सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 274

प्रथम तरंग [१८९]

[बायाँ स्तम्भ]
जांच किया । किन्तु विशेष सहायता न मिली ।
स्तीन वर्णित लिंग तथा कल्हण वर्णित मन्दिर का
लेश मात्र वहाँ चिन्ह नही मिला । सब कुछ समयर
कर आधुनिक मैदान तथा इमारतो में परिणत हो
गया है ।
श्री स्तीन जहाँ ज्येष्ठेश्वर का स्थान निश्चित
करते हैं वहाँ इस समय भव्य राजप्रासाद एवं होटल
है । नकशे की सड़क का अस्तित्व लोप हो गया है ।
दो दिन तक मैं स्थानो का निरीक्षण करता रहा
किन्तु कुछ पता नही चला ।
मेरा ड्राइवर ब्राह्मण था । वह राजा हरीसिंह
के समय से ही राजकर्मचारी था । ड्राइवरी करते
करते वृद्ध हो गया था । इस समय सरकारी ड्राइवर
था । कश्मीर के मुख्य मंत्री श्री बख्शी गुलाम मुहम्मद
ने एक कार के साथ उसे मेरे साथ लगा दिया था ।
वह इस स्थान से परिचित था । बहुत दिन पूर्व उसका
यहाँ पर क्वार्टर था । उसमें रहता था । क्वार्टरों
का भी अब लोप हो चुका है । मैंने उससे पुरानी
सड़क का स्थान पूछा । नकशा दिखाया । पुराने ग्राम
का चिह्न भी बताया ।
मैं कल्पना नहीं कर सकता था कि डोगरा
हिन्दू राज्य में शिवलिंग हटाया जा सकता था । वे
धर्मपरायणता के लिये प्रसिद्ध थे । मैने ड्राइवर से
उसकी बाल्यावस्था की कुछ बातें स्मरण करने के
लिये उत्साहित किया । वह राजभक्त सेवक था ।
वह जानकर इस स्थान के विषय में कुछ नहीं बता
रहा था । मैंने इसे लक्ष्य किया । उसने काश्मीर के
पुरातत्व विभागीय युवक से जिसे मैंने अपने साथ ले
लिया था दबी जबान में धीरे से कहा—यहाँ शिव
लिंग था । उस स्थान पर जहाँ राज्य प्रासाद या
होटल का इस समय मैदान है । इस बात से मुझे
एक जानकारी का स्रोत मिला ।
इस स्थान पर आने के पूर्व मैं जेठा देवी गया
था । मुझे श्रीनगर में कुछ ब्राह्मणों ने बताया कि जेठा
देवी के स्थान पर ही ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर था । मैं


[दायाँ स्तम्भ]
वहाँ पहुँचा । स्थान देखा । मुझे निराशा हुई । स्थान
आधुनिक था । प्राचीनता नाम की किसी वस्तु का
दर्शन नहीं मिला । प्रथम क्रिया हुई । यह स्थान
ज्येष्ठेश्वर का नही हो सकता । यहाँ देवी की संवत्
२००३ विक्रमी में एक मूर्ति स्थापित की गई थी ।
शिवलिंग कहीं नहीं था । मैं बहुत देर तक वहाँ
बैठा और आस-पास घूमता रहा । कुछ समय
पश्चात् एक वृद्ध ब्राह्मण वहाँ आ गये । मेरा कौतूहल
जानकर वे चकित हुए । मैने अपना सन्देह इस स्थान
के विषय में प्रकट किया ।
ज्येष्ठा अर्थात् वर्तमान जेठा देवी के स्थान के
पार्श्व में एक नाला बहता था । ज्येष्ठेश्वर का मन्दिर
नाला के वाम पार्श्व में पुरानी अर्थात् श्री स्तीन के
नकशा के लुप्त वालो सड़क के समीप होना चाहिये था ।
ज्येष्ठा देवी का स्थान ज्येष्ठ रुद्र से ऊपर तथा
नाला के तटपर है । राज प्रासाद मे होकर यहाँ का
मार्ग जाता है । पूर्व काल में यह मार्ग एक सड़क
के रूप में था । इस समय सड़क बिगड़ गयी है ।
पगडण्डी का रूप ले ली है । ऊपर पहुँचने पर एक
सुरम्य स्थान मिलता है । यहाँ पर नाग अर्थात्
जलस्रोत है । स्रोत का प्रथम स्वरूप नव निर्मित
ज्येष्ठा देवी के मन्दिर के सम्मुख है । एक कुण्ड में
स्रोत जल आता है । वहाँ से जल निकल कर नीचे
बने चौकोर दूसरे कुण्ड में आता है । यहाँ पुरुष
स्नान करते हैं । वहाँ से जल निकलकर तीसरे
अर्थात् सबसे निचले कुण्ड में आता है । यह कुण्ड भी
चौकोर है । यह मिट्टी तथा पत्थर की दिवाल से
घेरा गया है । जहाँ महिलाएँ स्नान करती हैं ।
प्रथम कुण्ड के ऊपर मैदान है । जहाँ धर्मशाला
बनी है । धर्मशाला के बायें भाग में दो कूप जैसे
बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये हैं । इसमें होटल वाले शीत
काल में बरफ एकत्रित कर रखते हैं । उसका प्रयोग
ग्रीष्म काल में करते हैं । इन गड्ढों की गहरी
खुदाई की गयी थी । परन्तु उसमें से कोई महत्त्व-
पूर्ण वस्तु प्राप्त नही हुई ।