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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 280, कुल 984 में से

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पृष्ठ 280

प्रथम तरंग १९३
राज्ञस्तस्य कदाचित्तु व्रजतो विजयेश्वरम् ।
ययाचे काचिदबला भोजनं मार्गमध्यगा ॥ १३१ ॥
१३१. किसी समय राजा विजयेश्वर जा रहा था । मध्य मार्ग में एक अबला मिली । उसने
राजा से भोजन की याचना की ।
यथेष्टमशनं दातुं ततोऽनेन प्रतिश्रुते ।
व्यघृणोद्विकृता भूत्वा सा नृमांसाश्रयां स्पृहाम् ॥ १३२ ॥
१३२. राजा ने उसकी इच्छानुसार भोजन देने का वचन दिया तो उसने अपना असली
रूप धारण कर मानवमांस की स्पृहा प्रकट की ।
स सत्यहिंसाविरतस्तस्यै मांसं स्वविग्रहात् ।
अनुज्ञां प्रददौ भोक्तुं यदा सैवं तदाऽब्रवीत् ॥ १३३॥
१३३. राजा अहिंसा व्रत धारण कर जीव हिंसा से विरत हो गया था । उसने उससे
कहा — 'मेरे शरीर का मांस ग्रहण' कर सकती हो ।' उसने राजा से कहा ।
उरुमुश अपने जीवन काल में ही ईश्वर का कल्हण यहाँ पर जलोक में उसी अलौकिक
अवतार माना जाता था । नरामसिन राजा कहता ईश्वरीय शक्ति का होना कहता है । उसकी तुलना
था । उसमें देवता का रूप प्रवाहित था अतएव उसने नन्दीश के अवतार से करता है ।
अपने मस्तकपर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा
रखा था । १३१ (१) कृत्या कथा : कल्हण ने यहाँ
मिस्र में कुछ इसी प्रकार की मान्यता थी । भगवान् बुद्ध से सम्बन्धित तत्कालीन एक कथा का
वहाँ का राजा दैवी शक्ति युक्त माना जाता था । उल्लेख किया है । राजा जलोक का झुकाव बुद्ध
मिस्री लोगों का विश्वास था । 'रा' देवता रानी के धर्म की ओर अधिक नहीं था । अपितु वर्णाश्रम
साथ सहवास करता था । उससे अलौकिक शक्ति धर्म प्रचार निमित्त ठोस कदम उठाया था । बौद्धों
सम्पन्न राजपुत्र जन्म लेता था । में आतंक व्याप्त हो गया होगा । राज्याश्रय के अभाव
यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यों के में वे भय का अनुभव करते । वर्णाश्रम धर्मावलम्बियों
समान थी । वीर पुरुषों को वे विभिन्न देवों के पुत्र द्वारा बौद्धों का उत्पीड़न बन्द किया जाय, एतदर्थ
तुल्य मानते थे । जैसे महाभारत में कर्ण सूर्य के, युधि- यह कथा यहाँ जोड़ दी गयी है । राजा जलोक के
ष्ठिर धर्मराज के, अर्जुन इन्द्र के पुत्र माने गये थे । समय बौद्धधर्मावलम्बियों की क्या स्थिति हो गयी
यहूदी धर्म में ईश्वर के अवतार किंवा पुरुष विशेष थी । यह इस कथा द्वारा प्रकट होता है ।
में ईश्वर की शक्ति विशेष मानने की ओर अधिक
झुकाव है । पाठभेद :
ईसाई धर्म में बाइबिल का अध्ययन इस श्लोक संख्या १३२ में 'यथेष्ट' का पाठभेद
मान्यता को स्वीकार करता है । महात्मा ईसा में 'यथेच्छ' मिलता है ।
अलौकिक शक्ति का होना स्वीकार किया गया है ।
इस्लाम में शिया सम्प्रदाय इमाम में अलौकिक श्लोक संख्या १३३ में 'मांसं' का पाठभेद 'दातुं'
शक्ति की मान्यता स्वीकार करता है । मिलता है ।
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