पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 146, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंआदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १६५
ता दिन सु सार सज्जा समह । भ्रम अंतर कायर कपे ॥
मानिकक राइ अनगेस घर । पानि ग्रहन ज दिन थपे ॥
कं० ॥ ६८३ ॥ रू० ॥ ३४४ ॥
॥ सोमेस्वरजी की राणी के गर्भ रहना और उस का प्रतिदिन बढना ॥
कवित्त ॥ कितिक दिवस अंतरह । गयिय आधान रानि उर ॥
दिन दिन कला बढंत । मेघ ज्यों बढत भद्द धुर ॥
चंद्र कला सित पष्प । जेम बाढंत दिनं दिन ॥
मुगधा जोवन चढत । मिन्नत भरतार षिनंषिन ॥
उदित अधान सुभ गातनह । जेम जलधि पुन्निम बढहि ॥
हुलसंत चीय जे प्रीय चिय । जिम सु जोति जनिता चढहि ॥
कं० ॥ ६८४ ॥ रू० ॥ ३४५ ॥
॥ सोमेस्वरजी की तुन्नरि राणी का पृथ्वीराजजी को जनना ॥
दूहा ॥ सोमेसर तोन्नर घरनि । अनगपाल पुचीय ॥
तिन सु पिथ्य गर्भं धरिय । दानव कुञ्ज कृचीय ॥
कं० ॥ ६८५ ॥ रू० ॥ ३४६ ॥
॥ सोमेसजी के प्रथम पुत्र ढुंढा के वर से होना स्मरण कर
गंधर्वादि का प्रसन्न होना और उत्सव मनाना ॥
कवित्त ॥ प्रथम पुत्र सोमेस । गंधपुर ढुंढा गद्विय ॥
भई सुद्धि गंध्रवन । पुहप मंगल दुज पट्टिय ॥
अद्धं रैनि अनु जानि । खियौ वालुक सिर सिद्धिय ॥
गयन बयन घन सह । जुद्ध जीवन जय दिद्विय ॥
३४४ पाठान्तरः—व्याह । सोमेस । ता । भ्रमरंत । भ्रमरंन । उदित । काम कलहागम
कुदित । उंमहिय । उमहिय । नाथ मोहि भार उतारै । सेज । क्षिति । छनि । दिव वांनब्वि पुं
तारै । पौ । दीन कहुं दवि पुंतारै । कंपीय । कंपीय । मानिक । रायं । अनगैस । ज दिन ।
थपिय । थपीय । थपै ॥
३४५ पाठान्तरः—कितकं । आधांन । रांनि । ज्यों मेध वढंत भद्द धुंर । ज्यो । ज्यों मेघ
बढुंत भद्द धुर । पष । र्पष । जैम । यौवनं । षिन षिनं । षिनि पन । उदित अधान सुभगतनह ।
जैम । पूनिम । पूंनिम । हुलषंत । जै । जीय । ज्योति ॥
३४६ पाठान्तरः—सोमेशरं । तुंअर । यम्भ पिथं । पिथ्यै । क्षित्रीय ॥