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फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पन्द्रहवां अध्याय : भावचिन्ता २९३
भावस्योदयपाश्रितस्य कुशलं यद्भावपेनोदय-
स्वामी तिष्ठति संयुतोऽपि कलयेत्तद्भावजातं फलम् ।
दुःस्थाने विपरीतमेतदुदितं भावेश्वरे दुर्बले
दोषोऽतीव भवेद्बलेन सहिते दोषाल्पता जल्पिता ॥६॥
जिस भाव में लग्नेश बैठा हो उसकी समृद्धि होती है। लग्नेश
जिस भाव के स्वामी के साथ बैठा हो उस भाव के स्वामी के फल को
बढ़ाता है। ऊपर यह बताया गया है कि लग्नेश जिस स्थान में
बैठता है उस स्थान के फल को बढ़ाता है। इसका तात्पर्य यह है कि
उस स्थान का शुभफल बढ़ावेगा। यदि किसी भाव का स्वामी दुःस्थान
में हो तो इसका उलटा फल होता है। यदि दुःस्थान में पड़ा हुआ
ग्रह निर्बल हो तो बहुत अनिष्ट फल करेगा। किन्तु यदि बलवान्
हो तो उतना खराब नहीं जावेगा ॥ ९ ॥
यद्भावेष्वशुभोऽपि वोदयपतिस्तद्भाववृद्धिं दिशे-
द्दुःस्थानाधिपतिः स चेद्यदि तनोः प्राबल्यमन्यस्य न ।
अत्रोदाहरणं कुजे सुतगते सिंहे झषे वा स्थिते
पुत्राप्तिं शुभवीक्षिते झटिति तत्प्राप्तिं वदन्त्युत्तमाः ॥१०॥
इस श्लोक में यह बताया गया है कि लग्नेश स्वयं चाहे शुभ-
ग्रह हो चाहे पाप-ग्रह हो वह जहाँ बैठ जाता है उस स्थान की वृद्धि
ही करता है। ज्योतिष शास्त्र का यह माना हुआ नियम है कि
६, ८, १२, यह दुःस्थान हैं। अब शंका यह होती है कि लग्न का
स्वामी होना तो शुभ होता है किन्तु यदि कोई ग्रह लग्न के साथ
साथ छठे वा आठवें घर का भी स्वामी हो तो वह कैसा फल करेगा।
इस शंका का समाधान करते हुए कहते हैं कि लग्न का स्वामी होने

२९४ फलदीपिका
के कारण जो शुभता है वही मुख्य रहेगी । अर्थात् मान लीजिये
वृश्चिक लग्न है और मंगल लग्न और छठे घर का मालिक हुआ।
या मेष लग्न हो तो मंगल लग्न और आठवें घर का मालिक हुआ ।
अब यदि मंगल पंचम में बैठा हो तो वह षष्ठेश अथवा अष्टमेश होने
के कारण सन्तान कष्ट करेगा या लग्नेश पंचम में बैठा है इस कारण
सन्तान सम्बन्धी शुभफल दिखावेगा ? इसके उत्तर में कहते हैं कि
यदि मंगल लग्नेश षष्ठंश अथवा लग्नेश-अष्टमेश होकर पाँचवें घर में
बैठा हो और शुभ-ग्रह से देखा जाता हो तो शीघ्र ही पुत्र-प्राप्ति
करावेगा ।
द्विस्थानाधिपतित्वमस्ति यदि चेन्मुख्यं त्रिकोणर्क्षजं
तस्यार्द्धं स्वगृहेऽथ पूर्वमुभयोर्यत्तद्दशादौ वदेत् ।
पश्चाद्भावमिहापरार्द्धसमये युग्मे गृहे युग्मजं
त्वोजस्थे सति चौजंभावजफलं शंसन्ति केचिज्जनाः ॥११॥
यदि कोई ग्रह दो घरों का मालिक है तो वह अधिक फल
उस घर का दिखायेगा जो उसकी मूल त्रिकोण राशि है । किस
ग्रह की कौनसी मूल त्रिकोण राशि है यह पहले बताया जा चुका
है । (देखिये पृष्ठ २१) उदाहरण के लिये सिंह लग्न की कुण्डली में
बृहस्पति ५वें और ८वें घर का मालिक है । पंचम घर शुभ है,
अष्टम घर अशुभ है ऐसी स्थिति में बृहस्पति की मूल-त्रिकोण राशि
पंचम में होने से मुख्य फल पंचमेश होने का करेगा और अष्टमेश
होने का फल उसका आधा करेगा । अर्थात् यदि पंचमेश होने का
१६ आने शुभ फल तो अष्टमेश होने का ८ आने अशुभ फल । ऐसे
ग्रह की दशा में दोनों भावों के स्वामी होने का शुभ या अशुभ फल
होगा । अर्थात् प्रस्तुत उदाहरण में बृहस्पति पंचमेश और अष्टमेश

