फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
३७८ फलदीपिका
होगा। क्योंकि सातवें का स्वामी लाभ में बैठा और लाभ का स्वामी
सातवें में बैठा। इस प्रकार एक दूसरे की राशि में बैठने से सातवें
और ग्यारहवें के मालिक का परस्पर स्थान परिवर्तन हुआ ।
५. कन्या लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र चौथे हों तो
बृहस्पति और शुक्र की दशा में योग होता है।
६. यदि कन्या लग्न हो, लाभ में शनि हों तो शनि की दशा
योग (अर्थात् शुभ फल) देने वाली होती है।
तुला लग्न विचार
अब तुला लग्न के योग दिये जाते हैं :—
१. तुला लग्न वाले जातक को शनि योग कारक होता है।
२. तुला लग्न होने पर बृहस्पति तीसरे और छठे घर का मालिक
होने पर भी योग उत्पन्न करता है।
३. मंगल दूसरे, सातवें घर का मालिक हुआ, इसलिए मंगल पापी
हुआ परन्तु मारता नहीं है। हमारे विचार से अन्य योगों को देखने
पर ही यह कहा जा सकता है कि मंगल की दशा मारक होगी
अथवा नहीं।
४. तुला लग्न हो और बृहस्पति और शुक्र (१) एक साथ हों
(२) या एक-दूसरे को देखते हों या (३) मंगल और शनि से
दृष्ट हों अथवा (४) मंगल और शनि की राशियों में हों तो
गुरु की दशा में जब शुक्र की अन्तर्दशा होगी अथवा शुक्र की महादशा
में जब बृहस्पति की अन्तर्दशा होगी तो शीतला, व्रण, स्फोट आदि का
रोग होवेगा ।
५. तुला लग्न हो, सूर्य, बुध, शुक्र लग्न में हों तो जातक धनवान्
और भाग्यवान् होता है । साधारण तौर पर तुला का सूर्य बहुत निकृष्ट
फलदाता समझा जाता है । पृथुयशस् ने अपनी पुस्तक होरा सार
उन्नीसवां अध्याय : दशाफल ३७९
में लिखा है कि यदि तुला राशि के दशवें अंश में सूर्य हो तो सहस्त्र
राज योगों को नष्ट कर देता है। यहां भावार्थ रत्नाकर में यह बताया
है कि यदि शुक्र और बुध का योग सूर्य के साथ लग्न में हो तो
अच्छा योग है।
६. यदि तुला जन्म लग्न हो और बारहवें घर में सूर्य और बुध
हों और उन पर शनि की दृष्टि हो तो जातक का पिता भाग्यवान्
किन्तु मध्यायु होगा।
७. तुला लग्न हो और सूर्य, बुध तथा शनि का मंगल से सम्बन्ध
हो तो जातक बहुत भाग्यशाली हो।
८. तुला लग्न हो और सूय, बुध, शनि का चन्द्रमा से सम्बन्ध हो
तो जातक भाग्यशाली है।
९. तुला लग्न हो बुध, शुक्र, शनि, लग्न में हों और चन्द्रमा और
मंगल सातवें घर में हों तो बुध की दशा में जातक धनवान् होता है।
१०. तुला लग्न वाली कुण्डली, में यदि बृहस्पति अष्टम, शनि
नवम, और मंगल तथा बुध लाभ स्थान में हों तो विशेष राज
योग है।
११. यदि चन्द्रमा लग्न में हो, बृहस्पति छठे या बारहवें हों तो
शनि की दशा में भाग्यवान् होता है।
१२. तुला लग्न हो, लग्न में शुक्र हो तो मारक होता है।
१३. यद्यपि मंगल दूसरे और सातवें का मालिक हुआ लेकिन
मारक नहीं होता।
ऊपर जो नं० ३ तथा ५ के योग बताये गये हैं उसमें नं० ५ के
योग पर हम अपने विचार उस प्रकरण में व्यक्त कर चुके हैं। जहाँ
तक लग्नेश शुक्र के मारक होने का प्रश्न है पाराशरी में लिखा हुआ
है लग्नाधीश भी मारक हो जाता है। साधारण तौर पर शुक्र को
अष्टमेश का दोष नहीं होना चाहिए क्योंकि वह लग्न का स्वामी
भी है परन्तु ज्योतिष के सर्व सिद्धान्त तर्कगम्य नहीं है।
३८० फलदीपिका
१४. यदि शनि लग्न में हो और दशम में चन्द्रमा हो तो राज योग
होता है।
१५. यदि मंगल, बुध, बृहस्पति और शनि तुला में और राहु
दशम में हों तो राहु की दशा में तीर्थ-स्नान आदि शुभ फल
होता है।*
वृश्चिक लग्न
अब वृश्चिक लग्न के कुछ योग दिये जाते हैं :—
१. वृश्चिक लग्न की कुण्डली में बुध और बृहस्पति का योग हो
