फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)
Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary
मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा
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करेगा। शनि वायु प्रधान है इस कारण, शनि जब कान के
रोग उत्पन्न करेगा तो वात के कारण। वात, पित्त, कफ यही
तीन दोष आयुर्वेद के हिसाब से “त्रिदोष” हैं जिनके कुपित हो जाने से
या असामञ्जस्य से शरीर में रोग होते हैं।
(३) मंगल पंचम में होने से उदर रोग होता है। (कोई भी उग्र-
ग्रह सूर्य, मंगल, शनि, राहु, केतु) पंचम में होने से पेट में पीड़ा करता
है। पांचवां स्थान पेट का है।
(४) शुक्र यदि सप्तम या अष्टम स्थान में हो तो वीर्य सम्बन्धी
प्रमेहादि या मूत्ररोग करता है।
(५) यदि षष्ठेश या अष्टमेश, सप्तम में या षष्ठेश अष्टम में हो
तो गुदा रोग होता है। सप्तम स्थान गुह्य जननेन्द्रिय प्रदेश, अष्टम गुदा
का स्थान है। यहां पाप ग्रह बैठे हों या दुःस्थान (छठे आठवें)
के स्वामी बैठे हों तो शरीर के उस भाग में रोग उत्पन्न
करते हैं। ॥ १० ॥
(१) यदि छठे या आठवें घर में सूर्य हो तो ज्वर (बुखार) का
भय (२) यदि छठे या आठवें घर में मंगल या केतु हों तो व्रण
(घाव, चोट, जख्म) (३) छठे या आठवें घर में शुक्र हो तो
जननेन्द्रिय प्रदेश में रोग (उदाहरण के लिये मूत्र रोग, वीर्य रोग,
सुजाक, आतशक आदि) (४) यदि छठे या आठवें घर में वृहस्पति
हो तो क्षय (यक्ष्मा, टी. बी. आदि) (५) यदि छठे या आठवें
शनि हो तो वात (वायु रोग) (६) यदि छठे या आठवें मंगल राहु
हों या उस पर मंगल की दृष्टि हो तो पिटिका (अदीठ आदि
फोड़ा या सामान्य फोड़ा) (७) यदि छठे या आठवें घर में चन्द्रमा
और शनि एक साथ हों तो गुल्म (तिल्ली के कारण यथा तिल्ली बढ़
जाने के कारण—पेट में पसलियों के नीचे—दाहिनी ओर यकृत
(जिगर) और बांयीं ओर प्लीहा (तिल्ली, होती है) (८) यदि कृष्ण