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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

१५४ प्रासादमण्डने
और ईशानकोणमे अष्टकोण, ये आठ पूर्वदिशासे ईशानकोण तक आठ दिक्पालों के कुण्ड है ।
तथा पूर्व और ईशान के मध्य भाग मे नवा प्राचार्य कुण्ड गोल अथवा समचोरस बनावें ।
'विशेष जानने के लिये देखे मंडपकुं'डसिद्धि आदि ग्रंथ ।'
मंडल—
एकद्वित्रिकरं कुर्याद् वेदिकोपरि मण्डलम् ।
ब्रह्मविष्णुरवीणां च सर्वतोभद्रमिष्यते ॥४८॥
वेदिकाके ऊपर एक, दो अथवा तीन हाथ के मानका मंडल बनावें । ब्रह्मा, विष्णु और
सूर्य की प्रतिष्ठा मे सर्वतोभद्र नामका मंडल बनावे ॥४८॥
भद्रं तु सर्वदेवानां नवनाभिस्तथा त्रयम् ।
लिङ्गोद्भवं शिवस्यापि लतालङ्गोद्भवं तथा ॥४६॥
सब देवों की प्रतिष्ठा में भद्र नाम का मंडल, तथा नवनाभी अथवा तीन नाभि वाला
लिंगोद्भव मंडल बनावे । शिव की प्रतिष्ठा में लिंगोद्भव तथा लतालिङ्गोद्भव नाम का मंडल
बनावे ॥४९॥
भद्रं च गौरीतलकं देवीनां पूजने हितम् ।
अर्धचन्द्रं तडागेषु चापाकारं तथैव च ॥५०॥
सब देवियों की पूजन प्रतिष्ठा मे भद्र और गौरीतिलक नाम का मंडल बनावें । तथा
तालाब की प्रतिष्ठा में अर्धचंद्र चापाकार मंडल बनावे ॥५०॥
टङ्काभं स्वस्तिकं चैव वापीकूपेषु पूजयेत् ।
पीठिकाजलपट्टेषु योन्याकारं तु कामदम् ॥५१॥
वावडी और कुओ की प्रतिष्ठा मे टंकाभ और स्वस्तिक मंडल का पूजन करे । पीठिका
और जलपट्ट की प्रतिष्ठा मे योनि के आकार का मंडल पूजने से सब कार्य सिद्ध होते है ॥५१॥
गजदन्तं महादुर्गे प्रशस्तं मण्डलं यजेत् ।
टङ्काभं चतुरस्रं च गजदन्तं महायतम् ॥५२॥
बड़े किले की प्रतिष्ठा मे गजदंत नामका मंडल पूजन करना प्रशस्त है । टंकाभ मंडल
का आकार चोरस है और गजदंत मंडल का आकार लंबा है ॥५२॥
विख्यातं सर्वतोभद्रं ज्ञेयमन्योऽन्यलोकतः ।
पूर्वादितोरणं प्लक्ष-यज्ञाश्वत्थटपिप्पलैः ॥५३॥

ऽष्टमोऽध्यायः १५५
सब मंडलो मे सर्वतोभद्र नामका मंडल प्रसिद्ध है, उसका तथा अन्य मंडलों का स्वरूप
अन्यशास्त्र ( अपराजितपृच्छा सूत्र १४८ ) से जानें । यज्ञमंडप मे पूर्वादि दिशाओं मे अनुक्रम से
पीपला, गूलर, बरगद और पीपल के पत्तो का तोरण बाधे ॥५३॥
ऋत्विजसंख्या—
द्वात्रिंशत् षोडशाष्टौ च ऋत्विजो वेदपारगान् ।
कुलीनानङ्गसम्पूर्णान् यज्ञार्थमभिमन्त्रयेत् ॥५४॥
यज्ञ करने वाले बत्तीस, सोलह अथवा आठ ऋत्विज आमंत्रित होना चाहिये । ये सब
वेदों के ज्ञाता हो, कुलवान् हों और अंगहीन न हों ॥५४॥
देवस्नान विधि—
मण्डपस्य त्रिभागेन चोत्तरे स्नानमण्डपम् ।
स्थण्डिलं वालुकं कृत्वा शय्यायां स्नापयेत् सुरम् ॥५५॥
पञ्चगव्यैः कषायैश्च वल्कलैः क्षीरवृक्षजैः ।
स्नापयेत् पञ्चकलशैः शतवारं जलेन च ॥५६॥
मंडप की चारों दिशा मे तीन २ भाग करें, अर्थात् मंडप का नव भाग करे। ( आठ
दिशा के आठ और एक मध्य वेदी का भाग जाने ) । इनमे उत्तर दिशा के भाग में स्नान मंडप
बनावे । उसमे रेतीका शुद्ध स्थंडिल ( भूमि ) बनाकर उसके ऊपर शय्या मे देव की स्थापना
करे । पीछे पंचगव्य से, कषाय वर्ग की औषधियो से और क्षीरवृक्षो की छालो के चूर्ण से स्नात्र-
जल तैयार करें, उससे पाच २ कलश एकसौ बार भर करके देवको स्नान करावे ॥५५-५६॥
वेदमन्त्रैश्च वादित्रै-र्गीतमङ्गलनिःस्वनै ।
वस्त्रेणाच्छादयेद् देवं वेद्यन्ते मण्डपे न्यसेत् ॥५७॥
स्नान क्रिया के समय वेदमंत्रो के उच्चारणो से, वाजीत्र की ध्वनियो से और मागलिक
गीतो से आकाश ध्वनिमान करे। स्नान के बाद देवको वस्त्रसे आच्छादित करके, पीछे
ईशानकोन की वेदी के ऊपर स्थापित करें ॥५७॥
देवशयन—
तल्पमारोपयेद् वेद्या-मुत्तराङ्गी न्यसेत् ततः ।
कलशं तु शिरोदेशे पादस्थाने कमण्डलुम् ॥५८॥