तो विशेष धन कारक कहा गया है।
२. वृश्चिक लग्न हो, बृहस्पति तृतीय हो तो जातक विशेष
उदार होता है।
३. यदि सूर्य, बुध शुक्र सप्तम में हों तो बुध की महादशा में
राज योग होता है और जातक का बहुत यश विस्तार होता है।
४. यदि बृहस्पति और बुध पाचवें घर में हो (मीन राशि में)
और कन्या राशि का चन्द्रमा लाभ स्थान में हो तो मनुष्य बहुत
धनिक और भाग्यशाली होता है।
५. यदि कर्क राशि के चन्द्र, बृहस्पति केतु नवम में हों तो
केतु दशा साधारण होती है किन्तु बृहस्पति की दशा बहुत योग देने
वाली होती है।
*संस्कृत में 'घट' छपा है। इसका अर्थ हुआ कुंभ में मंगल, बुध,
बृहस्पति तथा शनि हों और राहु दशम में हो तो तीर्थ स्नानादि
शुभ फल होता है। अगर इसे 'घट' न मान कर 'धट' अर्थात् तुला
मानें तो ऊपर जो अर्थ दिया है वह ठीक है।
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८१
धनु लग्न विचार
अब धनु लग्न जातक के कुछ योग दिये जाते हैं :-
१. धनु लग्न हो, पाँचवें घर में शनि हो तो शनि की दशा योग
देने वाली होती है अर्थात् अच्छा फल करती है ।
२. धनु लग्न हो, तुला का शनि लाभ स्थान में हो तो शनि
योग देने वाला होता है, अन्य किसी भी लग्न की कुण्डली में
शनि ११वें योग कारक नहीं होता । हम इस विचार से सहमत
नहीं हैं क्योंकि सारावली अध्याय ६ श्लोक ४ के अनुसार कुछ का
मत है कि एकादश स्थान में बैठे हुये सभी ग्रह शुभ कारक होते हैं
और धन लाभ कराते हैं। कहा भी है 'लाभे सर्वे प्रशस्ताः' अर्थात् लाभ
स्थान में चाहे शुभ ग्रह हो चाहे क्रूर ग्रह हों सभी प्रशस्त हैं अर्थात्
उनको अच्छे बैठे हुये समझना चाहिये । ऐसी स्थिति में भावार्थ
रत्नाकरकार का यह कहना कि केवल तुला राशि का शनि एका-
दश में योग फल देने वाला होता है अन्य राशियों का नहीं थोड़ा
सा प्रचलित विचार के विरुद्ध है ।
३. धनु लग्न हो और सूर्य और शुक्र नवम सिंह के, शनि
कुम्भ राशि का तृतीय हो तो शनि की दशा में धनागम हो और
भाग्य योग हो ।
४. धनु लग्न में हो, मंगल और सूर्य कुम्भ के तृतीय में हो,
राहु नवम स्थान हो तो राहु की दशा में तीर्थ स्नान हो ।
मकर लग्न विचार
अब मकर लग्न वाली कुण्डलियों का विचार देते हैं :-
१. यदि मकर लग्न हो तो बुध योगप्रद होता है, अर्थात् बुध
की दशा, अन्तर्दशा अच्छा फल करेगी ।
३८२ फलदीपिका
२. मकर लग्न हो, लग्न में बृहस्पति हो और उस बृहस्पति
पर शुक्र की दृष्टि हो और बुध आठवें घर में हो तो जातक दीर्घायु
किन्तु निर्धन होता है ।
३. मकर लग्न हो, वृष का शुक्र पंचम हो तो योगप्रद होता
है किन्तु यदि दशम में शुक्र हो तो योगप्रद नहीं होता ।
४. यदि चन्द्रमा पंचम में हो और उस पर बृहस्पति की दृष्टि
हो और बुध, शुक्र लग्न में हों तो यह बहुत प्रबल राज योग है ।
५. बृहस्पति लग्न में हों और मंगल, शुक्र लाभ स्थान में हों
तो बृहस्पति की दशा में भाइयों के द्वारा या भाइयों का धन
प्राप्त हो ।
६. यदि मकर लग्न हो और लग्न में सूर्य, चन्द्र और बुध हों तथा
बारहवें घर में मंगल और शुक्र हों तो भाइयों के कारण भी भाग्य
उदय हो और स्वयं अपने पुरुषार्थ से भी धन उपार्जन करे अथवा
स्वयं जातक का और उसके भाइयों का भाग्योदय हो ।
७. यदि बुध और शनि भाग्य स्थान में हों तो जातक भाग्यवान्
होता है ।
८. यदि राहु और बृहस्पति बारहवें स्थान में हों तो यह उत्तम
योग है । राहु की दशा में भाग्योदय होता है
९. यदि लग्न में मकर का मंगल हो, सातवें घर में कर्क का
चन्द्रमा हो तो उत्तम योग होता है । यह राज योग हैं ।
कुम्भ लग्न विचार
अब कुंभ लग्न की कुंडलियों का विचार दिया जाता है :--