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९५
दोनों स्वामित्व का फल दिखावेगा । यहाँ यह भी निर्णय करते हैं
कि पहले किस राशि के स्वामित्व का फल दिखावेगा । इसके उत्तर
में कहते हैं कि लग्न से गिनने पर जो राशि पहले आवे उस राशि
के स्वामित्व का प्रभाव पहले होगा और जो राशि बाद में होगी
उसका प्रभाव बाद में होगा । परन्तु मन्त्रेश्वर महाराज स्वयं लिखते
हैं कि कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि यदि विचारणीय ग्रह ऊनी
राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों में जो ऊनी राशि है उसका
फल पहले दिखावेगा और अपनी दूसरी राशि का फल बाद में ।
किन्तु यदि ग्रह किसी सम राशि में बैठा है तो उसकी दो राशियों
में जो समराशि है उसके स्वामित्व का फल पहले दिखावेगा और ऊनी
राशि का फल बाद में दिखावेगा । ॥११॥
यद्भावेशस्याधिशत्रुग्रहो वा
यो वा खेटो बिन्दुशून्यर्क्षयुक्तः
तत्तत्पाके मूर्तिभावादिकानां
नाशं ब्रूयाद्दैववित्प्राज्ञिकाय ॥१२॥
इस श्लोक में यह बताते हैं कि किन ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा में
किन-किन भावों का नाश होगा । इस सम्बन्ध में दो बातें बताते हैं ।
(क) जो भावेश का अधिशत्रु ग्रह हो उस अधि-शत्रु ग्रह की दशा-
अन्तर्दशा में भाव का नाश होगा । (ख) जिस ग्रह की अपने अष्टक
वर्ग में जिस भाव में शून्य-शुभ बिन्दु हो अर्थात् कोई शुभ बिन्दु न
हो उस भाव को भी ग्रह अपनी दशा-अन्तर्दशा में बिगाड़ता है ।
इसका अर्थ यह हुआ कि मान लीजिये शनि की महादशा है और
शनि के अष्टक वर्ग में पंचम भाव में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो
शनि की दशा-अन्तर्दशा में पंचमभाव सम्बन्धी कष्ट होगा । (ग)

२९६ फलदीपिका
एक अन्य टीकाकार के मत से मान लीजिये सिंह लग्न है और सूर्य के
अष्टकवर्ग में मीन में कोई शुभ बिन्दु नहीं है तो मीन राशि में जो
ग्रह बैठे हों उनकी दशा-अन्तर्दशा में शरीर सम्बन्धी कष्ट होगा।
इनके मत से जिस भाव का विचार करना है उस विचारणीय भावेश
के अष्टक वर्ग में जिस राशि में कोई शुभ बिन्दु न हो उस राशि
में बैठा हुआ ग्रह अपनी दशा अन्तर्दशा में विचारणीय भाव का नाश
करेगा। ॥१२॥
स्वोच्चे सुहृत्क्षेत्रगतो ग्रहेन्द्रः
षड्भिर्बलैर्मुख्यबलान्वितोऽपि ।
सन्धौ स्थितः सन्नफलप्रदः स्यात्
एवं विचिन्त्यात्र वदेद्विपाके ॥१३॥
भावेषु भावस्फुटतुल्यभाग-
स्तद्भावजं पूर्णफलं विधत्ते ।
सन्धौ फलं नास्ति तदन्तराले
चिन्त्योऽनुपातः खलु खेचराणाम् ॥१४॥
चाहे कोई ग्रह अपनी उच्च राशि में हो, चाहे वह मित्र के
क्षेत्र में हो चाहे वह पूर्ण षड्बल से सम्पन्न हो किन्तु यदि वह ग्रह
भाव-सन्धि में हो तो वह फल देने में असमर्थ हो जाता है। फलादेश
करते समय इसका विचार कर लेना चाहिये। ॥१३॥
जो ग्रह भावमध्य में होते हैं वह उस भाव सम्बन्धी पूर्णफल
दिखाते हैं और जो ग्रह भावसन्धि में होते हैं वह शून्य फल दिखाते हैं
अर्थात् कुछ फल नहीं दिखाते हैं। यदि भाव-मध्य और भाव सन्धि के
बीच में हो तो जितना ही भाव मध्य के पास होंगे उतना ही उस

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९७
भाव सम्बन्धी अधिक फल दिखावेंगे और ग्रह जितना भाव मध्य से
दूर होगा उतना ही उस भाव सम्बन्धी कम फल दिखावेगा । यदि
सूक्ष्म विचार करना हो तो त्रैराशिक से यह गणित कर लीजिये कि
कितना फल दिखावेगा ॥ १४ ॥
सूर्यादात्मपितृप्रभाव्निरुजां शक्तिं श्रियं चिन्तयेत्
चेतोबुद्धिनृपप्रसादजननीसंपत्करश्चन्द्रमाः ।
सत्वं रोगगुणानुजावनिरिपुज्ञातीन्धरासूनुना
विद्याबन्धुविवेकमातुलसुहृद्वाक्कर्मकृद्बोधनः ॥१५॥
प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टितनयज्ञानानि वागीश्वरात्
पत्नीवाहनभूषणानि मदनव्यापारसौख्यं भृगोः ।
आयुर्जीवनमृत्युकारणविपद्भृत्यांश्च मन्दाद्वदेत्
सर्पेणैव पितामहं तु शिखिना मातामहं चिन्तयेत् ॥१६॥
सूर्य से आत्मा, पिता, प्रभाव, स्वास्थ्य, शक्ति (ताक़त), और
लक्ष्मी का विचार करना चाहिये। चन्द्रमा से मन, बुद्धि राजा की
कृपा, माता और सम्पत्ति का विचार करिये । मंगल से सत्व
(ताकत, हिम्मत) रोग, गुण, छोटे भाई, पृथ्वी, शत्रु और ज्ञाति
(चचेरे भाई आदि) का विचार करना चाहिये । विद्या, बन्धु,
विवेक, मामा, मित्र, वाणी और कार्यक्षमता का विचार बुध से
करे । ॥१५॥
संस्कृत में शब्द आया है कि कर्म का विचार बुध से करे । क्या
बुध कर्म करने वाला है ? इसका क्या आशय है ? बुध स्नायुमंडल
का स्वामी है । स्नायुमंडल पुष्ट होने से मनुष्य कर्मशील होता है,
कर्म में प्रवृत्त होता है। काम काज में व्यस्त रहता है । स्नायुमंडल