१५६ प्रासादमण्डने
ईशानकोन की वेदी के ऊपर देवका शय्यासन रक्खें। उनके चरण उत्तर दिशा में
रक्खे। सिर भाग के पास कलश और चरण के स्थान के पास कमंडलु रक्खें ॥५८॥
व्यजनं दक्षिणे देशे दर्पणं वामतः शुभम् ।
रत्नन्यासं ततः कुर्याद् दिक्पालादिकपूजनम् ॥५६॥
देवकी दाहिनी ओर पंखा और बायी ओर दर्पण रखना शुभ है। पीछे आठ दिशाओं
मे रत्न को स्थापित करके दिकपाल आदि की पूजा करें ॥५६॥
आग्नेयां गणेशं विद्या-दीशानेग्रहमण्डलम् ।
नैऋत्ये वास्तुपूजा च वायव्ये मातरः स्मृतः ॥६०॥
अग्निकोन में गणेश, ईशानकोन मे नवग्रह मंडल, नैऋत्य कोन में वास्तुपूजा और
वायव्यकोन मे मातृदेवता की स्थापना करे ॥६०॥
रत्नन्यास-
वज्रं वैडूर्यकं मुक्ता-मिन्द्रनीलं सुनीलकम् ।
पुष्परागं च गोमेदं 'प्रवालं पूर्वतः क्रमात् ॥६१॥
वज्र (हीरा), वैडूर्य, मोती, इन्द्रनील, सुनील, पुष्पराग, गोमेद और प्रवाल, ये
आठ रत्न पूर्वादि सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६१॥
धातुन्यास-
सुवर्णं रजतं ताम्रं कांस्यं रीतिं च सीसकम् ।
वङ्गं लोहं च पूर्वाद्यौ सृष्ट्या धातूनिह न्यसेत् ॥६२॥
सोना, चांदी, ताबा, कांसी, पीतल, सीसा, कलई और लोह, ये आठ धातु पूर्वादि
सृष्टिक्रम से रक्खे ॥६२॥
श्रौषधिन्यास-
*वज्री वह्निः सहदेवी विष्णुकान्तेन्द्रवारुणी ।
शंखिनी ज्योतिष्मती चैवेश्वरी तान् क्रमान् न्यसेत् ॥६३॥
*अपराजितपृच्छा सूत्र १४६ श्लो० १५ मे 'वचा' पाठ है ।
१. 'चन्द्र' पूर्वादिषु यजेत्' इति पाठान्तरे ।

ऽष्टमोऽध्यायः १५७
वज्री ( वज्रदंती ), वह्नि ( चित्रक ), सहदेवी, विष्णुकान्ता, इन्द्रवारुणी, शंखाहुली,
ज्योतिष्मती ( मालकागनी ) और शिवलिंगी, ये आठ औषधियां पूर्वादि दिशाओं में सृष्टिक्रम से
रक्खे ॥६३॥
धान्यन्यास—
यवो व्रीहिस्तथा कङ्गु-जूर्णाहा च तिलैर्युताः ।
शाली मुद्गाः समाख्याता गोधूमाश्च क्रमेण तु ॥६४॥
जव, व्रीहि, कगु, जुआर, तिल, शाली, मूंग और गेहू, ये आठ धान्य पूर्वादि दिशाओ
मे सृष्टिक्रम से रक्खे ।
आचार्य और शिल्पियो का सन्मान—
यद्देवाभरणं पूजा वस्त्रालङ्कारभूषणम् ।
तत्सर्वं शिल्पिने दद्याद् आचार्याय तु याज्ञिकम् ॥६५॥
देवसंस्कार के लिये जो वस्त्र और अलंकार आदि आभूषण चढाया जाता है, वे सब
शिल्पिको देना चाहिये और आचार्य को यज्ञ संबन्धी सब वस्तु देनी चाहिये ॥६५॥
ततो महोत्सवं कुर्यान्नृत्यगीतैरनेकशः ।
नैवेद्यारात्रिकं पूजा-मङ्गन्यासादिकं तथा ॥६६॥
पीछे अनेक प्रकार के नृत्य और गीत पूर्वक महोत्सव करे, नैवेद्य चढावे, आरती करे
और अंगन्यास ( मुद्रा न्यास ) आदि करे ॥६६॥
क्षीरं क्षौद्रं घृतं खण्डं पक्वान्नानि बहून्यपि ।
षड्रसस्वादुभक्ष्याणि सन्मानं परिकल्पयेत् ॥६७॥
दूध, शहद, घी, खांड और अनेक प्रकार के पकवान, तथा षड्रस के स्वाद वाले भोजन
पदार्थ, ये सन्मान पूर्वक देव के आगे रखने चाहिये ॥६७॥
विप्राणां सम्प्रदायैश्च वेदमन्त्रैस्तथागमैः ।
सकलीकरणं जीवन्यासं कृत्वा प्रतिष्ठयेत् ॥६८॥
पीछे ब्राह्मण अपने सम्प्रदाय के अनुसार वेद ंत्रो से तथा आगम मंत्रो से सकलीकरण
करके देवमे जीवन्यास करें । पीछे प्रतिष्ठित करे ॥६८॥

१५८ प्रासादमण्डने
प्रासाददेव न्यास—
प्रासादे देवतान्यासं स्थावरेषु पृथक् पृथक् ।
खरशिलायां वाराहं पौल्यां नागकुलानि च ॥६६॥
प्रासाद के थरों और अंगोपांगो में अलग २ देवों का न्यास करके पूजन करें । खरशिला
में वाराह देव और भीट के थर मे नागदेव का न्यास करे ॥६६॥
प्रकुम्भे जलदेवांश्च पुष्पके किन्नुरांस्तथा ।
१नन्दिनं जाड्यकुम्भे च कर्णिकायां स्थापयेद्धरिम् ॥७०॥
कुम्भ के थर मे जलदेव, पुष्पकंठ के थर मे किन्नरदेव, जाड्यकुम्भ मे नंदीदेव, और
कर्णिका के थर मे हरिदेव का न्यास करें ॥७०॥
गणेशं गजपीठे स्या-दश्वपीठे तथाश्विनौ ।
नरपीठे नरांश्चैव च्क्ष्मां च खुरके यजेत् ॥७१॥
गजपीठ में गणेश, अश्वपीठ में दोनों अश्विनीकुमार, नरपीठ में नरदेव और खुरा के
थर मे पृथ्बीदेवी का न्यास करके पूजन करें ॥७१॥
भद्रे संध्यात्रयं २कुम्भे पार्वतीं कलशे स्थिताम् ।
कपोताल्यां च गान्धर्वान् मञ्चिकायां सरस्वतीम् ॥७२॥
भद्र के कुम्भ मे तीन सध्यादेवी, कलश के थर मे पार्वतीदेवी, केवाल के थर में गांधर्वदेव
और मांची के थर में सरस्वती देवी का न्यास करें ॥७२॥
जङ्घायां च दिशिपाला-निन्द्रमुद्गमे संस्थितम् ।
सावित्रीं भरणीदेशे शिरावट्यां च देविकाम् ॥७३॥
जंघा के थर मे दिक्पाल, उद्गम के थर मे इन्द्र, भरणी के थर में सावित्री और शिरावटी
के थर मे भाराधार देवी का न्यास करें ॥७३॥
विद्याधरान् कपोताल्या-मन्तराले सुरांस्तथा ।
पर्जन्यं कूटच्छाद्ये च ततो मध्ये प्रतिष्ठयेत् ॥७४॥
केवाल के थर मे विद्याधर, अंतराल के थर मे किन्नरादि सुर और छज्जा के थरमें पर्जन्य
( मेघ ) देव, इनका न्यास करे । अब भीतर के मध्य भाग में देवों का न्यास कहते है ॥७४॥
१. 'नन्दिनी' । २. 'सप्तारं कुम्भके' अप० सू० १५० श्लो० ८ ।

