माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
भाग 7 (पृष्ठ 121-140)
समय ज्यादा था अथवा विचार ज्यादा गहरा अथवा इन सब बातोंके ऊपर भी जो समय का स्वामी
परमात्मा था उसकी यह प्रेरणा थी? रामलाल सहसा जाग तो उठे परन्तु उनका मन जैसे
खो-सा गया था! उन्होंने सोचा, 'क्या मैं मरूँगा?
जब तक भगवान् की इच्छा होगी तब तक ही यह सब कुछ मुझे दिखाई देगा। परन्तु
केवल मेरे मर जाने पर ही संसार बन्द तो नहीं हो जायेगा। यह संसार तो चलता ही रहेगा।
यह विचार आते ही वह घबरा गये। उन्होंने सोचा 'यदि मुझे अपनी मृत्युका ही भय होता,
अहम्मन्यता होती, ईर्ष्या-द्वेष होता तो, सम्भवतः सहसा जागकर मैं डरता अथवा दुःखी
पर यह दुःखदायिनी शान्ति कैसी?
जब संसार का अन्त नहीं होता अथवा जब तक संसार के सब पदार्थों का अन्त नहीं
होता केवल जीवन समाप्त हो सकता है। जीवन समाप्त हो जाने पर जो कुछ है उसका क्या
होगा? केवल इतना ही नहीं, यह सुख, शान्ति और आनन्द जो आज तक मैंने इस संसार
के सब सुख और सारे आनन्द एक-एक करके तो मुझे मिले नहीं। आज केवल उनका विचार
आया, और सारा जीवन ही आनन्द से भर उठा--तो आनन्द कैसा होगा? इस प्रकार सोचते
ही सही, जिस शान्ति स्वरूप आत्मा का ध्यान आ जाने पर आनन्द मिल ही जाता? पर केवल शान्ति!
शान्त रहकर क्या होगा नहीं! क्या यह शान्ति किसीकी होगी? केवल ही सब, कभी-कभी, शान्ति
विश्रामके लिये होती है। पर जीवन केवल शान्ति!
सब प्रकार चिन्तन करने पर भी कोई निष्कर्ष न निकल-सका केवल यह निष्कर्ष निकल रहा
था कि मृत्यु का भय नहीं था और न ही जीवन की लालसा। मृत्यु के बाद क्या संसार नष्ट
नहीं होता यह चिन्ता सताती, चिन्ता भी नहीं, तो क्या चिन्तित? जीवन का भय नहीं अथवा
केवल जीवन एक न समाप्त, केवल ही सब चिन्ता अथवा भय का रूप बन कर सब कुछ खोता
जा रहा था यह सोच अथवा विचार उस जीवन को शान्ति प्रदान करने के स्थान पर एक अजीब
अशान्ति दे रहा था। शान्ति अथवा जीवन जिस प्रकार भी समाप्त हो जाता तो मन को शान्ति तो
थी!
जो कुछ घट रहा था अथवा विचारित था, सब का सब मन का रूप बना हुआ था।
उस पर भी जब मन कुछ सोच न रहा था परिणामतः एक प्रकार शान्ति का जन्म हो रहा
था न वह सुख था और न दुःख, केवल मन शांत था।
जीवन केवल सुख और दुःख दोनों का नाम नहीं था। न यह सुख का ही परिणाम
था, न केवल दुःख का। जब तक जीवन में सुख और आनन्द मिल रहा था तब तक केवल
सुख और आनन्द प्राप्त करनेका प्रयास हो रहा था, केवल उसीमें लगा हुआ था।
जब शान्ति मिली अथवा ऐसा लगा, कि जीवन तो, सब कुछ व्यर्थ था, सब
कुछ जो चिन्तन कर सोचा जा रहा था उसका कोई परिणाम नहीं निकला था, जब सब व्यर्थ, तो
यह विचार ही क्यों उत्पन्न हो रहा था? केवल इतना नहीं विचार-मुक्त हो जाने पर जिस
सत्य, ही का नाम आनन्द अथवा शान्ति हो यह विचार भी तो केवल शान्तिदायिनी ही अथवा
सब कुछ व्यर्थ, तो यह सब परिणाम ही विवशताका रूप था। यदि, केवल ही सब सुख
का नाम था अथवा यदि यह विचार-मुक्त ही होना शान्ति का रूप था तो चिन्ताएँ किस-
प्रकार से उत्पन्न होंगी, विचार-मुक्त रूप ही यदि सब चिन्ता का, केवल शान्ति किस-
रूप से उत्पन्न होगी। सब कुछ तो मन का ही तो व्यापार, केवल शान्ति भी
तो अस्वाभाविक, केवल अपने मन अथवा विचार का रूप होगा--तो यह विचार? अथवा
अस्वाभाविक? यदि सब कुछ ही शान्ति रूप हो गया अथवा हो सके, तो फिर चिन्ता अथवा
अस्वाभाविक चिन्ता का क्या अर्थ!
वास्तविकता रूप को जानने का प्रयास ही शायद उस शान्ति का कारण था, जिसे
वह इस प्रकार केवल भय समझ रहा था। भय से ही शान्ति उत्पन्न हो रही थी।
जो भी कुछ घटित होता था, पर सब कुछ केवल विचार मात्र था। जीवनका
चरम लक्ष्य तो अपने स्वरूप को ही जानना था। उस स्वरूप अवस्था तक पहुँच कर केवल
शान्ति थी।
क्या शान्ति मात्र थी? या उस शान्त स्वरूप स्थिति में शान्त रूप का आनन्द भी
था अथवा केवल शान्त ही सब कुछ था। यदि केवल शान्त ही सब कुछ था तब तो शान्ति के
उपरान्त शान्ति का ही जीवन में आनन्दमय स्वरूप स्वयं बन ही जाता होगा। वह जो कुछ
था या शान्ति का जो स्वरूप था उस शान्ति मात्र से ही सब कुछ रूप में उस परमात्मा
स्वरूप आत्मा का ही सब कुछ अनुभव होने लगा।
जो कुछ सत्य था अथवा न था उस रूप में केवल शान्ति ही तो सत्य बन कर सब कुछ
का कारण बन जाती थी। जो उस परमात्मा का ही केवल दूसरा रूप था। केवल शान्ति ही, सब
विचार शून्य हो कर अपना स्वरूप प्राप्त कर सकती।
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जिससे कि यदि कोई बात कहूं और उसका ठीक उत्तर न मिले अथवा प्रतिकूल भी मिले तो मन--
को यह तो न हो सके कि यह सब कुछ एक ऐसे व्यक्ति द्वारा अपमानित किया जा रहा था जो
तो न केवल हर बात को ठीक समझता ही न था वरन् जान-बूझकर भी अन-
देखा
भी किए बिना केवल अपनी बात ऊपर रखने का ही यत्न करता रहता था; वस्तुतः
बात इसके सर्वथा विपरीत निकली क्योंकि मैं समझता हूँ कि शायद केवल दो चार
प्रतिशत ऐसे ही लोग, चाहे वे किसी भी स्थिति अथवा पद पर हों अथवा किसी
प्रकार के भी हों जो कि इस बात की सर्वतोभावेन चेष्टा, चाहे वह केवल अपने
को सिद्ध करने के लिए ही यत्न करते हों अथवा जैसा कि मैंने पहले भी कहा था
बातचीत आगे बढ़ सके या न केवल बातचीत आगे बढ़ सके बल्कि बात का कोई
निष्कर्ष भी? और कभी कभी स्थिति के पीछे छुपे रहस्य को स्पष्ट कर सकने में, जिसे
सच कहा जा सकता हो सहायक सिद्ध हो।
पर जो निष्पक्ष लोग होते हैं वे प्रायः सच बात को जानने के लिए ही उत्सुक
रहते हैं? पर अधिकांश के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसीलिए, सच
पूछो, तो परस्पर में, चाहे व्यक्तिगत हो, चाहे संस्था का, चाहे संगठन का
कोई भी संवाद बहुत कम ही ऐसा सफल सार्थक होता है? जिसे सार्थक कहें? संवाद से तो
केवल यही पता चल पाता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोचता अथवा कहता है? दूसरा व्यक्ति क्या?