२९८ फलदीपिका
कमजोर होने से काम करने की प्रवृत्ति संकुचित होती है। कार्य करने
की शक्ति कम होने से कार्य करने की रुचि भी कम होती है।
दशम स्थान—दसवें घर को कर्म स्थान कहते हैं। कर्म या कार्य का
दशम स्थान से सम्बन्ध होने के कारण ही—दशम स्थान के कारक
ग्रहों में बुध भी एक कारक माना गया है। ॥१५॥
प्रज्ञा, धन, शरीर पुष्टि, पुत्र और ज्ञान का विचार बृहस्पति
से करे। पत्नी, सवारी, आभूषण, स्त्री-पुरुष प्रेम सम्बन्ध और सुख
का कारक शुक्र है। आयु, जीवन (जीविका), मृत्यु का कारण,
विपत्ति और नौकरी का विचार शनि से करना चाहिये। राहु से
बाबा का और केतु से नाना का विचार किया जाता है। ॥१६॥
द्युमणिरमरमन्त्री भूसुतः सोम सौम्यौ
गुरुरिनतनयारौ भार्गवो भानुपुत्रः ।
दिनकरदिविजेड्यौ जीवभानुज्ञमन्दाः
सुरगुरुरिनसूनुः कारकाः स्युर्विलग्नात् ॥१७॥
जब किसी बात का विचार किया जाता है तो प्रायः ज्योतिषी
भाव और भावेश को देखते हैं। परन्तु जितनी मुख्यता भाव और
भावेश की है उतनी ही कारक ग्रह की भी है। उदाहरण के लिये
किसी का सप्तम और सप्तमेश तो बिगड़ा है किन्तु शुक्र बड़ा बलवान्
है तो शुक्र के कारण स्त्री सुख प्राप्त होगा। अथवा मान लीजिये कि
सप्तम और सप्तमेश तो अच्छे हैं और शुक्र बिगड़ा है तो शुक्र के
बिगड़ने के कारण उतना स्त्री सुख नहीं होगा जितना होना चाहिये।
किन वस्तुओं का कौन सा ग्रह कारक होता है यह पिछले श्लोकों में
बताया गया है। अब उसी बात को भावों के दृष्टिकोण से बताते हैं कि
किस भाव का कौन सा ग्रह या कौन से ग्रह कारक होते हैं। जन्म

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता २९९
कुण्डली में बारह भाव होते हैं । बारहों भावों के क्रमशः निम्नलिखित
कारक हैं : (१) सूर्य (२) बृहस्पति (३) मंगल (४) चन्द्र और
बुध (५) बृहस्पति (६) मंगल और शनि (७) शुक्र (८) शनि
(९) बृहस्पति और सूर्य (१०) सूर्य, बुध, बृहस्पति और शनि
(११) बृहस्पति और (१२) शनि । ॥ १७ ॥
सुहृदरिपरकीयस्वर्क्षतुङ्गस्थितानां
फलमनुपरिचिन्त्यं लग्नदेहादिभावैः ।
समुपचयविपत्ती सौम्यपापेषु सत्यः
कथयति विपरीतं रिःफषष्ठाष्टमेषु ॥१८॥
किसी ग्रह का फल देखना हो तो यह देखिये कि वह लग्न आदि
द्वादश भावों में से किस भाव में है और मित्र राशि में है, या स्वराशि
में है, या उच्च राशि में या शत्रु राशि में । सत्याचार्य के मत से जिस
घर में सौम्यग्रह बैठते हैं उस घर की वृद्धि करते हैं और जिस घर में
पाप-ग्रह बैठते हैं उस घर का नाश करते हैं लेकिन छठे, आठवें, बारहवें
में इससे उलटा समझना चाहिये । ॥ १८ ॥
पापग्रहाः षष्ठमृतिव्ययस्था-
स्तद्भाववृद्धिं कलयन्ति दोषैः ।
शुभास्तु तद्भावलयं हि
तस्माच्छत्र्वादि भावोत्फलप्रणाशः ॥१९॥
पापग्रह यदि लग्न से छठे, ८वें या १२वें हो तो उन भावों के उन
दुष्ट फल को बढ़ाते हैं । शुभ ग्रह इन भावों में हों तो उस भाव के