ऽष्टमोऽध्यायः १५६
शाखयोश्चन्द्रसूर्यौ च त्रिमूर्त्तिश्चोत्तरङ्गके ।
उदुम्बरे स्थितं यक्ष-मश्विनावद्ध'चन्द्रके ॥७५॥
द्वारशाखाओ मे चंद्र और सूर्य, उत्तरंग मे त्रिमूत्ति (ब्रह्मा, विष्णु और शिव), देहली
मे यक्षों और अर्धचंद्र (शंखावटी) मे दोनो अश्विनीकुमारो का न्यास करे ॥७५॥
कौलिकायां धराधारं क्षितिं चोत्तानपट्टके ।
स्तम्भेषु पर्वतांश्चैव-माकाशं च करोटके ॥७६॥
कीलिका मे धराधर, उत्तानपट्ट (बड़ा पाट) में क्षिति, स्तंभ मे पर्वत और गूंबद मे
आकाश, इन देवो का न्यास करे ॥७६॥
मध्ये प्रतिष्ठयेद् देवं मकरे जाह्नवीं तथा ।
शिखरस्योरुशृङ्गेषु पञ्च पञ्च प्रतिष्ठयेत् ॥७७॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा सूर्य ईश्वरी च सदाशिवः ।
शिखरे चेश्वरं देवं शिखायां च सुराधिपम् ॥७८॥
गर्भगृह मे स्वदेव, मगर मुखवाली नाली मे गंगाजी, शिखर के उरुशृंगो मे ब्रह्मा,
विष्णु, सूर्य, पार्वती और सदाशिव, इन पांच २ देवो का न्यास करके पूजन करे । शिखर मे
ईश्वर देवका और शिखामे सुराधिप (इन्द्र) का न्यास करे ॥७७-७८॥
ग्रीवायामम्बरं देव-मएडके च निशाकरम् ।
पद्माक्षं पद्मपत्रे च कलशे च सदाशिवम् ॥७६॥
शिखर की ग्रीवा में अंबरदेव, शृंगो मे तथा आमलसार मे निशाकर (चंद्रमा),
पद्मपत्र और पद्मशिला मे पद्माक्ष देव, और कलश मे सदाशिव, इन देवो का न्यास करे ॥७९॥
सद्यो वामस्तथाघोर-स्तत्पुरुष ईश एव च ।
कर्णादिगर्भपर्यन्तं पञ्चाङ्गे तान् प्रतिष्ठयेत् ॥८०॥
इति स्थावर प्रतिष्ठा ।
सद्य, वामन, अघोर, तत्पुरुष और ईश, इन पाच देवो का कोने से लेकर गर्भपर्यन्त
पांच अंगों मे (कर्ण, प्रतिरथ, रथ, प्रतिभद्र और मुखभद्र मे) न्यास करे ॥८०॥
प्रतिष्ठितदेव का प्रथम दर्शन—
प्रथमं देवतादृष्टे-दर्शयेदन्तर्हितम् ।
विप्रकुमारिकां वास्तु-ततो लोकान् प्रदर्शयेत् ॥८१॥

१६० प्रासादमण्डने
प्रतिष्ठा के दिन रात्रि में देवालय बंध होने के बाद प्रातःकाल खोलने के समय देवका
प्रथम दर्शन ब्राह्मण कुमारी करें, बाद में अन्य सब लोग दर्शन करे ॥८१॥
सूत्रधार पूजन—
१इत्येवं विविधं कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् ।
भूवित्तवस्त्रालङ्कारै-गौमहिष्यश्च वाहनैः ॥८२॥
अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्त्तव्या कर्मकारिणाम् ।
स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रैस्ताम्बूलभोजनैः ॥८३॥
अच्छी तरह विधि पूर्वक देव के प्रतिष्ठित होने के बाद भूमि, धन, वस्त्र और अलंकारों
से तथा गाय, भैंस और घोड़ा आदि वाहनों से सूत्रधार की सम्मान पूर्वक पूजा करें । एवं
काम करने वाले अन्य शिल्पियों की भी उनके योग्यतानुसार वस्त्र, तांबूल और भोजन आदि से
सम्मान पूर्वक पूजा करें ॥८२-८३॥
देवालयय निर्माण का फल—
काष्ठपाषाणनिर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरे ।
भुंक्तेऽसौ च तत्र सौख्यं शङ्करत्रिदशैः सह ॥८४॥
काष्ठ अथवा पाषाण आदिका प्रासाद जो बनवाता है. वह देवलोक में महादेव तथा
अन्य देवों के साथ सुखको भोगता है ॥८४॥
सूत्रधार का आशीर्वाद—
पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थयेत् सूत्रधारतः ।
सूत्रधारो वदेत् स्वामिन् ! अक्षयं भवतात् तव ॥८५॥
इति सूत्रधारपूजा ।
देवालय बनवाने वाला स्वामी सूत्रधार से प्रासाद बंधवाने के पुण्य की प्रार्थना करें,
तब सूत्रधार आशीर्वाद देवे कि—'हे स्वामिन् देवालय बंधवाने का तुम्हारा पुण्य
अक्षय हो' ॥८५॥
आचार्य पूजन—
आचार्य पूजनं कृत्वा वस्त्रस्वर्णधनैः सह ।
दानं दद्याद् द्विजातिभ्यो दीनान्धदुर्बलेषु च ॥८६॥
१. 'इत्यनन्तरतः' ।

