पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
११८ - पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
राम दे राव जालोर धर । गोइंद गढ़ धामनि यसै ॥
दाच्छिम बयानै उप्पन्नौ । प्रित्थियराज परिगह बसै ॥
छं० ॥ ५८४ ॥ रु० ॥ ३१५ ॥
३१५ पाठान्तर :-निझर । चिनूर । कनवज । जेन सल्तप अधुगठ । दाहुलि । उपजि ।
अता ताय । समंता रामदे गोइद । गठ । दाहिम । वयाने । प्रियोराज । परिगह ॥
. इस रूपक से कवि ने पृथ्वीराजजी के सामंतो के नाम और उन की उत्पत्ति के स्थानादि
का वर्णन करना प्रारंभ किया है। यह विषय पुरातत्त्ववेत्ताओं के ऐतिहासिक शोधों में बहुत उप-
योगी होने जैसा है-किन्तु इस ग्रंथ के अकृत्रिम होने में भी एक प्रमाण रूप हो सक्ता है-और
यह भी भले प्रकार ध्यान में रखने जैसी बात है कि यहां चंद अपनी उत्पत्ति लाहौर की अर्थात्
“चंद उपजि लाहौरह” कहता है । इस महाकाव्य में बहुत से पंजाबी भाषा के शब्द मिलने
से पुरातत्ववेत्ता विद्वान चंद की जन्मभूमि के विषय में पंजाब देश का अनुमान किया करते
थे और पंजाबी अति वृद्ध यहस्थ भी अपने देश के महाकवि चंद का नाम वंश परंपरा से आज
तक सुनते चले आते हैं परंतु अब हमको इस बात का निश्चय हो गया और पंजाब देश हिन्दी
भाषा के काव्यों की अनुक्रमणिका में पहिली संख्या पर जाय स्थापन हुआ क्योंकि अब तक इस
महाकाव्य से प्राचीन कोई अन्य काव्य नहीं उपलब्ध हुआ है । कोई २ विद्वान जो यह कहते हैं
कि चंद कवि का होना केवल इसी महाकाव्य से विदित होता है । उन को अजमेर नगर के
कैसरगंज में चांद बावड़ी अपने नेत्रों से देखनी चाहिये और चंद के पुरुषाओं का बनाया हुआ
भाटाबाव भी उसी नगर में तारागढ को जाते हुए दृष्टि गोचर करना उचित है कि जो अजमेर के
भाटों के कब्जे से निकल कर बहुत समय तक टोंक के नब्वाब साहेब के अधिकार में रहे हैं ।
फिर उन्होंने एक मोची को चांद बावड़ी दे दियी थी कि अब म्यूनीसीपैल कमैटी ने उस की चारों
ओर की दीवार बना दियी है और इस बावड़ी के चारों ओर एक बगीचा भी था कि जिस का
हांसल कुछ थोड़े दिनों तक म्यूनीसीपैलीटी में जमा होता रहा है और अब वह बगीचा कट कर
वहां बस्ती बसा दियी गई है। चांद बावडी में नीचे उतरते दहिने हाथ की दीवार में प्रशस्ति
का स्थान बना है कि जिस के पाषाण लेख को एक ८३ वर्ष का मुसलमान फकीर कर्नल टोड
साहब का लेजाना कहता है । इस के महरावदार द्वार के दोनों ओर एक २ पत्थर के फूल खुदे
हुए हैं कि जिस को अंग्रेजी में lotus अर्थात् कमल की जाति का फूल कहते हैं । यह फूल
शिल्पशास्त्र के सिद्धान्तों में विज्ञ विद्वानों को बावडी की अति प्राचीनता सूचन करने वाला दृष्टि
आवेगा । चंद के विषय में कुछ और भी प्रमाण हमारी रचित पृथ्वीराज रासे की प्रथम संस्ता में
पाठक देख लें । इस महाकाव्य में प्रायः फारसी शब्द भी प्रयोग हुए हैं उन के विषय में हमने
अन्यत्र कई एक प्रमाण प्रकाश किये हैं परंतु यह भी विशेष करके हमारे पाठकों के ध्यान में रहने
जैसी बात है कि चंद जिस समय लाहौर में उत्पन्न हुआ था उस के १०० सौ वर्ष पहिले से वहां
महमूददी सन्तान का राज्य था । फिर क्या कोई यह अनुमान कर सक्ता है कि उस समय की
हिन्दी में एक भी फारसी भाषा का शब्द नहीं मिल सक्ता था ? इन रूपकों में जिन २ सामंतों
के नाम आये हैं उन का पूरा २ वर्णन हम ग्रंथ के पूरे छप जाने पर लिखेंगे क्योंकि अभी हमारा
काम केवल मूल पाठ शोध कर प्रकाश करने का है ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । ११६
पहरी ॥ उतपत्ति वास सामंत चंद । पाधरी छंद ब्रनै सु वंद ॥
दस तीन हुए दिल्ली प्रमान । हरिसिंघ वसै गढ़ह बयान ॥ छं० ॥ ५८५ ॥
जैसलहमेर अचलेस भान । पज्जून वसै चीतोर थान ॥
कलि कुंड हुऔ जंघार भीम । चहुआन आन रक्ष्यैत सीम ॥ ५८६ ॥
बउ भ्रात छोरि लग्गो सु पाइ । चहुवान सु वर सामंत राइ ॥
समियांन गढ़ नरासंघ राइ । पित मात छोरि आए सु भाइ ॥ छं० ॥ ५८७ ॥
देवरा धीर रिनधीर सथ्य । पह्विवान देस प्रिथिराज तथ्य ॥
जंघार भीम गढ जून वास । किन्नो सु जुद्ध भीमंग आस ॥ छं० ॥ ५८८ ॥
लग्गो सु लोच लिन्नौ दिलेश । सारंग राइ मोरी नरेश ॥
वारडह राइ सहसी करन्न । असिर वसै गढ आसमन्न ॥ छं० ॥ ५८९ ॥
जुध करै जिन्त कन्हाति राइ । चहुआन सूर उप्पारि घाइ ॥
सेवकक कीन अप्पै सु जोर । तेजङ्ग डोड वासी जुनोर ॥ छं० ॥ ५९० ॥
कैमास सद्धि बलवंत वीर । लग्गो सु पाइ चहुआन धीर ॥
तारन्न सूर भटनेर वास । प्रिथिराज पाइ कीनी सु आस ॥ छं० ॥ ५९१ ॥
भैंचा चंदेल गजनीय सेव । लग्गो सु घाव भूझंत तेव ॥
उप्पारि लियौ सामंत राव । कीनी सु सेव अप्पह सु भाव ॥ छं० ॥ ५९२ ॥
अरसी चंदेल मास्यौ सकज्ज । भै घा चंदेल दीनो सरज्ज ॥
पानीय पंथ उत्तन्न देस । दीनौ सु फेरि दिल्ली नरेश ॥ छं० ॥ ५९३ ॥
कनवज्ज राइ भूझंत ताम । रष्यौ सु अप्प कलि जुग्ग नाम ॥
चालुक्क पाट भोरा भुअंग । रक्ष्यै सु कचरा पिथ्य रंग ॥ छं० ॥ ५९४ ॥
३१६ पाठान्तर :—उतपति । उत्तपत्ति । वाश । वरनैति । चंद्र वरनैति । बंध । दश । हूए ।
प्रमांन । गढह । वयांत । जेशलह । जेसल्लह । भांन । पांजुन । पजून । वसे । यांन । कूंढ । हूवो ।
हुवो । चहुभ्रान । चहुवांन । भ्रांन । रपेति । भ्रानर रपैति । भ्रान्ट । लगा । सू । पाय । चहुवांन ।
राई । रांय । समोयांत । गढ । राय । छोरि । भाय । निरधीर । रनधीर । पह्निवांन । देश । प्रियोराज ।
पृथीराज । तथ । जूंन । बाश । कौनौ । सू लिन्नौ । दिलेश । राय । नरेश । राय । सह । सो ।
कारंन । आसमंन । करे । जित । कन्हानराय । चहुंवान । उपार । उप्पार । सेवक । क्कीन । अपै ।
