फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
२५८ फलदीपिका
यदि दोनों द्विस्वभाव या एक चर एक स्थिर राशि में हो तो
मध्यायु होता है।
(ख) लग्नेश नवांश राशि और चन्द्रेश नवांश राशि । यदि दोनो चर
में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर
या एक चर एक द्विस्वभाव में हो तो अल्पायु । यदि दोनों
द्विस्वभाव में या एक चर एक स्थिर में हों तो मध्यायु होती है।
(ग) लग्नेश द्वादशांश राशि और रन्ध्रेश द्वादशांश राशि। यदि
दोनों चर राशि में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो
दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर में या एक चर एक द्विस्वभाव में तो
अल्पायु । यदि दोनों द्विस्वभाव में वा एक चर एक स्थिर में हो तो
मध्यायु होती है ।
तीनों मत से विचार करने पर बहुमत से जो निर्णय आये वह
निर्णय मानना चाहिये ।॥ १४॥
लग्नाधीशशुभाः क्रमाद्बहुसमाल्पायूंषि केन्द्रादिगाः
रन्ध्रेशोग्रखगास्तथा यदि गता व्यस्तं विदध्युः फलम् ।
जन्मेशाष्टमनाथयोरुदयपच्छिद्रे शयोर्मन्त्रतो
भास्वल्लग्नपयाश्चिरायुरहितेऽल्पायुः समे मध्यमः ॥१५॥
यदि लग्न का स्वामी और सब शुभ-ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घायु
(२) पणफर में हो तो मध्यायु (३) और आपोक्लिम में हों तो
नोट—रन्ध्रेश अष्टमेश को कहते हैं।
टिप्पणी : यदि तीनों से विभिन्न मत आवे तो जैमिनि के मतानुसार विचार
करें । जैमिनि के मत के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका
पृ० १२६
तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २५९
अल्पायु। यदि आठवें घर का स्वामी और सब क्रूर-ग्रह (१) केन्द्र
में हो तो अल्पायु (२) पणफर में हो तो मध्यायु और (३)
आपोक्लिम में हों तो दीर्घायु होता है ।
यह देखिये कि निम्नलिखित परस्पर मित्र हैं या सम या शत्रु ;
(क) चन्द्र जिस राशि में है उसका स्वामी और चन्द्रमा जिस
राशि में है उससे अष्टम का स्वामी आपस में ।
(ख) लग्नेश और अष्टमेश आपस में ।
(ग) लग्नेश और सूर्य आपस में ।
यदि ये परस्पर मित्र हों तो दीर्घायु; सम हों तो मध्यायु;
शत्रु हों तो अल्पायु ॥ १५ ॥
लग्नाधिपो लग्ननवांशनायको
जन्मेश्वरो जन्मनवांशनायकः ।
स्वस्वाष्टमेशाद्यदि चेद्बलान्विता
दीर्घायुषः स्युर्विपरीतमन्यथा ॥१६॥
यदि लग्न का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि
लग्न नवांश का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो, यदि
जन्म राशि का स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक बली हो और
चन्द्रमा जिस नवांश में है उसका स्वामी अपने अष्टमेश से अधिक
बली हो तो दीर्घायु होती है किन्तु यदि लग्नेश आदि अपने अपने
अष्टमेश की अपेक्षा दुर्बल हों तो अल्पायु होती है ।
ऊपर जो विचार दिया गया है उसमें लग्न कुण्डली के साथ
साथ नवांश कुण्डली की भी आवश्यकता पड़ेगी । निम्नलिखित
चारों का अपने अपने अष्टमेशों से बलवान् होना आवश्यक है ।
(१) लग्न का स्वामी (२) लग्न नवांश का स्वामी (३) चन्द्र राशि
का स्वामी (४) चन्द्र नवांश का स्वामी-तभी दीर्घायु होगी । ॥ १६ ॥
२६० फलदीपिका
लग्नेश्वरादतिबली निधनेश्वरोऽसौ
केन्द्रस्थितो निधनरिः फगतैश्च पापैः ।
तस्यायुरल्पमथवा यदि मध्यमायु-
रुत्साहसंकटवशात्परमायुरेति ॥१७॥
यदि लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अत्यन्त बलवान् हो और केन्द्र
में हो तथा पाप-ग्रह अष्टम और द्वादश में हों तो जातक अल्पायु
होता है या मध्यम आयु ; यदि दीर्घायु प्राप्त भी करे तो जीवन संकट
की दशा में बीतेगा। ॥ १७॥
नरोऽल्पायुर्योगे प्रथमभगणे नश्यति शने-
र्द्वितीये मध्यायुर्यदि भवति दीर्घायुषि सति ।
