फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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गुणाधिकाः सद्ग्रहदृष्टियुक्ता
गुणाधिकं तं कथयन्ति कालम् ॥२०॥
जब चन्द्रमा, चन्द्रराशि का स्वामी और लग्नेश ये तीनों गोचर-
वश बलवान् और शुभ-ग्रहों से दृष्ट हों तो वह समय जातक के लिए
बहुत अच्छा अर्थात् शुभ व्यतीत होगा । यहाँ यह भी विचार कर लेना
चाहिये कि लग्नेश, चन्द्रमा और चन्द्रराशि के स्वामी जहाँ जहां जन्म
कुण्डली में बैठे है वहाँ वहां उन पर भी गोचर द्वारा शुभ-दृष्टि पड़
रही है या नहीं । उदाहरण के लिये किसी का सिंह लग्न है और
सूर्य वृश्चिक में है तो न केवल गोचर वश सूर्य बलवान् होना चाहिये
बल्कि जन्म कुण्डली में वृश्चिक में जो सूर्य है उस पर भी गोचरवश
गुरु की दृष्टि आदि होनी चाहिये । ॥२०॥
लग्नाधिपोऽतिबलवानशुभैरदृष्टः
केन्द्रस्थितः शुभखगैरवलोक्यमानः ।
मृत्युं विहाय विदधाति स दीर्घमायुः
सार्द्धं गुणैर्बहुभिरूजितराजलक्ष्म्या ॥२१॥
यदि लग्न का स्वामी अति बलवान् हो, अशुभ ग्रहों से न देखा
जाता हो, केन्द्र में बैठा हो और शुभ-ग्रहों से देखा जाता हो तो
ऐसा बलवान् लग्नेश मारकों को रोकता है और दीर्घायु के साथ-साथ
गुण, लक्ष्मी और ऐश्वर्य प्रदान करता है । ॥२१॥
सर्वातिशाय्यतिबलः स्फुरदंशुजालो
लग्ने स्थितः प्रशमयेत् सुरराजमन्त्री ।