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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 220

परिशिष्टे केसरीप्रासादः १७१
दो कर्णिका का तीन भाग छोड़ करके बाकी तीन भाग रहे, उतना मुखभद्र का विस्तार
रखे ॥१५॥
भद्रे वै तूद्गमाः पञ्च कर्णेऽष्टशृङ्गकानि च ।
श्रीवत्सशिखरं कार्यं घटाकलशसंयुतम् ॥१६॥
इति सर्वतोभद्रप्रासादः ॥२॥
भद्रके ऊपर पांच २ उद्गम करे। कोणे के ऊपर दो २
एव कुल आठ शृंग चढावे आमलसार और कलश वाला
श्रीवत्स शिखर बनावे ॥१६॥
शृंगसंख्या—प्रत्येक कोण पर २-२ और एक शिखर
एवं कुल ९ शृंग ।
३-नन्दनप्रासाद—
श्रीवत्सं भद्रमारूढं रथिकोद्गमभूषिते ।
नन्दने नन्दति स्वामी दुरितं हरति ध्रुवम् ॥१७॥
इति नन्दनप्रासाद. ।.३॥
यह नन्दन प्रासाद का मान और स्वरूप सर्वतोभद्र
प्रासाद के अनुसार जाने । फर्क इतना कि—भद्र के गवाक्ष और
उद्गम के ऊपर एक २ उरुशृंग चढ़ावे । इसको बनानेवाला
स्वामी आनन्द मे रहता है और सब पापो का नाश
करता है ॥१७॥
शृंगसंख्या—चार कोणे ८, चार भद्रे ४ और एक
शिखर, एव कुल १३ शृंग ।
४-नन्दिशालप्रासाद—
तस्यैवं भद्रोर्ध्वे शृङ्गं भद्रं तस्यानुरूपतः ।
नन्दिशाली गुणैर्युक्तः स्वरूपो लक्षणान्वितः ॥१८॥
इति नन्दिशालप्रासादः ॥४॥
इस नन्दिशालप्रासाद का तलमान और स्वरूप नन्दन प्रासाद के अनुसार जाने । विशेष
इतना कि—भद्र के ऊपर एक २ उरुशृंग अधिक चडावे तो यह नन्दिशाल प्रासाद सब गुणो से
युक्त अच्छे लक्षणवाला सुन्दर बनता है ॥१८॥
शृंगसंख्या-कोणे ८, भद्रे ८ और एक शिखर, एवं कुल १७ शृंग ।