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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 828, कुल 984 में से

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पृष्ठ 828

[Header] परिशिष्ट घ २७

रेस’ का ‘गोरगोन मेडूसा’ तथा ईरान में ‘फरदियम’ का ‘अजोदहक’ के साथ संघर्ष के दिखाये गये हैं ।
अथर्व वेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, छान्दोग्योपनिषद्, गृह्य सूत्र में नाग पूजा को उल्लेख
मिलता है । वे एक जाति रूप में चित्रित किये गये हैं ।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण अन्य जातियों के साथ नाग जाति का उल्लेख करता है । ( १ : ६ : ६ )
मत्स्य पुराण ‘बहुतरनागजातय.’ अर्थात् नागों की बहुत जातियाँ थी, वर्णन करता है ( १५४ . ४६२ ) पद्म
पुराण तथा हरिवंश पुराणों में उल्लेख आता है । पृथु के पूर्व नाग पृथ्वी का दोहन करते थे । ( पद्मपुराण
भूमिखण्ड २८ : ४५ तथा हरिवंश: १ : ७ : २६-२७ ) ।
वृत्र शब्द का प्रयोग वेदों में किया गया है । शाब्दिक अर्थ है—‘ध्यान्तारंदानवा वृश्रा ’—अर्थात्
वृत्रासुर, अन्धकार, शत्रु । वृत्रासुर इन्द्र संग्राम की कथा प्रसिद्ध है । इन्द्र ने वृत्रासुर का वध किया था ।
अपनी रक्षा के लिये वृत्र ने अहि का रूप धारण कर लिया था ।
शतपथ ब्राह्मण में वृत्र को सर्प तथा दानव कहा गया है । कश्यप के दनुनाम्नी पत्नी द्वारा उत्पन्न
पुत्रों का नाम दानव है । शतपथ ब्राह्मण में वृत्र का नाम सर्प दिया गया है ।
मुझे नेपाल यात्रा में सर्प जाति के लोगों से सम्पर्क हुआ था । पहले नाम सुना तो कुछ आश्चर्य
हुआ । सर्प जाति के लोग अच्छे, सुन्दर मनुष्य जैसे थे । उनकी जाति का सर्प क्यो पड़ गया, मैने पूछा वे
स्वयं नहीं बता सके । किन्तु उनके पास रहने से मैने अनुभव किया सर्प किंवा नाग का उनके मन में उच्च भाव
है । मैं समझता हूँ किसी समय सर्प की उपासना करने के कारण, उन्हें सर्प पूजक कहा गया था । किंवा
सर्प विद्या में वह जाति निपुण होगी । अतएव उनका नाम सर्प में दिया गया । सम्भव है वह नाम काला-
न्तर में कर्मवाचक से जातिवाचक हो गया । नाग शब्द, साप, सर्प, कीरा के सामान्य अर्थ में प्रयोग
किया जाता है । एक और सम्भावना हो सकती है । किसी पर्वतीय जाति का प्रतीक किंवा चिन्ह सर्प अथवा
नाग रहा था । उस प्रतीक किंवा चिन्ह के कारण नाग शब्द जातिवाचक हो गया । नाग प्राणी हैं । वे
मनुष्य हैं । और रेंगने वाले जीव भी हैं ?
फर्गुसन ने नाग जाति को तुरानी अर्थात् तुरान देशीय किंवा तुरान वंशीय कहा है । तुरानी तथा
आर्यों की एक ही परम्परा थी । यहू तथा द्रविड जाति मूलतः नाग अर्थात् सर्प पूजक नही थे । वे उत्तरो
भारत निवासी थे । आर्यों ने उन्हें जीता था । ( ‘ट्री एण्ड सरपेण्ट वरशिप’ पृष्ठ ६०, ६१ ) ।
कनिंघम ने नाग जाति को ड्रेगन अर्थात् नाग पूजक माना है । उनकी गणना ‘शक’, ‘मीडिया’ तथा
‘जोहक’ की श्रेणी में की है । तीन अत्यन्त प्राचीन मुद्राओं पर सर्प टंकित मिलता है । उस पर पुरानी
ब्राह्मी लिपि में ‘काटस’ अंकित है । उन्हें पश्चिमी पंजाब मे पाया गया था । यह प्रारम्भिक ‘तख्खस’ थे ।
नाग जाति का तक्षक राजा माना जाता है । उन्हों के उत्तराधिकारी थे । उन्हें ‘काद्रवेय; किंवा ‘कुद्रव’
कहा जाता था । ( वे कद्रू की सन्तान थे । कनिंघम ए० एम० आर० भाग २ : पृष्ठ १० )
कर्नल टाड के अनुसार नाग जाति शेषनाग देश से आई थी । यह देश सम्भवतः स्काईथिक अर्थात्
स्टार्बो वर्णित तोखरी है । तोखरो शब्द-संज्ञा तुर्की के लिए व्यवहृत की गयी है । वे शकद्वीप में राज्य करते थे।
चीनी उन्हें ‘तक ई उक्म’ कहते थे । वर्तमान ताजिन के ताजिक थे । ( एनाल्स एण्ड एण्टी क्विटींज आफ
राजस्थान पृ० ४५ ) थीपाजिटर ने उन्हे मानव, सोयुम तथा एल ( चन्द्रवंश ) से भिन्न नहीं माना है । उन्हें
क्षत्रियो की परम्परा में विरोधी तथा पर जाति कहा है । दैत्य, दानव, नाग एवं राक्षस सर्वथा मानव से
विरुद्ध थे नही माना है । (पाजिटर ए० आई० एच० टी० पृ० २९०)
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