ते जल । जुबौर । सहु । लगा । पाय । चहुंवान । चहुवांन । तरंन । बाश । प्रिथीराज । प्रथरीराज । पाय ।
सू । भोहा । भोंहा । गनीय । बूंदी राज्य के पुस्तकालय की पुस्तक लिखी सं० १६४५ में लगो-तेव के
स्थान में "दम आप आपंछ सु भेव" करके पाठ है । और छंद ५९१ पिछली तुक उस में है ही
नहीं । लगा । भुझंत । उपारि । लीयौ । किची । चंदेल । सकज । भोहा । भौंहां । चंद्रल ।
सूरज । सुरंञ्ज । पांनीय । पानीय । उर्तन । उतंन । देश । सू । नरेश । कनवंज राज भुझंत तांम ।
.१२० पृथ्थीराजरासो । [ आदि पर्व
जावल्लो जल्ह दषिनी देस । पृथिराज राइ किन्नौ प्रवेस ॥
सतनेज नगर दीनौ उतन्न । पूरन्न माल पृथिराज तन्न ॥ छं० ॥ ५९५ ॥
सूरत्ति वांस चहुआन राइ । कव्यौ सु बात रष्यौ सु दाइ ॥
बडगुज्जरवराम अल्ली नरेस । दिनं प्रति षांन भंजे सदेस ॥ छं० ॥ ५९६ ॥
मुक्कले दूत पृथिराज तथ्य । सेवा सु पाइ उप्परं जु हत्थ ॥
पृथिराज ताचि दो देस दिद्ध । आरूत षांन अल्ली प्रसिद्ध ॥ छं० ॥ ५९७ ॥
करि वास तब्ब गुज्जर निसंक । मारयौ षांन आनोल्ल बंक ॥
छड्ड़ा हमीर नैन वारिड । लग्गे सु पाइ दस देस दिद्ध ॥ छं० ॥ ५९८ ॥
षेता षंगार द्वै भ्रात राइ । परयौ दु कालं देसं सु भाइ ॥
दिल्लीय देस गुट्ठा सु मंडि । रष्यै सु वास भट सुभट झुंड ॥ छं० ॥ ५९९ ॥
परमार कनक जैचंद वास । किन्नौ सु षूंन डूक पाच दास ॥
लिय पांच ग्रह्यो पृथिराज देस । लंग्यौ सु पाइ आयौ नरेस ॥ छं० ॥ ६०० ॥
सांषुलौ सहसमल सात पष । तप करत अनंगच गयौ रष्प ॥
लग्यौ सु पाइ पृथीराज आइ । दीनौ सु देस पट्टय साइ ॥ छं० ॥ ६०१ ॥
अवतार खियो दिल्ही नरेस । तब हुए सत्त सामंत भेस ॥
छं० ॥ ६०२ ॥ रू० ॥ ३१६ ॥
छवित्त ॥ ढुंढा (नाम *) दानव उतंग । दियो फल अंब बिसालं ॥
बंदि लीन नृप राज । आय फिर गेह सु चालं ॥
सत्त भाग कछ अग्र । बेंटि दिय भ्रत्त समानं ॥
तिनह सूर सामंत । किंतित्त रषन चहुवानं ॥
जुंगं । फंगं । नांम । चालूंक्क । रषैं । पिथ । रष्यै सुकंवराषिथ रंग । जांवल्लो जल्ह दिषिनीय ।
देश । दषनीय । पिथौराजं । राय । कीनौ । दीन्ना । उतंन । पूरन माल । प्रथौराज । तंन ।
सूर्रति । क्रांत । बडगुज्जर राय । अली । नरेश । सुंदेश । मुकले । पृथौराज । तथ । पांय । सुं ।
प्रिथीराज । देश । दिंध । अली । प्रसीद्ध । तब । गुजर । मारीयौ । हांडा । हामा । दंमीर ।
नेनं । लगे । पांय । षेतलं षंगर । परियौ । देसां । भांय । दिल्लियं । दलीय । देश । गूढा । भेंट्ट ।
जैद । पांचदास । यहैौ । प्रथीरोज । देश । आये । मानि । पंषि । कंरित । रिषि । प्रथौराज ।
आयं । कीनौ । पहूच । लीयौ । दिली । सित्त ॥
३१७ पाठान्तर :- ढुंढं (नाम * विशेष है) उतग । विसालं । गेहे । सु बालं । अय । भृत ।
समानं । चहुंवांनं । अति प्रथुल । अमिय प्रकास । संग्रह । डूक । सवंत । सवत । संघत ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १२१
रजसेल चंद फन चमिय ग्रथु । सबर साचि आपन सु गढु ॥
इकदस समंत पंचह समै* । भए थान पंचस सु पहु ॥
छं० ॥ ६०३ ॥ रू० ॥ ३१७ ॥
॥ आना राजा का उजाड़ी हुई अजमेर को फिर बसाकर राज करना ॥
दूहा ॥ अनल आनि मातह मिल्यो । कहि सब वत्त सुनाइ ॥
लोग महाजन संग लै । भूमि बसाई जाइ ॥ छं० ॥ ६०४ ॥ रू० ॥ ३१८ ॥
पद्धरी ॥ आना नरिंद अजमेर वास । संभरिय कीन सौत्रत्र रास ॥
नियमनाम कन्हा आना नरिंद । अरि धरनि वीर संध्यौ सु दंड ॥ छं० ॥ ६०५ ॥
द्यासान ग्राम तोरन उतंग । बन वढि कढि निधि निधि पुरंग ॥
पसु पंपि सद श्रुत संडलेप्त । जत्न न्हान दान ब्रह्मन सु देस ॥ छं० ॥ ६०६ ॥
हारम्य रम्य फिरि मंडि लोइ । दालिद्र दीन दीसै न कोइ ॥
चौघडि सतं वरषं प्रमान । आना नरिंद तपि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६०७ ॥
॥ जैसींघ जी का गद्दी पर विराज राज करना ॥
पग अम्भ देम दिय पुत्त छथ्य । जैसींघदेव तपि राज तथ्थ ॥
क्रिति छत्र सीस जैसींघ देव । निधि लई वीर बीसल पनेव ॥ छं० ॥ ६०८ ॥
विंटु लीय वीर आना नरिंद । बीसल तडाग मधि द्रव्य कंद ॥
पायौ न वीर तिन द्रव्य केछ । कंचनह काम मंडाय गेह ॥ छं० ॥ ६०८ ॥
सब द्रव्य दीन तिन विप्र हस्त । भंडार धरिय धन अम्म वस्त ॥
श्रुति सुनहि श्रवन जंपत पुरान । साधरम करम चलि चाहुवान ॥ छं० ॥ ६१० ॥
कत्ति नीति गरुअ गचि गरुअ मुक्कि । कुछ रीति चित्त रंचक न चुक्कि ॥
सोऽवरस अष्ट तप राज कीन । आनंद मेव सिर छत्र दीन ॥ छं० ॥ ६११ ॥
* यह पाठ हमने सं० १८४९ की पुस्तक का रक्खा है किन्तु सं० १६४७, सं० १७९० और
सं० १८४५ की में "इक दस संवत पंचह समै" है कि इन में से जिसे विद्वान ठीक समझें उसे
ग्रहण करें ॥
३१८ पाठान्तर :- अनिल । अनलि । सुनाय । लोग । वसाईय । धसाइय । आय ॥
३१९ पाठान्तर :- आनां । नरिद । नरंद । सभरीय । सोवंत्र । राशि । नांम । आंना ।
मंडीं। तोरन । वढि । कढि । पुरंगं । पंप । सदस्तुत । मंडलेस । न्हान । दांन । हारम्य । मंड ।
लोई । लोय । दारिद्र । दीन दीन । दीसे । कोई । चौ घड़ी । सत । प्रमानं । नरिंदं । चहुवांन ।
म्रग । हथ । हथ्थ । तथ । छत्रचीस । जैसीह । निघ । बीर संल । पनैव । बिंदुलीय । विटलीय ।
१२२ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
॥ आनन्दसेवजी का राज करना ॥
तहां तप्पि तेज आनन्द सेव । बाराह रूप दिद्ध्यौसु देव ॥
धरनी विचार आभास साद । मंड्यौ सु राज पहुकर प्रसाद ॥ छं० ॥ ६१२ ॥
सो * वरष राज तप अंत कीन । सिर क्व सोम पुच्च सु दीन ॥
॥ सोमेश्वरजी का सिंहासन पर विराज राज करना ॥
सोमेस सूर गुज्जर नरेस । मालवी राज सब लग्ग पेस ॥ छं० ॥ ६१३ ॥
मारू बजाडू भहीन थान । घल सोमि लई बल चाहुवान ॥