तृतीये निर्याणं स्फुटशनिगुर्वर्कहिमगून्
दशां भुक्तिं कष्टामपि वदति निश्चित्य सुमतिः ॥१८॥
नीचे लिखे चारों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़
लीजिये :
सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा शनि
उदाहरण के लिये जिसकी जन्मकुंडली का विचार कर रहे हैं
उसके यह चारों ग्रह स्पष्ट जोड़े ।
सूर्य ७—२६
चन्द्र ११—२०
गुरु ६—१४
शनि ०—७
योग २६—७ या २—७
अर्थात् मिथुन के सात अंश ।
यदि इस जातक की अल्पायु है तो गोचर वश जब शनि प्रथम बार
तेरहवां अध्याय : आयुर्भाव २६१
मिथुन राशि के सात अंश पर आवेगा तब इसकी मृत्यु होगी । यदि
मध्यायु है तो जब शनि द्वितीय बार मिथुन के सात अंश पर आवेगा
तब मृत्यु होगी और यदि दीर्घायु है तो शनि जब गोचरवश तृतीय
बार मिथुन के ७ अंश पर आवेगा तब मृत्यु होगी । यह विचार
करते समय दशा और अन्तर्दशा का भी विचार कर लेना
चाहिए । ॥१८॥
सपापो लग्नेशो रविहतरुचिर्नीचरिपुगो
यदा दुःस्थानेषु स्थितमुपगतो गोचरवशात् ।
तनौ वा तद्योगो यदि निधनमाहुस्तनुभृतां
नवांशाद्द्रेष्काणाच्छिशिरकरलग्नादपि वदेत् ॥१९॥
यदि लग्नेश किसी क्रूर ग्रह के साथ हो और नीच या शत्रु राशि
में रहकर अस्त हो तो जब वह गोचरवश दुस्थान में जावे या लग्न में
आवे या लग्न से सम्बन्ध करे तो जातक की मृत्यु होगी । जो विचार
ऊपर लग्नेश द्वारा बताया गया है उसी प्रकार नवांश लग्न के स्वामी,
द्रेष्काण लग्न के स्वामी तथा चन्द्र राशि के स्वामी से भी करना
चाहिए ॥१९॥*
शशी तदारूढगृहाधिपश्च
लग्नाधिनाथश्च यदा त्रयोऽमी
नोट : ऊपर के श्लोक १९ में कई बातें बता दीं । गोचरवश जब
६, ८, १२ वें या लग्न में ग्रह आवे — किन्तु प्रायः गोचरवश ग्रह इन
स्थानों में घूमते ही रहते हैं । इसलिये हमारे विचार से यदि कोई व्यक्ति
बीमार हो और सूक्ष्म काल निर्णय करना हो तभी इस श्लोक में दिया
गया विचार काम में लाया जा सकता है ।
२६२ फलदीपिका
गुणाधिकाः सद्ग्रहदृष्टियुक्ता
गुणाधिकं तं कथयन्ति कालम् ॥२०॥
जब चन्द्रमा, चन्द्रराशि का स्वामी और लग्नेश ये तीनों गोचर-
वश बलवान् और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हों तो वह समय जातक के लिए
बहुत अच्छा अर्थात् शुभ व्यतीत होगा । यहाँ यह भी विचार कर लेना
चाहिये कि लग्नेश, चन्द्रमा और चन्द्रराशि के स्वामी जहाँ जहां जन्म
कुण्डली में बैठे है वहाँ वहां उन पर भी गोचर द्वारा शुभ-दृष्टि पड़
रही है या नहीं । उदाहरण के लिये किसी का सिंह लग्न है और
सूर्य वृश्चिक में है तो न केवल गोचर वश सूर्य बलवान् होना चाहिये
बल्कि जन्म कुण्डली में वृश्चिक में जो सूर्य है उस पर भी गोचरवश
गुरु की दृष्टि आदि होनी चाहिये । ॥२०॥
लग्नाधिपोऽतिबलवानशुभैरदृष्टः
केन्द्रस्थितः शुभखगैरवलोक्यमानः ।
मृत्युं विहाय विदधाति स दीर्घमायुः
सार्द्धं गुणैर्बहुभिरूजितराजलक्ष्म्या ॥२१॥
यदि लग्न का स्वामी अति बलवान् हो, अशुभ ग्रहों से न देखा
जाता हो, केन्द्र में बैठा हो और शुभ-ग्रहों से देखा जाता हो तो
ऐसा बलवान् लग्नेश मारकों को रोकता है और दीर्घायु के साथ-साथ
गुण, लक्ष्मी और ऐश्वर्य प्रदान करता है । ॥२१॥
सर्वातिशाय्यतिबलः स्फुरदंशुजालो
लग्ने स्थितः प्रशमयेत् सुरराजमन्त्री ।
- द - श - ा - प ् - र - क - ा - र - ा - त ् ।
Wait, "दशयोडु" -> द - श - यो - डु = दशयोडु! (दशया + उडु = दशयोडु).
Then: द - श - ा - प ् - र - क - ा - र - ा - त ् = दशाप्रकारात् ।
Yes! "यत्कालचक्रदशयोडुदशाप्रकारात् ।"
Let's check line 21:
"नीरोग रहता हुआ सौ वर्ष तक जीता है । ॥२४॥"
Notice there is a dot above in line 12? Under "दोषों" there is a stray dot in line 13: "होता है ." - just print noise.
