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सर्वकोश
प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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परिशिष्ट नं.-१
केसरी आदि २५ प्रासाद ।
( अपराजितपृच्छा सूत्र १५६ )
विश्वकर्मोवाच—
सान्धारांश्च ततो वक्ष्ये प्रासादान् पर्वतोपमान् ।
शिखरैर्विविधाकारै-नैकाएडैश्च¹ विभूषितान् ॥१॥
पर्वत के जैसे शोभायमान, अनेक प्रकार के शिखरवाले और अनेक शृंगों से विभूषित,
ऐसे सान्धार जातिके प्रसादो को कहता हूं। ऐसा विश्वकर्मा कहता है ॥१॥
आद्यः पञ्चाएडको ज्ञेयः केसरी नाम नामतः ।
²तावदन्तं चतुर्वृद्धि-र्यावदेकोत्तरं शतम् ॥२॥
प्रथम केसरी नामका प्रासाद पांच शृंगो वाला है। पीछे प्रत्येक प्रासाद के ऊपर चार २
शृंग बढाने से पच्चीसवें अंतिम मेरु प्रासाद के ऊपर एक सौ एक शृंग होजाता हैं ॥२॥
पच्चीस प्रासादों का नाम—
केशरी सर्वतोभद्रो नन्दनो नन्दशालिकः ।
नन्दीशो मन्दरश्चैव श्रीवत्सश्चामृतोद्भवः ॥३॥
हिमवान् हेमकूटश्च कैलासः पृथिवीजयः ।
इन्द्रनीलो महानीलो भूधरो रत्नकूटकः ॥४॥
वैडूर्यः पद्मरागश्च वज्रको मुकुटोज्ज्वलः ।
ऐरावतो राजहंसो गरुडो वृषभस्तथा ॥५॥
मेरुः प्रासादराजः स्याद् देवानामालयो हि सः ।
संयोगेन च सान्धारान् कथयामि यथार्थतः ॥६॥
१. 'रएडकैर्नैकभूषितान्।' २. 'तावन्तश्चतुरो वृद्धिः।'