दिल्लेस व्याह तोवर घरेस । तिह ग्रब्भ भयौ पीथळ नरेस ॥ छं० ॥ ६१४ ॥
आनन्द राज नंदन सु सोम । सोरिया दखनि तिन कियौ होम ॥
निय पुर सु नयर सुर लग्गि धोम । आनन्द केलि अजमेर भोम ॥
छं० ॥ ६१५ ॥ रू० ॥ ३१८ ॥
॥ सोमेश्वर जी की शूरता का संक्षेप वर्णन ॥
कवित्त ॥ जिहि सोमेसर सूर । सूर जित्ते धुरसानी ॥
जिहि सोमेसर सूर । चढिवि गुज्जर घर आनी ॥
जिहि सोमेसर सूर । लियौ नाहर परिचारिय ॥
बल उप्पम कवि चंद । चंद राहा जिस मारिय ॥
नरिंद । छेह । देह । कांम । गैह । गेह । दिन । भंडारि । अवन सुनहि । जपत । पुत्तान चाहु-
वांन । गहव । गहव मुकि । ऊति । रीत । चित्त । रचक्र । चुकि सौ । अठ । तिहां । तपि ।
रूप । दैध्यौ । सट्ट । प्रसद्द । सौ । सोम । सोमैस । सूर । गुजर । पग । पैस । मारू । वज्ञाय ।
भट्टी । यांन । लइ । बल । चाहुवांन । दिल्लेस । दिल्लेश । तुंवर । घरेश। गर्भ । यभ । पित्यल ।
पीथ्यल । नरेश । मोरीयां । दल । दलह । कीयौ । नैर । लगि । कल ॥
- चौघट्टि सत्त = इस के विरुद्ध कोई दूसरा पाठ हमारे पास की पुस्तकों में नहीं मिलता
किन्तु कोई २ वृद्ध कवि चौसट्ठि सत्त करके मूल में पाठ होना कहते हैं और उस से ६४+७ = ७१
वर्ष की संख्या निकालते हैं और कोई १०० वर्ष और चार घड़ी और कोई ७ वर्ष और चार घड़ी
का वाचक पाठ कहते हैं किन्तु ऐसे सब स्थल पक्षपात रहित विद्वानों के सूक्ष्म विचार करने योग्य हैं ॥ - इस सो शब्द का पाठ किसी २ पुस्तक में सौ भी है कि जिस से वर्ष की संख्या के
समझने में बड़ी गड़बड़ हो जाती है । यह स्थल भी विद्वानों की बुद्धि को भ्रम देने जैसे है ।
यदि कोई शुद्ध अंतःकरण से पूर्वापर का लेखा लगा देखेगा तो वह चंद कवि को संवत संबन्धी
कठिनता को जान कर बहुत प्रसन्न होगा ॥
३२०. पाठान्तर :- जिहिं । सोमेत्थर । जिने । धुरसांनी । चढै । चढे । भांनी । भांती ।
लीयौ । परिहारी । परिहारीय । बलि । उपम । राहां । सारी । मारोय । बैरन । द्वोरि । रांजोर ।
बर । पां । मइ । गुजर । गूजर । गज यौ ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२३
बर वीर धीर धारच्च धनी । संभरि वैरिन भंजयौ ॥
इक दौरि गौर राजौर वह । पां वड गुज्जर गंजयौ ॥
छं० ॥ ६१६ ॥ रु० ॥ ३२० ॥
॥ दिल्ली के राजा अनंगपाल जी पर कमधज्ज का चढना ॥
कवित्त ॥ ढिल्लिवै आनंग । राज राजंग अभंगं ॥
ता उप्पर कमधज्ज । सेन सज्जी चतुरंगं ॥
अग्र आस अभूत । पुट्टि बंधे गज पत्तं ॥
ता पुठ्ठै विजपाल * । सुभर सज्जै रन मत्तं ॥
धजनेज मोज नीसान ढल । मनु बसंत रंज्जय विपन ॥
करि कूच कूच उप्पर धरा । आय वेध अंतर सपन ॥
छं० ॥ ६१७ ॥ रु० ॥ ३२१ ॥
॥ कमधज्ज की चढाई सुन अनंग का कालिंद्री उतर मुकाम करना ॥
कवित्त ॥ सुनी बत्त आनंग । अंग लग्गो रस वीरच्च ॥
भ्रकुटि वक्र रत द्विग । चित्त जुध रत्त सरीरच्च ॥
बोलि मित्त अप्पान । । कहिय सू बान मंत गुन ॥
चढत राइ दिल्लेस । करिय नीसान वीर धुन ॥
गज वाजि रथ्थ पद भर गद्दर । सजिय सेन सनमुष चलियं ॥
उत्तरि कालिंद्द्रि मुक्काम किय । दस दिसान वत्ती चलिय ॥
छं० ॥ ६१८ ॥ रु० ॥ ३२२ ॥
- स्मरण में रखने की बात है कि संप्रत शोधों के अनुसार भी कनौज़ के राजा विजयपाल
जी, दिल्ली के राजा अनंगपालजी और अजमेर के राजा सोमेश्वर जी परस्पर समकालीन थे ॥
३२१ पाठान्तर :-ढिली । ढिल्लावै । राजग । अभंगम । कनवज । सजी । चतुरंगम ।
अंग । अग्र । पुठिं । पुढ़ि । बँधे । पंतं । प्रंत । पुठे । पुठिं । विजेपाल । सजे । मंतं । मंत ।
नीसांन । ढल्ल । मनों । बसंत । रञ्जय । विपण । कूच २ । उपरि । धरहि । धरहिं । आइ । वेद्ध । संपन ॥
३२२ पाठान्तर :-सुनिग । सूनिग । वत । लगौ । लगे । दश । भृगुटि । चक्र । द्विग रत ।
चिंत । भृत । अप्पांन । शषांन । स बांन । दिलेश । निसांन । धूंनि । रथ । पथ । मन मुष ।
संमुख । उतरि । कलिद्रि । मुकांम । दश । दशांन । वती । हलीय ॥
१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ कमधज्ज की चढाई सुन सोमेस का अनंग की सहायता को
दिल्ली जाना और वहां पहुँच अनंगपालजी से एकान्त में
मंत्रणा करना ॥
पद्धरी ॥ संभरिय बत्त संभरि नरेस । आभासि खित्त अप्पां असेख ॥
कमधज्ज राज तंवर नरिंद । मत्तौ सु दुनै आवद्ध दंड ॥ छं० ॥ ६१८ ॥
अप्पन सहाय सज्जों सपूर । बैठन्न ग्रेह नह अम्भ सूर ॥
करिकैं सु जीति आवैं अपान । कै सजै वास कैलास थान ॥ छं० ॥ ६२० ॥
मन्नेव सूर भर मंत वाम । घुम्मरे नद्द नीसान ताम ॥
चढि चल्या सेन सजि चाहुवान । उप्पटे जानि सत सिंधु पान ॥ छं० ॥ ६२१ ॥
अग्गे सु सोम दिल्ली सहाय । अग्गेव विष्व हर कंठ लाय ॥
अग्गेव मनी लख्खी फणिंद । अग्गेव सरद निसि उगिग चंद ॥ छं० ॥ ६२२ ॥
अग्गे सु चक्र खिन्ना गुविंद । अग्गै सु वज्र कर चक्की इंद ॥
बिहु बाह सूर सज्जे समंत । बेनै विरद्द बंधे अनंत ॥ छं० ॥ ६२३ ॥ *
- यह छंद सं० १६४७ । १७७० । और १८४५ की पुस्तकों में नहीं है किन्तु सं० १८५९ की
लिखी में है ॥
इस छंद की अंत की तुक में “बेनै विरद्द बंधे अनंत” है कि जिसका अर्थ यह होता है
कि वेन ने अनेक बिरद बांधे अर्थात् कहे । यह वेन कवि इस महाकाव्य के रचनेवाले चंद का
पिता था और वह सोमेश्वर जी के इस समय साथ था । अब तक चंद से पहिले का कोई काव्य
किसी भी कवि का किसी के जानने में नहीं है किन्तु हमने जो एक छंद छंद वर्णन की महिमा
नामक पुस्तक सं० १६२९ की लिखी शोध कियी है उस के पीछे मेवाड राज के महाराणा जी श्री
उदयसिंहजी के महाराज कुमार श्रीसगतसिंहजी के पंडित विष्णुदासजी ने अकबर बादशाह के
भाट गंगजी से अजमेर में पटोलावाय के मुकाम पर चंद के बाप कवि राव वेन का नीचे लिखा
