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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 395, कुल 684 में से

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पृष्ठ 395

३९४ फलदीपिका
विकार हो या दुष्ट वाणी बोले)। द्रव्य का व्यय हो, राजा से भय हो
और अशुभ पत्रों की प्राप्ति हो। श्लोक तीन में द्वितीय स्थान का विचार
करते समय उन सब वस्तुओं का विचार कर लेना चाहिए जो दूसरे
घर से देखते हैं। ॥ १५ ॥
(iii) यदि तीसरे घर का स्वामी बिगड़ा हुआ हो तो सहोदर
भाई-बहिन की मृत्यु की आशंका हो। जातक के कार्य की अनिष्ट
आलोचना हो और छिपे हुए शत्रुओं से पीड़ा हो, जातक की हार हो,
उसको नीचा देखना पड़े और उसका गर्व भंग हो। बिगड़े हुए तृतीयेश
की महादशा में उपर्युक्त अनिष्ट फल होते हैं।
(iv) यदि चौथे घर का स्वामी निर्बल हो तो उसकी महादशा
में माता को कष्ट हो, इष्टजनों और मित्रों को कष्ट हो, खेत और
मकान के नष्ट होने का भय हो। पशु-अश्व आदि नष्ट हों और जल
का भय हो। चौथे स्थान से जल का भी विचार किया जाता है। इस
कारण चतुर्थेश के बिगड़ने से जल का भय लिखा है। ॥ १६ ॥
(v) यदि पंचमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जातक के
पुत्र की मृत्यु हो, बुद्धि में भ्रम हो, ठगा जावे, निरर्थक इधर-उधर
भ्रमण करना पड़े—रास्ता चलना पड़े—पेट की बीमारी हो, राजा का
कोप हो और जातक की शक्ति का निरर्थक अपव्यय हो।
(vi) यदि षष्ठेश बिगड़ा हुआ हो तो चोरों से डर हो, अनर्थता
हो (दरिद्रता या कष्टमय घटनायें)। जातक का अन्य लोगों द्वारा
दमन हो, रोग हो। जातक से दुष्कर्म बन पड़े या जातक के साथ लोग
बुरा व्यवहार करें। जातक को किसी की नौकरी करनी पड़े, अपमान
और अपयश प्राप्त हो और उसके शरीर में व्रण (घाव) हो ॥ १७ ॥
(vii) यदि सप्तमेश निर्बल हो तो उसकी महादशा में जामाता
को कष्ट हो। जातक का अपनी स्त्री से विरह हो और स्त्री के
कारण बहुत कष्ट उठाना पड़े। निर्बल सप्तमेश की महादशा में असत्या
में रुचि हो, गुप्त रोग हों और निरर्थक भ्रमण करता रहे।