पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १२३
बर वीर धीर धारच्च धनी । संभरि वैरिन भंजयौ ॥
इक दौरि गौर राजौर वह । पां वड गुज्जर गंजयौ ॥
छं० ॥ ६१६ ॥ रु० ॥ ३२० ॥
॥ दिल्ली के राजा अनंगपाल जी पर कमधज्ज का चढना ॥
कवित्त ॥ ढिल्लिवै आनंग । राज राजंग अभंगं ॥
ता उप्पर कमधज्ज । सेन सज्जी चतुरंगं ॥
अग्र आस अभूत । पुट्टि बंधे गज पत्तं ॥
ता पुठ्ठै विजपाल * । सुभर सज्जै रन मत्तं ॥
धजनेज मोज नीसान ढल । मनु बसंत रंज्जय विपन ॥
करि कूच कूच उप्पर धरा । आय वेध अंतर सपन ॥
छं० ॥ ६१७ ॥ रु० ॥ ३२१ ॥
॥ कमधज्ज की चढाई सुन अनंग का कालिंद्री उतर मुकाम करना ॥
कवित्त ॥ सुनी बत्त आनंग । अंग लग्गो रस वीरच्च ॥
भ्रकुटि वक्र रत द्विग । चित्त जुध रत्त सरीरच्च ॥
बोलि मित्त अप्पान । । कहिय सू बान मंत गुन ॥
चढत राइ दिल्लेस । करिय नीसान वीर धुन ॥
गज वाजि रथ्थ पद भर गद्दर । सजिय सेन सनमुष चलियं ॥
उत्तरि कालिंद्द्रि मुक्काम किय । दस दिसान वत्ती चलिय ॥
छं० ॥ ६१८ ॥ रु० ॥ ३२२ ॥
- स्मरण में रखने की बात है कि संप्रत शोधों के अनुसार भी कनौज़ के राजा विजयपाल
जी, दिल्ली के राजा अनंगपालजी और अजमेर के राजा सोमेश्वर जी परस्पर समकालीन थे ॥
३२१ पाठान्तर :-ढिली । ढिल्लावै । राजग । अभंगम । कनवज । सजी । चतुरंगम ।
अंग । अग्र । पुठिं । पुढ़ि । बँधे । पंतं । प्रंत । पुठे । पुठिं । विजेपाल । सजे । मंतं । मंत ।
नीसांन । ढल्ल । मनों । बसंत । रञ्जय । विपण । कूच २ । उपरि । धरहि । धरहिं । आइ । वेद्ध । संपन ॥
३२२ पाठान्तर :-सुनिग । सूनिग । वत । लगौ । लगे । दश । भृगुटि । चक्र । द्विग रत ।
चिंत । भृत । अप्पांन । शषांन । स बांन । दिलेश । निसांन । धूंनि । रथ । पथ । मन मुष ।
संमुख । उतरि । कलिद्रि । मुकांम । दश । दशांन । वती । हलीय ॥