छप्पय अर्थात् कवित्त लिखा था वह हम प्रकाश करते हैं। इस छप्पय से वेन ने पृथ्वीराजजी के
पिता सोमेश्वरजी को आसीस दियी थी :-
छप्पय ॥ अटल ठाट महि पाट । अटल तारागढ थानं ॥
अटल नग अजमेर । अटल हिंदव अस्थानं ॥
अटल तेज परताप । अटल लंका गढ डंडिव ॥
अटल आप चहुवान । अटल भूमी जस मंडिव ॥
संभरी भूप सोमेस नृप । अटल छत्र आपै सु सर ॥
कवि राव वेन आसीस दै । अटल जुगां राजेसं कर ॥ १ ॥
[आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२५
अग्गैं सुदंति पंतिय विद्दूर । पन्तंत चंदु सद फान्न भूर ॥
धजनेज चमर वंवर विनान । मन हू कि पब्ब पह्नाव किसान ॥ कं० ॥ ६२४ ॥
धमकंत धरनि अच्छि सिर निहाय । चल चलिय द्विग उद्विग्ग थाय ॥
पुर धूरि पूरि मुद्दित भमित्ति । दिसि व दिसि राज पसरंत कित्ति ॥ कं० ॥ ६२५ ॥
रह पग्ट्ठि सोम पर चाड कज्जि । मन हू कि दुनह वर व्याघ्र रज्जि ॥
संपत्त जाय दिल्लिय पुरेस । आनंग राज मिळे असे स ॥ कं० ॥ ६२६ ॥
ग्रह वत्त कुसल पूंछिय असेत । रस हास पेम वढे सु छेत ॥
विधि विड्डि भोज भोजंत राय । सचि सु चित्त चित्त पट रस्स भाइ ॥ कं० ॥ ६२७ ॥
[L10: आहार पान घन सार पूर । बैठे सु आइ एकांत सूर ॥
सब कहिग विड्ड कमधज दिसान । सुद्धरै वत्त सो करहु पान ॥
कं० ॥ ६२८ ॥ रू० ॥ ३२३ ॥
॥ अनंग की बात सुन सोमेस का रोस में आय लड़ने को तयार होना॥
कवित्त ॥ सुनिय वत्त जपि सोम । रोस उब्भार झार असि ॥
रसन दसन दब्बंत । रक्त द्रिग मुच्छ हथ्थ कसि ॥
इसी के साथ उसी पुस्तक में चंद के नागापन्नकरणा का कहा हुआ यह नीचे लिखा
दोहा भी लिखा है:-
दोहा ॥ ले कूंजा नृप पीयुला, सांमत चमूं समंद ॥
वेन नंदन कनवज गमन, चंद करन फइ दंड ॥
३२३ पाठान्तर :- संभरीय । नरेवा । अभासि चित आपां । अपा । अग्रेश । कमधज ।
राव । तूंवर । नरिंद । दुन्हैं । आबद्ध । दुंद । सञ्जौ । वैवच । गेह । धम । कैकरैं जीत आना
नारंद । आनिग । अपांन । यांन । कें सजे यांन कैलास इंद । मनेव । मंच्नैवं मंत भर सूर ठाम ।
घुमरेट्ट नीसांन तांम । मनेव । घुमरे । चाहुवांन । उपटे । जांनि । सिंधू । पांनि । पानि ।
अग्गै । अग्गें । अग्रैं । अगैंव । अंगेव । अग्रैंव । विप । लाइ । अगैंव । अग्रेत्र । अग्रैंव ।
मंति । मचि । लभी । फूंनिंद । अग्रैंव । अगैंव । रत अग्गें । अगैं । वेन । बानैं । अग्रैं । सदंत ।
पंभूर । पंडूर । भरन । बनांन । मत हूं । पब । फसांन । सर । हलीय । दुग । अट्ठगु । दूग ।
अद्रूग । पुरि धूरि रिपुरि सुदिन भमित्त । पुररि पूरि धूरि मुदिन तगित्त । वि । पसरंति । पडड् ।
पडह । कज । मांन हूं । मानहु । रज । संपत । दिल्लियपुरेश । राय । मिले । गृह । कुशल ।
पुछिय । अशेष । रश हाश । बढे । विधि विधि । चित । रेश । पांन । आय । सब्ब । विधि ।
कमढुंज । दिसांन । सुट्ठरंहि । बत । हूं । पांन ॥
३२४ पाठान्तर :-घत । चत्तं । जपं । रोश । उभार । भारि । दुतिवंत । मुछ । हथ । विचा-
रिय । अप्पांन । अपनीय । अचि । भारीय । चाहुआन । चंडुवान । झंपौ । दलां । मांनहुं ॥
१८६ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
दूद्द कसंध आसंध । राज सम जंग विचारिय ॥
सजौ सेन अप्पनी । भिरौ संजौ अरि भारिय ॥
चहुआन राय आनन्द सुच्च । अति उमाह भारथ मनच्च ॥
अच सम्म लग्गि ऋषी दलच्च । बात चक्र मानहु तिनच्च ॥
छं० ॥ ६२८ ॥ रु० ॥ ३२४ ॥
॥ दोनों राजाओं का डेरौं पर जाना और पिछली रात को
युद्धारंभ होना ॥
दूहा ॥ दूद्द परिट्टि * राजन उठे । गय अप्पाने ठावै ॥
निसा जाम रहि पाछली । भयौ निसान निघाव ॥
छं० ॥ ६३० ॥ रु० ॥ ३२५
॥ सोमेशकी सहायता से अनंग की विजयपालजी के साथ लडाई ॥
भुजंगी ॥ रही जाम एकं निसा पच्छि यानं । बजे नद्द नीसान बीसान जानं ॥
चक्कौ राज आनंग सोमं समेतं । बढे हास रासं चित्तं प्रीति चेतं ॥ छं० ६३१ ॥
सुसै सेन ऊचं धजा नेज साची । सनौं बह्लं मक्कू रञ्जै सु राची ॥
सजे पप्खरं बाज दंती सनैनं । सनाहंत श्रीतं चित्तं जुद्ध जेनं ॥ छं० ॥ ६३२ ॥
दूतै आनि दूतं कही बत्त सायं । सजै सेन आयौ विजपाल राजं ॥
ख्रपं व्यूच आकार सञ्जे सभारं । दढं फन्न पुंछं रच्चे भ्रित्त सारं ॥ छं० ॥ ६३३ ॥
सुने बत्त आनंग चित्तं बिचारी । कही सोम सीषी बँधौ बंध भारी ॥
सजो सेन अप्पान व्यूहं गहरं । गिल्लै ख्रप्प तामं हुवै जित्ति सूरं ॥ छं० ॥ ६३४ ॥
- हिं० परिट्टि (सं० स्त्री० परीष्टि = Inquiry, research, &c.) से है ॥
३२५ पाठान्तर :- परट्ठि । परठि । अप्पानै । ठाह । जांम । पछली । निसांन । नघाय ॥
३२६ पाठान्तर :- जांम । इक्कं । इक्क । पछियनं । बजै । नीसांन । वरसांन । चक्रे । सोमे ।
सोम । समैत । चढे । हांश । रास । राशं । चित । सुभे । क्षेत्र । नेन । मांही । मनौ । बदलं ।
बदलल । मका । रचे । रच्ये । पषरं । सनैनं । सनांर्हित । भितं । चित्तं । जूदू । जैनं दूते । इतैं ।
आंनि । आय । सभैं । आयेो । विजिपाल । विजेपाल । अपं । रूप । सजे । सु भारं । दंढं । फन ।
फच । पुछं । भृत्ति । ध्रित । सुनै श्रवनं वैनं वतं विचारी । सिरकं । सिपं । बंधो । सजो । अपान ।
कद्दरं । गिले । अप । जिति । चंचु । राय । तिन । राजं । पिछ । चौरंग । तयं तुहु । जय ।
उधीर । पिछ । घरा धार उधार वीरं सु नेवं । पंड पिंड । पंड पंड । लज । सेजे । सन्नै । पुछ ।
पथ्य । कूर्भ । जिन्ने । जित्तीया । जितिया । अनेक । अय । नंगं । तिन । अग । आतस । भारे ।
दुयं । गेनं । उडै । कंपे । कये । बठे । भंडा । दिषानं । वजै । अचहु । आनंद्द । अंनद्र । गजे । निसांनं ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२७