सोच कहता है?
पर दोनों मिलकर किसी बात को तय करने का तो कोई यत्न करते नहीं?
यह तो स्पष्ट ही रहता होगा कि जो सच तक नहीं जाते हैं वे सच तक पहुंच भी
नहीं सकते और सच तक न जाने, या पहुंचने की उत्कट इच्छा रखने वाले ही तो
किसी के साथ भी या परस्पर में भी एक दूसरे को लेकर सच तक पहुंचने का
कोई यत्न करें, ऐसा कम ही।
प्रत्येक व्यक्ति का यह केवल अपना ही अहंकार होता है कि केवल जो कुछ
उसने सोचा या कह दिया अथवा जैसा किया, उसको ठीक मान लिया जाय, जिसको
उसने ऐसा किया
तो स्वाभाविकता के विपरीत समझ लिया जा सकता था या फिर केवल यह कहा जा
सकता, कि जो उस समय हुआ, वह केवल समय के प्रभाव द्वारा स्वयं सिद्ध अथवा
प्रकट हुआ ही माना जा सकता था जिसका सारा श्रेय, जो भी स्थिति अपने को
सामने लाती है, उस समय के ही उस यत्न को ही जाता था।
ऐसा सच तो नहीं, पर जिस रूप द्वारा सच को तय है, या कहा जा सके
कि, उस समय जैसा यत्न हो भी सकता था या जो भी स्थिति थी वह सब सच
तक सच को, सच तक न पहुंचने पर, सच को ऐसा रूप दिया जाता था जिसे सच
ही माना जाना चाहिए।
पर सच के प्रति न जाने क्यों या सच के प्रति न लगन के कारण
हम अपने लिए ही ऐसा सच तय करने लगते हैं, जिससे कि ऐसा लगना संभव हो
निकलता चला जाय कि सच का तो आभास ही केवल लगता सा ही होता है, सच
का कोई रूप सार्थक सिद्ध करना चाहें, जिसे सब लोग सच के रूप में मान
सकें
तो ऐसा तो लगता ही नहीं है कि लोग इस बात के लिए तय हो कर चलें,
जिसे माना जा सके अथवा, सच तक जाने का यत्न न कर के केवल उस बात
को ही सच मान लिया जा सके? जिसका यत्न न किया जा सका हो। सच, तो
केवल एक ऐसी बात का विषय होकर रह जाता है।
सच को न मान कर, सच को त्याग कर केवल इस बात को तय कर पाना
कि ऐसा संभव हो सकता है अथवा नहीं? यह बात ही इस बात को न मान कर ही
अपने आप सामने आ कर खड़ी हो जाती है जिसे सच माना जा सके?
यद्यपि जो लोग केवल संगठन मात्र को ही सब कुछ मान कर चलते हों
उनका यह भी, अपना यत्न हो, कि केवल जो ही कहा जा रहा हो उसे ही
माना जाय, तो ऐसा तो सच न संगठन, जिसे सब लोग मानते हों केवल उसी
प्रकार सच मान लिया जायगा जैसा कि संगठन को सत्य के रूप में मान कर
लोग जो कुछ भी न मान कर ही सब कुछ के यत्न में लगे हैं... उनका तो
केवल यह प्रयत्न मात्र करना ही सच को सच न मान कर, जो कुछ सच को सच
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123
इस पर उसने उत्तर दिया कि वह साक्षात्कार केवल उसी व्यक्ति का हो सकता था, साक्षात्कार
कराने वाले, किसी अन्य जीव और स्वयं उस घटित होने वाले दृश्य रूपी साक्षी रूपी परमेश्वर का
नहीं। इस कारण उसका उत्तर भी अपूर्ण ही रह जाता है। परिणाम यह निकलता हैकि
सत्य, जिसे कहा गया तथा जो प्रत्यक्ष घटित हुआ था वह केवल भ्रम था। वह न साक्षात्कार
कराने या उसकी वास्तविकता निर्णय-विधि का कोई समाधान या प्रमाण प्रस्तुत करने योग्य
कथन रहा, न सत्य कथन करने वाले व्यक्ति का, न परमेश्वर का, जिसने रूप धर कर अपने
रूप दर्शन दिए और अंत में! वह साक्षात्कार का दावा करने वाला व्यक्ति, जो स्वयं को
साक्षात्कार योग्य समझ बैठा, वास्तव मेंउसका क्या फल था? वह केवल भ्रम, या केवल उस
व्यक्ति तक ही, सीमित रह कर सब कुछ व्यर्थ हो गया। व्यर्थ इसलिए कि इससे न तो उसका
भला हुआ नअन्य
इस प्रकार का साक्षात्कार आत्मज्ञान तक ले जा सकता था, केवल भ्रमित ही
किया जा, जिससे कि ईश्वर के प्रति उस व्यक्ति का तन--मन, कर्म, विचार जो भी
था सो तो व्यर्थ हुआ। भ्रम मेंवह ईश्वर रूप से क्या लाभ उठा सकता? जब तक कि वह उस
स्थिति पर नथा कि स्वयं साक्षात्कार द्वारा प्राप्त ज्ञान को जन हित तक पहुँचा सके?
