फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
३९८ फलदीपिका
भरणी—भरणी तृतीय नक्षत्र हुआ; रोहिणी पंचम नक्षत्र हुआ; आर्द्रा
सप्तम नक्षत्र हुआ । भरणी का स्वामी शुक्र है, रोहिणी का चन्द्रमा,
आर्द्रा का राहु । ऐसी स्थिति में किसी क्रूर ग्रह की दशा हो—
मान लीजिये शनि की महादशा हो तो उसमें शुक्र, चन्द्र और राहु
की अन्तर्दशा कष्टमय जावेगी ।
इसी प्रकार क्रूर ग्रह की दशा हो और उसमें जन्मराशि के स्वामी
की अन्तर्दशा हो या जन्म राशि से अष्टम राशि के स्वामी की दशा
हो तो चोर-पीड़ा, शत्रु-पीड़ा और दुःख आदि कष्ट होते हैं ॥ २३ ॥
शनेश्चतुर्थी च गुरोस्तु षष्ठी
दशा कुजाह्वोर्यदि पञ्चमी सा ।
कष्टा भवेद्राश्यवसानभाग-
स्थितस्य दुःस्थानपतेस्तथैव ॥२४॥
निम्नलिखित दशायें कष्टकारक होती हैं ।
(१) शनि की दशा यदि चौथी हो । (२) बृहस्पति की दशा
यदि छठी हो (३) मंगल और राहु की दशा यदि पाँचवी हों ।
(४) किसी राशि के अन्तिम अंश पर स्थित यदि कोई ग्रह हो अर्थात्
यदि कोई ग्रह किसी भी राशि में ३०वें अंश पर हो । (५) दुःस्थान
अर्थात् ६, ८, १२ के मालिक की दशा। यदि किसी का जन्म मंगल
की महादशा में हो तो भौ. रा. जी. श—शनि की दशा उसे चौथी
होगी । यदि किसी का जन्म शुक्र की महादशा में हो तो राहु की दशा
पंचम होगी और गुरु की दशा षष्ठ होगी । इसी प्रकार यदि किसी
का जन्म केतुकी महादशा में हो तो मंगल की दशा उसे पंचम
होगी ॥ २४ ॥
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ३९९
ऊर्ध्वास्यतुङ्गभवनस्थितभूमिजस्य
कर्मायगस्य हि दशा विदधाति राज्यम् ।
जित्वा रिपून्विपुलवाहनसैन्ययुक्तां
राज्यश्रियं वितनुतेऽधिकमन्नदानम् ॥२५॥
यदि मंगल ऊर्ध्वमुख राशि में स्थित होकर मकर में हो और लग्न
से दशम या एकादश स्थान में स्थित हो तो राज्य प्रदान करती
है। ऐसा जातक शत्रुओं को जीत कर बहुत बड़ी सेना का अधिपति हो
राज्यलक्ष्मी का उपभोग करता है और उसके आश्रय में अनेक लोग
पेट पालते हैं । यह जो विशिष्ट राजयोग बताया गया है इसमें तीनो
बात होना आवश्यक है; (१) मंगल उच्च राशि में हो (२) दशम
या एकादश में हो (३) ऊर्ध्वमुख राशि में हो । ऊर्ध्वमुख राशि
किसे कहते हैं यह पहले अध्याय के आठवें श्लोक में बताया गया
है ।* ॥ २५ ॥
स्वोच्चस्थितो भृगुसुतो व्ययकर्मगो वा
लाभेऽपि वाऽस्तरहितो न च पापयुक्तः ।
तस्याब्दपाकसमये बहुरत्नपूर्णो
धीमान्विशालविभवो जयति प्रशस्तः ॥२६॥
अब शुक्र सम्बन्धी एक विशिष्ट राजयोग बताते हैं। यदि मीन,
तुला या वृषभ राशि का शुक्र दशम या द्वादश में स्थित हो या
एकादश में ही हो किन्तु किसी पाप ग्रह के साथ न हो और अस्त
न हो तो उस शुक्र की महादशा में जातक बहुत धनी, वैभव युक्त,
*यह मंगल की महादशा का फल है ।
४०० फलदीपिका
स्वर्ण आदि से सम्पन्न, लोक में प्रशंसित होकर भोग करता है ।
यह शुक्र महादशा का फल है । *
अब ऐसे ग्रहों की महादशा का फल बताते हैं जो नीच राशि में
छठे या आठवें हों । प्रायः यह समझा जाता है कि शुभ-ग्रह कहीं
भी बैठे अच्छा । तो क्या छठे या बारहवें में बैठा हुआ शुभ ग्रह शुभ
फल दिखावेगा ? एक ज्योतिष की कहावत है कि :
“पापाः षष्ठे वित्तलाभं प्रकुर्युः” तो क्या पाप-ग्रह छठे में अच्छा
फल दिखावेंगे ? इन्हीं शंकाओं का जवाब नीचे के श्लोक में दिया
जा रहा है ।
नीचारिषष्ठव्ययसंश्रिता हि
शुभाः प्रयच्छन्त्यशुभानि सर्वे ।
शुभेतरास्त्वेषु गताः प्रयच्छ-
न्त्यमोघदुःखानि दशासु तेषाम् ॥२७॥
यदि शुभ-ग्रह नीच-राशि में, शत्रु-राशि में, छठे या बारहवें बैठे
हों तो यह सब अशुभ फल दिखाते हैं—और यदि जो शुभ नहीं
है अर्थात् पाप-ग्रह अपनी नीच राशि में, शत्रु-राशि में छठे या बारहवें