ऽष्टमोऽध्यायः १६१
सर्वेषां धनमाधारः प्राणीनां जीवनं परम् ।
वित्ते दत्ते प्रतुष्यन्ति मनुष्याः पितरः सुराः ॥८७ ॥८७॥
इति प्रतिष्ठाविधिः ।
प्रतिष्ठाका कार्य समाप्त होने के बाद वस्त्र और सुवर्ण आदि धन से आचार्य की पूजा
करें। पीछे ब्राह्मणों को तथा दीन, अंध और दुर्बल मनुष्यों को दान देवे । क्योकि सब प्राणियों
का आधार धन है, और यही प्राणियो का श्रेष्ठ जीवन है। धन का दान देने से मनुष्य, पितृदेव
और अन्य देव संतुष्ट होते हे ॥८६-८७॥
जिनदेव प्रतिष्ठा—
प्रतिष्ठा वीतरागस्य जिनशासनमार्गतः ।
नवकारैः सूरिमंत्रैश्च सिद्धकेवलिभाषितैः ॥८८॥
वीतराग देव की प्रतिष्ठा जैन शासन मे बतलाई हुई विधि के अनुसार, सिद्ध हुए केवल-
ज्ञानियो ने कहे हुए नवकारमंत्र और सूरिमंत्रो के उच्चारण पूर्वक करनी चाहिये ॥८८॥
ग्रहाः सर्वज्ञदेवस्य पादपीठे प्रतिष्ठिताः ।
येनानन्तविभेदेन मुक्तिमार्ग उदाहृताः ॥८६॥
जिनानां मातरो यक्षा यक्षिण्यो गौतमादयः ।
सिद्धाः कालत्रये जाताश्चतुर्विंशतिमूर्त्तयः ॥६०॥
सर्वज्ञदेव के पादपीठ ( पवासन ) मे नवग्रह स्थापित करे । ये जिनदेव अनन्त भेदो से
मुक्ति मार्ग के अनुगामी कहे गये है । जिनदेव की माता, यक्ष, यक्षिणी और गौतम आदि
गणधर आदि की मूर्त्तिया, तथा तीन काल मे सिद्ध होनेवाले चौवीस २ जिनदेव की
मूर्त्तियां है ॥८६-६०॥
इति स्थाप्या जिनावासे त्रिप्राकारं गृहं तथा ।
सांवर्णं शिखरं १मन्दा-रकं त्वष्टापदादिकम् ॥६१॥
वे मूर्त्तिया जिनालय मे स्थापित करे । जिनालय समवसरण वाला, सवरणा वाला,
शिखर वाला, गुम्बद वाला और अष्टापद वाला बनाया जाता है ॥६१॥
१. 'मन्दोश्वर ।'
श० २१

४. अध्याय ११-१४: प्रासाद-भेद (नागर, द्राविड़, वेसर), जीर्णोद्धार एवं उपसंहार

१६२ प्रासादमण्डने
प्रासादो वीतरागस्य पुरमध्ये सुखावहः ।
नृणां कल्याणकारी स्याच्चतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत् ॥६२॥
इति जिनप्रतिष्ठा ।
वीतरागदेव का प्रासाद नगर मे हो तो सुखकारक है, तथा मनुष्यों का कल्याण करने
वाला है। इसलिये चारों दिशा मे ये बनाने चाहियें ॥६२॥
जलाशय प्रतिष्ठा—
माघादिपञ्चमासेषु वापीकूपादिसंस्कृतम् ।
तडागस्य चतुर्मास्यां कुर्यादाषाढमार्गयोः ॥६३॥
असंस्कृतं जलं देवाः पितरो न पिवन्ति तत् ।
संस्कृते तृप्तिमायाति तस्मात् संस्कारमाचरेत् ॥६४॥
वावड़ी और कूंआं आदिकी प्रतिष्ठा मीन संक्राति का मास छोड़कर माघ आदि पांच
मास में करे। तालाब की प्रतिष्ठा चौमासे के चार मास आषाढ और मार्गशीर्ष, ये छह मास में
करे। जलाश्रयो के जल का संस्कार न किया जाय तो उसका जल पितृदेव पीते नही है।
संस्कार किये जल से ही पितृदेव तृप्त होते हैं। इसलिये जल का संस्कार अवश्य करना
चाहिये ॥६३-६४॥
जलाशय बनवाने का पुण्य—
जीवनं वृत्तजन्तूनां करोति यो जलाशयम् ।
दत्ते वा स लभेत्सौख्य-मुख्यां स्वर्गे च मानवः ॥६५॥
जल, वृक्ष और सब जीवों का जीवन है। इसलिये जो मनुष्य जलाशय बनवाता है, वह
मनुष्य जगत मे धनधान्य से पूर्ण ऐहिक सुखों को, तथा स्वर्ग के सुखों को प्राप्त करता है और
मोक्ष पाता है ॥६५॥
वास्तुपुरुषोत्पत्ति—
पुरान्धकवधे रुद्र-ललाटात् पतितः क्षितौ ।
स्वेदस्तस्मात् समुद्भूतं भूतमत्यन्तं दुस्सहम् ॥६६॥
गृहीत्वा सहसा देवै-न्र्यस्तं भूमावधोमुखम् ।
जानुनी कोणयोः पादौ रक्षोदिशि शिवे शिरः ॥६७॥

