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सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 259, कुल 684 में से

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पृष्ठ 259

२५८ फलदीपिका
यदि दोनों द्विस्वभाव या एक चर एक स्थिर राशि में हो तो
मध्यायु होता है।
(ख) लग्नेश नवांश राशि और चन्द्रेश नवांश राशि । यदि दोनो चर
में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर
या एक चर एक द्विस्वभाव में हो तो अल्पायु । यदि दोनों
द्विस्वभाव में या एक चर एक स्थिर में हों तो मध्यायु होती है।
(ग) लग्नेश द्वादशांश राशि और रन्ध्रेश द्वादशांश राशि। यदि
दोनों चर राशि में हों या एक स्थिर में दूसरी द्विस्वभाव में तो
दीर्घायु । यदि दोनों स्थिर में या एक चर एक द्विस्वभाव में तो
अल्पायु । यदि दोनों द्विस्वभाव में वा एक चर एक स्थिर में हो तो
मध्यायु होती है ।
तीनों मत से विचार करने पर बहुमत से जो निर्णय आये वह
निर्णय मानना चाहिये ।॥ १४॥
लग्नाधीशशुभाः क्रमाद्बहुसमाल्पायूंषि केन्द्रादिगाः
रन्ध्रेशोग्रखगास्तथा यदि गता व्यस्तं विदध्युः फलम् ।
जन्मेशाष्टमनाथयोरुदयपच्छिद्रे शयोर्मन्त्रतो
भास्वल्लग्नपयाश्चिरायुरहितेऽल्पायुः समे मध्यमः ॥१५॥
यदि लग्न का स्वामी और सब शुभ-ग्रह केन्द्र में हों तो दीर्घायु
(२) पणफर में हो तो मध्यायु (३) और आपोक्लिम में हों तो
नोट—रन्ध्रेश अष्टमेश को कहते हैं।
टिप्पणी : यदि तीनों से विभिन्न मत आवे तो जैमिनि के मतानुसार विचार
करें । जैमिनि के मत के लिये देखिये सुगम ज्योतिष प्रवेशिका
पृ० १२६