जन हित मेंसाक्षात्कार ज्ञान पहुँचाया जा सकता हैकि नहीं या इसके विपरीत भी
कुछ हो सकता था, इस बात का ज्ञान प्राप्त करने हेतु हम कहेंगे कि जो लोग यह
विश्वास करते हैंकि वे जन हित मेंकार्य कर रहेहैंवे केवल अपने ही भ्रम जाल में
उलझ कर रह जाते हैं। इस भ्रम से छूट कर जब वे आत्म ज्ञान के उस स्तर पर पहुँच जाते
हैं जहाँ सब कुछ स्वयं प्रकाश रूप होकर चमक उठता हैतो वे जन हित की सीमा
रेखा लाँघ, न जाने कहाँ से कहाँ जा पहुँचते हैं, जहाँ से जन हित रूपी सीमा
धुँधली पड़ कर लुप्त हो जाती है। परिणाम यह निकलता है, जहाँ से ज्ञान प्रारम्भ
रूप धारण करने लगता हैउस स्तर पर, कार्य या कर्म या ज्ञान किसी जन हित मेंनहीं
आता है, साक्षात्कार या वास्तविकता की उपलब्धि केवल उस व्यक्ति, जिसने कि
प्राप्त किया? या उसके पश्चात किसी को, जिसने कि केवल सुना?
वास्तव मेंज्ञान जहाँ से प्रारम्भ होता हैया उस स्तर तक पहुँच, जन कहा जाने,
या माना जाने वाला जन, या साधारण जन जन, जिस मेंकि ज्ञान रूपी ज्योति
के दर्शन तक भी नहीं हो सकते हैंउस स्तर पर पहुँच कर लुप्त प्रायः हो ही
जाता है। जन साधारण का भला कैसे किया जा सकता है? क्या यह कभी सोचा
गया, कि जो साधारण जन मात्र की कल्पना मेंसाक्षात्कार का भ्रम पैदा कर
दे, ज्ञान-गंगा बहाने वाले कहलाने वाले कहलाने का दावा करते हों--उस जनसाधारण
के बीच एक--दो जनसाधारण आत्मज्ञान तक पहुँच सकते भी हों, उस से जन
कल्याण होगा, या जन हित हो गया, या जन मात्र का उद्धार हो गया, इस मेंसंदेह
बना रहा ही है। भ्रम मेंभटके हुए लोग सत्य भ्रम को समझ, केवल जन ही,
साधारण जन ही, रह जाते
हे आत्मा के साक्षात्कार स्वरूपो ! इस प्रकार भ्रम फैला कर किसी का अहित
अथवा जन मात्र का अहित करके ही कोई व्यक्ति या व्यक्ति विशेष अपने प्रचार
प्रसार, यशप्राप्ति, अहंकार पोषण, या किसी स्वार्थ साधन सिद्धि करता, व्यर्थता
रूप नहीं कहलाता
सुनो आत्मा रूपो! सुनो आत्मस्वरूपियो ! सुनो भगवतस्वरुपो ! सुनो भगवन्
रूप से जन हित के नाम पर इस प्रकार के प्रचार या मिथ्या प्रचार के बहकावे--में आ आत्मज्ञान
के पद पर पहुँच जाने का दावा करने वालों के भ्रम मेंमत पड़ो।
ऐसा मत हो, ज्ञान मार्ग जिसे तुम सोच रहेहो वह केवल भ्रम हो? ऐसा मत
हो, जिसे तुम आत्मज्ञान समझ रहे, जिसे तुम ईश्वर प्राप्ति रूप मान कर चल रहेहो
वह भ्रम, केवल तुम्हारे भ्रम या जन मात्र के भ्रम द्वारा, कोई स्वार्थ सिद्धि हो?
चेतो भव्य, हे जीव अपने अंदर छिपे ईश्वर रूप आत्मन्, उस दिव्य को
जान लो। जन हित के नाम पर ज्ञान के मिथ्या प्रचार रूप भ्रम जन्य भ्रमजाल से
दूर हो जाने का प्रयत्न करो
साक्षात्कार जब भी प्रत्यक्ष होगा वह जन मात्र के लिए न होकर मात्र, उस
विशेष व्यक्ति विशेष के आत्मज्ञान की सीमा, जो कि भौतिक शरीर रूपी सीमा से
परे पहुँच कर ही संभव कहलाती कही जाती है, इसके लिए जन केवल जन न
रह कर उस दिव्य चेतना रूप मेंबदल जाता है, जो वास्तविकता रूप ज्ञान प्राप्त करके
ही जन मात्र रूपी सीमा से परे हट कर उस दिव्य सीमा मेंपहुँच कर ही जन
कल्याण कार्य सम्पन्न करने हेतु समर्थ हो सकता है। यह सब कुछ जान लेने के
124
जब परमात्मा कर्ता रहा, तो परमात्मा की शरण गये--तो भय कैसा, तो
फिर हम ऐसा कर लें कि जो हो सो सब प्रभु के हाथ सौंप कर निश्चिन्त
विश्वासी बनकर बैठ ही न जायें अथवा ऐसा ही करें?
सो प्रभु दयाल हैं, वे अपने पर निर्भर रहने वाले का सब काम कर देते
भी होंगे भी, पर विश्वास सच्चा बने तो ही सब हो सकता, केवल मन का मन
घड़न्त भाव न चाहिये, ऐसा विश्वास सब से हो नहीं बन या सध सकता और
बात यह भी है कि सब को सब बात में या सब को एक-सी समझ दयालु की
तो नहीं, सो उस हित की इच्छा मन में रख कर न बैठना, केवल प्रभु का नाम ही
जपना, यह उत्तम बात नहीं हो सकती।
जो हाथ हिला नहीं, काम किये बिना भोजन, प्यास या और कुछ मिल सके,
फिर भगवान भजन क्यों कहें, ऐसा कर्म तो मुक्ति का साधन भी तो है और मुक्ति
बिना सब कुछ ही तो व्यर्थ, फिर जो कर्म प्रभु आज्ञा से हो सदा ही शुभ
ही कर्मों को ही सुख सब दें, प्रभु का नाम जपो, पर कर्म छोड़ परमात्मा शरण
होना भूल
केवल ही विश्वासियों के लिये प्रभु शरण सुखद है यह सत्य है पर
सब कोई, जब कभी कोई कठिनाई आ जाये तब ही, परमात्मा की ही
शरण हो तो वो भी सच्चा भाव नहीं बन या टिक सकता और न ही ऐसा
मन ही सच्चा प्रभु में, लगता फिर वो ही प्रभु न्याय, सब बिना यत्न के क्यों करें?