ऽष्टमोऽध्यायः १६३
प्राचीन समय में जब महादेव ने अंधक नाम के दैत्य का विनाश किया, उस समय
परिश्रम से महादेव के ललाट में से पसीना की विन्दु पृथ्वो के ऊपर पड़ी । इस विन्दु से एक
अत्यन्त भयंकर भूत उत्पन्न हुआ । उसको देवों ने शीघ्र ही पकड़ करके पृथिवी के ऊपर इस
प्रकार से औंधा गिरा दिया, कि उसकी दोनो जानु और हाथ की दोनो कोन्ही वायु और
अग्नि कोने में, चरण नैऋृत्य कोने में और मस्तक ईशान कोने में रहा ॥६६-६७॥
चत्वारिंशद्युताः पञ्च वास्तुदेहे स्थिताः सुराः ।
देव्योऽष्टौ बाह्यगास्तेषां वसनाद्वास्तुरुच्यते ॥६८॥
इस औंधे पड़े हुए वास्तुपुरुष के शरीर पर पैंतालीस देव स्थित हो गये और उसके चारो
कोने पर आठ देवियां भी स्थित हो गईं । इस प्रकार तरेपन (५३) देव उस भूत के शरीर पर
निवास करते हैं, इसलिये उसको वास्तु पुरुष कहते है ॥६८॥
अधोमुखेन विज्ञप्तौ त्रिदशान् विहितो बलिम् ।
तेनैव बलिना शान्ति करोति हानिमन्यथा ॥६६॥
प्रासादभवनादीनां प्रारम्भे परिवर्त्तने ।
वास्तुकर्मसु सर्वेषु पूजितः सौख्यदो भवेत् ॥१००॥
अधोमुख करके रहा हुआ वास्तु पुरुष देवो को विनति करता है कि—जो मनुष्य मेरे
ऊपर बैठे हुए देवो को विधिपूर्वक बलि देवेगा, तो उस बलिके प्रभाव से मै उसको शान्ति प्रदान
करूंगा और बलि नही देने पर तो हानि करूंगा। इसलिये प्रासाद और भवन आदि के सब
वास्तु कर्म के प्रारम्भ से सम्पूर्ण होने तक सब वास्तु कर्म मे वास्तु पूजन करने से सुखशांति
होवेगी ॥६६-१००॥
एकपदादितो वास्तुर्यावत्पदसहस्रकम् ।
द्वात्रिंशन्मण्डलानि स्युः क्षेत्रतुल्याकृतीनि च ॥१०१॥
एक पदसे लेकर एक हजार पद तक का वास्तु बनाने का विधान है । वास्तुपूजन के
बत्तीस मंडल है, वे क्षेत्र की आकृति के अनुसार आकृति वाले है ॥१०१॥ A
एकाशीतिपदो वास्तुश्चतुःषष्टिपदोऽथवा ।
सर्ववास्तुविभागेषु पूज्येन्मण्डलद्वयम् ॥१०२॥
A सविस्तार जानने के लिये देखें । अपराजित पृच्छा सूत्र ५७ और ५८ वा ।

१६४ प्रासादमण्डने
वास्तु पूजन के बत्तीस मंडलों में से इक्यासीपद का और चौसठ पद का, ये दो मंडल
पूजने चाहिये ॥१०२॥*
वास्तुपुरुष के ४५ देव—
ईशो मूर्धनि पर्जन्यो दक्षिणकर्णमाश्रितः ।
जयः स्कन्धे महेन्द्राद्याः पञ्च दक्षिणबाहुगाः ॥१०३॥
'महेन्द्रादित्यसत्याश्च भृश आकाशमेव च ।
वास्तुपुरुष चक्र — [मण्डल-देवता: चरकी, विदारी, पूतना, पापराक्षसी, ईश, पर्जन्य, जय, इन्द्र, सूर्य, सत्य, भृश, आकाश, अग्नि, पूषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गन्धर्व, भृङ्ग, मृग, पितृ, नन्दि, सुग्रीव, पुष्पदन्त, वरुण, असुर, शेष, दौवारिक, रोग, नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर, सोम, दिति, अदिति, आप, आपवत्स, सविता, सावित्र, विवस्वत, मित्र, रुद्र, रुद्रदास, पृथ्वीधर, ब्रह्मा]
वास्तुपुरुष के मस्तक पर ईशदेव, दाहिने कान पर पर्जन्यदेव, दाहिने स्कंध पर जयदेव
और दाहिनी भुजा पर इन्द्र आदि पांच—इन्द्र, सूर्य, सत्य भृश और आकाश देव
स्थित हैं ॥१०३॥
वह्निर्जानुनि पुषाद्याः सप्त पादनलीस्थिताः ॥१०४॥
*विशेष जानने के लिये देखें राजवल्लभ मंडन अध्याय २.
१. 'महेन्द्रः सूर्यः सत्यश्च ।'

ऽष्टमोऽध्यायः १६५
पुपाथ वितथश्चैव गृहक्षतो यमस्तथा । '
गन्धर्वो भृङ्गराजश्च मृगः सप्त सुरा इति ॥१०५॥
अग्निकोण मे जानुके ऊपर अग्नि देव और दाहिने पैर की नलीके ऊपर पुषा आदि
सात देव—पुषा, वितथ, गृहक्षत, यम, गान्धर्व, भृगराज और मृग, ये सात देव
स्थित है ॥१०४-१०५॥
पादयोः पितरस्तस्मात् सप्त पादनलीस्थिताः ।
दौवारिकोऽथ सुग्रीवः पुष्पदन्तो जलाधिपः ॥१०६॥
'असुरशोषयक्ष्माश्च रोगो जानुनि संस्थितः ।
नागो मुख्यश्च भल्लाटः सोमो गिरिश्च बाहुगाः ॥१०७॥
दोनो पैरके ऊपर पितृदेव, बाये पैरकी नली पर दौवारिक, सुग्रीव, पुष्पदत, जलाधिप
(वरुण), असुर, शोष, और पापयक्ष्मा ये सात देव स्थित है। नाग, मुख्य, भल्लाट, कुबेर और
गिरि (शैल), ये पाच देव बाबी भुजा पर स्थित है ॥१०६-१०७॥
अदितिः स्कन्धदेशे च वामे कर्णे दिति. स्थितः ।
द्वात्रिंशद्वाह्यगा देवा नाभिष्पृष्ठे स्थितो विधिः ॥१०८॥
बाये स्कंध पर अदिति देव और बाये कान पर दितिदेव स्थित है। इस प्रकार बत्तीस
देव वास्तुपुरुष के बाह्य अंगों पर है। मध्य नाभि के पृष्ठ भाग मे ब्रह्मा स्थित है ॥१०८॥
अर्यमा दक्षिणे वामे स्तने तु पृथिवीधरः ।
विवस्वानऽथ , मित्रश्च दक्षवामोरुगावुभौ ॥१०६॥
दाहिने स्तन पर अर्यमा और बाये स्तन पर पृथ्वीधर देव स्थित है। दाहनी ऊरु पर
विवस्वान् और बायी ऊरु पर मित्रदेव स्थित है ॥१०६॥
आपस्तु गलके वास्तो-रापवत्सो हृदि स्थितः ।
२सावित्री सविता तद्वत् करं दक्षिणमाश्रितौ ॥११०॥
वास्तुपुरुष के गले पर आपदेव, हृदय के ऊपर आपवत्स देव स्थित है। दाहिने हाथ पर
सावित्री और सविता ये दो देविया स्थित है ॥११०॥
इन्द्र इन्द्रजयो मेढ़े रुद्रोऽसौ वामहस्तके ।
रुद्रदासोऽपि तत्रैव इति देवमयं वपुः ॥१११॥
१. 'शेष ।' २. 'सावित्र' ।

