प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)
Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary
मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऽष्टमोऽध्यायः १६१
सर्वेषां धनमाधारः प्राणीनां जीवनं परम् ।
वित्ते दत्ते प्रतुष्यन्ति मनुष्याः पितरः सुराः ॥८७ ॥८७॥
इति प्रतिष्ठाविधिः ।
प्रतिष्ठाका कार्य समाप्त होने के बाद वस्त्र और सुवर्ण आदि धन से आचार्य की पूजा
करें। पीछे ब्राह्मणों को तथा दीन, अंध और दुर्बल मनुष्यों को दान देवे । क्योकि सब प्राणियों
का आधार धन है, और यही प्राणियो का श्रेष्ठ जीवन है। धन का दान देने से मनुष्य, पितृदेव
और अन्य देव संतुष्ट होते हे ॥८६-८७॥
जिनदेव प्रतिष्ठा—
प्रतिष्ठा वीतरागस्य जिनशासनमार्गतः ।
नवकारैः सूरिमंत्रैश्च सिद्धकेवलिभाषितैः ॥८८॥
वीतराग देव की प्रतिष्ठा जैन शासन मे बतलाई हुई विधि के अनुसार, सिद्ध हुए केवल-
ज्ञानियो ने कहे हुए नवकारमंत्र और सूरिमंत्रो के उच्चारण पूर्वक करनी चाहिये ॥८८॥
ग्रहाः सर्वज्ञदेवस्य पादपीठे प्रतिष्ठिताः ।
येनानन्तविभेदेन मुक्तिमार्ग उदाहृताः ॥८६॥
जिनानां मातरो यक्षा यक्षिण्यो गौतमादयः ।
सिद्धाः कालत्रये जाताश्चतुर्विंशतिमूर्त्तयः ॥६०॥
सर्वज्ञदेव के पादपीठ ( पवासन ) मे नवग्रह स्थापित करे । ये जिनदेव अनन्त भेदो से
मुक्ति मार्ग के अनुगामी कहे गये है । जिनदेव की माता, यक्ष, यक्षिणी और गौतम आदि
गणधर आदि की मूर्त्तिया, तथा तीन काल मे सिद्ध होनेवाले चौवीस २ जिनदेव की
मूर्त्तियां है ॥८६-६०॥
इति स्थाप्या जिनावासे त्रिप्राकारं गृहं तथा ।
सांवर्णं शिखरं १मन्दा-रकं त्वष्टापदादिकम् ॥६१॥
वे मूर्त्तिया जिनालय मे स्थापित करे । जिनालय समवसरण वाला, सवरणा वाला,
शिखर वाला, गुम्बद वाला और अष्टापद वाला बनाया जाता है ॥६१॥
१. 'मन्दोश्वर ।'
श० २१