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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 211

१६२ प्रासादमण्डने
प्रासादो वीतरागस्य पुरमध्ये सुखावहः ।
नृणां कल्याणकारी स्याच्चतुर्दिक्षु प्रकल्पयेत् ॥६२॥
इति जिनप्रतिष्ठा ।
वीतरागदेव का प्रासाद नगर मे हो तो सुखकारक है, तथा मनुष्यों का कल्याण करने
वाला है। इसलिये चारों दिशा मे ये बनाने चाहियें ॥६२॥
जलाशय प्रतिष्ठा—
माघादिपञ्चमासेषु वापीकूपादिसंस्कृतम् ।
तडागस्य चतुर्मास्यां कुर्यादाषाढमार्गयोः ॥६३॥
असंस्कृतं जलं देवाः पितरो न पिवन्ति तत् ।
संस्कृते तृप्तिमायाति तस्मात् संस्कारमाचरेत् ॥६४॥
वावड़ी और कूंआं आदिकी प्रतिष्ठा मीन संक्राति का मास छोड़कर माघ आदि पांच
मास में करे। तालाब की प्रतिष्ठा चौमासे के चार मास आषाढ और मार्गशीर्ष, ये छह मास में
करे। जलाश्रयो के जल का संस्कार न किया जाय तो उसका जल पितृदेव पीते नही है।
संस्कार किये जल से ही पितृदेव तृप्त होते हैं। इसलिये जल का संस्कार अवश्य करना
चाहिये ॥६३-६४॥
जलाशय बनवाने का पुण्य—
जीवनं वृत्तजन्तूनां करोति यो जलाशयम् ।
दत्ते वा स लभेत्सौख्य-मुख्यां स्वर्गे च मानवः ॥६५॥
जल, वृक्ष और सब जीवों का जीवन है। इसलिये जो मनुष्य जलाशय बनवाता है, वह
मनुष्य जगत मे धनधान्य से पूर्ण ऐहिक सुखों को, तथा स्वर्ग के सुखों को प्राप्त करता है और
मोक्ष पाता है ॥६५॥
वास्तुपुरुषोत्पत्ति—
पुरान्धकवधे रुद्र-ललाटात् पतितः क्षितौ ।
स्वेदस्तस्मात् समुद्भूतं भूतमत्यन्तं दुस्सहम् ॥६६॥
गृहीत्वा सहसा देवै-न्र्यस्तं भूमावधोमुखम् ।
जानुनी कोणयोः पादौ रक्षोदिशि शिवे शिरः ॥६७॥