१. यदि कुंभ लग्न हो तो केवल नवमेश, दशमेश अर्थात् मंगल
और शुक्र के सम्बन्ध से कोई योग नहीं होता । अर्थात् केवल मंगल-
शुक्र सम्बन्ध राजयोग कारक नहीं है ।
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८३
२. यदि शुक्र बारहवें घर में हो तो योग देने वाला नहीं
होता ।
३. यदि लग्न में सूर्य और शुक्र हों और दशम में राहु हो, तो
राहु और बृहस्पति की दशा में योग होता है।
४. यदि सूर्य और मंगल अष्टम में हों तो उनकी दशा में दुःख
होगा । बुध की दशा योग देने वाली होती है ।
५-६. यदि वृहस्पति लग्न में हो और शनि दूसरे घर में हो तो
बृहस्पति की दशा में मिश्र फल होगा यानी मिला-जुला फल होगा
यानी कभी अच्छा कभी ख़राब; कुछ अच्छा; कुछ ख़राब । शनि की
दशा योग देने वाली होगी।
७. यदि शनि और शुक्र धनु राशि के लाभ स्थान में हों तो
शुक्र की दशा योग देने वाली होगी ।
८. यदि सूर्य, बुध और बृहस्पति तृतीय में हो तो सूर्य की दशा
शुभ-राज योग कारक होती है ।
मीन लग्न विचार
अब मीन लग्न वाले जातकों का विचार दिया जाता है :--
१. यदि जन्म लग्न मीन या कुंभ हो और शुक्र १२वें घर में हो
तो शुक्र योग देने वाला नहीं होता । यदि कोई अन्य लग्न जन्म कुण्डली
में हो तो बारहवें घर में शुक्र अच्छा फल करता है ।
२. (क)* बारहवें घर में शनि हो तो योग देने वाला होता
है । यदि चन्द्रमा बारहवें घर में हो तो जातक धनहीन होता है ।
नोट-*यहाँ पर यह अर्थ समझना चाहिये कि मीन लग्न वाली कुण्डली
में शनि बारहवें घर में योग देने वाला होता है। बहुत सी जगह यह
पुनरावृत्ति नहीं की गई है । कि "यदि अमुक लग्न हो" किन्तु यह
देखना चाहिये कि किस लग्न के अन्तर्गत यह योग दिया गया है । उसी
लग्न में ऊपर लिखे हुये योग घटाने चाहियें । सब लग्नों में नहीं ।
३८४ फलदीपिका
(ख) ऊपर (क) में जो योग बताया है उसी के सम्बन्ध में
कहते हैं कि बृहस्पति की दशा में जब चन्द्रमा की अन्तर्दशा हो तो
ह्रस्व (थोड़ा) फल होता है ।
३. यदि पाँचवें घर में बृहस्पति हो तो कन्यायें बहुत होती हैं,
पुत्र थोड़े ।
४. यदि दूसरे घर में चन्द्रमा, पाँचवें घर में मंगल हो तो चन्द्रमा
की दशा में धनागम होता है ।
५. यदि बृहस्पति छठे हो, आठवें शुक्र हो, नवम में शनि हो और
लाभ स्थान में चन्द्र, मंगल हो तो उत्कृष्ट भाग्यवान् होता है ।
६. यदि चन्द्रमा मंगल और बुध मकर राशि के लाभ में हों तो
धन प्राप्ति, जायदाद और वाहन (सवारी) का उत्तम योग हैं ।
७. यदि चन्द्रमा और शनि लग्न में हों, मंगल ग्यारहवें हो, छठे
शुक्र हो तो शुक्र दशा में भाग्य उदय होता है ।
८. यदि चन्द्रमा, मंगल व बुध और बृहस्पति चतुर्थ स्थान में
हों तो इन ग्रहों की दशा अन्तर्दशा में बहुत यश प्राप्त करता है, और
भाग्य उदय होता है किन्तु यदि तृतीयेश और अष्टमेश इन चारों ग्रहों
के साथ बैठ जावे तो यह योग भंग हो जाता है ।
९. यदि धनु राशि का बृहस्पति दशम में हो तो निश्चय योग
देने वाला होता है ।
१०. यदि चन्द्रमा वृषभ में, सूर्य सिंह में, बुध कन्या में, शुक्र तुला
में, बृहस्पति धनु में, मंगल मकर में और कुम्भ में शनि हो तो बहुत भाग्य
उदय होता है । ऊपर जो सात ग्रहों की स्थिति बताई गई उनमें सब
ग्रहों की स्थिति जैसी कही गई है वैसी न हो और ५ ग्रहों की
स्थिति भी उपर्युक्त प्रकार की हो तो भी जातक बहुत भाग्यवान्
होता है ।
भावार्थ रत्नाकर (जो फलित ज्योतिष का प्राचीन संस्कृत ग्रन्थ
है) से मेष लग्न के २२, वृष लग्न के जातकों के १४, मिथुन लग्न की
उन्नीसवाँ अध्याय : दशाफल ३८५