न्याय तो सब को एक सा ही होगा और मिलता सब को अपने कर्मों अनुसार,
फिर सदा ही शरण क्यों? शरण तो सदा ही सुख की दाता पर विश्वास सब का हो
केवल जब कष्ट, तब शरण वो सदा ही? शरण में बैठ भी तो नहीं
सब ही आश्रय पा कर स्थिर सुख पाते, कर्मों का फल अवश्य भोग
सब कर्म रूप ही प्रभु के स्वरूप को समझ कर करें, केवल ही नाम जपने मात्र
प्रभु शरण नहीं बन जाती यह सब को स्मरण रहे क्योंकि परमात्मा तो अपने
स्वरूप सच्चिदानन्द रूप जगत को रचे हुए हैं सो उस का सत्य, ओ सब उस की
चेतन शक्ति से सब कुछ हो रहा है और आनन्द ही तो स्वरूप भोगने योग्य है।
सच्चिदानन्दरूप सब, जब वो परमात्मा ही सब कुछ बना हुआ है तब, वो
सब--ही सब--ही कर्म सब परमात्मा की आज्ञा, का पालन सब प्राणियों को
सब के कल्याण के लिये ही करना है, सदा ही कर्म योग सब के लिये शुभ ही
सदा सुख दाता रूप ही बना रहेगा, सो सदा निष्काम ही कर्म करें
सो कर्म से मुँह मोड़ कर बैठ जाने से संसार चलना कठिन, फिर
जगत सब ही बिखर सा जायेगा, बिना कर्म संसार चल ही नहीं हो, फिर सब
प्राणियों अपना कर्म छोड़ बैठना भी तो कर्म ही बना सो पाप ही होगा सो
सब कर्म प्रभु द्वारा नियुक्त ही समझ कर निष्काम हो करिये, केवल प्रभु शरण
ही सब नहीं कर लेगी, सब काम तो सब को करने ही होंगे, प्रभु शरण
से तो केवल, सब पापों नाश होगा; मुक्ति सब को मिले, सब अपने कर्मों
ही से तो मुक्ति कर्मों द्वारा प्राप्त हो सकती, फिर क्यों बैठें? सो तो निष्काम कर्म!
सब कर्म प्रभु अर्पण कर, कर्म फल त्याग कर ही सच्चा सुख भोग
सो कर्म करना ही तो उत्तम साधन है, सो कर्म छोड़ बैठना पाप कर्म
ही सब को हो ही जाता कर्म--त्यागना कोई धर्म, जप तप से सदा कर्म--ही
मुक्ति के तो द्वारा कर्म ही खुलते हैं। और निष्काम से तो सब कर्म ही
परमात्मा को अर्पण होते हैं इसलिये ही सब काम निष्काम ही सब को करने, तो
सब जन ही अमर रूप को प्राप्त हो कर मोक्ष पावें, साधन ही मुक्ति का कर्म
सब जन जानें, परमात्मा का रूप ही, सब निष्काम कर्म हैं!
सो निष्काम कर्म ही मुक्ति का साधन है, सब कर्म छोड़ बैठ, किसी का भला नहीं
कर सके ऐसा त्याग कभी किसी को नहीं करना चाहिये, ऐसा निष्काम ही कर्मों
करना ही सब का सच्चा धर्म स्वरूप बन सकेगा सो सब जन ही निष्काम
शुभ कर्मों को, ही सदा ही, करते हुए ही अपना जीवन व्यतीत, करने का सदा
विचार किया करें
फिर सुनो जी, हे शिष्य! केवल ही ही कर्म करने से काम न होगा जब
तक निष्काम रूप सब को न प्राप्त हो सका हो, तब केवल ही कर्म रूपी साधन
अज्ञानता का, अज्ञान ही, अज्ञानियों का, फिर तो सब कर्म व्यर्थ ही हो गया! सो
सदा सब कर्मों को निष्काम स्वरूप समझ कर ही किया जा सके? तो सब
125
जिसका चित्त हमेशा स्वरूप मात्र ही रहा हो उसका इस संसार विषयक कैसा विचार रहा होगा
इसका क्या विचार?
इस विचारणा समय यह बात तो स्पष्ट रूप समझनी चाहिये कि यह कोई ऐसा
विचार, मात्र वैराग्य दर्शक या केवल संसार दशा का वर्णन ही, या वैराग्य साधन का
निरूपक नहीं हो या हो यह सब सच, पर इस योग्य पद के आत्म-ज्ञानी ऐसे
विचारशील की यथार्थ साक्षी दर्शक पद, सो पद ऐसा पद, जिसे सब संसार साक्षी
स्वरूप ग्रहण करना चाहिये! कारण कि विचार तो, चाहे सो मनुष्य जैसा मन में आया
वैसा कहसकता है, अर्थात् विचार तो मनुष्य मात्रका होता ही।
पर ज्ञानी, जिसे पद प्राप्त हुआ है, सो पद प्राप्ति पूर्वक जो जो बात अपने स्वरूप
विषयक स्मरण में आती, जिसे स्वरूप ही में जो मन था, जिसे ऐसा स्वरूप दृष्टि
सब जगह रहता सो सो भाव में जो ज्ञान रहता था उसे उस ज्ञान पूर्वक साक्षी के पद
निरूपणमें जो, जिसे साक्षी रूप ही स्वरूपस्थिति का भाव रहा।
सो विचारणा रूप ज्ञान साधन ऐसा ही साधन था जिससे यथार्थ ज्ञान दशा
ज्ञान को प्राप्त हो जाती थी, जिसे वैराग्य दशा कह कर ज्ञान की स्थिति निरूपक
भी कह सकते थे। इस विचार रूपी ज्ञान दशा को ज्ञान पूर्वक निरूपण हो सकता,
ऐसा विचार तो सब ज्ञानी जन, जिसे ज्ञान पद की प्राप्ति, जिसे ज्ञान स्वरूप दशा
सब स्वाभाविक दशा रूप सब ज्ञान साधन साधन में ज्ञान रहता था, स्वाभाविकता
ऐसी विचार दशा में सब ही पद की, सो ज्ञान दशा, सो सब अवस्था साक्षी रूप एक
पद मात्र स्थित सो, जिसे ज्ञान ही स्वरूप सो, जिसे तो संसार साक्षी ही सब
बात समझ में ही आती रही, विचार दशा तो ज्ञान रूप, विचार दशा ज्ञान
ही का स्वरूप साक्षी भाव रूप ज्ञान साधन रहता, जिसे ज्ञान दशा स्वतः
स्थित कही जाती
ज्ञानी को तो स्वाभाविकता ही, ज्ञानी को तो स्वाभाविकता रूप स्थिति सो प्राप्त ही
पद था, जिस ज्ञान दशा को ज्ञान पद रूप में विचार रूप से कथन किया गया जिससे
यथार्थ भाव रूप ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान रहा, जिसे विचार रूप ज्ञान कथन किया
सो तो साक्षी रूप ही रहा सो, साक्षी ही स्वरूप
अब विचार रूप जो यह साखी क्या थी? उसके अर्थ का सब प्रकार सब
ही भाव था? जिसमें तो ज्ञान ही साधन रूप का भाव बताया, जिसमें तो ज्ञान रूप
सब ही भाव निरूपण हुआ जिससे ज्ञान का साधन सब ही ज्ञान रहा; जिससे साक्षी,
सब ज्ञान; जिससे सब ही स्वरूप पद के साधन रूप भाव का ही वर्णन,
जिसे ज्ञान ही साधन कहा, जिसे सब रूप से ज्ञान स्वरूप ही का सब भाव
समझ में आता रहा सो स्वाभाविकता का ज्ञान रूप क्या नहीं? उस ज्ञान
रूप दशा को ज्ञान दशा रूप रूप सब ही सो उस पद का ही भाव कहा जा
सकता, स्वाभाविकता से भरा सब ज्ञान था? हां हां! स्वरूप ही साक्षी रहा।
निरूपण अवस्था से साक्षी ही रहा। क्योंकि ऐसी सब अवस्था संसार दशा
से तो परे ही पद का पद रूप था जिससे संसार का रूप तो भिन्न रूप ही रहा, सो
सब साक्षी स्वाभाव स्वरूप स्वाभाविकता से भिन्न हो गया, सो ज्ञान स्वरूप
स्वाभाविकता ही।
जिसके चित्त में यह बात रही सो पद, जिस पद को ज्ञान दशा ही कहा जा
सो निरूपण तो ज्ञान स्वाभाविकता स्वरूप ही कहा जा सकता यह ज्ञान का भाव ही
सब रूप रहा, सो ज्ञान दशा स्वाभाविक ज्ञान दशा रही, सो ज्ञान तो ज्ञान रूप-
ज्ञान रूप स्वाभाव के ज्ञान ही से स्वाभाव से ज्ञान हो, सो सब ज्ञान स्वरूप
रहा, सो तो सो ज्ञान ही ही से स्वरूप भाव के स्वाभाविकता रूप से स्वरूप
स्वतः स्वाभाविक स्वाभाविक ही पद से हो सब हो गया, सो ज्ञान ही का ज्ञान
रहा
सो ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप रहा, सो ज्ञान सब दशा साक्षी का स्वाभाविक
ही ज्ञान दशा स्वतः सिद्ध सब ज्ञान कहा गया, जिसे ज्ञान सब प्रकार साक्षी
रूप ही रहा सब ही ज्ञान सब ज्ञान दशा साधन में सब ज्ञान का स्वरूप रहा
सो पद, निरूपक स्वरूप ज्ञान ही था, उस अवस्था का सब ही भाव, स्वाभाविकता
ही सब साधन का ज्ञान रहा ही स्वरूप ही था, जो स्वरूप दशा रूप कहा, सो
स्वरूप सब भाव रूप स्वरूप ही स्वरूप ही ज्ञान के स्वरूप दशा ही सो ही
ज्ञान सब रूप से ही ज्ञान दशा स्वाभाविक ही सो साक्षी रहा?