३०० फलदीपिका
प्रभाव को लय (नाश) करते हैं। इस कारण इन भावों में शुभ-ग्रह के
होने से इन भावों के दुष्ट फल का नाश होता है। यद्यपि मन्त्रेश्वर
महाराज के मत से त्रिक स्थान का शुभग्रह त्रिक स्थान के दोष को
अवश्य कम करता है परन्तु त्रिक स्थान में बैठने से ग्रह स्वयं दूषित
हो जाता है और अपनी दशा-अन्तर्दशा में पूर्ण शुभ फल देने में असमर्थ
होता है। ॥ १९ ॥
भावस्य यस्यैव फलं विचिन्त्यं
भावं च तं लग्नमिति प्रकल्प्य ।
तस्माद्वदेद्द्वादशभावजानि
फलानि तद्रूपधनादिकानि ॥२०॥
इस श्लोक में एक नयी बात बताते हैं। जिस भाव का विचार
करना हो उसको लग्न मान कर एक नयी कुण्डली बना लीजिये और
फिर इसी प्रकार विचार कीजिये जैसे कि जन्म-कुण्डली में विचार
किया जाता है। उदाहरण लिये आपको अपने पुत्र की स्त्री का विचार
करना है तो आपके जन्म-लग्न से पंचम को (क्योंकि पुत्र का विचार
पंचम से किया जाता है) पुत्र स्थान मानकर उस पंचम से सप्तम से
पुत्र वधू का विचार कीजिये। अथवा दूसरा उदाहरण लीजिये।
आपको अपनी पत्नी के धन का विचार करना है तो सप्तम से
दूसरा अर्थात् अपने अष्टम से अपनी स्त्री के धन का विचार कीजिये।
पत्नी के छोटे भाई का विचार करना है तो अपने सप्तम (पत्नी) से
तृतीय—(छोटा) भाई अर्थात् अपने जन्म लग्न से नवम स्थान से पत्नी के
छोटे भाई का विचार कीजिये। इस प्रकार किसी भी भाव को लग्न
मान कर उससे द्वादश भावों का विचार किया जा सकता है। यह
ऊपर के उदाहरण से स्पष्ट है। ॥ २० ॥

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०१
एवं हि तत्कारकतो विचिन्त्यं
पितुश्च मातुश्च सहोदरस्य ।
तन्मातुलस्यापि सुतस्य पत्यु-
र्भृत्यस्य सूर्यादिखगस्थितर्क्षात् ॥२१॥
एक अन्य प्रकार और बताते हैं । यदि पिता का विचार करना है
तो सूर्य जिस भाव में है उसको लग्न मान कर सूर्य से द्वितीय से पिता
का धन, सूर्य से तृतीय से पिता का छोटा भ्राता आदि पिता के बारहौं
भावों का विचार कीजिये । माता का विचार करना है तो चन्द्र-स्थित
राशि को लग्न मान कर। भाई का विचार करना है तो मंगल-स्थित
राशि को लग्न मान कर, मामा का विचार करना हो तो बुध-स्थित
राशि को लग्न मान कर, पुत्र का विचार बृहस्पति वाली राशि को लग्न
मान कर, स्त्री का विचार शुक्र-स्थित राशि को लग्न मान कर और
नौकर का विचार शनि-स्थित राशि को लग्न मान कर उनके
बारहों भावों का विचार करना चाहिये । ॥ २१ ॥
सूर्यस्थितर्क्षाज्जनकस्वरूपं
वृद्धिं द्वितीयेन तु तत्प्रकाशम् ।
[

३०२ फलदीपिका
पुण्यं शुभं तत्पितरं शुभेन
व्यापारमस्यैव हि कर्मभावात् ।
लाभं ह्युपान्त्यात् क्षयमन्त्य-
भावाच्चन्द्रादिकानां फलमेवमाहुः ॥२४॥
सूर्य जिस राशि में है उससे पिता के स्वरूप का विचार करिये।
सूर्य-स्थित राशि से दूसरे भाव से पिता के धन और ख्याति का विचार
करिये। सूर्य जिस राशि में है उससे तीसरे से पिता के भाई और गुणों
का विचार करे। पिता के सुख और पिता की माता का विचार सूर्य-
स्थित राशि हो उससे चौथे घर से करना चाहिये । ॥ २२ ॥
सूर्य-स्थित राशि से पंचम से पिता की बुद्धि और प्रसाद (प्रसन्नता)
का विचार करे। सूर्य-स्थित राशि से छठे से पिता के दोष, शत्रु और
रोग का विचार करे। सूर्य-स्थित, राशि से सप्तम से पिता के मदन-
व्यापार (स्त्री-पुरुष प्रेम) का, और सूर्य-स्थित राशि से अष्टम से पिता
के दुःख, आयु तथा मृत्यु का विचार करे। ॥ २३ ॥
सूर्य-स्थित राशि अर्थात् सूर्य जिस राशि में हो उससे नवम से
पिता का पुण्य, पिता का शुभ, पिता के पिता का विचार करना चाहिये।
और सूर्य स्थित राशि से दशम से पिता के व्यापार का विचार करना
चाहिये। सूर्य-स्थित राशि से एकादश से पिता के लाभ का और सूर्य-
स्थित राशि से द्वादश से पिता के क्षय (व्यय) का विचार करना
चाहिये। जैसे सूर्य स्थित राशि से विविध भावों से पिता के विविध
भावों का विचार किया जाता है वैसे ही चन्द्रस्थित राशि को लग्न
मान कर मातृ सम्बन्धी विविध भावों का, मंगल-स्थित राशि को
लग्न मान कर भ्रातृ सम्बन्धी विविध भावों का विचार करना
चाहिये। इसी प्रकार बुध आदि ग्रहों से उनसे सम्बन्धित रिश्तेदारों
के बारहवों भाव का विचार करे । ॥ २४ ॥