सज्यो पंच ग्रीवा सु सोमेस रायं । तिनं संभरी लांज राजं सचायं ॥
दिसा दाचिनी पञ्च चौरंग वीरं । कुलं चाहुवानं जयं जुद्ध भीरं ॥ छं० ॥ ६३५ ॥
थियं पञ्च वीरंम वीरंग देवं । धरा धार उद्धार धारं सु नेवं ॥
पगं पंड आनंग राजंग पाखं । धरा पंड पंडं भुजं लज्ज झाखं ॥ छं० ॥ ६३६ ॥
सजे पुक्क कोरंभ जैसिंघ नामं । जिनै जित्तिया जुद्ध अनेक ठामं ॥
सजे अग्ग पंती मदं मोष नग्गं । तिनं अग्ग आतस्स भारं उतंगं ॥ छं० ॥ ६३७ ॥
दुवै सेन मिच्छी उडी रेन पूरं । कंपे कायरं सूर वढ्ढे सनूरं ॥
धजा नेज ढालं पताषी दिसानं । वजे सिंधु आनद्द गज्जे निसानं ॥
छं० ॥ ६३८ ॥ रू० ॥ ३२६ ॥
कवित्त ॥ वज्जि गद्दर नीसान । अग्गि अग वान विकुट्टिय ॥
*दरिया दधि किय मथन ।+ भोम फटिय पच्च तुद्दिय ॥
करषि मुट्ठि कम्मान । तानि अन वान छनं किय ॥
मनहुं चिल्ह दिसि सदल । ‡ भौर वासं नमनं किय ॥
रुधि मग्ग मिच्च षांच मुद्दयी । सुभर सोम मत्तो गहन ॥
सर सार सार उच्चर सिखह । मनु मेघ बुंद मच्छी मछन ॥
छं० ॥ ६३९ ॥ रू० ॥ ३२७ ॥
विराज ॥ चुरंगी सु वीरं । जुटे जुद्ध भीरं ॥
कुटे मोष बानं । मुदे आसमानं ॥ छं० ॥ ६४० ॥
परे वप्प घायं । करें कूच कार्यं ॥
उभारंत सेखं । हुवं सेल भेखं ॥ छं० ॥ ६४१ ॥
तनं किद्र काखं । रुधिंजा प्रनालं ॥
बहै धार पग्गं । निनारंध रग्गं ॥ छं० ॥ ६४२ ॥
३२७ पाठान्तरः-नीसांन । अगि अगिवांन विकुटीय । * कि । दीया । कीय । मघन ।
+कि । फट्टीय । तुट्टीय । मुंछ । क्रंमांन । कम्मांन । आंन । छिन्न । बांन । छनं क्रिय । मनहुं । चिल्लि ।
‡ कि । भौर । भौर । भोर । वास । नभनं । मग । मुद्यो । सुभर भोम । मनौ मेघ बुंदह महन ।
मंनौ मेघ बुंद मह महन । महि ॥
३२८ पाठान्तरः- चौरंगीश । जुटें । जूटे । भारं । कुंटै । छूटे । बानं । सुदे । वप । घायं ।
करे । कुह । हुए । सैल । तिनं । कद्र । रुधिन्जा । रुधिजा । बहैँ । पग्गां । डग्गां । रंगं । त्रूटै ।
तुटैं । दन । करगै । करेंगे । विहारी । परै । परें । यांनं । फल कौट जारी । कोट । हय । घरे ।
६ड । लुलं लौघ मत्तं । कटै बंधन भयतं । कटे । भंतं । चौरंगी । वरसिंघ । वरंसिघ । बथ । टुत्र ।
मल । जम । दुठं । बठं । वरसिंघ । वरसिंह । पितं । परै । बधि । मैतं । पच । भीर । कटै ।
भगै । दंढि । जितै ॥
५२८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व ]
तुरे दंत जारी । करै गै विचारी ॥
परे भूमि थानं । कलं कूट जानं ॥ छं० ॥ ६४३ ॥
हयं षंड षंडं । धरं रुंड मुंडं ॥
लुथं लुत्थ मत्तं । कटं बंन भत्तं ॥ छं० ॥ ६४४ ॥
चुरंगी सु तत्तं । बरं सिंघ उत्तं ॥
मिल्है बत्थ आनं । दुअं संझ जानं ॥ छं० ॥ ६४५ ॥
खिल्लै जंम दंडं । गलं खग्गि बद्धं ॥
बरं सिंघ षेतं । परे बंध नेतं ॥ छं० ॥ ६४६ ॥
भयं पंच भीरं । कटे पास बीरं ॥
भगे दढ्ढ वामं । जिते चाहुवानं ॥ छं० ॥ ६४७ ॥ रू० ॥ ३२८ ॥
गाथा ॥ भग्गो दन्न नर सिंघं । जंगं जित्ताइं राए चौरंगी ॥
बाई दिसि बर बीरं । लग्गे जुड्डाइं भग्ग मग्गयं ॥
छं० ॥ ६४८ ॥ रू० ॥ ३२८ ॥
रसावळा ॥ * षग्ग साहिं नगा । सेन सेनं अगा ॥
सार धारं मगा । कूह कूहं बगा ॥ छं० ॥ ६४९ ॥
धाय यों ठंनकी । आहिरं घंनकी ॥
कंठ गौरं मता । बाहनी पी मता ॥ छं० ॥ ६५० ॥
बीर लुत्थं लुथं । मिल्ल बत्थं बथं ॥
तुहि तंतं अती । गज्जनोयं दंती ॥ छं० ॥ ६५१ ॥
नालि ज्यो कढ़ती । सूर यों बिढ़ती ॥
उड्डि लोहं नुहं । मिल्ल जोहं जुहं ॥ छं० ॥ ६५२ ॥ रू० ॥ ३३० ॥
३२६ पाठान्तर :- भगो । बरसिंघं । बरसिह । जंग । जिताइ । राय । चउरंगी । वाइ ।
दीसि । लगे । मगाइ । मगाहूं ॥
- इस छंद का नामान्तर विमोह अर्थात् विमोहा भी है और वह दो २ रगण का होता है ॥
३३० षगं । संग । सांहि । साहं । नंगा । सजे सैन अंगा । सजे सेन अंगा । सारं धार ।
कुंह कूह वमा । कुहं रूह वगा । विद्योयं ठनकी । अहीरन धनकी । अहिचं धनकी । कठंगी
रमता । कंठंगी रमता । वारुणि पिमंत्ता । बारूणी पिमंता । परी लुथ लुथं । परी लुथा लुत्थ ।
मिलै बथ बत्थं । वथं । तुटीतंत अतीं । तुटी तंति अंती । गरजंत दंती । नालि ज्यौं कठंती ।
सूरणों वढंती । सूर ज्यौं बढती । उड़े लोह लोहं । उड़े लोह लोहं । मिलें जोह जोहं । मिले जोह
जोहं ॥
इस रूपक के पाठान्तरों को विचारने से पाठकों को ज्ञात होगा कि वे कैसे २ अद्भुत और
विद्वानों को भी भुला देने वाले हैं ॥
पृथ्वीराजरासौ । १२६
कवित्त ॥ बढन वीर वीरस्स । वीर कमधज सौं जुग्यौ ॥
ता उप्पर गजराज । आइ मद मोप उपग्यौ ॥
इचित संग उब्भारि । विरचि बाची गज मध्यह ॥
जानू ठनंकिय घंट । कंठ सोभा सुभि तथ्यह ॥
गचि संग सूर नीनो हबकि । जै जै सुर आकास कहि ॥
रुधि धार कुट्टि संमुह चली । मनो मेर सरसत्ति बहि* ॥
कूं० ॥ ६५३ ॥ रु० ॥ ३३१ ॥
भंजि मुख गजराज । अप्प सेना उर धारिय† ॥
ता मध्ये सै तीन । फिरग संमुख है डारिय† ॥
ता मध्ये वाघेल । राइ रिपु सल्ल मचा भर ॥
घरी यक रन रंग । तुद्दि धर धार गही धर ॥
जित्तो सु जंग धारह धनिय । विभक्त बीर† बित्तो जहां ॥
भजि और अंत कंडे रिनह । गे राज विजपाल तहां ॥
कूं० ॥ ६५४ ॥ रु० ॥ ३३२ ॥
दूहा ॥ वीर देव सम बीर लरि । भग्गि सेन कमधज्ज ॥
ता पच्छै सोमेस पर । उड्डिसार बज रज्ज ॥ कूं० ॥ ६५५ ॥ रु० ॥ ३३३ ॥
- यह तुकें बूंदी राज के पुस्तकालय की पुस्तक सं० १८४५ की में नहीं हैं ॥
३३१ पाठान्तर :- बीरंम । कमधंज्जे । सों । सुं । उपर । गजराजं । आय । इहत । उभारि ।
वाहि । मध्यह । जाय । कंति । तथ्यह । संगि । समूह । संमुह हेडा रिय । चलिय । मनहु ।
सति । विहि ॥
† पाठको ! हम बीसलदेवजी की दानव कथा को अद्भुत रस में कवि का लिखना टिप्पण
२६० में कह आये उसी तरह इस दिल्ली के राजा अनंगपाल जी और कनौज के राजा कमधज्ज