126
महाराज को तो ऐसा काम करना ही नहीं था जिससे उन पर कोई दोष
लगाया जाय कि महामहोपाध्याय के साथ अन्याय किया? इसलिए महाराज शांत हो
कर बैठ गये और सब ओर मुँह पर हाथ धरके शांति छाती ही रही। क्यों जी, यह क्या
लीला है, विद्याशंकराचार्य जी, शांत हो, शांत हो महाराज अपने पर दोष लगाने
का भय तो करें? भला जो महाराज हैं, सब तरह का भय उन्हें ही क्यों न हो?
पराक्रमियों को तो सब बात सोच कर ही काम मन में धारना योग्य समझना चाहिए,
जिससे कि किसी का कुछ अनिष्ट न हो।
पंडित बालशास्त्री सब बात महामहोपाध्याय शास्त्र का ही, जो महाराज कहे उसी
बात सत्य समझ कर बैठे रहे। और जो सभा में अन्य जन थे वे सब तो महामहोपाध्याय
के स्वरूप के प्रकाशमान होने से सब दबे थे, परंतु जो थे पंडित
जी के, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, महाराज को,
पंडितों को खा ही, पर मुंह पर हाथ धरके जो महाराज शांत हुए इससे उन लोगों
महामहोपाध्याय की ओर जो कुछ भी शब्द करने की शक्ति नहीं रही। क्यों कि ऐसा ही
सभा का नियम ही बन गया था कि, विद्याशंकराचार्य आज्ञा बिना जो कोई
शास्त्रार्थ करे उसको दंड दिया जाय? विद्याशंकराचार्य, विद्याशंकराचार्य, महाराज की
जय! बस सब लोग तो जयकारा ही जयकारा करने लगे। पीछे जब यह बात तय पाई
कि कल को फिर सभा होगी और विद्याशंकराचार्य जब आज्ञा दे तब बात करना। जब कोई
न बोले तो किसी प्रकार शास्त्रार्थ हो, सो पंडित बाल शास्त्री तो महामहोपाध्याय के सामने
ऐसे, कि जैसे दीपक सूर्य के सामने प्रकाश करना चाहे, न कभी बोल
सके और न कोई शास्त्रार्थ हो सका, पर पंडित लोग मुंह में ही बात करते ही रहे
कि, पंडित जी को, किसी तरह भी हम लोग विजय करें पर महामहोपाध्याय
ऐसे न थे कि जिन्हें कोई परास्त कर सके, क्यों कि महाविद्वान् ही वे थे।
पर पंडितों को जो दुःख, उससे विद्या-विजयी महाराज प्रसन्न हुए, सो सब लोगों
को भोजन का प्रबंध करने की आज्ञा
देकर सब लोगों को विदा कर महाराज ने सोचा कि कैसे हो? जो जो पंडित
थे सो सब लोग कहने लगे कि जो महाराज ने किया वही हो गया कि हम लोग हार ही
गये। ऐसा कह कर, सब लोग घर को प्रस्थान किया!
काशीराज ने, पंडित बाल शास्त्री जी, स्वामी विशुद्धानन्द जी, और राजा शिव-प्रसाद जी
सब को एक ओर ले जाकर सलाह की कि कल--को विजय प्राप्त कैसे होगी, पंडित बाल
शास्त्री, स्वामी विशुद्धानन्द, स्वामी स्वरूपानन्द, स्वामी विशुद्ध भारती, पंडित तारा-
चरण इन सबने कहा, चिंता मत करो! काशीराज और पंडित बालशास्त्री,
काशीराज की जय जय होवे! ऐसा कहकर सबने विश्राम किया।
उधर तो ऐसा, पर इधर स्वामी दयानंद, पंडित भीमसेन दोनों ही विचार ही में
पडे कि क्या होगा? अब तो कल शास्त्रार्थ का समय आ गया परंतु, अब क्या हो
सकता है? महाराज जी का सिद्धांत सर्वथा सत्य ही है पर कल क्या होगा सो
कल ही देखना क्या होता है? सब लोग इस सोच में
चिंता करने के रहे, पर स्वामी जी को कोई, चिंता नहीं थी कि कल,
क्या होगा सो देखा जायगा।
उधर जो, काशीराज और पंडित, इन दोनों को भय व डर व्यापता, कि कहीं
कल को हमारी हार न हो जाय। तब तो सब काम बिगड़ जाय, सब काशी भर में बदनामी
फैल जाय कि हार गये।
काशीराज जी, सब सनातन धर्मियों को बुला कर, चिंता मत करो जी,
ऐसा सबने कहा, कल ऐसा ही होगा कि जैसा काशीराज
चाहें सो, काशीराज वैसा ही कर देना; ऐसा सबने कहा। जब काशीराज
आज्ञा दे तब शास्त्रार्थ बंद कर देना और फिर जय जय पुकार कर उठ जाना। तब तो हम
लोग सब विजय पा जांयगे और महामहोपाध्याय परास्त हो जायंगे और सब लोग कहेंगे
कि दयानन्द हार गया। और कोई दयानन्द का सत्कार न करेगा, ऐसा ही सब लोग ठहरा
कर अपने अपने घर को गये, कल जैसा स्वामी जी शास्त्रार्थ में करेंगे वैसा
सब कुछ न मानेंगे, सब लोग उठ कर चले जांयगे।
सब ही लोग जानते थे कि, स्वामी जी के साथ शास्त्रार्थ में जीत होना अति
कठिन था क्योंकि वे बड़े भारी पंडित थे, ऐसा काशीराज ने भी सब लोगों से कह
दिया था। इस बात को सबने मान लिया और अपने अपने स्थान पर चले
गये।
127
इस प्रकार जीव का यह सब भ्रम मिटने, पर ही जीव अपने शुद्ध रूप को पा कर मोक्ष सुख
प्राप्त कर सकता।
इसके उत्तर दाता का यह काम था, जिसने उत्तर दिया कि ब्रह्म--विद्या केवल गुरु
से? अर्थात जिस विद्या द्वारा ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त किया जाता हो उस विद्या को केवल
एक गुरु, अर्थात् केवल १ ईश्वर, केवल १ ही गुरु, जिस का नाम शिव प्रसिद्ध हो सब
संशय और सब भ्रमों को दूर करने वाली यथार्थ उपदेश करने वाला गुरु कहा गया हो
उसी द्वारा ही जाने?