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०३
तत्तद्भावात्कारकादेवमूह्यं
तत्तन्मातृभ्रातृपित्रात्मजाद्यम् ।
तस्मिन् भावे कारके भावनाथे
वीर्योपेते तस्य भावस्य सौख्यम् ॥२५॥
इसलिये पिता, माता, भ्राता, मातुल, पुत्र, स्त्री, भृत्य आदि का
विचार करना हो तो उपर्युक्त प्रकार से भाव, भावेश तथा कारक
तीनों का विचार करना चाहिये । यदि भाव, भावेश और कारक तीनों
बलवान् हों तो उस भाव सम्बन्धी सुख होगा । ॥ २५ ॥
धर्मे सूर्यः शीतगुर्बन्धुभावे
शौर्ये भौमः पञ्चमे देवमन्त्री ।
कामे शुक्रश्चाष्टमे भानुपुत्रः
कुर्यात्तस्य क्लेशमित्याहुरन्ये ॥२६॥
नवम में सूर्य, चौथे में चन्द्रमा, तृतीय में मंगल, पंचम में
बृहस्पति, सप्तम में शुक्र, और अष्टम में शनि उस भाव सम्बन्धी क्लेश
करते हैं ऐसा अन्य लोग कहते हैं । ॥ २६ ॥
लग्नेश्वरो यद्भवनेशयुक्तो
यद्भावगस्तस्य फलं ददाति ।
भावे तदीशे बलभाजि तेन
भावेन सौख्यं व्यसनं बलोने ॥२७॥
लग्नेश किस भावेश के साथ रहता है उस भावेश का या जिस
भाव में रहता है उस भाव का फल देता है। यदि भाव और उसका
स्वामी बलवान् हो तो उस भाव सम्बन्धी सुख होता है । यदि बलहीन
हो तो उस भाव सम्बन्धी कष्ट होता है । ॥ २७ ॥

३०४ फलदीपिका
यद्भावप्रभुणा युतो बलवता मुख्याङ्गगो लग्नप-
स्तद्भावानुभवं वितनुते यद्भावगस्तस्य च ।
संयुक्तो बलहीनभावपतिना निन्द्याङ्गभाजां फलं
कुर्यात्तद्विपरीतमेवमुदितं सर्वेषु भावेष्वपि ॥२८॥
लग्नेश के अष्टक वर्ग में जिन भावों में शुभ बिन्दु अधिक हों
उन भावों के स्वामी यदि बलवान् हों और लग्नेश के साथ हों तो उन
भाव सम्बन्धी शुभ फल होगा। किन्तु लग्नेश के अष्टकवर्ग में जिन भावों
में थोड़े शुभ बिन्दु हों उन भावों के स्वामी बलहीन हों और लग्नेश से
संयुक्त हों तो उस भाव सम्बन्धी शुभ फल नहीं होगा। इसी प्रकार सब
भावों का विचार करना चाहिये। बहुतों के मत से बलवान् या
निर्बल इतना मात्र देखें। अष्टक वर्ग का विचार इस श्लोक के लिये
आवश्यक नहीं है। ॥ २८ ॥
दुःस्थानपस्तदितरस्वगृहस्थितश्चेत्
स्वक्षेत्रभावफलमेव करोति नान्यत् ।
मन्दो मृगे सुतगृहे यदि पुत्रसिद्धिः
षष्ठाधिपत्यकृतदोषफलं च नात्र ॥२६॥
यदि कोई ग्रह दो राशियों का स्वामी हो और एक राशि लग्न से
शुभ-स्थान में हो और दूसरी राशि लग्न से दुःस्थान में पड़े और
यदि ग्रह सुस्थान राशि वाले अपने घर में हों तब वह सुस्थान के
स्वामी होने का शुभ फल देता है। दुःस्थान के स्वामी होने का
अशुभफल नहीं देता। उदाहरण के लिये यदि कन्या लग्न हो और
शनि पंचम में मकर राशि का हो तो यद्यपि वह पंचमेश और
षष्ठेश होने से आधा शुभ, आधा पाप होना चाहिये किन्तु मन्त्रेश्वर
महाराज के इस श्लोक में बताये गये सिद्धान्त के अनुसार वह पंचम

