राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ राजतरंगिणी
प्रतिष्ठां ज्येष्ठरुद्रस्य श्योनगर्यां वितन्वता ।
तेन नन्दीशसंस्पर्धं न मेने सोदरं विना ॥ १२४ ॥
१२४. राजा जिस समय ज्येष्ठ रुद्र की प्रतिष्ठा श्योनगर में करता रहा था उसने अनुभव
किया कि बिना सोदर तीर्थ के वह नन्दीश से स्पर्धा नहीं कर सकता था ।
मै सुदर बल ग्राम में आया हूँ। ग्राम की आबादी
बढ़ गयी है। ग्राम तथा डल लेक तक पक्की सड़क
बन गयी है। बिजली लग गयी है। मकान अच्छे
और कुछ पक्के बन गये हैं। वहाँ नावें डल तट पर
मिलती है। उस पार होकर ले जाई जाती है। तट
से कुछ हटकर लेक में कमल खूब लगे हैं। मृणाल
दण्ड पर कमल पत्र तथा प्रफुल्लित कमल झूम रहे
थे। कमलगट्टा अर्थात् कमल का बीज हरा अत्यन्त
स्वादिष्ट होता है। ये तोड़ कर सूखने के लिये तट
पर बिछाये गये थे।
मैंने ग्रामीणों से श्री स्टीन वर्णित स्थान के
विषय मे जिज्ञासा की। ग्रामीणों ने बताया कि उन
सब स्थानों पर अब खेत हो गये हैं। काश्त होने
लगी है। जलस्रोत सूख गया है। अब कुछ नहीं है।
मैंने अपने कश्मीर भ्रमण मे अनुभव किया है।
जहाँ भी कहीं देवस्थान, तीर्थ, मन्दिरादि जियारत,
मजार किंवा मस्जिदों मे परिणत हो जाते हैं वहाँ
ग्रामीण सत्य बात बताने से हिचकते हैं। उस स्थान
का सम्बन्ध किसी मुसलिम पीर, संत महात्मा या
जियारत से जोड़ देते हैं।
लगभग शताब्दो पूर्व कश्मीरी ब्राह्मण यहाँ
तीर्थ यात्रा निमित्त आते थे। ग्राम के समीप भट्टपुर
स्थान है। भट्ट शब्द भट्ट का अपभ्रंश है। भट्ट ब्राह्मण
लोग यहाँ आबाद थे। वे यहाँ के पुरोहित थे। अब
वहाँ पर किसी ब्राह्मण की आबादी नही है।
श्रीम्तीन को इस स्थान पर कोई ध्वंसावशेष
नहीं मिला था। स्थानीय ग्रामीणों से उन्हें मालूम
हुआ था। ग्राम में अत्यधिक अलंकृत शिला-
खण्ड पड़े थे। उन्हें कश्मीरराज महाराज रणवीर
सिंह जी श्रीनगर में मन्दिर निर्माण निमित्त उठवा
ले गये थे। इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थान
जलोक निर्मित सोदर तीर्थ था। यहाँ से मूल सोदर
तीर्थ अर्थात् नारन नाग भूतेश्वर मे ३२ मीलों का
अन्तर है।
सोदर तीर्थ की पूर्व दिशा में ईशेश्वर, सुरेश्र्वरी,
तथा उत्तर पश्चिम अमृत भवन, उत्तर पूर्व तिलप्रस्था
और दक्षिण में सारिका पर्वत के प्राचीन पवित्र
तीर्थस्थान थे।
(५) नन्दीशः अमर कोश (१:४३) में नन्दीके
६ नाम यथा-शृंगी, भृङ्गी, रिटि, तुण्डि, नन्दिक
तथा नन्दिकेश्वर दिया है। यहाँ पर नन्दीश का
अर्थ शिव है। नन्दी शिव के पार्षद है। द्वारपाल हैं।
वाहन है। यह शंकर के वरदान के कारण शिलाद
ऋषि को भूमि जोतते समय मिले थे। ऋषि पुत्र
स्वरूप भगवान् शंकर की तपस्या किया था। तप
द्वारा अमरत्व की प्राप्ति की थी। शिव ने इन्हें
पुत्रवत् माना था। अपने गणों में स्थान दिया था।
मत्स्य पुराण के अनुसार नन्दीश वास्तु शास्त्र
का एक ग्रन्थकार है। मनु के एक पुत्र नन्दीश
हैं। कश्यप कुल का गोत्र तथा भार्गव कुल का
एक मंत्रकार हुआ है। भागवत मतानुसार निषाध
तथा वायु पुराण मतानुसार नल का पुत्र था। नल
का पुत्र पुण्डरीक था किन्तु यहाँ पर नन्दीश का अर्थ
शंकर किंवा शिव मानना चाहिए।
नन्दीश की पूजा नन्दकोल झील कश्मीर में
होती थी। नन्दकोल का प्राचीन नाम कालोदक
अथवा नन्दिसर है। इसका यह नाम इस लिये पड़ा
है कि काल अर्थात् शिव का और उनके पार्षद
नन्दी का भी स्थान होने के कारण नन्दिसर नाम
पड़ा है। इन सब तीर्थ स्थानों के क्षेत्र का नाम
नन्दिक्षेत्र कल्हण ने दिया है।