कुण्डली के ८, कर्क लग्न के १३, सिंह लग्न के ८, कन्या लग्न वाली जन्म
कुण्डलियों के ६, तुला लग्न वाले जातकों के १५, वृश्चिक लग्न के
५, धनु लग्न वाली कुण्डलियों के ४, मकर लग्न के ९, कुम्भ लग्न वाले
जातकों के ८ और मीन लग्न के १०—इस प्रकार १२२ योग इस विचार
से दिये गये हैं कि पाठकों को फलदीपिका में दिये गये सिद्धान्तों के
अतिरिक्त इन नियमों को भी ध्यान में रखने से, फल निर्णय करने में
सहायता मिलेगी ।
बीसवाँ अध्याय
अन्तर्दशाफल
दशा और अन्तर्दशा का विशेष फल
इस अध्याय में जो भावेश के सबल होने के कारण शुभ फल या
अशुभ फल बताये गये हैं—वह महादशा तथा अन्तर्दशा—दोनों का
विचार करते समय लागू करने चाहिये।
भावेश्वरेण प्रबलेन येन यद्यत्फलं हीनबलेन येन ।
यदानुभोक्तव्यमनन्यसम्यक्संसूचयिष्यत्यथ संग्रहेण ॥१॥
जब किसी भाव का स्वामी प्रवल अर्थात् बलवान् होता है तब
क्या फल होता है और जब वह ही निर्बल अर्थात् बलहीन होता है
तब क्या फल होता है और इनका फल किस समय भोगा जावेगा यह
संक्षेप में बताते हैं ॥ १ ॥
लग्ने बलिष्ठे जगति प्रभुत्वं सुखस्थितिं देहबलं सुवर्चः ।
उपर्युपर्यभ्युदयाभिवृद्धिं प्राप्नोति बालेन्दुवदेष जातः ॥२॥
पाकेऽर्थनाथस्य कुटुम्बसिद्धिं
सत्पुत्रिकाप्तिं सुखभोजनं च
प्राप्नोति वाग्जीविकया धनानि
वक्ता सदुक्तिं सदसि प्रशस्ताम् ॥३॥
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३८७
शौर्ये सवीर्ये सहजानुकूल्यं
सन्तोषवार्ताश्रवणं च शौर्यम् ।
सेनापतित्वं लभतेऽभिमानं
जनाश्रयं सद्गुणभाजनत्वम् ॥४॥
बन्धूपकारं कृषिकर्मसिद्धि स्त्रीसङ्गमं वाहनलाभमेति ।
क्षेत्रं गृहं नूतनमर्थसिद्धि स्थानंप्रशस्तं च सुखेशदाये ॥५॥
पुत्रप्राप्तिं बन्धुविलासं नृपतीनां
साचिव्यं वा धीशदशायां बहुमानम् ।
प्राज्यैर्भोज्यैर्मृष्टमिहाश्नाति ददाति
श्रेयस्कार्यं सज्जनशस्तं स विदध्यात् ॥६॥
रिपून्निहन्ति साहसैररीश्वरस्य वत्सरे ।
अरोगतामुदारतामधृष्यतामतिश्रियम् ॥७॥
सम्पाद्य वस्त्राभरणानि शय्यां
प्रीतो रमण्या रमतेऽतिवीर्यः ।
करोति कल्याणमहोत्सवादीन्
सन्तोषयात्रां च मदेशदाये ॥८॥
ऋणविमोचनमुच्छ्रितिमात्मनः
कलहकृत्यनिवृत्तिमुपैति सः ।
महिषपश्वजभृत्यजनागमं
वयसि रन्ध्रपतेर्बलशालिनः ॥९॥
स्त्रीपुत्रपौत्रैः सहबन्धुवर्गै-
र्भाग्यंश्रियं चानुभवत्यजस्रम् ।
३८८ फलदीपिका
श्रेयांसि कार्याण्यवनीशपूजां
भाग्येशदाये द्विजदेवभक्तिम् ॥१०॥
यत्कार्यमारब्धमुपैत्यनेन
तस्यैव सिद्धिं सुखजीवनं च ।
कीर्ति प्रतिष्ठां कुशलप्रवृत्तिं
मानोन्नतिं कर्मपतेर्दशायाम् ॥११॥
ऐश्वर्यमव्याहतमिष्टबन्धु-
समागमं भृत्यजनांश्च दासान् ।
संसारसौभाग्यमहोदयं च
लभेत लाभाधिपतेर्दशायाम् ॥१२॥
व्ययेशितुर्वयस्यतिव्ययं करोति सज्जने ।
अघौघनाशिनीं शुभक्रियां महीशमान्यताम् ॥१३॥
(i) यदि लग्न बलवान् हो तो लग्नेश की दशा में जातक का
प्रभुत्व जगत् में बढ़ता है, वह सुख पूर्वक रहता है; शरीर बलवान्
रहता है (अर्थात् लग्नेश की दशा के समय रोग आदि नहीं होते)
और चेहरे पर कान्ति रहती है। चेहरे पर कान्ति होना यह प्रकट करता
है कि मन और शरीर दोनों प्रसन्न हैं। जिस प्रकार शुक्ल पक्ष की
द्वितीया का चन्द्रमा प्रतिदिन वृद्धि और अभ्युदय को प्राप्त होता है
उसी प्रकार बलवान् लग्नेश की दशा में जातक की निरन्तर उन्नति
होती रहती है ॥ २ ॥
(ii) यदि द्वितीयेश बलवान् हो तो क्या फल होता है यह बताते
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३८९
हैं। द्वितीयेश की दशा में कुटुम्ब वृद्धि हो; उत्तम बेटियाँ* प्राप्त हों ।
सुख पूर्वक भोजन मिले; वाणी या वाक् शक्ति के कारण धन उपार्जन करे ।