पन्द्रहवाँ अध्याय : भावचिन्ता ३०५
में स्वराशि में स्थित होने के कारण शुभ फल देगा और पुत्र सिद्धि
करायेगा । छठे घर के मालिक होने का दोष नहीं होगा । ॥ २९ ॥
राशौ स्थितिर्मिथो योगो दृष्टिः केन्द्रेषु संस्थितिः ।
त्रिकोणे वा स्थितिः पञ्चप्रकारो बन्ध ईरितः ॥३०॥
इस इलोक में सम्बन्ध या बन्ध किसे कहते हैं यह बताते हैं ।
सम्बन्ध या बन्ध पाँच प्रकार का होता है । (१) परस्पर स्थान
सम्बन्ध, मान लीजिये “क” ग्रह “ख” की राशि में बैठा है और “ख”
ग्रह “क” की राशि में । (२) जब दो ग्रह एक ही राशि में हों
(३) जब दो ग्रह एक दूसरे को पूर्ण दृष्टि से देखते हों (४) जब दो
ग्रह केन्द्र में हों (५) जब दो ग्रह त्रिकोण में हों । ॥ ३० ॥

सोलहवाँ अध्याय
द्वादश भावफल
लग्न आदि द्वादश भावों का समुदाय फल
लग्ननवांशपतुल्यतनुः स्याद्वीर्ययुतग्रहतुल्यतनुर्वा
चन्द्रसमेतनवांशपवर्णः कादिविलग्नविभक्तभगात्रः ॥१॥
लग्नेशे केन्द्रकोणे स्फुटकरनिकरे स्वोच्चभे वा स्वभे वा
केन्द्रादन्यत्रसंस्थे निधनभवनपे सौम्ययुक्ते विलग्ने ।
दीर्घायुष्मान्धनाढ्यो महितगुणयुतो भूमिपालप्रशस्तो
लक्ष्मीवान् सुन्दराङ्गो दृढतनुरभयो धार्मिकः सत्कुटुम्बी ॥२॥
सत्सम्बन्धयुते कलेवरपतौ सद्ग्रामवासोऽथवा
सत्सङ्गः प्रबलग्रहेण सहिते विख्यातभूपाश्रयः ।
स्वोच्चस्थे नृपतिः स्वयं स्वगृहगे तज्जन्मभूमौ स्थितिः
सञ्चारश्चरभे स्थितिः स्थिरगृहे द्वन्द्वं द्विरूपं फलम् ॥३॥
विख्यातः किरणोज्ज्वले तनुपतौ सुस्थे सुखी वर्धनो
दुःस्थे दुःखसहक्षनीचभवने वासो निकृष्टस्थले ।
स्वस्थो जीवति शक्तिमत्युदयभे वर्द्धिष्णुरुर्जस्वलो
निःशक्तौ निहतो विपद्भिरसकृत्खिन्नो भवेदातुरः ॥४॥
अर्थस्वामिनि मुख्यभावजुषि सत्स्वर्थे कुटुम्बश्रिया
सर्वोत्कृष्टगुणो धनी च सुमुखी स्याद्दूरदर्शी नरः ।

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३०७
सम्बन्धे सवितुर्द्वितीयपतिना लोकोपकारक्षमां
विद्यामर्थमवाप्नुयादथ शनेः क्षुद्रालपविद्यारतः ॥५॥
जैवे वैदिकधर्मशास्त्रनिपुणो बौधेऽर्थशास्त्रे पटुः
शृङ्गारोक्तिपटुर्भृगौहिमरुचेः किञ्चित्कलाविद्भवेत् ।
कौजे क्रूरकलापटुश्च पिशुनो राहौ स्थिते लोहलः
केतौ भ्रश्यदलोकवाग्धनगतैः पापैश्च मूढोऽधनः ॥६॥
बन्धो यदि स्यात्तनुशौर्यनाथयो-
रन्योन्यराशिस्थितयोर्बलाढ्ययोः ।
धैर्यं च शौर्यं सहजानुकूलतां
प्राप्नोत्ययं साहसकार्यकर्तृ ताम् ॥७॥
शौर्यपे बलिनि सद्ग्रहयुक्ते कारकेऽपि शुभभावमुपेते ।
भ्रातृवृद्धिरथ वीर्यविहीने दुःस्थिते भवति सोदरनाशः ॥८॥
अयुग्मराशौ यदि कारकेशौ
गुर्वर्कभूसूनुनिरोक्षितौ चेत् ।
ओजो गृहः स्याद्यदि विक्रमाख्यः
पुंभ्रातरस्त्वंशवशाद्भवेयुः ॥९॥
दुःस्थाने सुखपे शशिन्यपि सतां योगेक्षणैर्वर्जिते
पापान्तःस्थितिमत्यसद्ग्रहयुते दृष्टे जनन्या मृतिः ।
एतौ द्वावपि वीर्यगौ शुभयुतौ दृष्टौ शुभैर्बन्धुगे-
र्मातुः सौख्यकरौ विधोश्च सुखगेः सौम्यैर्वदेत्तत्सुखम् ॥१०॥