विजपाल जी की लड़ाई का वर्णन वीभत्स और वीर रसों में कवि ने लिखा है कि इस बात की
वह हम को युक्ति से सूचना अपने "विभक्त बीर बित्तो जहां" वाक्य से करता है । यह महाकाव्य
कवि ने नव रसों में लिखा है अतएव जहां हम आप को सचेत न भी करें वहां आप विचार कर
रस को समझ लीजिएगा ॥
३३२ पाठान्तर :- मुखं । सेनहं । धारीयं । मध । संमुह हे । संमुह ह्वै डारीय । मधे ।
बघेल । बघ्येल । राय । सल । तुदि । गई । गई । जितो । सं । धनीय । जिहां । बोरं । ओर ।
भत्तं । भित्त । कुंडै । रनह । गंद्यये । गईय । गयै । बिजैपालं तिहां ॥
३३३ पाठान्तर :- दोहा । वीर । बीर । भग्न । कमधन्त । पिछै । पछै । सौमेस । उडी । रंज ॥
६
·१३० पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
कवित्त ॥ परी भीर सोमेस । सोम बंसी सहाय भय ॥
मार मार उच्चरंत । सेन चतुरंग हयग्गय ॥
गजदंता बिक्कुरंत । बीर सेरी झननंकत ॥
टोप टूक बिक्कुरंत । पग्ग भागत रमनंकत ॥
रस रास बीर कमधज्ज भय । संमुह बीर निहाइया ॥
संभरी राव संभारि छुह । लग्गो लोह उचाइया ॥
छं० ॥ ६५६ ॥ रू० ॥ ३३४ ॥
पद्धरी ॥ उच्चाय लोह लगि व्योम थान । मानों कि हरिय बल कलन बान ॥
जुहौ सु अरिन दल मझ्झ जाइ । मांनो कि सिंघ गज जूथ पाइ ॥ छं० ६५७ ॥
इन बिद्ध सोम मिल लोह पूर । आवड रीठ मत्ती कहूर ॥
झन नंकि बान बजि गोम धंक । कायर पुलंत सूरा निसंक ॥ छं० ॥ ६५८ ॥
दल मिलग सेन बे बाह बीर । बरसें अनंग ग्रज्जंत धीर ॥
मांचंत कूच वजि लोह सार । जुहंत सूर रिन करि पचार ॥ छं० ॥ ६५९ ॥
राजंत राग सिंधू * कराल । बाजंत बज्ज जनु मेध काल ॥
छहकंत घाव वाहंत धीर । किलकत नह नारद बीर ॥ छं० ॥ ६६० ॥
डक्कंत डक्क डाइन डरान । गच्छंत गिद्धि सिद्धनिय थान ॥
नाषंत देव मच्छंत फूल । खच्छंत दुष्य मन मध्य हूखि ॥ छं० ॥ ६६१ ॥
उररीय सेन सजि अनंगपाल । भर हरो भोर कमधज बिसाल ॥
सूत पैंड जाइ फिर लग्गि घाय । आतार रीठ मत्तौ उराय ॥ छं० ॥ ६६२ ॥
३३४ पाठान्तर :-परी । सोमेष । बंसी । हय गय । गजदिंता । झननंकंतः । टौक ।
बिक्कूरंत । पग । भगंत । रननंक्रीत । रननंकेत । रस सुर । वीर । समूह वीर । बिहाइया । निहा-
ईया । संभरी । लग्गै । लगों । उचाईया । उच्चारिया ॥
- संगीत शास्त्रवेत्ता और अन्य सब को स्मरण में रखने की बात है कि संगीत के आचार्य
भरत जो सिंधू राग को वीर रस में मानते हैं उस का प्रचार इस समय तक पाया जाता है अर्थात्
लड़ाई में सिन्धु राग गाया और बजाया जाता था और व्यूह रच के लड़ना भी पृथ्वीराजजी के
समय तक प्रचलित रहा है ॥
३३५ उच्चाय । लौह । ष्योम । योम । यांन । मांने । मनो । हरि । हरी बलि बलन बानं ।
हरीय । बांन । झुंदौ । जुटौ । जुटो । मभ्र । जाय । मांनौ । मांनो । जुथ । पाय । इनि । विध ।
विधि । सोम । मिलि । लौह । पुर । रौदु । मती । बान । शूरा । हलि । मिलिग । वै वाह ।
बरसै । यजंट । मांवत । जुठंत । सिंधु । मेघ । घातय । घाय । बहंत । नद । नारद । डक ।
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १३१
तिन मुख्य सोम मिलि चाहुवान । सांनौ कि रिषि दरिया ग्रसान ॥
तिन सीस वज्जि धारा निहाय । घरियार वज्जि मनुं वज्र घाय ॥ कुं० ॥ ६६३ ॥
परि सोम सूर अरि बधिय जंग । चौसट्ठि घाय बेध्यौ सु अंग ॥
तिन अग्र परिग पहु मान वीर । छिन भिन्न होय धारा सरीर ॥ कुं० ॥ ६६४ ॥
सत पंच परिग है गै कहर । सैं पंच दून परि पित्त सूर ॥
सहसं च पंच कमधज्ज सेन । जीतौ अनंद सुत वीर सेन ॥ कुं० ॥ ६६५ ॥
भाणंत सेन वर विजराज । है गै सु वीर रिन छोरि लाज ॥
पन्नकंत आन घर चलिग पाल । कौतिग्ग देव चर रुंड माल ॥ कुं० ॥ ६६६ ॥
पन्न चरन चार वर रंभ कीन । जै जया सद्द वंदीन दीन ॥ ६६७ ॥ रु० ॥ ३३५ ॥
॥ सोमेश्वरजी कां दिल्ली में बडा साहस करना ॥
कवित्त ॥ दिल्ही वै सोमेस । कियौ साहस चहुवानं ॥
खो कमधज्ज नरिंद । वीर विजपाल भगांनं ॥
अजरां परि अजमेर । मान बंधव परि चहुं ॥
अस्त वस्तं अरु चर्म । रंक लब्भै नन पहुं ॥
रघुवंस वीर दिष्यौ निजरि । पहु पंपिनिय रुडाइयां * ॥
अप मंस अप्प कर कढ़ि कैं । चील्हां हंकि उडाइयां * ॥
कुं० ॥ ६६८ ॥ रु० ॥ ३३६ ॥
इरांन । सिद्धुनीय । यांन । फूल । दुत्य । मघ । फूल । सैन । अनंगपाल । हरिय । हरीय । पैंड । पैड ।
जाय । फिरि । मतौ । मुप । सौम । मिलि । चाहुवांन । मांनौ । रिपि । दरीयायसांन । घरोयार ।
मनुं । मनौ । घरोयार मनौ । वन्जि । वज्जै । सौम । जग । चौसठि । वेध्यो । अग्र । परिम ।
पहु मांन । होइ । शरीर । गै । गहर । से । सुर । सहसच । परिकमध । जीतौ सु जंग सुत वीर
सैन । जीता सु जंग सुत वीर सेन । हय । गय । कौतिग । चारु । वरं । जे जे जु सद्द् । जै जै जु सद्द् ॥
- ऐसे प्रयोगों को देख कर के राजपूताने के कवियों को भ्रम के वश न हो जाना चाहिये
क्योंकि वे कवि की मातृ भाषा पंजाबी होने के कारण प्रयोग हुए हैं और राजपूताने की भाषा में
बहुत से पंजाबी शब्द भी मिले हुए हैं । तथा राजपूताने की भाषा कोई स्वतंत्र भाषा नहीं है
किन्तु भील और मेर आदि और जो २ क्षत्री और कवि आदि जिस २ प्रान्त से इस देश में आकर
बसे हैं उन सब की भाषाओं से मिल कर बनी हुई एक खिचड़ी है ॥
३३६ पाठान्तर :- दिली । ढिल्ली । वै । सौमेस । घहुवानं । कंमधिरज । नरेंद । विजपाल ।
मांन । परचहुं । परंचहुं । अस्ति । वस्ति । अरु चर्मः । चर्म । विर । पंषीनिय । पंखिनि । अध्य ।
मस । कढ़ि । कै । कैं । चिल्हां हक्कि । हकि ॥
१३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ कमधज्ज का पराजित हो घर जाना और सोमेस का अजमेर
को चलना ॥