बैठे हों तो वे क्या फल दिखावेंगे ? वे अपनी दशा में अमोघ दुःख
- मूल में “स्वोच्चस्थित” यह शब्द आया है—स्वराशि या
उच्च राशि यह अर्थ लेने से शुक्र यदि वृष, तुला, मीन किसी में
हो तो उपर्युक्त फल करेगा। किन्तु यदि स्त्रोच्च का यह अर्थ लिया
जावे कि अपनी उच्च राशि में, तो उपर्युक्त योग केवल तभी बनेगा
जब शुक्र मीन का हो । हम दूसरे अर्थ के पक्ष में हैं । और ग्रह
बारहवें घर में अच्छे नहीं माने जाते, किन्तु भोग प्रदाता शुक्र द्वादश
में बहुत भोग कराता है ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०१
दिखाते हैं । अमोघ कहते हैं ऐसे कष्ट को जो निश्चय ही होता है और
जिससे छुटकारा पाना सम्भव न हो ॥ २७ ॥
अब तक महादशा, अन्तर्दशा का फल बता रहे थे । अब बीच
में अन्तर्दशा का फल बताने वाला एक श्लोक कहते हैं ।
दशेशशत्रोररिगेहभाजो
लग्नेशशत्रोरपि वाऽथ भुक्तौ ।
शत्रोर्भयं स्थानलयः तदास्य
स्निग्धोपि शत्रुत्वमुपैति नूनम् ॥२८॥
यदि ऐसे ग्रह की अन्तर्दशा हो जो ( १ ) जिस ग्रह की महादशा चल
रही है उसका शत्रु हो । ( २ ) या शत्रु-राशि में हो ( ३ ) या छठे
हो ( ४ ) या लग्नेश का शत्रु हो, तो ऐसी अन्तर्दशा में शत्रु का भय हो,
स्थान भय हो । ( नौकरी या मकान छूटे । ) यह अन्तर्दशा बहुत
कष्टकारक बीतती है और जातक के मित्र भी शत्रु हो जाते
हैं।* ॥ २८ ॥
यद्भावगः पाकपतिर्दशेशात्-
तद्भावजातानि फलानि कुर्यात् ।
विपक्षरिफाष्टमभावगश्चेद्-
दुःखं विदध्यादितरत्र सौख्यम् ॥२९॥
*मूल श्लोक में शब्द आया है 'अरिगेहभाजो' जिसको दो अर्थ हो
सकते हैं । ( १ ) शत्रु के घर में हो ( २ ) शत्रु का विचार छठे घर
से किया जाता है इसलिये लग्न से छठे घर में हो । ऊपर श्लोक
का भावार्थ समझाते हुए यह दोनों अर्थ दे दिये गये गये हैं ।
यह भी विचार कर लेना चाहिये कि अन्तर्दशा नाथ महादशा
स्वामी की शत्रु-राशि में तो नहीं है ।
४०२ फलदीपिका
यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा चल रही है वह कहाँ
है और जिस ग्रह की अन्तर्दशा चल रही है वह कहाँ है । यदि
महादशा के स्वामी से गिनने पर अन्तर्दशा का स्वामी छठे, आठवें
या बारहवें हो तो कष्टकारक होता है । यदि अन्तर्दशा नाथ (महादशा-
नाथ से) गिनने पर ६, ८, १२, के अलावा अन्य स्थानों में हो तो
अच्छा है । इस श्लोक में यह नयी बात बतायी कि महादशा और
अन्तर्दशा का विचार करते समय केवल दोनों ग्रहों का ही अलग २
विचार नहीं कर लेना चाहिये बल्कि यह भी देखना चाहिये कि अन्तर्दशा-
नाथ— महादशानाथ से ६, ८, १२ तो नहीं है ॥ २९ ॥
महादशानाथ जिस घर में बैठा है उससे गिनने पर अन्तर्दशा-
नाथ जिस घर में बैठा है—उसका फल करेगा—अर्थात् यदि अन्तर्दशानाथ
—महादशानाथ से नवम में है तो भाग्य वृद्धि करेगा, दशम में बैठा
है तो पद वृद्धि, एकादश में बैठा है तो लाभ ।
सिद्धान्त यह हुआ कि केवल अन्तर्दशानाथ की स्थिति का विचार
लग्न से, या चन्द्र लग्न से ही नहीं करना बल्कि महादशानाथ जिस
राशि में बैठा है—उससे भी करना चाहिये ।
स्वोच्चत्रिकोणस्वहितारिनीचे
पूर्णं त्रिपादार्द्धपदालपशून्यम् ।
क्रमाच्छुभं चेदशुभं विलोमात्
मूढे ग्रहे नीचसमं फलं स्यात् ॥३०॥
[L2
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०३
ग्रह नीच राशि में हो तो शुभफल शून्य के बराबर होता है । यदि
पाप ग्रह नीच राशि में हो तो पापफल पूर्ण अर्थात् सोलह आना
अशुभ होता है । यदि अशुभ ग्रह शत्रु राशि में हो तो बारह आना अशुभ
फल; यदि पाप-ग्रह मित्र राशि में हो तो आठ आना अशुभ फल ।
यदि पाप ग्रह स्वराशि में हो तो चार आना अशुभफल । यदि पाप-
ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में हो तो दो आना अशुभ फल और
यदि उच्च राशि में हो तो पाप फल शून्य के बराबर अर्थात् बहुत कम
होता है ।
यदि ग्रह अस्त हो तो नीच राशि स्थित ग्रह के समान फल करता
है ॥ ३० ॥
मन्दमान्द्यगुखरेशरण्ध्रपाः-
तन्नवांशपतयोऽपि ये ग्रहाः ।
तेषु दुर्बलदशा मृतिप्रदा
कष्टभे चरति सूर्यनन्दने ॥३१॥
यह देखिये कि निम्नलिखित में सबसे दुर्बल कौन है (क) शनि
(ख) मान्दि (ग) राहु (घ) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी
(ङ) अष्टमेश और (च) अ से (ङ) तक जो बताये गये हैं वे जिन
नवांशों में हैं उन नवांशों के स्वामी । उपर्युक्त में जो सबसे दुर्बल होता
है उसकी दशा मृत्यु कारक होती है और मृत्यु तब होती है जब शनि
भी गोचरवश अनिष्ट हों ॥ ३१॥
मृतीशनाथस्थितभांशकेशयोः
खरत्रिभागेश्वरयोर्बलीयसः ।
दशागमे मृत्यूपयुक्तभांशक-
त्रिकोणगे देवगुरौ तनुक्षयः ॥३२॥
यह देखिये कि (क) अष्टमेश जिस राशि में है उसका स्वामी और
(ख) अष्टमेश जिस नवांश में है उसका स्वामी इन दोनों में कौन
बलवान् है । इसी प्रकार यह देखिये कि (ग) लग्न से २२वें
द्रेष्काण का स्वामी और (घ) लग्न जिस द्रेष्काण में है उसका स्वामी
इन दोनों में कौन बलवान् है ?
उपर्युक्त बलवान् ग्रह की महादशा हो और बृहस्पति गोचरवश
निम्नलिखित स्थानों में से कहीं भी आवे तब मृत्यु होती है । (१)
अष्टमेश जिस राशि में हो (२) अष्टमेश जिस नवांश में हो (३) ऊपर
(१) और (२) में जो स्थान बताये गये हैं उनसे नवम या पंचम
॥ ३२ ॥
चतुष्टयस्था गुरुजन्मलग्नपा
भवन्ति मध्ये वयसः सुखप्रदाः ।
क्रमेण पृष्ठोभयमस्तकोदय-
स्थितोऽन्त्यमध्यप्रथमेषु पाकदाः ॥३३॥
(i) यदि (१) बृहस्पति (२) जन्म राशि का स्वामी (३)
जन्म-लग्नेश ये तीनो जन्मलग्न से केन्द्र में हों तो जीवन के मध्य-
काल में सुख प्रद होते हैं।
अब एकदूसरी बात और बताते हैं। यदि कोई ग्रह शीर्षोदय राशि
में हो तो वह अपनी महादशा के प्रारम्भिक काल में ही अपना विशेष
फल दिखाता है । यदि कोई ग्रह पृष्ठोदय राशि में हो तो वह अपना
फल अपनी महादशा के अन्तिम काल में विशेष दिखाता है । यदि
कोई ग्रह उभयोदय राशि में है तो वह अपना फल महादशा के मध्य
काल में विशेष दिखाता है। कौन सी राशि पृष्ठोदय होती है, कौनसी
शीर्षोदय, यह प्रथम अध्याय के आठवें श्लोक में बताया है ।
यहाँ यह विशेष कथन है कि मिथुन राशि फलदीपिका के मत से
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०५
उभयोदय है । एक अन्य बात इन राशियों के विषय में अन्यत्र कही
गयी है वह भी यहाँ बताते हैं । पृष्ठोदय राशि में क्रूर ग्रह हो तो
अत्यन्त अशुभ और शुभ ग्रह हो तो कम अशुभ । शीर्षोदय राशि में
शुभ-ग्रह हो तो पूर्ण शुभ, क्रूर-ग्रह हो तो कम अशुभ । उभयोदय में
मिश्रत फल ॥ ३३ ॥
यद्भावगो गोचरतो विलग्नात्-
दशेश्वरः स्वोच्चसुहृद्गृहस्थः ।
तद्भावपुष्टिं कुरुते तदानीं
बलान्वितश्चेज्जननेऽपि तस्य ॥३४॥
यह देखिये कि जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह महादशा
के समय, लग्न से किस भाव में जा रहा है । इस श्लोक में यह नयी
बात बतायी गयी है कि एक ही महादशानाथ--जब उसकी महादशा
जा रही हो--तब गोचरवश भिन्न-भिन्न स्थानों में रहता हुआ भिन्न-
भिन्न फल करता है ।
महादशा स्वामी यदि जन्म कुण्डली में भी बलवान् हो तो जब
उसकी महादशा के समय गोचरवश अपनी उच्च । स्वराशि, या मित्र
राशि में रहता हुआ लग्न से जिस भाव में भ्रमण करता है उस भाव
का पुष्टिकारक होता है । मान लीजिये किसी की कुण्डली में राहु
बड़ा बलवान् है । और राहु की महादशा है तो जब गोचरवश जन्म