३०८ फलदीपिका
लग्नेशे सुखगेऽथवा सुखपतौ लग्ने तयोरीक्षणे
योगे वा शशिनस्तथा यदि करोत्यन्त्यां स्वमातुः क्रियाम् ।
अन्योन्यं यदि शत्रुनीचभवने षष्ठाष्टमे वा तयो-
र्मातुर्नोपकरोति नाशसमये बन्धस्तयोर्वा न चेत् ॥११॥
मातृभावोक्तवद्वाच्यं पितृभ्रातृसुतादिषु ।
भावकारकभावेशलग्नलग्नेश्वरैर्वदेत् ॥१२॥
सुस्थौ सुखेशभृगुजौ तनुबन्धुयुक्ता-
वान्दोलिकां जनपतेश्वरतां विधत्तः ।
स्वर्णाद्यनर्घ्यमणिभूषणपट्टशय्या-
कामोपभोगकरणानि च गोगजाश्वान् ॥१३॥
दुःस्थे सुखेशे कुजसूर्ययुक्ते
सुखेऽपि वा जन्मगृहं प्रदग्धम् ।
जीर्णं तमोमन्दयुतेऽरियुक्ते
परैर्हृतं गोक्षितिवाहनाद्यम् ॥१४॥
सौम्यर्क्षांशे सौम्ययुक्ते पञ्चमे वा तदीश्वरे ।
वैशेषिकांशे सद्भावे धीमान्निष्कपटी भवेत् ॥१५॥
स्थितिः पापानां वा, द्विषति बलयुक्तारिपतिना
युतो वा दृष्टो वा, यदि रिपुगृहे वा तनुपतिः ।
अरीशः केन्द्रे वाऽप्यशुभखगसंवीक्षितयुतो
रिपूणां पीडां द्राग्भृशमपरिहार्यां वितनुते ॥१६॥
षष्ठेश्वरादतिबलिन्युदयाधिनाथे
सौम्यग्रहांशसहिते शुभदृष्टियुक्ते ।

सोलहवां अध्याय : द्वादश भावफल ३०९
सौख्येश्वरेऽपि सबले यदि केन्द्रकोणे-
ष्द्वारोग्यभाग्यसहितो दृढगात्रयुक्तः ॥१७॥
शत्रु नाथे तु दुःस्थाने नीचमूढारिसंयुते
तस्माद्बलाढ्ये लग्नेशे शत्रु नाशं रवौ शुभे ॥१८॥
यद्भावेशयुतो वैरिनाथो यद्भावसंश्रितः ।
षष्ठस्थितो यद्भावेशस्ते भावाः शत्रुतां ययुः ॥१९॥
सत्संबन्धयुते सप्तर्क्षे तदीशे बलान्विते ।
पतिपुत्रवती साध्वी भार्या सर्वगुणैर्वृता ॥२०॥
केन्द्रादन्यत्र रन्ध्रेशे लग्नेशाद्दुर्बले सति ।
नाधिर्न विघ्नो न क्लेशो नृणामायुश्चिरं भवेत् ॥२१॥
धर्मे कुजे वा सूर्ये वा दुःस्थे तन्नायके सति ।
पापमध्यगते वाऽपि पितुर्मरणमादिशेत् ॥२२॥
दिवा सूर्ये निशा मन्दे सुस्थे शुभनिरीक्षि

३१० फलदीपिका
धर्मे तदीशे वा मन्दयुक्ते दृष्टेऽपि वा चरे ।
जातो दत्तो भवेन्नूनं व्ययेशे बलशालिनि ॥२६॥
नभसि शुभखगे वा तत्पतौ केन्द्रकोणे
बलिनि निजगृहोच्चे कर्मगे लग्नपे वा ।
महितपृथुयशाः स्याद्धर्मकर्मप्रवृत्तिः
नृपतिसदृशभाग्यं दीर्घमायुश्च तस्य ॥२७॥
ऊर्जस्वी जनवल्लभो दशमगे सूर्ये कुजे वा महत्
कार्यं साधयति प्रतापबहुलं खेशश्च सुस्थो यदि ।
सव्यापारवतीं क्रियां वितनुते सौम्येषु सच्छ्लाघितां
कर्मस्थेष्वहिमन्दकेतुषु भवेद्दुष्कर्मकारी नरः ॥२८॥
लाभेशे यद्भावनाथयुक्ते यद्भावगेऽपि वा ।
भावं तदनुरूपस्य वस्तुनो लाभगैरपि ॥२९॥
व्ययस्थितो यद्भावेशो व्ययेशो यत्र तिष्ठति ।
तस्य भावस्यानुरूपवस्तुनो नाशमादिशेत् ॥३०॥
(i) (क) जातक का शरीर या तो नवांश लग्न के स्वामी के
अनुसार होता है या जन्म-कुण्डली में जो ग्रह सबसे बलवान् हो उसके
समान हो । चन्द्रमा जिस नवांश में हो उस नवांश के स्वामी का
जो वर्ण (रंग-रूप) हो उसी के अनुकूल जातक का वर्ण होगा । मेष
से लेकर बारह राशियों तक काल पुरुष के बारह अंग माने गये हैं;
इसी प्रकार लग्न से लेकर बारहवें भाव तक काल पुरुष के बारह अंग
माने गये हैं, यहाँ पर मन्त्रेश्वर महाराज यह बताते हैं कि यदि लग्न बड़ी
राशि है तो लग्न में शुभ ग्रह होने से जातक का सिर बड़ा और और
सुन्दर होगा । इसी प्रकार भिन्न-भिन्न भावों में कैसी राशि पड़ी है

