सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

फलदीपिका (मन्त्रेश्वर दैवज्ञ - सम्पूर्ण २८ अध्याय, भाव-विचार, दशा-फल एवं गोचर सटीक)

Phaladeepika of Mantreshwara Daivajna with Commentary

मन्त्रेश्वर दैवज्ञ (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण व्यास) द्वारा

DevanagariHindipublished684 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 684 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 261

२६० फलदीपिका
लग्नेश्वरादतिबली निधनेश्वरोऽसौ
केन्द्रस्थितो निधनरिः फगतैश्च पापैः ।
तस्यायुरल्पमथवा यदि मध्यमायु-
रुत्साहसंकटवशात्परमायुरेति ॥१७॥
यदि लग्नेश की अपेक्षा अष्टमेश अत्यन्त बलवान् हो और केन्द्र
में हो तथा पाप-ग्रह अष्टम और द्वादश में हों तो जातक अल्पायु
होता है या मध्यम आयु ; यदि दीर्घायु प्राप्त भी करे तो जीवन संकट
की दशा में बीतेगा। ॥ १७॥
नरोऽल्पायुर्योगे प्रथमभगणे नश्यति शने-
र्द्वितीये मध्यायुर्यदि भवति दीर्घायुषि सति ।
तृतीये निर्याणं स्फुटशनिगुर्वर्कहिमगून्
दशां भुक्तिं कष्टामपि वदति निश्चित्य सुमतिः ॥१८॥
नीचे लिखे चारों ग्रहों की राशि, अंश, कला, विकला जोड़
लीजिये :
सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति तथा शनि
उदाहरण के लिये जिसकी जन्मकुंडली का विचार कर रहे हैं
उसके यह चारों ग्रह स्पष्ट जोड़े ।
सूर्य ७—२६
चन्द्र ११—२०
गुरु ६—१४
शनि ०—७
योग २६—७ या २—७
अर्थात् मिथुन के सात अंश ।
यदि इस जातक की अल्पायु है तो गोचर वश जब शनि प्रथम बार