लग्न से ११वें आवेगा तब धन लाभ करावेगा, जब जन्म लग्न से
दशम में आवेगा तब पदोन्नति कारक होगा । जब नवम में आवेगा तब
भाग्योदय करेगा--इस प्रकार महादशानाथ के गोचरवश, फल में
तारतम्य कर विचार करना चाहिये ॥ ३४ ॥
४०६ फलदीपिका
बलोनितो जन्मनि पाकनाथो
मौढ्यं स्वनीचं रिपुमन्दिरं वा।
प्राप्तश्च यद्भावमुपैति चारात्-
तद्भावनाशं कुरुते तदानीम् ॥३५॥
ऊपर श्लोक में यह बताया गया है कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली
में बलवान् हो और गोचर में भी बलवान् हो तो क्या शुभ फल
देता है। अब यह बताते हैं कि यदि दशानाथ जन्म-कुण्डली में भी
निर्बल हो और गोचर में भी निर्बल हो तो क्या अशुभ फल करता
है
जिस ग्रह की महादशा जा रही है वह यदि जन्म-कुण्डली में
बलहीन हो और गोचर के समय अपनी नीच राशि या अपनी शत्रु
राशि में जा रहा हो या जब वह सूर्य के पास होने से अस्त हो
उस समय वह गोचरवश लग्न से जिस भाव में होता है उस
भाव सम्बन्धी अशुभफल करता है ।
मान लीजिये कन्या लग्न है ।
शनि अष्टम में । नीच राशि में होने
से यह निर्बल है । और मान लीजिये
शनि की महादशा है तथा शनि
गोचरवश सिंह राशि में जा रहा है।
सूर्य शनि का शत्रु है । इस कारण
जब शनि सिंह राशि में जायगा तब
लग्न से बारहवें घर में होने के
कारण, १२वें भाव-सम्बन्धी अशुभ फल दिखायेगा ॥ ३५ ॥
मूल श्लोक में कई जगह पाकप्रभु या पाकनाथ यह शब्द आया
है इस कारण जो सिद्धांत दशानाथ पर लागू होंगे वह अन्तर्दशानाथ
पर भी लागू होंगे ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०७
दशेशस्य तुङ्गे सुहृद्भे दशेशात्
त्रिषट्कर्मलाभत्रिकोणास्तभेषु ।
यदा चारगत्या समायाति चन्द्रः
शुभं संविधत्तेऽन्यथा चेदरिष्टम् ॥३६॥
अब यह बताते हैं कि दशानाथ से किन-किन स्थानों पर जब
चन्द्रमा गोचरवश आता है तब शुभ फल करता है । (क) दशानाथ
की उच्च राशि, (ख) दशानाथ के मित्रों की राशि, (ग) दशानाथ
से तृतीय, पाँचवे, छठे सातवे, नवें, दसवें, और ग्यारहवें । चन्द्रमा
एक राशि में केवल सवा दो दिन रहता है । मान लीजिये आपको
यह विचारना है कि दशानाथ के दृष्टिकोण से आज का चन्द्रमा कुछ
शुभफल दिखायेगा क्या ? तो यह देख लीजिये कि क्या चन्द्रमा गोचर,
वश उपर्युक्त किन्हीं राशियों में है । यदि गोचर वश चन्द्रमा अन्य
राशि में हो तो उस काल में महादशानाथ का शुभ फल प्राप्त नहीं
होगा ॥ ३६ ॥
पाकप्रभुर्गोचरतः स्वनीचं
मौढ्यं यदायाति विपक्षभं वा ।
कष्टं विदध्यात्स्वगृहं स्वतुङ्गं
वक्रं गतः सौख्यफलं तदानीम् ॥३७॥
जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा जा रही हो वह गोचरवश
यदि अपनी नीच राशि में या शत्रु राशि में जा रहा हो या सूर्य
के समीप होने के कारण अस्त हो जावे तो ऐसी स्थिति में वह ग्रह
कष्ट देगा । प्रायः यही बात ऊपर के ३५वें श्लोक में भी बतायी
गयी है । अन्तर केवल यह है कि ऊपर ३५वें श्लोक में यह कहा
है कि यदि "वह दशानाथ जन्म के समय भी बलहीन हो" किन्तु
यह बात ३७वें श्लोक में नहीं कही गयी । इससे परिणाम यह
निकला कि जिस ग्रह की महादशा हो वह जब गोचरवश अस्त होता है
या अनिष्ट राशि को प्राप्त होता है तो कष्टकारक होता है । अब
दूसरी बात लीजिये । जिस ग्रह की दशा या अन्तर्दशा हो वह जब
गोचरवश अपनी स्वराशि या अपनी उच्चराशि को प्राप्त होता है
या वक्र हो जाता है तो उस समय अच्छा फल देता है ।
पाकेशस्य शुभप्रदस्य भवनं तुङ्गं प्रपन्ने यदा
सूर्ये तत्फलसिद्धिमेति गुरुणाऽप्येवं फलं चिन्तयेत् ।
नीचं कष्टफलप्रदस्य च दशानाथस्य वैरिस्थलं
प्राप्ते भास्वति गोचरेण लभते तस्यैव कष्टं फलम् ॥३६॥
यदि कोई ग्रह शुभफल देने वाला है और उसकी दशा व अन्त-