सोलहवाँ अध्याय : द्वादश भावफल ३११
और कैसे ग्रह हैं उसी प्रकार का शरीर और शरीर के अवयव जातक
के होंगे । ॥२॥
(ख) लग्नेश केन्द्र या कोण में हो, अस्त न हो और अपनी उच्च
राशि या स्वराशि में हो तथा लग्न में सौम्य ग्रह हो; इस प्रकार लग्न
और लग्नेश दोनों सुधरे हुए हों और अष्टमेश केन्द्र के अलावा और किसी
स्थान में हो तो जातक दीर्घायु, धनवान्, प्रशंसित, गुण वाला, राजा
से प्रशंसित, लक्ष्मीवान्, सुन्दर अंग वाला, दृढ़ शरीर का, निर्भय,
धार्मिक और अच्छे कुटुम्ब वाला होता है । ॥२॥
(ग) यदि लग्नेश का अच्छे ग्रह से सम्बन्ध हो तो जातक उत्तम
ग्राम में वास करता है या उसे सज्जन मनुष्यों का सहवास प्राप्त होता
है । यदि लग्नेश किसी प्रबल ग्रह के साथ हो तो जातक को किसी
विख्यात राजा का आश्रय प्राप्त होता है । इससे यह भी नतीजा
निकलता है कि यदि लग्नेश दुःस्थान में पड़ा है तो जातक भी
दुःस्थान में रहेगा और यदि नीच, निर्बल ग्रहों के साथ हो तो मनुष्य
का संग भी ऐसे ही मनुष्यों के साथ होता है। यदि लग्नेश उच्च हो
तो जातक राजा हो। यदि लग्नेश स्व-गृही हो तो जातक अपनी जन्म-
भूमि में रहता चला आये । यदि चर-राशि में हो तो जातक एक जगह
स्थिर होकर न रहे । यदि लग्नेश स्थिर राशि में हो तो एक जगह जम
कर रहे । और यदि द्वि-स्वभाव राशि में हो तो दोनों प्रकार का
फल हो । अर्थात् कभी संचारशील हो कभी जम कर रहे । ॥३॥
(घ) यदि जन्म के समय लग्नेश किरणों से प्रकाशमान हो-
अर्थात् अस्त न हो तो मनुष्य विख्यात होता है। यदि लग्नेश सुस्थान
में हो तो जातक सुखी और वृद्धि को प्राप्त होता है। किंतु यदि
लग्नेश, नीच राशि, पाप ग्रह की राशि या दुःस्थान में हो तो जातक
निकृष्ट स्थान में वास करता है। यदि लग्नेश बलवान् होकर सुस्थान में
हो तो जातक सुखी, पराक्रमी, वृद्धि को प्राप्त, उत्तम जीवन व्यतीत

३१२ फलदीपिका
करता है किंतु यदि लग्नेश निर्बल हो तो मनुष्य विपत्तियों से आक्रान्त
(घिरा हुआ), रोगों से खिन्न (अर्थात् रोगी) अर्थात् बार-बार रोगों
और विपत्तियों का शिकार बना हुआ दुःखी जीवन व्यतीत करता है।
इन श्लोकों में लग्नेश के बलवान् अथवा दुर्बल-उत्तम स्थान किंवा
दुस्थान में रहने की महिमा बताई गई है। ॥४॥
(ii) (क) यदि द्वितीयेश लग्न में हो और शुभग्रह दूसरे में
हो, तो जातक सर्व उत्कृष्ट गुणों वाला, धनी, सुन्दर मुख वाला, दूरदर्शी
और सत्कुटुम्ब वाला होता है। यदि धनेश का सूर्य से सम्बन्ध हो तो
जातक लोक का उपकार करने वाला, विद्वान् और धनवान् होगा।
यदि धनेश का शनि से सम्बन्ध हो तो जातक की विद्या क्षुद्र (छोटे प्रकार
की) और अल्प होगी। ॥५॥
• (ख) यदि धनेश का बृहस्पति से सम्बन्ध हो तो जातक वेद
और धर्मशास्त्र में विद्वान् होता है। यदि बुध से सम्बन्ध हो तो
अर्थशास्त्र में पटु हो। यदि शुक्र से सम्बन्ध हो तो श्रृंगार सम्बन्धी शास्त्र
में (साहित्य, कामशास्त्र इत्यादि); और चन्द्रमा का द्वितीयेश से सम्बन्ध
हो तो किसी-किसी कला में कुशल हो; यदि मंगल से सम्बन्ध हो तो
क्रूर कलाओं में विद्वान् हो और जातक चुगलखोर भी हो। यदि
राहु द्वितीय स्थान में स्थित हो (या द्वितीयेश के साथ हो) तो स्पष्ट
उच्चारण न करने वाला और यदि केतु द्वितीय में हो तो हकलावे
या असत्य वचन बोलने वाला हो। यदि धनस्थान में पाप-ग्रह हो तो
मनुष्य मूर्ख और निर्धन होता है। ॥६॥
ऊपर श्लोक ५ और ६ में द्वितीयेश के विविध ग्रहों में सम्बन्ध
का जो फल बताया गया है वह फल उस दशा में भी होता है जब
द्वितीय भाव भी विविध ग्रहों से सम्बन्धित हो, ऐसा हमारा
मत है।