In line 13: "बहुत शुभ होता है ।॥२३॥"
Everything looks very clean, precise, and matches the printed page exactly.तेरहवाँ अध्याय : आयुर्भाव २६३
एको बहूनि दुरितानि सुदुस्तराणि
भक्त्या प्रयुक्त इव चक्रधरे प्रणामः ॥२२॥
यदि बलवान्, बृहस्पति लग्न में बैठा हो (किन्तु अस्त नहीं होना
चाहिये) तो वह अनेक दोषों को शान्त करता है जैसे यदि भक्ति
पूर्वक भगवान विष्णु को एक बार प्रणाम किया जाय तो अनेक संकट
दूर हो
२६४ फलदीपिका
सम्यक्स्फुटाभिहितया क्रिययाप्तवाव्या-
दायुर्बुधो वदतु भूरिपरीक्ष्य च ॥२५॥
जन्म-कुण्डली में आचार्यों के आदेशानुसार ग्रह-स्पष्ट, दशा आदि का
गणित कर श्रीपति ने जो दशायें बतायी हैं वे तथा अष्टकवर्ग, कालचक्र
दशा आदि का पूरा विचार कर आयु का निर्णय करना चाहिये ॥२५॥
म यहाँ पुस्तक में दिए गए पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत कर रहे हैं:
चौदहवां अध्याय
रोगनिर्णय
रोगस्य चिन्तामपि रोगभावस्थितैर्ग्रहैर्वा व्ययमृत्युसंस्थैः ।
रोगेश्वरेणापि तदन्वितैर्वा द्वित्र्यादिसम्वादवशाद्वदन्तु ॥१॥
इस अध्याय में रोग, मृत्यु, पूर्व जन्म और भविष्य जन्म के
विषय में बताया गया है।
१. रोग के विषय में नीचे लिखे हुए ग्रहों से विचार
करना चाहिये :— (क) जो ग्रह छठे घर में हों (ख) जो ग्रह
अष्टम में हों (ग) जो ग्रह बारहवें घर में हों (घ) छठे घर के
मालिक से (ङ) जो ग्रह छठे घर के मालिक के साथ हों। इस
प्रकार इन ग्रहों के विचार से, दो तीन प्रकार से जब एक ही
रोग निर्दिष्ट मालूम पड़े तब वह रोग होगा यह नतीजा निकालना
चाहिये ॥ १ ॥
पित्तोष्णज्वरतापदेहतपनापस्मारहृत्क्रोडज-
व्याधीन्वक्ति रविर्हृ'गार्त्यरिभयं त्वग्दोष
२६६ फलदीपिका
तृष्णासृक्कोपपित्तज्वरमनलविषास्त्रातिकुष्ठाक्षिरोगान्
गुल्मापस्मारमज्जाविहतिपरुषतापामिकादेहभङ्गान् ।
भूपारिस्तेनपीडां सहजसुतसुहृद्वैरियुद्धं विधत्ते
रक्षोगन्धर्वघोरग्रहभयमवनीसूनुरुर्ध्वाङ्गरोगम् ॥१४॥
भ्रान्तिं दुर्वचनं दृगामयगलघ्राणोत्थरोगं ज्वरं
पित्तश्लेष्मसमीरजं विषमपि त्वग्दोषपाण्ड्वामयान् ।
दुःस्वप्नं च विचर्चिकाग्निपतने पारुष्यबन्धश्रमान् ।
गन्धर्वक्षितिहर्म्यवाहिभिरपि ज्ञो वक्ति पीडां ग्रहैः ॥१५॥
गुल्मान्त्रज्वरशोकमोहकफजान् श्रोत्रार्तिमोहामयान्
देवस्थाननिधिप्रपीडनमहीदेवेशशापोद्भवम् ।
रोगं किन्नरयक्षदेवफणभृद्विद्याधराद्युद्भवं
जीवः सूचयति स्वयं बुध
चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६७
जब सूर्य रोग कारक ग्रह होता है तब निम्नलिखित रोगों की
सम्भावना होती हैं, या यह समझिये कि सूर्य निम्नलिखित रोग
और क्लेशों का कारक है ।
(१) पित्त (१) उष्ण ज्वर ( बुखार ) (३) शरीर में जलन
रहना (४) अपस्मार (मिर्गी) (५) हृदय रोग (हार्ट डिजीज)
(६) नेत्र रोग (७) नाभि से नीचे प्रदेश में या कोख में बीमारी
(८) चर्मरोग (९) अस्थि स्रुति (१०) शत्रुओं से भय, (११) काष्ठ
(१२) अग्नि, अस्त्र या विष से पीड़ा (१३) स्त्री या पुत्रों से पीड़ा
(१४) चोर या चौपायों से भय (१५) सर्प से भय (१६) राजा, धर्म-
राज (यम) भगवान्भूतेश (रुद्र) से भय होता है ।
चन्द्रमा निम्नलिखित रोग या कष्ट उत्पन्न करता है (१) निद्रा
रोग (या तो नींद न आवे या बहुत नींद आवे या सोते सोते चलना
इसे सन्यास रोग भी कहते हैं) (२) आलस्य (३) कफ, (४) अतिसार
(संग्रहणी) (५) पिटक, कारबंकिल (६.) शीतज्वर (ठंड देकर जो बुखार
आवे या ठंड के कारण जो बुखार हो (७) सींग वाले जानवर