र्दशा चल रही है तो उसका शुभ फल किस समय होगा ? शुभफल
तब होगा जब उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि में
गोचरवश सूर्य जावे । या उस दशानाथ या अन्तर्दशानाथ की उच्चराशि
में गोचरवश बृहस्पति जावे । मान लीजिये किसी जन्म-कुण्डली में शुक्र
शुभ-प्रद है और उसकी महादशा या अन्तर्दशा चल रही है । शुक्र
की उच्च राशि मीन है । ऐसी स्थिति में जब गोचरवश सूर्य मीन
में आवेगा या जब वृहस्पति गोचरवश मीन राशि में आवेगा तब शुभ
फल होगा । अब दूसरी बात लीजिये । कोई ग्रह जन्म-कुण्डली में कष्ट-
प्रद है और उसकी दशा या अन्तर्दशा चल रही है तो विशेष कष्ट
फल कब होगा ? जब उस ग्रह की नीच राशि में या उस ग्रह की
शत्रु राशि में गोचरवश सूर्य आवे तब विशेष कष्ट होगा ॥ ३८ ॥
येन ग्रहेण सहितो भुजगाधिनाथ-
स्तत्खेटजातगुणदोषफलानि कुर्यात् ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४०९
सर्पान्वितः स तु खगः शुभदोऽपि कष्टं
दुःखं दशान्त्यसमये कुरुते विशेषात् ॥३६॥
राहु जैसे ग्रह के साथ बैठता है उसके गुणदोष ग्रहण करके उसी
ग्रह का सा प्रभाव दिखाता है । साथ की कुण्डली में राहु शुक्र के
[कुण्डली: लग्न ४; २ भाव ५; ३ भाव ६; ४ भाव ७ में रा. शु.; ५ भाव ८; ६ भाव ९;] साथ है । इस लिये शुक्र के जो भी गुण
[७ भाव १०; ८ भाव ११; ९ भाव १२; १० भाव १; ११ भाव २; १२ भाव ३] या दोष हैं वह राहु भी करेगा ।
यह श्लोक के प्रथम दो चरणों में
कहा गया है । आगे चलकर
कहते हैं कि जो ग्रह राहु के साथ
बैठता है वह ग्रह चाहे शुभ हो
किन्तु कष्टकारक होता है खास .
कर—अपनी दशा के अन्त के समय
में । उदाहरण कुण्डली में शुक्र राहु
के साथ है इसलिये शुभ होने पर भी शुक्र कष्टकारक होगा ।
कहने का तात्पर्य यह है कि राहु सर्प है यह अपना विष अपने
साथ में रहने वाले ग्रह को दे देता है ॥ ३९ ॥
द्वावर्थकामाविह मारकाख्यौ
तदीश्वरस्तत्र गतो बलाढ्यः ।
हन्ति स्वपाके निधनेश्वरो वा
व्ययेश्वरो वाऽप्यतिदुर्बलश्चेत् ॥४०॥
द्वितीय और सप्तम भाव को मारक स्थान कहते हैं । यदि इनके
स्वामी या अन्य ग्रह बलवान् होकर इन स्थानों में पड़े हुए हों तो
वह अपनी दशा में मृत्यु करते हैं । यदि अष्टमेश या व्ययेश भी अति
दुर्बल हों तो उसकी भी दशा में मृत्यु हो सकती है ॥ ४० ॥
४१० फलदीपिका
केन्द्रेशस्य सतोऽसतोऽशुभशुभौ कुर्याद्दशा कोणपाः
सर्वे शोभनदास्त्रिवैरिवभवपा यद्यप्यनर्थप्रदाः ।
रन्ध्रेशोऽपि विलग्नपो यदि शुभं कुर्याद्रविर्वा शशी
यद्येवं शुभदः पराशरमतं तत्तद्दशायां फलम् ॥४१॥
यदि केन्द्र का मालिक सौम्य-ग्रह है तो वह अशुभ फल देता
है और यदि केन्द्र का स्वामी अशुभ ग्रह हो तो शुभ फल देता है।
त्रिकोण (लग्न से नवें, पाँचवे घर के स्वामी) के स्वामी हमेशा शुभ
फल ही देते हैं । लग्न को केन्द्र स्थान भी मानते हैं कोण स्थान
भी । इसलिये लग्नेश सदैव शुभ ही होता है । ३, ६, ११ के स्वामी
चाहे शुभ हों अनर्थ करने वाले ही होते हैं । अष्टमेश यदि लग्नेश
भी हो (यह तभी होता है जब जन्म लग्न मेष या तुला हो) तो
शुभ होता है। अष्टमेश यदि सूर्य या चन्द्रमा हो तो भी शुभ फल करते
हैं । यह तभी होता है जब धनु या मकर लग्न हो । इससे परि-
णाम यह निकला कि मेष, तुला, धनु और मकर इन चार लग्नों के
अतिरिक्त यदि कोई लग्न हो तो अष्टमेश अशुभ फल ही करता है ।
ऐसा पराशर का मत है ! ग्रह अपनी-अपनी दशा में अपना फल
करते हैं ॥ ४१ ॥
कोणाधीशः केन्द्रगः केन्द्रपो वा
कोणस्थश्चेद् द्वौ च योगप्रदौ स्तः ।
द्वावप्येतौ भुक्तिकाले दशाया-
मन्योन्यं तौ योगदौ सोपकारौ ॥४२॥
केन्द्र, त्रिकोण आदि के स्वामियों के शुभ या अशुभ फल देने का