दूहा ॥ जित्ति भत्ति भारथ्य भौ । गौ फिरि गृह कमधज्ज ॥
उप्पारे अजमेर पहुं । डोला पंच सुरज्ज ॥ छं० ॥ ६६९ ॥ रु० ॥ ३३७ ॥
॥ अनंगपाल जी का सोमेश्वर जी को कन्यादान करना ॥
कवित्त ॥ अनंग तूंअर नरिंद । अम्म संज्यो उहंग बर ॥
सुभ सोमेस नरिंद । ग्रहन पानिंग मंडि कर ॥
हेम हय गय भार । दासि दीनी जु पंच सय ॥
सत हस्ती है सहस । धथ अप्यौ सु देस लय ॥
हिंसार कोट षच्चर विचर । सुत्ती मान्न सुरंग घन ॥
चल्यौ नरिंद अजमेर दिसि । बलि नरिंद इक बंध मन ॥
॥ छं० ॥ ६७० ॥ रु० ॥ ३३८ ॥
॥ सोमेश्वरजी का अजमेर आना और वहां बडा उत्सव होना ॥
कवित्त ॥ श्रृंगारिय गजराज । आय ग्रिह जीतिव जानय ॥
पछिरावन परिवार । जानि रीति माधव मानिय ॥
बाल वृद्ध जुब्बनह । सुष ग्यावत अति मंगल ॥
रुचि रुचि विविध बचन्न । परसपर जानि सुष्ष गन्न ॥
तरु अंब गोष तारुन चिविध । सषिय गोष उभ्भंय सरस ॥
प्रतिबिंब मुष राका दरस । मुछ गावत चहुआन जैस ॥
छं० ॥ ६७१ ॥ रु० ॥ ३३९ ॥
३३७ पाठान्तर :—जिति । भिति । भारथ । भय । गय । ग्रिहं । कम धज । डौला सुरज ॥
३३८ पाठान्तर :—अनंगपाल । तुंबर । शुभ । सोमेस । पानिग । मंडि । हैन हय गयं । जु । सित । हथी । हय । हय । सुं । देवसलय । कोट । षच्चर । षच्चह बिहार । मुत्ति । मुक्तिय । दिशि । बल ॥
३३९ पाठान्तर :—श्रंगारीय । ग्रिहं । गृह । जीतिब । पारिवार । जानि । मांनिय । बुद्धि । जुवन्नह । मुष गांवत । मुंषि गांवत । विविधि । अचंच । जानि । सु पिंगल । ताहनि । त्रिविधि । सषीय । गोषि । उभोय । प्रति बिब मुझं राका दरसन । प्रतिव्यंब । मुष चहुंवांन । चहुवान । चहुआन ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १३३
॥ पृथ्वीराजजी की कथा का आरंभ करना ॥
पद्धरी ॥ अब कत्थौं कव्य चहुआन राइ । जिम लई भूमि पल पग्ग घाइ ॥
जिम अनंग राज दिय दिल्लि दान । बषनंत बषिय कुल चाहुवान ॥ छं० ॥ ६७२॥
जिम अगम दुग्ग गढ लए कूटि । जिन्हि किर्ति जित्ति संसार लूटि ॥
जिस सेक्कू सेन पग धार पंडि। कै वार साचि जिन बंधि कुंडि ॥ छं० ॥ ६७३ ॥
जिम कमध सेन धर धरिय कीन । विध्वंसि जग्ग संयोगि लीन ॥
अब्बुच्चा राव रच्यौ बलेस । चालुक्क भंजि पट्टन नरेस ॥ छं० ॥ ६७४ ॥
परिहार सिंघ जिम जेर कीन । दरनी विवाहि रस बसि अधीन ॥
देवगिर दुग्ग है धुरनि गाछि । बालुका जीति दै जग्ग धाछि ॥ छं० ॥ ६७५ ॥
रिनथंभ दुग्ग जह्व नरेस । कंन्या विवाहि तिन रषि देस ॥
भंजे मै वास बहु भील्न कंक । भर नीर ग्रेच तिन कढ्ढि बंक ॥ छं० ॥ ६७६ ॥
अनमो मसंद तिन नाम वारि । जुगवंत जीव मूरष गवार ॥
अवतार अप्प करतार होइ । हूओ न और ह्वैहै न कोइ ॥ छं० ॥ ६७७ ॥
अजमेर दुग्ग नृप सोम राइ । अदभूत तेज अरि धरन खाइ ॥
दिल्लिय अनंग तोंअर नरिंद । अनसंक कंक पहुमीस इंद ॥ छं० ॥ ६७८ ॥
तिह सुत्त नांहि यह पुत्ति दोय । किय व्याह कमध चहुआन सोइ ॥
छं० ॥ ६७९ ॥ रू० ॥ ३४० ॥
॥ सोमेश्वरजी का अपने तेज बल से तपना ॥
कवित्त ॥ तपै तेज चहुआन । सूर सोमेस अप्प बल ॥
तिन सु तेज तरवारि । मुक्क अह सुक्क मुष जल्ल ॥
३४० पाठान्तर :-कहौं । कहौ । कथ । चहुवांन राय । लइ । पगा । पय । घायं । अनंग ।
दिलि दां दांन । वषतैत । वषनंति । चाहुवांन । दुगा । दुंगां । जुट्ठि । जिंहि । किंति । जित्ति ।
लुट्ठि । लुंटि । जिन । मेकूं । मेक्कि । पिडं । के । जिन । कमंध । सैन । धर धरीय किंच ।
धरंधरी । धीरं । कींच । जिग्य । जंगि । संजौगि । लिंच । लींच । अबुंआ । आंबूआ । जिन ।
जैर । किंन । देनगिरि । हे । गाहि । दे । धाह । यःभ । डूग । डुंगं । जदैवं । कन्यां । रषि ।
भंजे । मेवास । मिवास । भरें । गैह । कढि । नांम । जुंगवंत । किरतार । सोइ । हूंओ । हूउन ।
ह्वैहै । व्है हैं । कोय । दुग । डूंग । नृप । सोम । घरन् । दिलिय । दिल्लीय । तुंवर । पहुवीस ।
पुढवीस । तिहिं । सुत । यिह । गृह । पुत्री । चहुवांन । चहुआन । सौय ॥
१२४ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
सुभट भाट संग थान । चित्त चारन चतुरंगम ॥
जहँ तहँ लच्छि निवास । सु बसि विलसंत सुरंगम ॥
सुनियै न श्रवन पर चक्र भय । सुजस सकल जंपै जगत ॥
मानिक राज कुल उद्धरन । सीम पलन जहँ तहँ पगत ॥
छं० ॥ ई८० ॥ रु० ॥ ३४१ ॥
॥ अनंगपालजी का अपनी दो पुत्रियों में से सुन्दरी बिजैपालजी
को और कमला सोमेश्वर जी को प्रदान करना ॥
दूहा ॥ अनग पाल पुत्ती उभय । इक दीनी विजपाल ॥
इक दीनी सोमेस कौं । बीज बवन कलि काल * ॥
छं० ॥ ई८१ ॥ रु० ॥ ३४२ ॥
एक नाम सुर सुंदरी । अनि वर कमला नाम ॥
दरसन सुर नर दुल्भची । मनौं सु कलिका काम ॥
छं० ॥ ई८२ ॥ रु० ॥ ३४३ ॥
॥ जिस दिन सोमेस का विवाह हुआ उस दिन क्या २ हुआ ॥
कवित्त ॥ ज दिन व्याहि सोमेस । त दिन अमरन मन उदित ॥
त दिन बीर बेताल । काल कलहागम कुदित ॥
त दिन अवनि उमहीय । पुच इक्चि भार उतारै ॥
छत्र तेज छित छज्जि । देव दानव पुंतारै ॥
३४१ पाठान्तरः—तपे । चहुआन । चहुवांन । मुझ । मुंछ । अच्छ । मुष । सुभट घाट संग
भाट चित्त चोरन चतुरंगम । जहां तहां । जिहां तिहां । जह । तह । लछि । वशि । सुनीयै ।
जंपे । मांनिक । कुल । प्रलन । जिहां तहां । जह । तह ॥
३४२-३ पाठान्तरः—अनंगपाल । दिनी । विजपाल । बिजैचंद । सोमेस । चिप वपुत्त । चाल ।
दंड ॥ ३४२ ॥ नांम । सूर सुंदरी । सुदरी । वीच कमला वर नांम । वै । अनि वर मलया नांम ।
दुल । मनौं । सुं । कांम ॥ ३४३ ॥
- चंद कवि का यह वाक्य "बीज बवन कलि काल" हमारे पाठकों के ध्यान देकर यह
समझने योग्य है कि यद्यपि चंद सोमेश्वर जी के घर का कविराज था परंतु वह कैसा यथार्थ
वक्ता था । क्या आज भी कोई कवि अथवा कविराज ऐसा स्पष्ट कह अथवा लिख सक्ता है ?
