राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट ख
हिमालय
( तरंग १ : २५ पृष्ठ २४ )
वैदिक साहित्य में हिमालय का वर्णन मिलता है । ऋग्वेद—१०:१२१:४, अथर्ववेद—३:१५:३,
४.९.९, ५.५.२-८, ५:२५.७, ६:२४:१, १२.१.१, १६:३९:१, २४:३०, २५:१२, ऐतरेय ब्राह्मण
८ १४: । तैत्तिरीय संहिता ५.५ ११.१
प्रायः सभी पुराणों में हिमालय का वर्णन प्राप्य है । मुख्यतः निम्नलिखित स्थल द्रष्टव्य हैं : भागवत
पुराण १:१३:२९; १:१३.५०; मत्स्य पुराण १८० . कूर्म पुराण; पूर्वभाग अध्याय १२; कालिका पुराण १४
तथा ५१; वाल्मीकि रामायण : किष्किन्धा काण्ड · ५३ तथा ५६ श्लोक १ ।
नीलमत पुराण में हिमालय, हिमाचल, हिमवान, हिमवन्त तथा हिमकूट शब्दों का उल्लेख कभी कभी
समानार्थक और कभी भिन्न अर्थों में किया गया है । उनको यहाँ उद्धृत कर देना उचित होगा ।
हिमालय :
कुरुष्व लांगलेन त्वं विदार्याय हिमालयम् ।
इदं सरोवरं दिव्य निष्तोयं शीघ्रमेव तु ।। 165-166 = २१८ ।
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इति तथ्यं सती ज्ञात्वा हलमार्गात्तु सिन्धुगा ।
हिमालयान्न प्रययौ पतितात्मा परं नदी ।। 299 = ३९८
समुद्ररूपस्य हरस्य भार्या हिमालयस्याद्रिपतेस्तनूजाम् ।
सुस्वादुतोयां ऋषिभैर्यजुष्टां तां त्वं पवित्रां प्रणमस्व राजन् ।। 1388 = १६०६ ।
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हिमाचल :
नीलाम्बरः कांचनबद्धमौलिः सम्पूज्यमानस्त्रिदशैः समस्तैः ।
विदारयामास स लाङ्गलेन हिमाचलं शैलवरं पृथिव्याम् ।। 168 = २२०
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—कुटिलैस्तरंगैः । हिमाचलाग्रैर्गगने स्पृशद्भिः
हिमालये तु षण्मासान् स सदा वसते सुखी ।
अद्य प्रभृति षण्मासान्तस्येह वसतिर्मया ।। 210 = २८३
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