तात्पर्य यह कि विद्या चाहे संसार की कोई भी क्यों न हो सब पहले ईश्वर द्वारा संसार
को प्राप्त हुई, जिसको उस समय चार वेद कहा गया था। इसलिये ज्ञान, जोकि यथार्थ
वस्तु का सही बोध कराता है उसका आरम्भ वेद द्वारा सर्व प्रथम संसार को प्राप्त हुआ
था ऐसा सब को मानना ही, होगा और सब धर्म वाले यही कहते और मानते हैं। यद्यपि,
कालान्तर में यह ज्ञान गुरु, शिष्य परंपरा द्वारा चलता रहा, इसलिए गुरु की महिमा
सबने बड़े आदर से मानी ही, परन्तु जो सच्चा गुरु, शिष्य होगा वह ज्ञान की महिमा
मानेगा, शिष्य को यह समझना चाहिये, सच्चा ज्ञान संसार में जहां कहीं से भी मिले
ग्रहण करे, और जिस से ज्ञान प्राप्त हुआ हो, उस को अपना गुरु माने, चाहे वह पुस्तक,
या संसार की अन्य कोई वस्तु हो। उस का ज्ञान ही मुख्य है, जिसको प्राप्त कर के जीव
का भला हो सकता, पर जो यह कहता, कि बस १ ही गुरु पर ही सब निर्भर करता
ऐसा विचार रखने वाले पर संसार का कोई गुरु भी कल्याणकारी नहीं हो सकता, और
उसका सारा किया कराया सब व्यर्थ चला जाता है, जो व्यक्ति यह समझे, कि उस
कल्याणकारी ज्ञान को सब संसार को देना--है सो वह, सब जगह सब को बांट
देगा
जिसके पास विद्या रूपी धन है, जिस से संसार का भला हो, उसको यह
कभी नहीं सोचना चाहिये कि जब तक कोई शिष्य बन कर न आयेगा, विद्या
प्रदान नहीं की जा सकती, विद्या का दान सब से बड़ा है--जो सब के लिये है,
जिसको सब को सब समय दिया जा सकता है। इसमें यह सब भेद कैसा
क्यों? उस ज्ञान दाता का नाम ही ईश्वर अथवा यथार्थ गुरु का स्वरूप कहा
जा सकता है। जो विद्या का प्रसार करे, उस विद्या के बदले संसार से
कुछ न चाहे। न धन चाहे न प्रतिष्ठा ही चाहे, केवल यह भाव ही मन में हो, कि सब
का सब प्रकार से भला हो, ऐसा ही उपदेश १ गुरु शिव
द्वारा मिलता, जिन्होंने स्वयं, संसार को सब कुछ दिया पर कुछ न
मांगा। ऐसे पुरुष ही संसार में यथार्थ, गुरु कहे जा सकते! केवल पेट पालने
को नहीं! ऐसा समझ कर, ज्ञान का उपदेश सब को करना चाहिये?
इसका उत्तर केवल यह है, यदि ऐसा विचार संसार में पहले रहता
सब जगह विद्या फैलती ही, पर जो कुछ नहीं फैला, उसका कारण केवल यह
बना कि जिसको जो ज्ञान प्राप्त हुआ, उसने उस पर अपना कब्जा करने का
प्रयत्न किया, जो कि सब का सब सर्वथा अनुचित था, जो विद्या केवल संसार
के, कल्याण के लिए थी उस पर अपना दावा सिद्ध करने का व्यर्थ यत्न किया
गया और सब कुछ छिन गया
जो विचार आज भारत वर्ष में सब को प्राप्त हैं उन का नाम केवल हिन्दू ही
नहीं कह सके। क्योंकि ज्ञान किसी के घर में बन्द नहीं किया जा सकता, यह
ज्ञान तो संसार के सब मनुष्यों के लिये ईश्वर ने प्रदान किया था, पर
जब तक यह ज्ञान १ घर में बन्द रहा तब तक उस का फल भी वैसा ही
ही मिला कि जिस घर में बन्द किया गया वह नष्ट हो गया, जिस प्रकार से बन्द
जल सड़
कर जाता है, इस लिये वेद के ज्ञान को, फैलाना चाहिये ताकि सारे संसार
को लाभ हो सके। ज्ञान की वृद्धि, तब होती है जब उस को सब के लिए
फैलाया जाये। फिर यह कहना, कि गुरु ही जाने, सो गुरु का अर्थ
क्या सब लोग समझ गये? फिर उसका भी हल, उस कल्याणकारी शिव, ने दिया
जिसका वह ज्ञान था।
जिसका वह ज्ञान था सो स्वयं १ गुरु बन कर इस ज्ञान रूपी अमृत को सब को
दे रहा है, पर उसका लाभ सब को तभी पहुंच सकता है, जब निष्काम हो,
निष्काम ही उपदेश संसार को दिया जाये। यजुर्वेद का १९.१२ मन्त्र इस
प्रकार के उपदेश को ही सब प्रकार के कल्याण का आधार मानता है।
128
इसके सिवाय इसके प्रत्येक विभाग पर एक-एक सौ हजार वीरोंका दल नियुक्त किया गया, जिससे कि
केवल एक दल किसी विपत्ति का शिकार न बने, और बाकी दल सहायता देकर उस विपत्ति स्वरूप
पहाड़ को चक ना चूर करने समर्थ हो सकें, इसीलिए प्रत्येक प्रकार से सोचा, विचारा प्रत्येक ने
जाना, कि अब लंका विजय का कोई प्रश्न नहीं
ना जाने वो दिन, वो घडी कब आएगी?