वा जल में रहने वाले जानवर मगर मच्छ आदि मे भय (८) मंदाग्नि
(भूख न लगना) (९) अरुचि (यह भी मन्दाग्नि का एक प्रकार है—जब
जठराग्नि के मन्द हो जाने से भूख नहीं लगती है तो भोजन की इच्छा
नहीं होती है) (१०) स्त्रियों से व्यथा (११) पीलिया (१२) खून
खराबी (१३) जल से भय । (१४) चित्त की थकावट । (१५) बाल ग्रह-
दुर्गा-किन्नर- धर्मराज (यम )-सर्प और यक्षिणी से भय होता है ।। ३ ।।
मंगल निम्नलिखित रोग और क्लेश उत्पन्न करता है । (१) तृष्णा-
बहुत अधिक प्यास लगना (२) प्रकोप (वायु जनित या पित्त प्रकोप)
(३) पित्तज्वर, अग्नि, विष या शस्त्र से भय (४) कुष्ठ (कोढ़) (५)
नेत्र रोग- (६) गुल्म (पेट में फोड़ा या एपिन्डिसाइटीज) (७)
अपस्मार (८) मज्जा रोग (हड्डी के अन्दर मज्जा होती है उसकी कमी
से जो रोग हो जाते हैं (९) खुजली (१०) चमड़े में खुरदरापन (११)
२६८ फलदीपिका
देह भंग (शरीर का कोई भाग टूट जाय) (१२) राजा, अग्नि,
और चोरों से भय (१३) भाई, मित्र, पुत्रों से कलह (१४) शत्रुओं
से युद्ध (१५) राक्षस, गन्धर्व घोर ग्रह से भय और शरीर के ऊपर के
भाग में बीमारियाँ होती हैं ॥४॥
बुध नीचे लिखे हुये रोग और क्लेश उत्पन्न करता है, (१)
भ्रान्ति (बहम, ) सोचने में अव्यवस्था हो जाय, विचार में तर्क
शक्ति न रहे, व्यर्थ की चिन्ता से मन उलटा पलटा सोचने लगे,
मन में मिथ्या चिन्ता, विना कारण भय, आशंका बनी रहे, जो बात
यथार्थ हो उसको भूल कर गलत बात याद रहे या गलत धारणा
हो जावे —यह सब भ्रान्ति के लक्षण हैं (२) दुर्वचन बोलना—
(३) नेत्र रोग (४) गले का रोग (५) नासिका रोग (६) वात, पित्त
कफ इस त्रिदोष से उत्पन्न ज्वर (७) विष की बीमारी (८) चर्म
रोग (९) पीलिया (१०) दुःस्वप्न, खुजली (११) अग्नि में पड़ने का
डर—लोग जातक के साथ परुषता (कठोरता) का व्यवहार करें या
जातक स्वयं अन्य लोगों के साथ परुषता का व्यवहार करे (१२) श्रम
(परिश्रम का काम करना पड़े) (१३) गन्धर्व आदि से उत्पन्न रोग। यह
सब बुध के कारण होते हैं।
अब वृहस्पति के कारण जो रोग, क्लेश आदि होते हैं वह
सब बताते हैं । (१) गुल्म, पेट का फोड़ा-रसोली आदि का रोग,
एपिन्डसाइटोज (२) अंतड़ियों का ज्वर (मोती झरा) (३) मूर्च्छा
यह सब रोग कफ के दोष से होते हैं क्योंकि कफ का अधिष्ठाता
बृहस्पति है (४) कान के रोग (५) देव स्थान सम्बन्धी पीड़ा अर्थात्
मन्दिर आदि की जायदाद लेकर मुकदमे बाजी (६) ब्राह्मणों के शाप
से कष्ट (७) किसी खजाने, ट्रस्ट या बैंक के मामलों के कारण
कलह या अदालती कार्रवाई । (८) विद्याधर, यक्ष-किन्नर, देवता, सर्प
आदि के द्वारा किया हुआ उपद्रव (९) अपने गुरुओं—माननीयों
तथा बड़ों के साथ किया हुआ अभद्र या अशिष्ट व्यवहार या उनके
चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २६९
प्रति कर्तव्य पालन न किया हो तो उस अपराध का दंड बृहस्पति की
दशा, अन्तर्दशा में होता है यह दैवी नियम है ।। ६ ।।
अब शुक्र ग्रह के कारण क्या क्या रोग, क्लेश आदि होते हैं
वह बताये जाते हैं :—(१) रक्त की कमी के कारण पीलापन
(२) कफ और वायु के दोष से नेत्र रोग, मूत्र रोग, प्रमेह जननेन्द्रिय
आदि में रोग—पेशाब करने में कठिनता या कष्ट (उपदंश, सुजाक
आदि के कारण या प्रोस्ट्रेट ग्लैण्ड बढ़ जाने की वजह से) (४)
वीर्य की कमी (५) संभोग में अक्षमता (६) अत्यन्त संभोग के कारण
शरीर में कमजोरी तथा चेहरे पर कान्ति हीनता (७) शोष (शरीर