अर्थात् ऐसी आजीविका से धन प्राप्त हो जिसमें जातक की वाक्शक्ति
की प्रधानता हो और जातक जो उत्तम वाणी बोले उसकी सब लोग
सभा में प्रशंसा करें। संक्षेप में यह कि द्वितीय स्थान वाणी, धन
और कुटुम्ब का है अतः इन तीनों बात सम्बन्धी सफलता मिले ॥ ३ ॥
(iii) यदि तृतीय स्थान बलवान् हो तो तृतीयेश की दशा में
भाई-बहिनों से प्रेम रहता है खुश-खबरियाँ सुनने को मिलती हैं, परा-
क्रम की वृद्धि होती है, जातक किसी सेना या समुदाय का नेता होता है,
अन्य लोग उसे सहायता देते हैं । उसमें अनेक गुणों का विकास
होता है तथा जातक के मान सम्मान और अभिमान की वृद्धि होती,
है ॥ ४ ॥
(iv) यदि चतुर्थ स्थान और उसका स्वामी बलवान् हो तो चतुर्थेश
की दशा में जातक बन्धुओं का उपकार करतां है, खेती के काम में सफलता
होती है, स्त्री के साथ सुखपूर्वक सहवास होता है और सवारी का
लाभ भी होता है। खेत, मकान, धन, सिद्धि और प्रशस्त स्थान की
प्राप्ति होती है। अर्थात् उसकी पदवृद्धि हो या नवीन मकान अथवा
ज़मीन की प्राप्ति हो ॥ ५ ॥
(v) यदि पंचमेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में पुत्र
की प्राप्ति हो, बन्धुओं के साथ हँसी-खुशी जीवन व्यतीत हो, राजाओं
*मूल श्लोक में शब्द आया है “सत्पुत्रिकाप्तिम्” किंतु द्वितीय
स्थान से पुत्री का विचार कहीं नहीं लिखा है । कुटुम्ब का विचार
होता है। संभवतः सत्पुत्रिकाप्तिम् की बजाय मूल में “सत्पत्रिकाप्तिं”
उत्तम शुभ चिट्ठियां प्राप्त हों यह पाठ होना चाहिये । आगे श्लोक
१५ में जहाँ द्वितीयेश का विचार किया गया है—“पत्रिका” का विचार
द्वितीय स्थान से किया गया है—पुत्रिका का नहीं ।
३९० फलदीपिका
का मन्त्रित्व प्राप्त हो और जातक को बहुत मान मिले । जातक
उत्तम कार्य करे जिसकी सज्जन लोग प्रशंसा करें । वह नाना प्रकार
के सुस्वादु भोजन ख़ुद करे तथा औरों को खिलावे ॥ ६ ॥
(vi) यदि षष्ठेश बलवान् हो तो उसकी महादशा में जातक अपने
साहस से शत्रुओं का पराजय करे । वह भी निरोगी रहे । उदार
हो और अति शक्तिशाली होता हुआ लक्ष्मी का भोग करे । अर्थात्
उसको कोई दबा न सके और वह ऐश्वर्य भोगे* ॥ ७ ॥
(vii) यदि सप्तमेश बलवान् हो तो जातक नवीन वस्त्र और
आभूषण प्राप्तकर स्त्री के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करे । उसके
शरीर में बल की वृद्धि रहे । उसके घर में विवाह आदि शुभ कार्य
हों और ऐसी यात्रा करे जिससे सन्तोष हो । अर्थात् जिस उद्देश्य
से यात्रा की जाय वह सफल हो । सप्तम स्थान से स्त्री सुख और यात्रा
का विचार किया जाता है । इस कारण बलवान् सप्तमेश की महा-
दशा में सप्तम भाव सम्बन्धी पूर्ण सुख की प्राप्ति होती है ॥ ८ ॥
(viii) यदि अष्टमेश बलवान् हो तो अष्टमेश की दशा में जातक
अपना ऋण चुका दे । जातक की उन्नति हो । यदि जातक का
किसी से कलह रहा हो तो उस कलह का अन्त हो जावे । और
भैंस, पशु, बकरी तथा नौकरों की प्राप्ति अथवा वृद्धि हो** ॥ ९ ॥
*जो केवल लघु पाराशरी पढ़ते हैं वह समझते हैं कि षष्ठेश की
महादशा सदैव ही खराब होती है ऐसा समझना ग़लत है । बलवान्
ग्रह सदैव अपने भाव सम्बन्धी शुभ फल ही दिखाता है ।
**प्रायः अष्टमेश की दशा को घोर कष्टमय और संकटपूर्ण
समझा जाता है किन्तु मन्त्रेश्वर महाराज के विचार से यदि अष्टमेश
बलवान् हो तो उसकी दशा में कष्ट से निवृत्ति और सुख के साधनों की
उपलब्धि होती है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९१
(ix) यदि नवमेश बलवान् हो तो जातक अपनी स्त्री, पुत्र,
पौत्र और भाई बन्धुओं के साथ निरन्तर भाग्य और लक्ष्मी का अनु-