वो भी क्या शुभ दिन होगा? जिस दिन लंका विजय होगी?
ऐसा विचार के मन, में जो विश्वास उत्पन्न हुआ था उनका, सो वो सारा जाता
रहा, ना तो कभी लंका विजय हुई, और कभी होगी विजय
जब तक स्वयं राम जी दल बल के साथ हैं, तभी तक लंका विजय? फिर विजय तो
बाद बात रह गई?
वो कहते गए राम जी, ना कोई बात विचारने योग्य, ना कोई बात सोचने
योग्य ना ही कोई बात मन में ही संशय करने योग्य; सो जो कुछ बात सो तो केवल इन
सब बातों की चर्चा ना करने की ही केवल सो तो केवल इन सब बातों उपरांत केवल ही
वो निर्णय का समय आ गया, जिस दल द्वारा सब लोग आ--पहुंचे, चलो, समय से
चलें? इसलिए विभीषण स्वयं साथ गए इन सब के, विभीषण सब को साथ दिए हुए जा ही
रहे केवल उस स्थान की ओर
सो वो कहता गया, इस प्रकार केवल जा ही तो रहे विभीषण
सो उस दल का प्रत्येक जन जब तक वहां पहुंचा विभीषण सो वहां से पीछे
ना हट सका केवल आगे ही बढ़ गया सो इन सब दलों को उस समय तक वो सब कुछ ज्ञात
ना हुआ कि लंका में क्या हो रहा होगा, सो विभीषण तो जा चुका था लंका में
सो क्या कह सके कोई? विभीषण तो गया! दल आगे आया सो वो तो केवल यही
सब देखने में लगा गया कि कहो, लंका में क्या हो सकता? ना कोई बात
है, जो कुछ भी कहा जाएगा? सो उस दल का विचार तो जा रहा केवल दो
बातों, केवल इस बात का ध्यान रहा
राम विचार, राम केवल ध्यान लगा बैठ विभीषण के प्रस्थान--
उपरांत शांतमय--चित्त द्वारा केवल प्रभु की शरण लगा विभीषण जिस प्रकार,
स्वयं को समर्पण किया प्रभु सम्मुख सो, स्वयं को केवल ऐसा माना जिसके द्वारा
सब ही कार्य विधाता के आश्रित चले जा ही विभीषणके किए हुए सब ही
कार्य प्रभु के ही पद चरण में जा गिरे
सो कहा ना जा सके! जो केवल उस विभीषण विचारने विचार केवल
सत्य जान सदा विधाता सम्मुख विभीषणके विचार केवल ही केवल,
केवल प्रभु के नाम का सुमिरन विभीषण के द्वारा, उसी नाम के
विचार को मनन माना जा रहा, सदा ही आगे बढ़ रहा था लंका की ओर
सो ऐसा जान कर चलो ना, ऐसा विचार केवल राम जी को बार बार प्रभु
पुकारे
बार बार ना जाने केवल वो सोच, ऐसा मन सोच-सोच
विह्वल हो विभीषण चला गया लंका दिशा विभीषण के पद पग लंका दिशा
बढ़े, सदा केवल विवशता दिखाई
129
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130
इस तरह विचार कर उसने मन-मन में निश्चय किया, आजन्म मरूँ तो, पर दूसरा विवाह कभी
नहीं करूँगा। जब वह मरा, तब उसने देखा, कि स्वर्ग में कोई दो-तीन स्त्रियाँ हैं।
जो केवल दो पत्नियों का स्वामी बनकर रहा उसको दोनो ओरसे हाथ पकड़कर ले जाने
वाले यमदूत ऐसे खींचते हैं कि वह सोच नहीं सकता कि किस ओर जाऊँ। जो तीन पत्नियाँ रखते हैं
उनको तीन ओर तीन यमदूत खींच कर त्रिशंकुकेसमान कर, असमंजसमें डाल,
कष्टप्रद बनाते हैं, बहुविवाहवालों की गति तो और भी विचित्र ही होती है। कोई तो कह
रहा, अरे मूर्खो! एक स्त्री से ही तुम्हारा निर्वाह नहीं हो सका तो फिर
विवाह ही क्यों न छोड़ दिया? जब विवाह करना पड़ा तो केवल एक ही पत्नी क्यों
न रखी? दूसरों का विवाह क्यों कराया? स्वयं कई स्त्रियों से विवाह क्यों किया? यदि कई
एक से विवाह किया था? फिर दूसरी के आधीन क्यों हुआ? अपनी इच्छा से कई स्त्रियों
पर रीझ कर विवाह कर उनके जाल में फँसने वाले तो अवश्य नरकमें गिरेंगे इसमें कोई
सन्देह नहीं!
जिन्होंने केवल पुत्रोत्पत्ति तथा गृहस्थ धर्म पालनार्थ एक ही से रूप-रंग वा धन-दौलत
को न देख कर केवल कुल को उत्तम समझ कर विवाह किया, केवल धर्मार्थ ही पत्नी का
उपयोग किया वा केवल सन्तान के निमित्त ही पत्नी का सङ्ग किया वा जिसने मन से भी पर-नारी
चिन्तन न किया। गृहस्थ में रहकर भी, ब्रह्मचारीवत् रहा।
जो किसी दूसरे पर या तो परावलम्बी बन कर नहीं रहा अथवा स्वयं, दीन-
हीन, दुर्बल होने पर, गृहस्थ धर्मका पालन करने लगा। उसने पत्नी के साथ धर्म-साधन
में सहयोग दिया, पत्नी ने भी हर तरह पति का साथ निभाया। दोनों में परस्पर कभी
कपट, द्वेष, विरोध नहीं रहा, वरन् दोनों परस्पर एक दूसरे का सदैव ध्यान रखते रहे।
सदा धर्म, सत्य, नियम का पालन करते रहे, किसी को अपने से कष्ट न पहुँचे इस बात
का पूरा ध्यान रक्खा गया, परोपकार में लगे रहे। किसी को सताया नहीं और न ही
किसी को परपीड़क बनने दिया, ऐसे लोगों का जीवन धन्य है। वे तो स्वर्ग को प्राप्त
करते हैं।
यही नहीं, उस लोक में जाकर, इन बातों का भी ज्ञान कराया गया
कि, जो मनुष्य केवल अपने उदर-पोषण में लगे रहते हैं।
सदा यही सोचा, स्वयं खाऊँ पर कभी किसीको दिया नहीं। दान-धर्म से सदा
जी चुराते रहे। दूसरों को जब-जब आवश्यकता पड़ी उस समय कोई सहायता न दी, जो
माता-पिता की सेवा नहीं करते वरन् उनका तिरस्कार करते हैं। जो भाई-भाई में कलह
कराते हैं। जो सन्तों का मान-भङ्ग करते हैं। वे नरक गामी होते हैं।
जो पर-नारी गमन, पर-धन का हरण करने में लगे, मदिरा-पान में ही
मस्त रहे, अपने को ही सब कुछ समझते, दूसरों को तुच्छ व हेय, दूसरों के
दुःख को न देखकर, केवल अपने सुख में ही लगे रहे। वे नरक गामी होते हैं।
जो विद्या दान नहीं देते वरन् धन कमाने की दृष्टि से ही विद्या देते, वे
नरक में घोर यातना पाते हैं। जो अपनी सन्तान को सुमार्ग नहीं दिखाते, वरन्
उन्हें कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं। जो अपने स्वामी का अहित करते हैं, जो
माता-पिता को घर से निकाल बाहर करते हैं।
इस प्रकार यमदूत उस जीव को, सब प्रकार समझा कर, कहते हैं, धर्मराज के दो रूप
हैं। एक तो सौम्य रूप है, जिसमें वे धर्मराज कहलाते हैं और दूसरा रूप अति भयंकर, विकराल
है जिसमें वे यमराज कहलाते हैं। जो, पापी होता उसके सम्मुख वे भयानक रूप
दिखाकर दण्ड की व्यवस्था देते हैं और, धर्मशील के आगे वे सौम्य।
जो पराई स्त्री को देख कर, अपनी दृष्टि को नीचा कर लेता है। जो पराई स्त्री को
अपनी माता अथवा बहन के समान समझता, वह धर्मराज का दर्शन पाता है?