का सूखना) (८) योगिनी, यक्षिणी एवं मातृगण से भय । (९)
शुक्र क्लेश कारक होने से मित्रों से मित्रता भी टूट जाती है।
अब उन रोग और क्लेशों का वर्णन करते हैं जो शनि के कारण
उत्पन्न होते हैं :—
(१) वात और कफ के द्वारा उत्पन्न रोग (२) टांग में दर्द
या लंगड़ाना, (३) अत्यधिक श्रम के कारण थकान (४) भ्रान्ति
(भ्रान्ति किसे कहते है? जहाँ बुध के रोग बताये गये हैं वहां विस्तार
से समझाया गया है)। (५) कुक्षि (काँख में रोग) (६) शरीर के भीतर
बहुत उष्णता हो जाय (७) नौकरों से कष्ट—नौकर नौकरी छोड़ कर
चलें जायें या धोखा या दगा दें। (८) भार्या और पुत्र सम्बन्धी विपत्ति
(९) अपने शरीर के किसी भाग में चोट (१०) हृदय ताप (मान-
सिक चिन्ता) पेड़ या पत्थर से चोट (११) पिशाच आदि की
पीडा (१२) आपत्ति ॥८॥
अब राहु ग्रह के कारण क्या क्लेश, रोग चिन्ता आदि होते हैं वह बताते
हैं:—(१) हृदय रोग (२) हृदय में ताप (जलन) (३) कोढ़ (४)
दुर्मति (५) भ्रान्ति (६) विष के कारण उत्पन्न हुई बीमारियां (७) पैर
में पीड़ा या चोट (८) स्त्री, पुत्र को कष्ट या उनके कारण कष्ट (९)
सर्प और पिशाचों से भय ।
२७० फलदीपिका
अब केतु क्या शारीरिक या मानसिक कष्ट, क्लेश उत्पन्न करता है
यह बताते हैं—ब्राह्मणों और क्षत्रियों से कलह के कारण कष्ट, शत्रुओं
से भय। अब गुलिक के कारण क्या कष्ट होते हैं यह बताते हैं। गुलिक
को ही मान्दि भी कहते हैं। गुलिक यदि छठे घर में हो या छठे ग्रह के
स्वामी के साथ हो तो शरीर में पीड़ा, किसी स्वजन की मृत्यु और
प्रेत से भय होता है ॥९॥
मन्दारान्वितवोक्षिते व्ययधने चन्द्रारुणौ चाक्षिरुक्
शौर्याद्याङ्गिरसो यमारसहिता दृष्टा यदि श्रोत्ररुक् ।
सोग्रे पञ्चमभे भवेदुदररुग्रन्ध्रारिनाथान्विते
तद्वत्सप्तमनैधने सगुदरुच्छुक्रे च गुह्यामयः ॥१०॥
षष्ठेऽर्केऽप्यथवाष्टमे ज्वरभयं भौमे च केतौ व्रणं
शुक्रे गुह्यरुजं क्षयं सुरगुरौ मन्दे च वातामयम् ।
राहौ भौमनिरीक्षिते च पिलकां सेन्दौ शनौ गुल्मजं
क्षीणोन्दौ जलभेषु पापसहिते तत्स्थेऽम्बुरोगं क्षयम् ॥११॥
अब रोग के कुछ अन्य योग बताये जाते हैं:—(१) यदि चन्द्रमा
और सूर्य बारहवें या दूसरे स्थान में हों और उनको मंगल और शनि
देखते हों तो नेत्र रोग होता है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि
सूर्य चन्द्र दोनों एक साथ या एक दूसरे घर में हो और उनको मंगल
और शनि दोनों पूर्ण दृष्टि से देखते हों तो संभवतः उस आँख से
दिखाई देना बिल्कुल बन्द हो जाय। दूसरा स्थान दाहिने नेत्र का है
इस कारण दाहिने नेत्र में रोग होगा । ऊपर जो योग बताया
गया है वह यदि बारहवें घर में होगा तो बाएँ नेत्र की दृष्टि नष्ट
होगी। इसी प्रकार यदि सूर्य और चन्द्रमा इन दोनों में से कोई—एक
दूसरे या बारहवें घर में बैठा हो और उसको शनि या मंगल देखता हो
चौदहवाँ अध्याय : रोगनिर्णय २७१
तो दूसरे में सूर्य या चन्द्र बैठने से दाहिने नेत्र का रोग होगा और
बारहवें घर में सूर्य या चन्द्र बैठने से और उस को मंगल या शनि के
देखने से बायें नेत्र में रोग होगा। दूसरे और बारहवें घर को नेत्र स्थान
कहते हैं। नेत्र स्थान में बैठे हुए सूर्य या चन्द्र को केवल मंगल या
केवल शनि देखे तो थोड़ा कष्ट और यदि मंगल और शनि दोनों देखें
तो विशेष कष्ट समझना चाहिये ऐसा हमारा अनुभव है। हमारा
यह भी अनुभव है कि यदि नेत्र स्थान में सूर्य, चन्द्र न भी बैठे हों अन्य
पाप ग्रह बैठे हों या पाप ग्रह की दृष्टि हो तो भी नेत्र की दृष्टि में