१६६ प्रासादमण्डने
मेढ्र (लिंग) स्थान पर इन्द्र और इन्द्रजय देव स्थित है। बायें हाथ पर रुद्र और
रुद्रदास देव स्थित है ! इस प्रकार कुल पैंतालीस देवमय वास्तुपुरुष का शरीर है ॥१११॥
वास्तुमंडल के कोने की आठ देवियां—
ऐशान्ये चरकी बाह्ये पीलीपीच्छा च पूर्वदिक् ।
विदारिकाग्निकोणे च जम्भा याम्यदिशाश्रिता ॥११२॥
नैर्ऋत्ये पूतना स्कन्दा पश्चिमे वायुकोणके ।
पापराक्षसिका सौम्येऽर्यमैवं सर्वतोऽर्चयेत् ॥११३॥
वास्तुमंडल के बाहर ईशानकोने में उत्तर दिशा में चरकी और पूर्व में पोलीपीच्छा,
अग्निकोने मे पूर्व में विदारिका और दक्षिण में जम्भा देवी, नैर्ऋत्यकोने मे दक्षिण मे पूतना
और पश्चिम मे स्कन्दा, वायुकोने में पश्चिम मे पापराक्षसिका और उत्तर में अर्यमा देवी का
न्यास करके पूजन करे ॥११२-१३॥
देवीः क्रूरान् यमादींश्च माषान्नैः सुरयामिषैः ।
अपरान् घृतपक्वान्नैः सर्वान् स्वर्णसुगन्धिभिः ॥११४॥
इति वास्तुपुरुषविन्यासः ।
देवियो को और यम आदि क्रूर देवो को माषान्न, सुरा और आमिष से और बाकी के
सब देवो को घृत, पक्वान, सुवर्ण और सुगंधित पदार्थों से पूजना चाहिये ॥११४॥
शास्त्रप्रशंसा—
एकेन शास्त्रेण गुणाधिकेन,
विना द्वितीयेन पदार्थसिद्धिः ।
तस्मात् प्रकारान्तरतो विलोक्य,
मणिर्गुणाढ्योऽपि सहायकाङ्क्षी ॥११५॥
इस ग्रन्थ के कर्त्ता श्रीमण्डनसूत्रधार का कहना है कि—शिल्पशास्त्र अनेक है। उनमें
यह एक ही शास्त्र अधिक गुणवाला होने पर भी दूसरे शिल्पशास्त्र देखे बिना पदार्थ की सिद्धि
नही होती, इसलिये प्रकारान्तर से दूसरे शिल्पग्रन्थ भी देखने चाहिये। जैसे—अकेला मणि
अधिक गुणवाला होने पर भी इतनी शोभा नही देता जितनी सुवर्णादि अन्य पदार्थों के साथ
मिलाने से देता है। इसी प्रकार शिल्प के अनेक शास्त्र देखने से शिल्पी शिल्पशास्त्र का विद्वान्
होता है ॥११५॥

ऽष्टमोऽध्यायः १६७
अन्तिममंगल—
श्रीविश्वकर्मगणनाथमहेशचण्डी-
श्रीविश्वरूपजगदीश्वरसुप्रसादात् ।
प्रासादमण्डनमिदं रुचिरं चकार,
श्रीमण्डनो गुणवतां भुवि सूत्रधारः ॥११६॥
इति श्रीसूत्रधारमण्डनविरचिते वास्तुशास्त्रे प्रासादमण्डने
अष्टमोऽध्यायः समाप्तः । सम्पूर्णोऽयं ग्रन्थः ।
श्री विश्वकर्मा, गणपति, महेश, चण्डीदेवी और विश्वस्वरूप श्री जगदीश्वर की कृपा से
जगत के विद्वानो मे सुप्रसिद्ध मंडन नाम का सूत्रधार है। उसने प्रासाद निर्माण विधि का यह
प्रासादमंडन नाम का शास्त्र आनंद पूर्वक बनाया ॥११६॥
इति श्री पंडित भगवानदास जैन ने इस प्रासादमंडन के आठवे
अध्याय को सुबोधिनी नामकी भाषाटीका समाप्त की।
❀ श्रीरस्तु ❀

परिशिष्ट नं.-१
केसरी आदि २५ प्रासाद ।
( अपराजितपृच्छा सूत्र १५६ )
विश्वकर्मोवाच—
सान्धारांश्च ततो वक्ष्ये प्रासादान् पर्वतोपमान् ।
शिखरैर्विविधाकारै-नैकाएडैश्च¹ विभूषितान् ॥१॥
पर्वत के जैसे शोभायमान, अनेक प्रकार के शिखरवाले और अनेक शृंगों से विभूषित,
ऐसे सान्धार जातिके प्रसादो को कहता हूं। ऐसा विश्वकर्मा कहता है ॥१॥
आद्यः पञ्चाएडको ज्ञेयः केसरी नाम नामतः ।
²तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥२॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगो वाला है। पीछे प्रत्येक प्रासाद के ऊपर चार २
शृंग बढाने से पच्चीसवें अंतिम मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक शृंग होजाता हैं ॥२॥
पच्चीस प्रासादों का नाम—
केशरी सर्वतोभद्रो नन्दनो नन्दशालिकः ।
नन्दीशो मन्दरश्चैव श्रीवत्सश्चामृतोद्भवः ॥३॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥४॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभस्तथा ॥५॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
संयोगेन च सान्धारान् कथयामि यथार्थतः ॥६॥
१. 'रएडकैर्नैकभूषितान्।' २. 'तावन्तश्चतुरो वृद्धिः।'