भव करता है अर्थात् अपने कुटुम्बी जनों के साथ ऐश्वर्य भोगता है।
बलवान् भाग्येश की दशा में जातक देवताओं और ब्राह्मणों की भक्ति
करे, राजा द्वारा प्रशंसित और सम्मानित हो और श्रेष्ठ कर्मों के करने
में लगा रहे । नवम भाव से धन और भाग्य का विचार किया जाता
है । इस कारण बलवान् भाग्येश की दशा में भाग्य-वृद्धि भी होती
है और धन-वृद्धि भी ॥ १० ॥
(x) यदि दशम भाव और दशमेश बलवान् हों तो दशमेश की दशा में
जिसकार्य को भी मनुष्य आरम्भ करता है उसी में सफलता मिलती है और
जातक का जीवन सुखमय व्यतीत होता है । जातक की मान वृद्धि होती
है, उसे यश प्राप्त होता है । वह उत्तम कार्यों में लगा रहता है और
उसे प्रतिष्ठा मिलती है ॥ ११ ॥ ,
(ix) बलवान् लाभाधिपति की दशा में निरन्तर ऐश्वर्य की
वृद्धि हो । प्रिय बन्धुओं से समागम हो और नौकरों की संख्या भी
बढ़े । सांसारिक सौभाग्य में बहुत वृद्धि हो ॥ १२ ॥
(xii) बलवान् व्ययेश की महादशा में जातक सज्जनों पर बहुत
अधिक व्यय करे । अर्थात् बलवान् व्ययेश के होने से उसकी महादशा
में व्यय तो होता है किन्तु शुभ कार्यों में खर्च होता है, अशुभ
कार्यों में नहीं । राजा से सम्मान प्राप्त होता है और मनुष्य ऐसे शुभ
कर्म करता है जिनसे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १३ ॥
वक्रगस्य निजतुङ्गसुहृत्-
सुस्थानगस्य दशाफलमेवम् ।
शत्रु नीचगृहमौढ्यषडन्त्य-
छिद्रगस्य तु फलान्यपि वक्ष्ये ॥१४॥
- तिं
The 'न्' in 'बहून्दुष्कृतिं' has a small curve to the left, exactly like the letter in question!
Wait, but if it is 'न्', then 'न्' + 'र्थ' would be 'न्' followed by 'र्थ': "न्अर्थतां" or "न्थरतां"?
Wait, why would there be 'म' before it? "चोराद्भीतिमन्अर्थतां"?
Wait! Let's look at "अ" in Devanagari in this book:
Look at 'अ' in:
व्याध्याधीनपरक्रियाभिगमनं स्थानच्युतिं चापदम्
वीर्योने प्रतिभापतौ
मन्तःशत्रु
और कोई
Where is an 'अ'?
"अ" in "बताये"? No.
"अनिष्ट": look at 'अ' in 'अनिष्ट' :
Top horizontal, left 3-shape, middle horizontal, right vertical.
Now look at character 6 in :
Does it look like 'अ'? No, it doesn't have the 3-shape.
Does it look like 'म'?
Wait, compare it to 'म' in 'मन्तःशत्रु' or 'दमनं':
In 'दमनं': द - म - नं
'म' has a left vertical, loop, horizontal,
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९३
रन्ध्रेशायुषि शोकमोहमदमात्सर्यादिमूर्च्छोच्छ्रितिं
दारिद्र्यं भ्रमणं वदेदपयशोव्याधीन्र्वजां मृतिम् ॥१८॥
पूर्वोपासितदेवकोपमशुभं जायातनूजापदं
दौष्कृत्यं स्वगुरोः पितुश्च निधनं दैन्यं शुभे दुर्बले ।
यद्यत्कर्म करोति तत्तदफलं स्यान्मानभङ्गो नभो-
भावे दुर्गुणतां प्रवासमशुभं दुर्वृत्तिमापन्नताम् ॥१९॥
श्रवणमशुभवाचां भ्रातृकष्टं सुतार्ति
भवपवयसि दैन्यं वञ्चनं कर्णरोगम् ।
बहुरुजमपमानं बन्धनं सर्वसम्पत्-
क्षयमपरशशीवाऽऽयाति रिःफेशदाये ॥२०॥
(1) यदि लग्नेश ऊपर लिखे हुये चार दोषों में से एक या
अधिक दोषों से युक्त हो तो उसकी महादशा में जातक को जेल जाने
का भय या अज्ञातवास का भय होता है अर्थात् उसे बंधन में रहना
पड़े या ऐसी दुःस्थिति आ जावे कि छिप कर रहना पड़े; उसे निरन्तर
भय रहे और आधि-व्याधि से युक्त हो । व्याधि शारीरिक रोग को
कहते हैं । आधि मानसिक रोग या दुश्चिन्ताओं का नाम है । निर्बल
या दुःस्थान स्थित हुए लग्नेश की दशा में जातक को मृत्यु संस्कार
आदि अशुभ कार्यों में सम्मिलित होना पड़ता है । अपने ओहदे या