विचार हमने सुगम ज्योतिष प्रवेशिका में विस्तृत रूप से दिया है ।
इसके लिये देखिये सुगमज्योतिष प्रवेशिका । इसी प्रकार तृतीयेश
षष्ठेश, एकादशेश पापी हैं या नहीं इसका भी पूर्ण विवरण उसी
पुस्तक में देखिये ।
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४११
(i) कोण का स्वामी यदि केन्द्र में हो या (ii) केन्द्र का स्वामी,
त्रिकोण में हो—ये दोनों ही योग देने वाले होते हैं। यदि इनमें
से एक की दशा हो और दूसरे की अन्तर्दशा हो तो उस समय शुभफल
होता है। इस प्रकार यह दोनों एक-दूसरे को योग प्रदान करते हैं
और उपकार करते हैं ॥ ४२ ॥
न दिशेयुर्ग्रहाः सर्वे स्वदशासु स्वभुक्तिषु ।
शुभाशुभफलं नॄणामात्मभावानुरूपतः ॥४३॥
ऊपर श्लोक ४१ में कहा गया है कि "तत्तद्दशायां फलम्" अपनी-
अपनी दशा में फल देते हैं तो क्या जिस ग्रह की महादशा होती है
वह अपनी महादशा में अपनी अन्तर्दशा में ही पूर्ण फल प्रदान कर
देता है ? नहीं । वही इस श्लोक में बताया है। सूर्य आदि सब ग्रह-
अपनी महादशा और उसमें अपनी ही अन्तर्दशा में--एवं अपने-
अपने भावों के अनुसार--मनुष्यों को शुभाशुभ फल प्रदान नहीं करते
हैं। तब कब करते हैं ? यह आगे के श्लोक में बताया गया है ॥४३॥
आत्मसम्बन्धिनो ये च ये ये निजसधर्मिणः ।
तेषामन्तर्दशास्वेव दिशन्ति स्वदशाफलम् ॥४४॥
अपनी महादशा में जब अपने सम्बन्धी या सधर्मी ग्रहों की
अन्तर्दशा आती है तब प्रत्येक ग्रह अपना शुभ या अशुभ फल देता
है। सम्बन्धी किसे कहते हैं ? देखिये अध्याय १५ का ३०वाँ श्लोक ।
सधर्मी किसे कहते हैं ? (क) अपने सदृश जो योग कारक अन्य ग्रह
हैं वे सधर्मी हैं (ख) शुभ ग्रहों के अन्य शुभ ग्रह सधर्मी हैं (ग)
पाप ग्रहों के अन्य पाप ग्रह सधर्मी हैं ॥४४॥
४१२ फलदीपिका
केन्द्रत्रिकोणनेतारौ दोषयुक्तावपि स्वयम् ।
सम्बन्धमात्राद्बलिनौ भवेतां योगकारको ॥४५॥
केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी—चाहे स्वयं दोष युक्त भी क्यों न
हों—परस्पर सम्बन्ध से बली होने पर योग कारक होते हैं । दोष से
क्या तात्पर्य है ? उदाहरण के लिये मेष लग्न में शनि दशमेश होने
से केन्द्र पति हुआ किन्तु एकादश का भी स्वामी है और एकादश का
स्वामी होना अच्छा नहीं, इस कारण दोष युक्त केन्द्र पति हुआ ।
इसी प्रकार सिंह लग्न में बृहस्पति पंचम के साथ-साथ अष्टम का
भी स्वामी हुआ । इस कारण दोषयुक्त त्रिकोण पति हुआ ।
इस श्लोक में यही बताया गया है कि चाहे दोष युक्त ही क्यों
न हों—केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध होने से ही उनमें बल आ
जाता है और वे योग कारक हो जाते हैं ॥४५॥
त्रिकोणाधिपयोर्मध्ये सम्बन्धो येन केनचित् ।
केन्द्रनाथस्य बलिनो भवेद्यदि स योगकृत् ॥४६॥
दोनों त्रिकोण स्वामियों में—यदि किसी का भी सम्बन्ध बली
केन्द्रनाथ से हो तो वह सम्बन्ध राजयोग कारक होता है। यहाँ यह भी
बतलाना आवश्यक है कि ‘बली’ शब्द से क्या तात्पर्य है ? एक अर्थ
तो साधारण है ही—बली अर्थात् बलवान् । “बली केन्द्रनाथ” का
दूसरा पारिभाषिक अर्थ है—दशमेश—क्योंकि चारों केन्द्रेशों में वही
सबसे बली माना जाता है। यह दूसरा अर्थ लेने से निष्कर्ष यह
‘सम्बन्ध’ या ‘बन्ध’ शब्द का प्रयोग ज्योतिष में एक विशेष अर्थ
में होता है । इस शब्द की व्याख्या के लिये देखिये अध्याय १५ ।
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१३
निकला कि पंचमेश या नवमेश-इन दोनों में से किसी का भी
सम्बन्ध यदि दशमेश से हो तो योगकारक होता है । किन्तु
अन्य लोग बली का अर्थ केवल बलवान् लेते हैं । इस मतानुसार
यदि कोई भी केन्द्रेश बलवान् है और किसी भी त्रिकोणेश से
