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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 816, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 816

परिशिष्ट 'ग'
वितस्ता
( तरंग १:२८ पृष्ठ ५७ )
वितस्ता नदी को काश्मीरी भाषा में व्यथ कहते हैं। वितस्ता शब्द का अपभ्रंश व्यथ है। पुराकालीन
पाश्चात्त्य लेखकों ने वितस्ता का नाम 'वेदस्ता' भी दिया है। चीन के इतिवृत्त में 'वितस्ता' नाम आता है।
'कश्मीर का एक नाम वितस्ता के आधार पर 'वैतस्तिका' है।
कहा जा चुका है कि ऋग्वेद में वितस्ता का उल्लेख है। प्राचीन यूनानी लेखकों ने ईरानी लेखकों
के आधार पर वितस्ता का नाम 'हाइडसपेस' दिया है। पोलेमी ने 'बिदसपेस' नाम से वितस्ता का उल्लेख
किया है।
पंजाब में वितस्ता को झेलम कहते हैं। काश्मीरी पुरासाहित्य में यह नाम अज्ञात है। इसका मूल
स्रोत मुस्लिम लेखकों के लेखों में मिलता है। अल्वेरुनी ने वितस्ता का नाम 'जेलम' दिया है। श्रोवर ने
सुलतान शाह हैदर के पंजाब के अभियान का वर्णन करते हुए झेलम शब्द को संस्कृत रूप देते हुए 'ज्यलमी'
शब्द का प्रयोग किया है।
नीलमत पुराण में श्लोक ३३५-३८१ तक वितस्ता की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण वितस्ता का अपर नाम वैतस्तिका देता है। ( १:१६४ )
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के सम्बन्ध में धारणा है कि वह कश्मीर में लिखा गया था।
महाभारत सभा पर्व में वितस्ता को कश्मीर तथा पंजाब की नदी कहा गया है। वितस्ता वरुण की
सभा में स्थित रहकर उनकी उपासना करती है। वरुण का स्थान उत्तर में है। वितस्ता उत्तर की नदी
है। ( ९:१९ )
महाभारत वन पर्व में उल्लेख आता है। कश्मीर मण्डल में नागराज तक्षक का वितस्ता नामक
प्रसिद्ध सुन्दर भवन है। इस नदी में स्नान एवं पित्रों के हेतु तर्पण द्वारा मानव को वाजपेय यज्ञ का लाभ
होता है। मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है। ( : ८२ : ८९ )
वितस्ता का जल सेवन भारत निवासी करते हैं। यहाँ संकेत है कि वितस्ता हिमालय से निकलकर
भारत के प्रशस्त भूभाग में प्रवेश करती है। भारतीय उसके जल से लाभ उठाते हैं। (महा० : भीष्म पर्व :
९ : १६ )
कठिन उपवास, व्रत के पश्चात् तरंगमालिनी वितस्ता में सात दिन स्नान करने वाला मनुष्य मुनि
तुल्य निर्मल हो जाता है। (महा० : अनुशासन : २५ : ७ )
देवी पार्वती ने भगवान् शंकर के प्रति स्त्री धर्म स्वीकार कर, जिनके विमर्श पर कार्य किया था,
उनमें एक 'वितस्ता' भी थी। (महा० : अनुशासन : १४० : १८ )