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १६६
केसरी, सर्वतोभद्र, नन्दन, नन्दशालिक, नन्दीश, मंदर, श्रीवत्स, अमृतोद्भव, हिमवान्,
हेमकूट, कैलाश, पृथिवीजय, इन्द्रनील, महानील, भूधर, रत्नकूटक, वैडूर्य, पद्मराग, वज्रक,
मुकुटोज्ज्वल, ऐरावत, राजहंस, गरुड, वृषभ और मेरु ये पचीस प्रासाद सांधारजाति के हैं ।
उसका अनुक्रमसे यथार्थ वर्णन किया जाता है ॥३ से ६॥
'दशहस्तादधस्तान्न प्रासादो भ्रमसंयुक्तः ।
षट्त्रिंशन्तं निरन्धारा धाव्ये वेदादिहस्ततः ॥७॥
यदि प्रासाद का मान दस हाथ से न्यून न हो तो, वह प्रासाद भ्रम (परिक्रमा) वाला
बना सकते है। एवं चार हाथ से छत्तीस हाथ तक के मान का प्रासाद बिना भ्रमका भी बना
सकते है ॥७॥
पञ्चविंशतिः २सान्धाराः प्रयुक्ता वास्तुवेदिभिः ।
भ्रमहीनास्तु ये कार्याः शुद्धच्छन्देषु नागराः ॥८॥
वास्तुशास्त्र के विद्वानो ने ये सान्धार (परिक्रमा वाले) पचीस प्रासाद शुद्ध नागर जाति
के कहे है, वे भ्रम रहित भी बना सकते है ॥८॥
१-केसरीप्रासाद—
चतुरसीकृते क्षेत्रे अष्टाष्टकविभाजिते ।
भागभागं भ्रमभित्ति-द्विभागो देवालयः ॥६॥
सान्धार जाति के प्रासाद की समचोरस भूमि के आठ २ भाग करे, उनमें से एक भाग
की भ्रमणी, एक २ भाग की दो दीवार और दो भागका गभारा बनाना चाहिये ॥६॥
निरन्धारे पदा भित्ति-रर्धे गर्भं प्रकल्पयेत् ।
मध्यच्छन्दश्च वेदास्त्रो बाह्ये कुम्भायतं शृणु ॥१०॥
यदि प्रासाद निरंधार बनाना हो तो प्रासाद के मान के चौथे भागकी दीवार और आधे
मानका गभारा बनाना चाहिये । जैसे-आठ हाथ के मानका प्रासाद है, तो उसका चौथा भाग
दो २ हाथ की दीवार और चार हाथ का गभारा बनावे । मध्य में गभारा समचोरस रक्खे ।
अब गभारा

१७० प्रासादमण्डने
क्षेत्रार्धे च भवेद् भद्रं भद्रार्धं कर्णविस्तरः ।
कर्णस्यार्धप्रमाणेन कर्त्तव्यो भद्रनिर्गमः ॥१२१॥
प्रासाद की भूमिके नाप से आधा भद्रका विस्तार रक्खें। इससे
आधे मानका कोणा का विस्तार रक्खें। कोणे के आधे मान का
भद्रका निर्गम रक्खें ॥१२१॥
चतुष्कर्णेषु ख्यातानि श्रीवत्सशिखराणि च ।
रथिकोद्गमे च पञ्चैव केशरी गिरिजाप्रियः ॥१२२॥
इति केसरीप्रासादः ॥१॥
प्रासाद के चारों कोणे के ऊपर एक २ श्रीवत्स शृंग चढावें, तथा
भद्रके ऊपर रथिका और उद्गम बनावें। इस प्रकार का केसरी नामका
प्रासाद पार्वती देवी को प्रिय है ॥१२२॥
शृंग संख्या-चार कोणे ४ और एक शिखर एवं कुल ५ शृंग।
२-सर्वतोभद्रप्रासाद—
क्षेत्रे विभक्ते दशधा गर्भः षोडशकोष्ठकैः ।
भित्तिं भ्रमं च भित्तिं च भागभागं प्रकल्पयेत् ॥१२३॥
प्रासाद की समचोर भूमिका दस २ भाग करें। उनमें से मध्य
गभारा कुल सोलह भाग का रक्खें। बाकी एक भाग की दीवार, एक
भाग की भ्रमणी और एक भागकी दूसरी बाहर की दीवार रक्खें ॥१२३॥
द्विभागः कर्ण इत्युक्तो भद्रं षड्भागिकं तथा ।
निर्गमं चैकभागेन भागिका पार्श्वचोभयोः ॥१२४॥
दो २ भाग का कोणा और छभागका भद्र का विस्तार रक्खें। भद्र का निर्गम एक
भाग रक्खे और भद्र के दोनों तरफ एक २ भाग की एक २ कोणी बनावें ॥१२४॥
कर्णिका चार्धभागेन भागार्धं भद्रनिर्गमम् ।
भागत्रयं च विस्तारे मुखभद्रं विधीयते ॥१२५॥
भद्र के दोनों तरफ आधे २ भाग की एक २ कर्णिका भी बनाना—इस का और
कोणीया का निर्गम आधा भाग और भद्र का निर्गम आधा भाग, इस प्रकार कुल एक भाग
भद्र का निर्गम जानें। भद्रका विस्तार छ भाग रखना ऊपर लिखा है, उनमे से दो कोणी और


चित्र-संलग्न पाठ (चित्र शीर्षक एवं विवरण):

  • ऊर्ध्व पाठ (चित्र के पार्श्व में): 〔उत्तार्द्धे, केसरी प्रासाद ११, समराङ्गण, पृ. ३६५, रेखा ५〕
  • तलच्छन्द (Ground Plan) पाठ: केसरीप्रासादप्रस्तारः (अन्तर्गत: भित्ति, गर्भ)