सम्बन्ध भी करता है तो राज योगकारक हुआ ॥ ४६ ॥
केन्द्रत्रिकोणाधिपयोरेक्ये तौ योगकारकौ ।
अन्यत्रिकोणपतिना संबन्धो यदि किं पुनः ॥४७॥
यदि किसी केन्द्र के स्वामी का दोनों त्रिकोणों में से एक के
स्वामी के साथ ऐक्य हो (दोनों एक साथ हों) तो इस ऐक्य के
कारण यह दोनों (परस्पर सम्बन्ध करने वाले त्रिकोणेश और केन्द्रेश)
योग कारक हो जाते हैं। यदि केन्द्रनाथ एक त्रिकोणाधिपति से
सम्बन्ध करे और साथ ही साथ दूसरे त्रिकोणपति से भी सम्बन्ध कर ले
तो फिर कहना ही क्या है अर्थात् किसी एक केन्द्रनाथ का दोनों
त्रिकोणेश से सम्बन्ध होना बहुत बड़ा राजयोग है।
यहाँ यह भी बतला देना आवश्यक है कि यदि एक ही ग्रह केन्द्र
और कोण का स्वामी हो तो वह स्वयं योगकारक हो जाता है ।
जैसे कर्क और सिंह लग्न वाले के लिये मंगल; मकर और कुंभ वाले के
लिये शुक्र; वृष और तुला लग्न वाले के लिये शनि। ऐसा योगकारक
ग्रह अपनी अन्तर्दशा में भाग्योदय करता है ॥ ४७ ॥
*मूल में शब्द "ऐक्य" है। अर्थात् एक साथ हों किन्तु यदि
चारों प्रकार के सम्बन्ध में से एक भी प्रकार का सम्बन्ध हो तो
हमारे विचार से वह काफ़ी है ।
४१४ फलदीपिका
योगकारकसम्बन्धात्पापिनोऽपि ग्रहाः स्वतः ।
तत्तद्भुक्त्यनुसारेण दिशेयुर्योगिकं फलम् ॥४८॥
पहले बता चुके हैं कि केन्द्रपति और कोणपति का सम्बन्ध
होने से दोनों ही ग्रह (केन्द्रपति और कोणपति) राजयोगकारक
माने जाते हैं। ऐसे योगकारक ग्रह की महादशा में यदि किसी शुभ-
ग्रह की अन्तर्दशा हो—तो चाहे यह शुभ ग्रह महादशानाथ से सम्बन्ध
न भी करता हो तो भी शुभ-ग्रह की अन्तर्दशा भाग्योदय ही करेगी।
अब यह बताते हैं कि यदि कोई ग्रह नैसर्गिक पाप-ग्रह हो (मंगल,
शनि) तो भी—यदि वह योग कारक से सम्बन्ध करते हों तो क्या
फल होगा। योगकारक से सम्बन्ध करने वाले पाप ग्रहों की अन्तर्दशा
'हो तो उसमें योगफल मिलता है। विशेष विवरण के लिये देखिये
सुगम ज्योतिष प्रवेशिका पृष्ठ १२१ तथा १३६ ॥ ४८ ॥
•
स्वदशायां त्रिकोणेशो भुक्तौ केन्द्रपतेः शुभम् ।
दिशेत्सोऽपि तथा नो चेदसंबन्धेऽपि पापकृत् ॥४९॥
यदि केन्द्रपति सम्बन्धयुक्त हो तो अपनी दशा में, कोणपति की
अन्तर्दशा में शुभफल कारक होता ही है। इसी प्रकार त्रिकोणेश भी
अपनी दशा में और केन्द्रपति की अन्तर्दशा में शुभ फल दायक होता
है। यदि केन्द्रकोण पतियों का सम्बन्ध न हो तो उतना शुभ नहीं होगा।
यदि दोनों शुभ हों तो इन दोनों का चाहे सम्बन्ध हो या न हो एक की
महादशा दूसरे की अन्तर्दशा में प्रायः शुभ फल ही होगा। हमारे विचार
से यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश में सम्बन्ध न हो और एक की महादशा
में दूसरे की अन्तर्दशा हो तो दोनों ग्रहों के विषय में यह भी विचारना
चाहिये कि वे केन्द्र और त्रिकोण के स्वामी होने के अतिरिक्त अन्य
बीसवाँ अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१५
किन घरों के स्वामी हैं ? कहाँ बैठे हैं ? एक दूसरे से छठे, आठवें, बारहवें
तो नहीं हैं ? बलवान् है या दुर्बल ? और तब जो निष्कर्ष आवे
वह मानना चाहिये यदि केन्द्रेश और त्रिकोणेश का सम्बन्ध नहीं है
और केन्द्रेश अशुभ है तो पाप फल देगा ॥ ४९ ॥
केन्द्राधिपत्यदोषस्तु बलवान् गुरुशुक्रयोः ।
मारकत्वेऽपि च तयोर्मारकस्थानसंस्थितिः ॥५०॥
पहले बता चुके हैं कि यदि केन्द्र का स्वामी शुभग्रह हो तो
अच्छा नहीं । अब यह कहते हैं कि बृहस्पति और शुक्र यदि केन्द्र के
स्वामी हों तो बहुत अधिक दोष हैं। यदि साथ ही साथ अर्थात् इन
दोनों में से कोई केन्द्र का स्वामी तो हो ही—मारक स्थान अर्थात्
द्वितीय या सप्तम में बैठा हो तो प्रबलमारक होता है ॥ ५० ॥