कमी हो जाती है।
(२) यदि तीसरे और ग्यारहवें घर और बृहस्पति-मंगल
शनि से युत या दृष्ट हों तो कान का रोग होता है। तीसरे से
दाहिने कान का विचार किया जाता है ग्यारहवें से बाँये कान का।
सुनना (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध इन पाँच गुणों में से) शब्द से
सम्बन्ध रखता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश यह पाँच
तत्त्व हैं। सूर्य और मंगल ग्रह का अग्नि तत्त्व, चन्द्रमा और शुक्र का
जल तत्त्व, बुध का पृथिवी तत्त्व, शनि का वायु तत्त्व और बृहस्पति का
आकाश तत्त्व है। शब्दगुण का अधिष्ठाता आकाश तत्त्व है। आकाश तत्त्व
बृहस्पति से सम्बन्धित होने के कारण यह कहा गया है कि यदि बृहस्पति
मंगल, शनि से (मंगल से या शनि से या शनि, मंगल दोनों से) पूर्ण
दृष्टि से देखा जाता हो, या मंगल, शनि के साथ हो तो कान के रोग
अथवा बहरापन होता है। यहाँ तारतम्य से यह विचार कर लेना
चाहिये कि तृतीय और एकादश घर जितने निर्बल होंगे और जितनी
अधिक पाप दृष्टि इन दोनों पर पड़ेगी—या जितने अधिक पाप
ग्रहों के साथ ये तथा बृहस्पति (शब्द गुण का अधिष्ठाता होने
के कारण) होंगे उतना ही तीव्र (अधिक) कान का रोग होगा।
मंगल पित्त प्रधान है इस लिए मंगल की युति या दृष्टि पित्त
के कारण या फोड़ा फुंसी, रक्त स्राव आदि का रोग कान में
२७२ फलदीपिका
करेगा। शनि वायु प्रधान है इस कारण, शनि जब कान के
रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही
तीन दोष आयुर्वेद के हिसाब से “त्रिदोष” हैं जिनके कुपित हो जाने से
या असामञ्जस्य से शरीर में रोग होते हैं।
(३) मंगल पंचम में होने से उदर रोग होता है। (कोई भी उग्र-
ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता
है। पांचवां स्थान पेट का है।
(४) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बन्धी
प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।
(५) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो
तो गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा
का स्थान है। यहां पाप ग्रह बैठे हों या दुःस्थान (छठे आठवें)
के स्वामी बैठे हों तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न
करते हैं। ॥ १० ॥
(१) यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो ज्वर (बुखार) का
भय (२) यदि छठे या आठवें घर में मंगल या केतु हों तो व्रण
(घाव, चोट, जख्म) (३) छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो
जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग,
सुजाक, आतशक आदि) (४) यदि छठे या आठवें घर में वृहस्पति
हो तो क्षय (यक्ष्मा, टी. बी. आदि) (५) यदि छठे या आठवें
शनि हो तो वात (वायु रोग) (६) यदि छठे या आठवें मंगल राहु
हों या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि
फोड़ा या सामान्य फोड़ा) (७) यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा
और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण यथा तिल्ली बढ़
जाने के कारण—पेट में पसलियों के नीचे—दाहिनी ओर यकृत
(जिगर) और बांयीं ओर प्लीहा (तिल्ली, होती है) (८) यदि कृष्ण
चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७३
पक्ष का क्षीण चन्द्र पाप ग्रह के साथ हो और जल राशि* में छठे
या आठवें हों तो अम्बू रोग (पेट या शरीर के अन्य भाग में पानी
