पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१३२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ कमधज्ज का पराजित हो घर जाना और सोमेस का अजमेर
को चलना ॥
दूहा ॥ जित्ति भत्ति भारथ्य भौ । गौ फिरि गृह कमधज्ज ॥
उप्पारे अजमेर पहुं । डोला पंच सुरज्ज ॥ छं० ॥ ६६९ ॥ रु० ॥ ३३७ ॥
॥ अनंगपाल जी का सोमेश्वर जी को कन्यादान करना ॥
कवित्त ॥ अनंग तूंअर नरिंद । अम्म संज्यो उहंग बर ॥
सुभ सोमेस नरिंद । ग्रहन पानिंग मंडि कर ॥
हेम हय गय भार । दासि दीनी जु पंच सय ॥
सत हस्ती है सहस । धथ अप्यौ सु देस लय ॥
हिंसार कोट षच्चर विचर । सुत्ती मान्न सुरंग घन ॥
चल्यौ नरिंद अजमेर दिसि । बलि नरिंद इक बंध मन ॥
॥ छं० ॥ ६७० ॥ रु० ॥ ३३८ ॥
॥ सोमेश्वरजी का अजमेर आना और वहां बडा उत्सव होना ॥
कवित्त ॥ श्रृंगारिय गजराज । आय ग्रिह जीतिव जानय ॥
पछिरावन परिवार । जानि रीति माधव मानिय ॥
बाल वृद्ध जुब्बनह । सुष ग्यावत अति मंगल ॥
रुचि रुचि विविध बचन्न । परसपर जानि सुष्ष गन्न ॥
तरु अंब गोष तारुन चिविध । सषिय गोष उभ्भंय सरस ॥
प्रतिबिंब मुष राका दरस । मुछ गावत चहुआन जैस ॥
छं० ॥ ६७१ ॥ रु० ॥ ३३९ ॥
३३७ पाठान्तर :—जिति । भिति । भारथ । भय । गय । ग्रिहं । कम धज । डौला सुरज ॥
३३८ पाठान्तर :—अनंगपाल । तुंबर । शुभ । सोमेस । पानिग । मंडि । हैन हय गयं । जु । सित । हथी । हय । हय । सुं । देवसलय । कोट । षच्चर । षच्चह बिहार । मुत्ति । मुक्तिय । दिशि । बल ॥
३३९ पाठान्तर :—श्रंगारीय । ग्रिहं । गृह । जीतिब । पारिवार । जानि । मांनिय । बुद्धि । जुवन्नह । मुष गांवत । मुंषि गांवत । विविधि । अचंच । जानि । सु पिंगल । ताहनि । त्रिविधि । सषीय । गोषि । उभोय । प्रति बिब मुझं राका दरसन । प्रतिव्यंब । मुष चहुंवांन । चहुवान । चहुआन ॥