बुधस्तदनु चंद्रोऽपि भवेत्तदनु तद्विधः ।
पापाश्चेत्केन्द्रपतयः शुभदाश्चोत्तरोत्तरम् ॥५१॥
जैसे गुरु और शुक्र का केन्द्रेश होना और मारक स्थान में बैठना
दोषयुक्त माना गया है वैसे ही बुध और चन्द्रमा को भी समझना
चाहिये । अर्थात् बुध यदि केन्द्र का स्वामी हो तो शुभ नहीं होता
और यदि केन्द्र का स्वामी होकर मारक स्थान में बैठा हो तो और
भी खराब समझना चाहिये । इसी प्रकार चन्द्रमा का केन्द्रेश होना
अच्छा नहीं और यदि चन्द्रमा केन्द्रेश होकर मारक स्थान में बैठ जाये
तो और भी खराब है। किन्तु यदि पाप ग्रह केन्द्र के स्वामी हों तो वह
शुभफल देने वाले होते हैं । सूर्य यदि केन्द्रेश हो तो उत्तम फल देगा ।
मंगल यदि केन्द्रेश हो तो और भी उत्तम फल देगा । और यदि शनि
केन्द्रेश हो तो और भी अच्छा ॥ ५१ ॥
४१६ फलदीपिका
यदि केन्द्रे त्रिकोणे वा निवसेतां तमोग्रहौ ।
नाथेनान्यतरस्यैव संबन्धाद्योगकारकौ ॥५२॥
यदि राहु या केतु केन्द्र में बैठा हो और त्रिकोणेश से सम्बन्ध
करता हो तो योग कारक होता है । अथवा यदि राहु या केतु त्रिकोण
में बैठा हो और केन्द्रेश से सम्बन्ध करता हो तो भी राजयोग कारक
होता है ॥ ५२ ॥
तमोग्रहौ शुभारूढौऽसंबद्धौ येन केनचित् ।
अन्तर्दशानुरूपेण भवेतां योगकारकौ ॥५३॥
यदि राहु या केतु शुभग्रह की राशि और अच्छे स्थान में बैठे हों
और किसी ग्रह से सम्बन्ध न करते हो तो अपनी अन्तर्दशा में शुभ
फल देते हैं । यदि राहु या केतु का किसी से सम्बन्ध नहीं है और
शुभ स्थान में है (केन्द्र या त्रिकोण में) तो इनकी महादशा में जब
योग कारक ग्रह की अन्तर्दशा आवेगी तब शुभ फल होगा ॥ ५३ ॥
आरम्भो राजयोगस्य भवेन्मारकभुक्तिषु ।
प्रथयन्ति तमारभ्य क्रमशः पापभुक्तयः ॥५४॥
यदि किसी मारक ग्रह की अन्तर्दशा में राजयोग का आरम्भ
हो तो उस दशाकाल में केवल राजपद की प्रसिद्धि हो जाती है—
राजोचित ऐश्वर्य किंवा भोग आदि की प्राप्ति नहीं होती ॥ ५४ ॥
रन्ध्रस्थरन्ध्रेशकरन्ध्रनाथ-
रन्ध्रत्रिभागाधिपमान्दिभेशाः ।
बीसवां अध्याय : अन्तर्दशाफल ४१७
दुःखप्रदास्तेष्वपि दुर्बलो यः
स नाशकारी स्वदशापहारे ॥५५॥
नीचे लिखे हुए ग्रह बहुत दुःख देने वाले होते हैं—(१) जो ग्रह
आठवें घर में बैठा हो (२) जो ग्रह आठवें घर को देखता हो (३)
अष्टमेश (४) लग्न से २२वें द्रेष्काण का स्वामी (५) जिस राशि में
मान्दि हो, उसका स्वामी । कहने का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त ग्रह
अपनी दशा, अन्तर्दशा में बहुत कष्ट देते हैं और इन ग्रहों में जो
सबसे दुर्बल हो उसकी दशा या अन्तर्दशा में मृत्यु होती है ॥५५॥
भ्रष्टस्य तुङ्गादवरोहिसंज्ञा
मध्या भवेत्सा सुहृदुच्चभागे ।
आरोहिणी निम्नपरिच्युतस्य
नीचारिभांशेष्वधमा भवेत्सा ॥५६॥
पहले बताया जा चुका है कि किसी राशि के किस अंश पर
कौनसा ग्रह परम उच्च होता है और किस राशि के किस अंश
पर परम नीच होता है । उदाहरण के लिये मेष राशि के दस
अंश पर सूर्य परम उच्च होता है और तुला राशि के दस अंश
पर सूर्य परम नीच होता है । तो तुला के दस अंश से निकल
कर जब तक मेष के दस अंश पर सूर्य नहीं पहुँचेगा तब तक उसे
आरोही अर्थात् चढ़ता हुआ कहेंगे । अपने उच्च (ऊँचे) भाव की ओर
जा रहा है इसलिये चढ़ता हुआ कहा और मेष के १० अंश को
श्लोक ५४ की विस्तृत व्याख्या के लिये देखिये सुगम ज्योतिष
प्रवेशिका । फलदीपिका के श्लोक के द्वितीय चरण में “कारक भुक्ति षु”
यह लिखा था किन्तु लघुपाराशरी में इसी श्लोक में “मारक भुक्तिष”
यह पाठ है जो अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है । वही पाठ हमने
इसमें शुद्ध कर दिया है ।