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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 812, कुल 984 में से

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पृष्ठ 812

परिशिष्ट ख १५
ततो वेगेन महता सीमन्तमिव कुर्वती ।
हिमाचलस्य प्रययौ तोयस्रैलोपमा नदी ॥ 138 = ४१९
हिमवान् तथा हेमकूट :
एकार्णवं जगत्सर्वं तदा भवति भूपते ।
हिमवाञ्छेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः ॥ 35 = ५५-५६
× × ×
हिमवत् :
तत्र मद्रेषु तीर्थानि सन्ति पुण्यानि मानद ।
तथा च पर्वतश्रेष्ठे हिमवत्यचलोत्तमे । 102 = १४५
× × ×
स्थावरत्वमनुप्राप्ता हिमवत्यचलोत्तमे ।
बहुधा सा विमन्तांगी निकुम्भे निर्गते बहिः ॥ 166 = ७९१
× × ×
एवमुक्त्वा स पितरं प्राप्तानुज्ञास्ततः स्वयम् ।
हरमुकुटमितिख्यातं शृङ्गं हिमवतः शुभम् ॥
जगाम सहसा नन्दी तपसे कृतनिश्चयः ॥ 1047 = १२३०-१२३१-१२३२
× × ×
रम्ये हिमवतः पृष्ठे एवमेतीति चाब्रवीत् ।
ऋषेर्नियोगं काञ्चाप देव्या राज्ञया प्रचोदिता ॥ वृहददेवता ४ : ७५,
हिमवान :
यस्मिंस्तु वासरे विप्र प्रचयं पतते हिमम् ।
तत्र पूज्यस्तु हिमवान् हेमन्तशिशिराशुभौ ॥ 461 = ५०९
हिमवान्-हेमकूट :
हिमवान् हेमकूटश्च निषधो नीलपर्वतः ।
श्वेतश्च शृंगवान् मेरुमलयिवान् गंधमादनः ॥ 516 = ७१७ ७१८
× × ×
महाभारत :
सभा पर्व ( २८ : ६) मे हिमालय, हिमवान, हेमकूट आदि शब्द हिमालय के लिए व्यवहृत किये
गये हैं। हिमवान शब्द का वर्णन हिमालय पर्वत के अधिष्ठातृ-देवता के रूप में किया गया है। हेमकूट
उत्तर दिशा का एक पर्वत कहा गया है। इसको पार कर अर्जुन ने हरिवर्ष में प्रवेश किया था ।
पाण्डवों के पिता पाण्डु कालकूट तथा हिमालय पर्वत का अतिक्रमण कर गन्धमादन पर्वत पर पहुँचे
थे । भगवान् परशुराम द्वारा क्षत्रियों के संहार से रक्षा निमित्त भृगुवंशीय स्त्रियों ने हिमालय पर्वत में