सारिका पर्वत पर
चढ़कर यदि चारों ओर देखा जाय तो शंकराचार्य
पर्वत अथवा ज्येष्ठ रुद्र जिसे मुसलिम लेखको ने
तख्त सुलेमान लिखा है दक्षिण दिशा में गौरव पूर्ण
शिखर ऊँचा किये दिखाई देता है। यहाँ के मन्दिर
के शिखर पर लगी बिजुली का प्रकाश रात्रि में समस्त
कश्मीर उपत्यका में चमकता दिखाई पड़ता है जैसे यह
रात्रि में उपत्यका की एक सजग प्रहरी की तरह
रक्षा कर रहा है। शंकराचार्य पर्वत तथा वितस्ता
के मध्य संकीर्ण स्थान है। वहाँ तट से खड़ा होकर
बिना मस्तक ऊपर उठाये शंकराचार्य पर्वत पर स्थित
मन्दिर को कोई नहीं देख सकता। मैंने इन दोनो
बातों का स्वयं अनुभव किया और सत्य पाया है।