भर जाना, जलोदर) या क्षय (यक्ष्मा टी० बी० आदि) का रोग होता
है ॥ ११ ॥
जातो गच्छति येन केन मरणं वक्ष्येऽथ तत्कारणं
रन्ध्रस्थैस्तदवेक्षकैर्बलवता तस्योक्तरोगैर्मृतिः ।
रन्ध्रक्षोक्तरुजाथवा मृतपतिप्राप्तर्क्षदोषेण वा
रन्ध्रेशेन खरत्रिभागपतिना मृत्युं वदेन्निश्चितम् ॥१२॥
ग्रहेण युक्ते निधने तदुक्तरोगैर्मृतिर्वाऽथ तदीक्षकस्य
ग्रहैर्विमुक्ते निधनेऽथ तस्य राशेः स्वभावोदितदोषजाता ॥१३॥
अग्न्युष्णज्वरपित्तशस्त्रजमिनश्चन्द्रो विसूच्यम्बुरु-
ग्यक्ष्मादि क्षितिजोऽसृजा च दहनक्षुद्राभिचारायुधैः ।
पाण्ड्वादि भ्रमजं बुधो गुरुरनायासेन मृत्युं कफात्
स्त्रीसङ्गोत्थरुजं कविस्तु मरुता वा संनिपातैः शनि ॥१४॥
कुष्ठेन वा कृत्रिमभक्षणाद्वा
राहुर्विषाद्वाथ मसूरिकाद्यैः ।
कुर्याच्छिखी दुर्मरणं नराणां
रिपोर्विरोधादपि कीटकाद्यैः ॥१५॥
लग्नादष्टमराशेः स्वभावदोषोद्भवं वदेन्मृत्युम् ।
निधनेशस्य नवांशस्थितराशिनिमित्तदोषजनितं वा ॥१६॥
- होरासार के मत से 'अलिझषमकर कुलीरा जलात्मका' अध्याय
१ श्लोक ८, । कर्क, वृश्चिक, मकर और मीन जलराशि हैं ।
२७४ फलदीपिका
पैत्त्यज्वरोष्णैर्जठराग्निनाजे
वृषे त्रिदोषैर्दहनाच्च शस्त्रात् ।
युग्मे तु कालश्वसनोष्णशूलै-
रुन्मादवातारुचिभिः कुलीरे ॥१७॥
मृग्ज्वरस्फोटजशत्रुजं हरौ
स्त्रियां स्त्रियागुह्यरुजा प्रपातनात् ।
तुलाधरे धीज्वरसंनिपातजं
प्लीहालिपाण्डुग्रहणोरुजालिनि ॥१८॥
वृक्षाम्बुकाष्ठायुधजं हयाङ्गे
मृगे तु शूलारुचिधीभ्रमाद्यैः ।
कुम्भे तु कासज्वरयक्ष्मरोगै
र्जले विपद्वा जलरोगतोऽन्त्ये ॥१९॥
पापर्क्षयुक्ते निधने सपापे
शस्त्रानलव्याघ्रभुजङ्गपीडा
अन्योन्यदृष्टौ व्यशुभौ सकेन्द्रौ
कोपात्प्रभोः शस्त्रविषाग्निजैर्वा ॥२०॥
सौम्यांशके सौम्यगृहेऽथ सौम्य-
सम्बन्धगे वा क्षयभे क्षयेशे ।
अक्लेशजातं मरणं नराणां
व्यस्ते तदा क्रूरमृतिं वदन्ति ॥२१॥
मृत्यु का कारण
अब मृत्यु का कारण तथा किस प्रकार मृत्यु होती है यह बताते हैं।
चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७५
(क) (१) जो ग्रह अष्टम में होते हैं या अष्टम को देखते
हैं—उनमें जो बलवान् होता है—उस ग्रह के रोग से जातक की मृत्यु
होती है । आठवाँ आयु का स्थान है । ऊपर बता चुके हैं कि
कौन-सा ग्रह किस रोग का कारक है ।
(२) यदि आठवें भाव में ग्रह हो या ग्रह देखते हों
तब तो किस प्रकार के रोग से मृत्यु होगी यह ऊपर बताया परन्तु
आठवें घर में कोई ग्रह न हो और न कोई ग्रह आठवें घर को
देखता हो—ऐसी स्थिति में किस रोग से मृत्यु होगी । यह बताते हैं
कि आठवें घर के जो रोग बताये गये हैं—उनसे या आठवें घर का
मालिक जिस राशि या भाव में बैठा हो उसके दोष से—उदाहरण
के लिये आठवें घर का मालिक पाँचवें घर में हो तो उदर (पेट
के) रोग से, चौथे घर में बैठा हो तो हृदय रोग से—यदि अष्ट-
मेश सूर्य या मंगल हां तो पित्तज रोग, से, शनि हो तो वात रोग से,
इत्यादि । जन्म लग्न (द्रेष्काण) से जो २२वां द्रेष्काण होता है उसका
स्वामी भी मृत्यु कारक होता है । ऊपर जो योग अष्टम भाव
सम्बन्धी बताये गये हैं वह लागू न हों तो जन्म द्रेष्काण से जो २२वाँ
द्रेष्काण हो—उस २२वें द्रेष्काण का जो स्वामी हो—उस स्वामी के
जो रोग हों—उनमें से किसी रोग के कारण मृत्यु होती है ॥१२॥
(ख) जो ग्रह आठवें घर में हों या आठवें घर को देखते हैं
उन ग्रहों में जो बलवान् हो उसके रोग/दोष से मृत्यु होती है ।
यदि कोई ऐसा ग्रह न हो तो अष्टम भाव में जो राशि हो उसके जो