मकान से हटना पड़ता है और निरन्तर आपत्ति ग्रस्त रहता है ।
(ii) यदि द्वितीयेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में
यदि सभा में बोलने का अवसर हो तो जड़ता हो जाये अर्थात् बोल
न सके । अपनी वाणी पर कायम न रहे। उसका कुटुम्ब इधर-उधर
बिखर जावे । नेत्र रोग हो । वाणी में दोष हो (मुख में शारीरिक
*मूलश्लोक में केवल यह कहा है कि लग्नेश यदि दुःस्थान
में हो । परन्तु ऊपर श्लोक १४ में चार दोष गिनाये गये हैं ।
३९४ फलदीपिका
विकार हो या दुष्ट वाणी बोले)। द्रव्य का व्यय हो, राजा से भय हो
और अशुभ पत्रों की प्राप्ति हो। श्लोक तीन में द्वितीय स्थान का विचार
करते समय उन सब वस्तुओं का विचार कर लेना चाहिए जो दूसरे
घर से देखते हैं। ॥ १५ ॥
(iii) यदि तीसरे घर का स्वामी बिगड़ा हुआ हो तो सहोदर
भाई-बहिन की मृत्यु की आशंका हो। जातक के कार्य की अनिष्ट
आलोचना हो और छिपे हुए शत्रुओं से पीड़ा हो, जातक की हार हो,
उसको नीचा देखना पड़े और उसका गर्व भंग हो। बिगड़े हुए तृतीयेश
की महादशा में उपर्युक्त अनिष्ट फल होते हैं।
(iv) यदि चौथे घर का स्वामी निर्बल हो तो उसकी महादशा
में माता को कष्ट हो, इष्टजनों और मित्रों को कष्ट हो, खेत और
मकान के नष्ट होने का भय हो। पशु-अश्व आदि नष्ट हों और जल
का भय हो। चौथे स्थान से जल का भी विचार किया जाता है। इस
कारण चतुर्थेश के बिगड़ने से जल का भय लिखा है। ॥ १६ ॥
(v) यदि पंचमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक के
पुत्र की मृत्यु हो, बुद्धि में भ्रम हो, ठगा जावे, निरर्थक इधर-उधर
भ्रमण करना पड़े—रास्ता चलना पड़े—पेट की बीमारी हो, राजा का
कोप हो और जातक की शक्ति का निरर्थक अपव्यय हो।
(vi) यदि षष्ठेश बिगड़ा हुआ हो तो चोरों से डर हो, अनर्थता
हो (दरिद्रता या कष्टमय घटनायें)। जातक का अन्य लोगों द्वारा
दमन हो, रोग हो। जातक से दुष्कर्म बन पड़े या जातक के साथ लोग
बुरा व्यवहार करें। जातक को किसी की नौकरी करनी पड़े, अपमान
और अपयश प्राप्त हो और उसके शरीर में व्रण (घाव) हो ॥ १७ ॥
(vii) यदि सप्तमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जामाता
को कष्ट हो। जातक का अपनी स्त्री से विरह हो और स्त्री के
कारण बहुत कष्ट उठाना पड़े। निर्बल सप्तमेश की महादशा में असत्या
में रुचि हो, गुप्त रोग हों और निरर्थक भ्रमण करता रहे।
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९५
(viii) यदि अष्टमेश बिगड़ा हुआ हो तो उसकी महादशा में
दरिद्रता, कष्ट, भय, भ्रमण, अपयश, व्याधि, अपमान आदि होते हैं—
मृत्यु भी हो सकती है। बिगड़े हुये अष्टमेश की महादशा में शोक,
मोह, मद, मात्सर्य आदि तथा मूर्च्छा के कारण बहुत अधिक मानसिक
सन्ताप रहता है। ॥ १८ ॥
(ix) यदि नवमेश दुर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक की
स्त्री और पुत्र पर आपत्ति आती है। उसको दीनता आ घेरती है।
पिता की मृत्यु हो जाती है। उससे दुष्कर्म बन पड़ते हैं। किसी गुरुजन
की मृत्यु हो। नवम स्थान धर्म स्थान है इन कारण दुर्बल नवमेश की
दशा में आपत्ति, विपत्ति, कष्ट आवें तो समझना चाहिये कि पहले जिस
किसी देवता की उपासना की गई है उसमें कोई अपराध बन जाने के
कारण यह सब अशुभ फल हो रहे हैं।
(x) अब दुर्बल दशमेश की महादशा का फल बताते हैं। दशम
कर्म स्थान है। इसका स्वामी निर्बल हो तो उसकी दशा में जो जो
भी कर्म मनुष्य करता है वह सभी निष्फल होते हैं, जातक से निन्दित
कार्य बन पड़े। घर से बाहर रहना पड़े इस कारण कष्ट हो। और
