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प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

प्रासाद मण्डन (मण्डन सूत्रधार - मन्दिर निर्माण, शिखर, मण्डप एवं वास्तु लक्षण सटीक)

Prasada Mandanam of Sutradhara Mandana with Commentary

मण्डन सूत्रधार (महाराणा कुम्भा के प्रधान वास्तुकार) द्वारा

DevanagariHindipublished278 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

१६० प्रासादमण्डने
प्रतिष्ठा के दिन रात्रि में देवालय बंध होने के बाद प्रातःकाल खोलने के समय देवका
प्रथम दर्शन ब्राह्मण कुमारी करें, बाद में अन्य सब लोग दर्शन करे ॥८१॥
सूत्रधार पूजन—
१इत्येवं विविधं कुर्यात् सूत्रधारस्य पूजनम् ।
भूवित्तवस्त्रालङ्कारै-गौमहिष्यश्च वाहनैः ॥८२॥
अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्त्तव्या कर्मकारिणाम् ।
स्वाधिकारानुसारेण वस्त्रैस्ताम्बूलभोजनैः ॥८३॥
अच्छी तरह विधि पूर्वक देव के प्रतिष्ठित होने के बाद भूमि, धन, वस्त्र और अलंकारों
से तथा गाय, भैंस और घोड़ा आदि वाहनों से सूत्रधार की सम्मान पूर्वक पूजा करें । एवं
काम करने वाले अन्य शिल्पियों की भी उनके योग्यतानुसार वस्त्र, तांबूल और भोजन आदि से
सम्मान पूर्वक पूजा करें ॥८२-८३॥
देवालयय निर्माण का फल—
काष्ठपाषाणनिर्माण-कारिणो यत्र मन्दिरे ।
भुंक्तेऽसौ च तत्र सौख्यं शङ्करत्रिदशैः सह ॥८४॥
काष्ठ अथवा पाषाण आदिका प्रासाद जो बनवाता है. वह देवलोक में महादेव तथा
अन्य देवों के साथ सुखको भोगता है ॥८४॥
सूत्रधार का आशीर्वाद—
पुण्यं प्रासादजं स्वामी प्रार्थयेत् सूत्रधारतः ।
सूत्रधारो वदेत् स्वामिन् ! अक्षयं भवतात् तव ॥८५॥
इति सूत्रधारपूजा ।
देवालय बनवाने वाला स्वामी सूत्रधार से प्रासाद बंधवाने के पुण्य की प्रार्थना करें,
तब सूत्रधार आशीर्वाद देवे कि—'हे स्वामिन् देवालय बंधवाने का तुम्हारा पुण्य
अक्षय हो' ॥८५॥
आचार्य पूजन—
आचार्य पूजनं कृत्वा वस्त्रस्वर्णधनैः सह ।
दानं दद्याद् द्विजातिभ्यो दीनान्धदुर्बलेषु च ॥८६॥
१. 'इत्यनन्तरतः' ।