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७१
दो कर्णिका का तीन भाग छोड़ करके बाकी तीन भाग रहे, उतना मुखभद्र का विस्तार
रखे ॥१५॥
भद्रे वै तूद्गमाः पञ्च कर्णेऽष्टशृङ्गकानि च ।
श्रीवत्सशिखरं कार्यं घटाकलशसंयुतम् ॥१६॥
इति सर्वतोभद्रप्रासादः ॥२॥
भद्रके ऊपर पांच २ उद्गम करे। कोणे के ऊपर दो २
एव कुल आठ शृंग चढावे आमलसार और कलश वाला
श्रीवत्स शिखर बनावे ॥१६॥
शृंगसंख्या—प्रत्येक कोण पर २-२ और एक शिखर
एवं कुल ९ शृंग ।
३-नन्दनप्रासाद—
श्रीवत्सं भद्रमारूढं रथिकोद्गमभूषिते ।
नन्दने नन्दति स्वामी दुरितं हरति ध्रुवम् ॥१७॥
इति नन्दनप्रासाद. ।.३॥
यह नन्दन प्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र
प्रासाद के अनुसार जाने । फर्क इतना कि—भद्र के गवाक्ष और
उद्गम के ऊपर एक २ उरुशृंग चढ़ावे । इसको बनानेवाला
स्वामी आनन्द मे रहता है और सब पापो का नाश
करता है ॥१७॥
शृंगसंख्या—चार कोणे ८, चार भद्रे ४ और एक
शिखर, एव कुल १३ शृंग ।
४-नन्दिशालप्रासाद—
तस्यैवं भद्रोर्ध्वे शृङ्गं भद्रं तस्यानुरूपतः ।
नन्दिशाली गुणैर्युक्तः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥१८॥
इति नन्दिशालप्रासादः ॥४॥
इस नन्दिशालप्रासाद का तलमान और स्वरूप नन्दन प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष
इतना कि—भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चडावे तो यह नन्दिशाल प्रासाद सब गुणो से
युक्त अच्छे लक्षणवाला सुन्दर बनता है ॥१८॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, भद्रे ८ और एक शिखर, एवं कुल १७ शृंग ।

१७२ प्रासादमण्डने
५-नन्दीशप्रासाद—
त्रिभागं च भवेद् भद्रं भद्रार्थं प्ररथस्तथा ।
कर्णे शृङ्गद्वयं भद्रे एकैकं प्ररथे तथा ॥१९॥
इति नन्दीशप्रासादः ॥५॥
यह नन्दीशप्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष
यह है कि—छः भाग का भद्र है, उसके बदले तीन भाग का भद्र और डेढ़ २ भाग का प्रतिरथ
बनावें। कोणे के ऊपर दो २, भद्र के ऊपर एक २ और प्रतिरथ के ऊपर एक २ शृंग
चढ़ावे ॥१९॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८, भद्रे ४ और एक शिखर, एवं कुल २१ शृंग ।
६-मंदरप्रासाद—
द्वादशांशस्तु विस्तारो मूलगर्भस्तदर्धतः ।
भागभागं तु कर्त्तव्या द्वे भित्ती चान्धकारिका ॥२०॥
कर्णप्ररथभद्रार्धं कारयेद् द्विद्विभागतः ।
प्ररथः समनिष्कासो भद्रं भागेन निर्गमम् ॥२१॥
कर्णे द्वे भद्रके द्वे च चैकं प्रतिरथे तथा ।
सघण्टा कलशा रेखा रथिकोद्गमभूषिताः ॥२२॥
इति मन्दरप्रासादः ॥६॥
प्रासाद की समचोरस भूमिका बारह भाग करें। उनमें से छः
भाग का गभारा बनावें, तथा एक २ भाग की दोनों दीवार और एक २
भाग की भ्रमणी (परिक्रमा) बनावें। गभारे के बाहर के भाग में
कोणा, प्ररथ और भद्रार्ध ये सब दो २ भाग का रक्खें । उसका निर्गम
समदल रक्खें और भद्रका निर्गम एक भाग रक्खें। कोणे के ऊपर
दो २ शृंग, भद्रके ऊपर दो २ उरशृंग और प्रतिरथ के ऊपर एक २
शृंग चढ़ावें । आमलसार, कलश, रेखा, गवाक्ष और उद्गम, ये सब
शोभायमान बनावें ॥२० से २२॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्ररथे ८ भद्रे ८ और एक शिखर, एव
कुल २५ शृंग ।

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १३६
७-श्रीवृक्षप्रासाद—
चतुर्दशांशविस्तारे गर्भगृहाष्टांशविस्तरः ।
भागभागं भ्रमो भित्ति-स्तारनिर्गमनेस्तु भागिकः ॥२३॥
कर्णे शृङ्गद्वयं कुर्या-च्छिखरं चाष्टभिर्भगम् ।
प्रत्यः कर्णमानेन तिलकं शृङ्गकेशरी ॥२४॥
नन्दिकायां च तिलकं भद्रे शृङ्गद्वयं भवेत् ।
श्रीवृक्षस्तु समाख्यातः कर्त्तव्यस्तु श्रियः पतेः ॥२५॥
इति श्रीवृक्षप्रासादः ॥७॥
प्रासाद को समचोरस भूमिहा चौदह भाग करें। उनमें से
आठ भागका गभारा, एक भागकी दीवार, एक भागकी भ्रमन्ती
और एक भागकी बाहर की दीवार, इस प्रकार भीतर १४ भाग
होता है। बाहर का मान नंदर प्रासाद के अनुसार होता है।
विशेष इतना कि—दो भाग का कोणा, २ भाग का प्रतिरथ, एक
भागकी नंदी, और दो भाग का भद्रारि रखो। कोने के ऊपर
दो शृंग, प्रतिरथ के ऊपर एक शृंग और एक तिलक बांधे।
शिखर का विस्तार आठ भाग का रखो। नंदीके ऊपर एक
तिलक रक्खे। भद्रके ऊपर तीन २ उरुशृंग बांधे। ऐसा
श्रीवृक्षप्रासाद का स्वरूप है, यह विष्णु के लिए बांधे
॥२३ से २५॥
शृंगसंख्या—कोणे ८, प्रतिरथे ८, भद्रे १२, एक शिखर,
एवं कुल २९ शृंग। तिलक संख्या-प्रतिरथे ८ और नंदीपर ८ एवं कुल १६ तिलक।
८-अमृतोद्भवप्रासाद—
कर्णे शृङ्गत्रयं कुर्यात् प्रत्यः पूर्ववत्स्थितः ।
अमृतोद्भवनामोऽसौ प्रासादः सुरपूजितः ॥२६॥
इति अमृतोद्भवप्रासादः ॥८॥
यह प्रासाद का तजमान और रचना श्रीवृक्षप्रासाद के अनुसार जानना। फर्क इतना
कि—कोण के ऊपर तीन शृङ्ग चढ़ावे, बाकी प्रतिरथ आदिक का रचना पूर्वोक्त प्रकार ही करा
जाने । ऐसा अमृतोद्भवप्रासाद देवों से पूजित है ॥२६॥