अशुभ घटनायें हों। संक्षेप में यह है कि जातक का जीवन कष्टमय,
मानहीन, निष्फल रहे। ॥ १९ ॥
(ix) यदि एकादशेश निर्बल और बिगड़ा हुआ हो तो भाई को कष्ट
हो, पुत्र को बीमारी हो, जातक ठगा जाये, उसे कर्ण-रोग हो और उसमें
शारीरक, मानसिक तथा आर्थिक दीनता आ जावे। इस महादशा या
अन्तर्दशा में अशुभ समाचार भी सुनने को मिलते हैं। यहां इस ओर
ध्यान आकर्षित कराया जाता है कि तृतीय से छोटे भाई का विचार
किया जाता है, एकादश से बड़े भाई का। तृतीय से दाहिने कान का,
एकादश से बाँये कान का।
(xii) यदि बारहवें घर का मालिक दुर्बल हो तो जातक को
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अनेक बीमारियाँ हों, अपमान हो और बंधन को प्राप्त हो और कृष्णपक्ष
के चन्द्रमा की तरह उसकी सारी सम्पत्ति का क्रमशः क्षय हो जावे।
कोई भावेश यदि बलवान् हो तो उसकी दशा का शुभ फल बताया
गया है। कोई भावेश यदि दुर्बल हो तो उसका अशुभ फल बताया है।
इस कारण फल कहते समय केवल यही नहीं देखना चाहिये कि जिस
ग्रह की महादशा है वह किस भवन का स्वामी है बल्कि यह भी देखना
चाहिये कि वह बलवान् है या नहीं।
संज्ञायां यदगाच्च कारकविधिश्व्लोकेषु यज्जल्पितं
कर्माजीवनिरूपितं फलमिदं यद्रोगचिन्ताविधौ ।
यद्यस्येक्षणयोगसंभवफलं भावेशयोगोद्भवं
भावेशैरपि भावगैरपि फलं वाच्यं दशायामिह ॥२१॥
ग्रहों की संज्ञा बताते समय जो कुछ प्रथम अध्याय में बताया
गया है; कौन सा ग्रह किन किन वस्तुओं का कारक है इस सम्बन्ध में
दूसरे अध्याय में जो कुछ बताया गया है; कौन सा ग्रह क्या कर्म कराता
है और किस मार्ग से आजीविका दिलाता है इस सम्बन्ध में पंचम
अध्याय में जो कुछ भी कहा गया है, और किस ग्रह से क्या रोग और
किस प्रकार की चिन्ता होती है इस सम्बन्ध में जो चौदहवें अध्याय
में वर्णन किया गया है; ग्रहों के, परस्पर दृष्टि और योग से जो फल
होते हैं या किन्हीं दो भावेशों के मिलने से जो योग होता है तथा
किसी भाव का स्वामी होने से तथा किसी भाव में बैठने से जो फल
होता है, इस सब का विचार करके उस ग्रह की महादशा या अन्तर्दशा
का फल कहना चाहिये। यह सब विषय पन्द्रहवें अध्याय से बीसवें
अध्याय तक बताये गये हैं। ॥ २१ ॥
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९७
वर्गोत्तमांशस्थदशा शुभप्रदा
मिश्रेव सा चास्तमिते च नीचगे ।
मृत्युव्ययारीशदशापहारयो-
स्तत्र स्थितस्याप्यशुभं फलं भवेत् ॥२२॥
यदि कोई ग्रह वर्गोत्तम में हो तो वह बहुत शुभ फल देता है।
किन्तु यदि वर्गोत्तम में होते हुए भी वह ग्रह अपनी नीच राशि में
हो या अस्त हो तो अच्छा-बुरा—मिला-जुला फल होता है । ६, ८,
१२ इन घरों के मालिकों में से किसी एक की महादशा और किसी
अन्य की अन्तर्दशा हो तो अशुभ फल होता है । इसी प्रकार ६, ८
या १२ इन स्थानों में से किसी एक स्थान में बैठे हुये ग्रह की महादशा
हो और त्रिक* में बैठे हुये ही किसी अन्य ग्रह की अन्तर्दशा हो तो
वह भी अशुभ होती है । २२ ॥
क्रूरग्रहस्यैव दशापहारे
त्रिपञ्चसप्तर्क्षपतेर्विपाके ।
तथैव जन्माष्टमनाथभुक्तौ
चोरारिपीड़ां लभतेऽतिदुःखम् ॥२३॥
यदि किसी क्रूर ग्रह की महादशा हो और उसमें किसी ऐसे
ग्रह की अन्तर्दशा हो जो जन्म नक्षत्र से तीसरे, पाँचवे या साँतवे नक्षत्र
का मालिक हो तो ऐसी परिस्थिति में जातक के घर में चोरी होती
है, उसे शत्रु पीड़ा होती है और वह अति दुःखित रहता है । किस
नक्षत्र का कौन सा स्वामी है यह पहिले बताया गया है । मान
लीजिये किसी व्यक्ति का रेवती नक्षत्र में जन्म है तो रेवती, अश्विनी,
*छठे, आठवें, बारहवें घर को त्रिक कहते हैं ।