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६५
ता दिन सु सार सज्जा समह । भ्रम अंतर कायर कपे ॥
मानिकक राइ अनगेस घर । पानि ग्रहन ज दिन थपे ॥
कं० ॥ ६८३ ॥ रू० ॥ ३४४ ॥
॥ सोमेस्वरजी की राणी के गर्भ रहना और उस का प्रतिदिन बढना ॥
कवित्त ॥ कितिक दिवस अंतरह । गयिय आधान रानि उर ॥
दिन दिन कला बढंत । मेघ ज्यों बढत भद्द धुर ॥
चंद्र कला सित पष्प । जेम बाढंत दिनं दिन ॥
मुगधा जोवन चढत । मिन्नत भरतार षिनंषिन ॥
उदित अधान सुभ गातनह । जेम जलधि पुन्निम बढहि ॥
हुलसंत चीय जे प्रीय चिय । जिम सु जोति जनिता चढहि ॥
कं० ॥ ६८४ ॥ रू० ॥ ३४५ ॥
॥ सोमेस्वरजी की तुन्नरि राणी का पृथ्वीराजजी को जनना ॥
दूहा ॥ सोमेसर तोन्नर घरनि । अनगपाल पुचीय ॥
तिन सु पिथ्य गर्भं धरिय । दानव कुञ्ज कृचीय ॥
कं० ॥ ६८५ ॥ रू० ॥ ३४६ ॥
॥ सोमेसजी के प्रथम पुत्र ढुंढा के वर से होना स्मरण कर
गंधर्वादि का प्रसन्न होना और उत्सव मनाना ॥
कवित्त ॥ प्रथम पुत्र सोमेस । गंधपुर ढुंढा गद्विय ॥
भई सुद्धि गंध्रवन । पुहप मंगल दुज पट्टिय ॥
अद्धं रैनि अनु जानि । खियौ वालुक सिर सिद्धिय ॥
गयन बयन घन सह । जुद्ध जीवन जय दिद्विय ॥
३४४ पाठान्तरः—व्याह । सोमेस । ता । भ्रमरंत । भ्रमरंन । उदित । काम कलहागम
कुदित । उंमहिय । उमहिय । नाथ मोहि भार उतारै । सेज । क्षिति । छनि । दिव वांनब्वि पुं
तारै । पौ । दीन कहुं दवि पुंतारै । कंपीय । कंपीय । मानिक । रायं । अनगैस । ज दिन ।
थपिय । थपीय । थपै ॥
३४५ पाठान्तरः—कितकं । आधांन । रांनि । ज्यों मेध वढंत भद्द धुंर । ज्यो । ज्यों मेघ
बढुंत भद्द धुर । पष । र्पष । जैम । यौवनं । षिन षिनं । षिनि पन । उदित अधान सुभगतनह ।
जैम । पूनिम । पूंनिम । हुलषंत । जै । जीय । ज्योति ॥
३४६ पाठान्तरः—सोमेशरं । तुंअर । यम्भ पिथं । पिथ्यै । क्षित्रीय ॥
१३६ पृथ्वीराजरासौ। [आदि पर्व
सित सुभट सूर छह सय्य चकि । चंद अह कीरति करन ॥
संजोगि जोति तप राशि सत । वरष तीस दसछ बरन ॥
छं० ॥ ६८६ ॥ रू० ॥ ३४७ ॥
कवित्त ॥ बज तापस तप तपिय । आप बीसल सिर धारिय ॥
बरष असी तीन सै । गुच्छा ढिल्ली ढिग नारिय ॥ †
सित अंजन रजनीय । पुरनि गंध्रव पग धारिय ॥ †
* * * * * *
अवतारलियौ प्रिथिराज पहु । ता दिन दान अनंत दिय ॥
कनवज्ज देस गज्जन पटन । किलकिलंत कालंकनिय ॥
छं० ॥ ६८७ ॥ रू० ॥ ३४८ ॥
॥ जिस दिन पृथ्वीराजजी का जन्म हुआ उस दिन देशान्तरों
में क्या २ हुआ ॥
कवित्त ॥ ज दिन जनम प्रिथिराज । षरिंग बत्तह कनवज्जह ॥
ज दिनं जनम प्रिथिराज । त दिन गज्जन पुर भज्जह ॥
ज दिन जनम प्रिथिराज । त दिन पहन वै सड्डिय ॥
ज दिन जनम प्रिथिराज । त दिन मन कालन घड्डिय ॥
ज दिन जनम प्रिथिराज भौ । त दिन भार धर उत्तरिय ॥
बत्तरीय अंस अंसन ब्रहम । रची जुगें जुग बत्तरिय ॥
छं० ॥ ६८८ ॥ रू० ॥ ३४९ ॥
३४७ पाठान्तरः-सोमैस । गधपुर । ढुंढां धारीय । भइ मुद्दि गंध्रवन । गंधूवन । पढिय ।
रैन । रैनि । जांनि । लयौ । लीये । वालिक । वालक । सुर । सड्डिय । गैन वैन । घसद् । गैन ।
वैन घन सद । सुड्ड जीपन जय द्वितीय । सतं । सुर । जोति । सन ॥
† यह दोनों तुक सं० १८४५ की पुस्तक में नहीं हैं ॥
* यह तुक हमारे पास की किसी भी पुस्तक में नहीं है ॥
३४८ पाठान्तरः-बलि । सिल । धारीय । रंजनीय । गंध्रव । धारीय । लीयौ । प्रिथीराज ।
दांन । कनवज । दैसं । गजन । प्रटन । प्रट्टन । किलकंतं । कालक नीय ॥
३४९ पाठान्तरः-डिनि । जनमि । प्रिथोराज । परिग वत्तह कनवजह । जनमी । गंजन पुर
भंजन । गजन पुर भजह । जा । ता । वै । सड्डीय । जनमी । ता । जनिमि । भय । जहिन
जनंम प्रथ्रिराज भुअं । भुय । ता । उतरिय । अवतारिय । अवतरीप । जुगे । जुग । बत्तरीप ॥
आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३५
॥ अनंगपालजी का अपनी पुत्री के पुत्र को देखना और
उत्सव करना ॥
कवित्त ॥ अनग पुहवै नरेस । व्यास जग जोत बुलाइय ॥
जुगंन लिद्धि अनुजा सुत । नाम चिहु चक्क चलाइय ॥
पुप्फ पानि धरि धूप । पिध्य पाइन दो अंसह ॥
कलि अवतार कुलाह । अंसपति पारन कंसह ॥
बहु जुद्ध रुद्द कलि जुग्ग वर । श्रित सित्त दैतन भिरन ॥
कवि चंद दिली थद्द कारने । इह अपुव्व अवतार लिन ॥
छं० ॥ ६७९ ॥ रु० ॥ ३५० ॥
पुत्री पुत्र उछाह । दान मानह घन दिड्डिय ॥
धाम २* गावत धम रि । मनहु अचि वन मनि लिड्डिय ॥
कनवज जैचंद मात । भयो संभरि वचनी सुत ॥
तिन पवंत दुज पठिय । धार जर चीर थपिय युत ॥
प्रछिराहू परीघह दान दुज । किय समाप सब्वन विवरि ॥
दस दिवस रषि अप्पन अवर । अति उछाह आनंग करि ॥
छं० ॥ ६८० ॥ रु० ॥ ३५१ ॥
- इस को कोई नई बात नहीं समझना चाहिये किन्तु बहुत पुरानी रीति है कि काव्य
में जहां एक शब्द दो बार प्रयोग होता है और दो बार उस का पृथक २ प्रयोग करने से छंद
टूटता हो तो उस को एक बार लिख कर उसके आगे २ दो का अंक कर देते हैं और उस से
अभिप्राय यह रहता है कि उस को गद्य में करने के समय अथवा उस का अर्थ करते समय उस
शब्द को दो बार प्रयोग कर लेना कि उस के गौरव का नाश न हो जाय । ऐसे प्रयोग प्राचीन
कवियों के काव्यों में आते हैं परंतु अब लोगों ने उन के स्थानों में नये पाठ धर दिये हैं और इस
सूक्ष्म कारण पर ध्यान नहीं दिया है । किन्तु गद्य में तो अब तक यह रीति भले प्रकार
प्रचलित है ॥
३५०-५१ पाठान्तर :- अनंगपाल । पुहवी । योति । भुलाईय । लिहू । दिहू । सु । तनि ।
नांम चिहुं चक्र चह्नाइय । चलाईय । पुफ्फ पांनि । पिथ । पायन । द्वौ । असह । कुलांह । असपति ।
बहुं । जुड्डु । जुंगा । जुग । भ्यत । ध्रित सित । देतन । भिरिय । करत इह अपूरव अवतार लीय ।
अपुव; ॥ ३५० ॥ दांन । मांन दिह्रीय । धांम धांम । धमारि । मनहुं अदि वंत मनि लह्रीय ।
कनवजह । कनवज्जह । जैचंद । जेचंद । पिता बहिनी सुतनी सुत । तिम । यवंग । दुजि । पठीय ।
थपीय । थुति । श्रुति । पहिराय । परिग्राह । परिगह । दांन । कोय । न्येमाप । समाप । सवन ।
विवर । दिस । रिषि । रषि । अपन ॥