रोग हैं उनके कारण मृत्यु होती है । '१३वाँ श्लोक एक प्रकार से
१२वें श्लोक की ही व्याख्या है । ।। १३ ।।
(१) सूर्य—अग्नि, उष्णज्वर, पित्त या शस्त्र से मृत्यु करता है ।
(२) चन्द्रमा—विषूचिका (हैजा), जलोदर, Oedema (इस रोग
में हाथ, पैर या अन्य स्थान में पानी इकट्ठा हो जाता है) जल की
२७६ फलदीपिका
बीमारियाँ (प्ल्यूरेसी या अन्य बीमारी जिसमें जल कहीं इकट्ठा हो
जावे, यक्ष्मा टी. बी. आदि रोगों से आयु समाप्त करता है।
(३) मंगल--जलने से (अग्नि प्रकोप, बिजली आदि भी इसी के
अन्तर्गत आ जाती है), रक्त विकार या रक्त बहने से, क्षुद्र अभिचार
(जादू, टोना, मारण आदि के अनुष्ठानों आदि) के कारण, मृत्यु
करता है।
(४) बुध--पाण्डु (पीलिया) या रक्त की कमी, भ्रान्ति (स्नायु
सम्बन्धी विकार) आदि रोगों से जातक के प्राण हरण करता है। रक्त
का कम बनना जिससे 'पाण्डु' आदि रोग होते हैं--यकृत की ख़राबी
से होते हैं।
(५) बृहस्पति--कफ का अधिष्ठाता है और कफ से मृत्यु करता
है। इसमें विशेष कष्ट नहीं होता।
(६) शुक्र--जब प्राणहरण करता है तो इसमें हेतु यह होता है कि
अतिस्त्री प्रसंग के कारण वीर्य की कमी से शरीर निस्तेज हो जाने से
बीमारी का शिकार हो जाता है। मूत्र रोग, जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोग
भी शुक्र के अन्तर्गत आ जाते हैं।
(७) शनि--सन्निपात. वातजरोग (लकवा आदि के द्वारा) आदि
से मृत्यु करता है। ॥ १४ ॥
(८) राहु--कुष्ठ (कोढ़ से) या food-poisoning विष या जर्म्स
(रोग कीटाणु) युक्त वस्तु खाने से, सर्प आदि विषैले जन्तुओं के
काटने से, जिस रोग में शरीर पर ददौड़े, फुंसिया आदि हो जावें, उससे
मृत्यु करता है।
(९) केतु--जब मृत्यु करता है तो दुर्मरण होता है। दुर्मरण का
अर्थ है अपमृत्यु (जैसा आकस्मिक मोटर, रेल आदि से, मकान के गिरने
से, कुचल जाने से, कोई कत्ल करदे, यह सब दुर्मरण के उदाहरण हैं)।
शत्रुओं के विरोध से, कीड़ों से या शरीर में किसी कीड़े या जन्तु के
चौदहवां अध्याय : रोगनिर्णय २७७
काटने से Septic हो जावे या भोजन आदि के ज़रिये विषाक्त कीटाणु
शरीर में प्रवेश कर जावें । ।। १५ ।।
(ग) (१) जन्म लग्न से आठवें घर से जो दोष या रोग सूचित
हों उनसे (इसमें आठवें घर का मालिक, आठवें घर को जो देखते हैं वे
सभी आ गये) ।
(२) या आठवें घर का मालिक जिस नवांश में बैठा हो उस
नवांश राशि के रोग या दोष से मृत्यु होती है ।
(घ) ऊपर कई बार राशियों के रोग/दोष का हवाला दिया
गया है। ग्रहों के रोग/दोष तो बताये हैं। किस-किस राशि के कौन
कौन से रोग स्वाभाविक हैं, अब यह बताते हैं:—
(१) मेष राशि—पित्त के कारण ज्वर, उष्णता (गर्मी के कारण
उत्पन्न रोग लू लगना आदि, जठराग्नि, (पेट में भोजन पचाने वाली जो
अग्नि है) के रोग ।
(२) वृष—त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) के उत्पात से, शस्त्र से,
अग्नि से जलने के कारण ।
(३) मिथुन—श्वास की बीमारी, दमा, उष्णशूल (पित्त के
कारण जो तीव्र दर्द होते) हैं ।
(४) कर्कट—पागलपन, उन्माद, वात के कारण रोग, अरुचि
(भोजन में अरुचि आदि लक्षण वाले रोग—anorexia)
(५) सिंह—जंगली पशुओं के कारण मृत्यु, ज्वर, स्फोट, (फोड़ा)
शत्रुओं के कारण ।
(६) कन्या—स्त्रियों के कारण, गुप्तरोग (मूत्रेन्द्रिय या जननेन्द्रिय
सम्बन्धी रोग), ऊपर से गिरने से ।
(७) तुला—धीज्वर (brain fever) सन्निपात ।
(८) वृश्चिक—प्लीहा (तिल्ली) संग्रहणी, पाण्डु रोग ।