जो दूसरे के धन को मिट्टी-पत्थर समझता है। जो अपने सुख की तरह दूसरों को भी
सुखी देखना चाहता है? जो किसी भी प्राणी को कष्ट नहीं देता, वही
पाता है, जिसने पराए दुःख को दूर करने का प्रयत्न किया है। जो
तो उस व्यक्ति को कभी भी नरक नहीं भोगना पड़ता, जिसने पराया अहित कभी नहीं
सोचा, वरन् सदा ही सबका भला ही सोचा है। जो दूसरों की निन्दा नहीं
करता, जो किसी भी प्राणी को धोखा नहीं देता। जो सन्तों का
आदर करता है। जो दीन-दुखियों की हर सम्भव सहायता करता है। जो सदा
प्रभु स्मरण करता है। जो अपने गुरुजनों का आदर करता है। जो अपने माता-
पिता को ईश्वर मानता है, जो कभी किसी का बुरा नहीं सोचता।
131
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विचार यह देखकर कि अधिकांश मानव जाग्रत होकर रहने का दम तो भरते हैं पर अपनी
जीवनचर्या पर एक बार भी नजर डालने अथवा खुद का ही सच से मुंह न मोड़े तो उन्हें खुद समझ
आ जाए कि जिस जाग्रत जीवन व्यतीत कर रहे हैं वह तो मात्र भ्रम या धोखा भर सिद्ध होकर रह जाता
बिना जागे ही हम मर रहे हैं और बिना ही जाने हमारा जीवन का सिलसिला समाप्त हुआ, व्यर्थ ही
जीवन समय बिताया
हे! साधक! जागो! जागो जो कुछ घट रहा उसे जानो इसके पहले कि मृत्यु आ जाए, अपने
जागने रूपी प्रकाश अथवा साधना के-को पहचानो कि इसके बिना जीवन का कोई भी अर्थ
नहीं या ऐसा जाग्रत जीवन ही व्यर्थ जीवन कहलाने के काबिल समझा जाता है। जो व्यर्थ
जीवनशैली पर विचार करने अथवा सोचने का कोई दृष्टिकोण या नजरिया अपना ही नहीं
सकते हैं। सच तो यह, कि जो भी हम कर्म करते हैं, या बातें करते हैं वह सब तो भ्रम या धोखा
सिद्ध... जीवन का उद्देश्य तो मात्र यही समझना था, जिससे बच कर आज जाग्रत
भ्रम जीवन रहे!
अधिकांश मानव इस भ्रम भरे मन द्वारा संचालित या निर्देशित या आयोजित भ्रम
भरे जाल तथा भ्रम से प्रभावित कार्यप्रणाली अपना कर ही जीता रहा! अधिकांश मानव उस
भ्रम या भुलावे का शिकार बन बैठा कि जो भी घटित हो रहा है सही! जिस कारण से
प्रत्येक बात का वह अपने आपको सच मान बैठा या उस भ्रमित सच को सच मान कर भ्रम
जीवनशैली पर गर्व (अभिमान) करता, अपनी ही बात (मानसिकता) को सच साबित करने
पर, व्यक्तिगत तौर तरीके से व्यवस्था या कार्यप्रणाली पर निर्भर बन बैठा या यह भी कह
लें ऐसा समझा गया; कि व्यक्तिगत ही नजरिया ही सही रूप सच का या सच जीवन
शैली है सच; कि व्यक्तिगत ही विचार ही विचार रूप सच का सच माना गया, जिस रूप
सच का वह रूप मान बैठा जिसके प्रभाव में भ्रमित ही दृष्टिकोण या नजरिया अपना
लिया जिसका वह संचालन व्यवस्था या कार्य कर बैठा--तो क्या ऐसा जाग्रत हुआ?
जिसे वह भ्रम पूर्वक अपना सच, जिस भ्रम को सच मान कर कार्य किया था?
इसलिए हर व्यक्ति को अपने मन-मस्तिष्क द्वारा जीवन के सच को
जानना था, जो कि वह कभी जान पाया ही न कभी समझ पाया जिस कारण से वह खुद
को ही भ्रम के आगोश में अपने आप छिपा बैठा तथा भ्रम आधारित जीवन संचालित कर
ही, अपने आपको जाग्रत मान बैठा
मन-के प्रभाव विचार द्वारा उस जीवन यात्रा पर विचार या ज्ञान पा सका, जिस
पर स्वयं व्यक्तिगत या समाज द्वारा जीवन का आधार, या सच मान बैठा क्योंकि
उसने कभी सच तथा उसके आधार को तलाशने अथवा खोजने का प्रयास कभी किया ही
जिससे कि स्वयं को, अपने आप विचार शैली, कार्यप्रणाली तथा व्यवस्था द्वारा
वह सब कुछ जान पाता भ्रम का शिकार ही बना रहा? सच यह तो नहीं जिसका वह
तो शिकार बना बैठा जिसे उसने अपने द्वारा विचार कर सच मान लिया था क्योंकि
वह स्वयं भ्रमित मन द्वारा, बिना ही ज्ञान बिना विवेक के ही जो विचार, कार्य
रूप ज्ञान, कभी विचारों का, कभी या विचारों, कभी के रूप, कभी उस विचार, का
रूप देकर अपने आप ही भ्रम के सच पर ही आधारित सच मान लिया
हर सांस व्यक्तिगत ही रूप में प्रभावित एक विचार को जन्म दे रही थी रूप
पर, उसने जिस व्यवस्था को, अपने विचार को सच मान कर जो रूप दिया उस रूप में
वह यह भूल गया कि, उसके जिस भ्रम विचार रूप को सच माना गया था वह कभी
विचार का रूप लेकर सच साबित हो रहा भ्रमित विचार ही तो था जिस रूप द्वारा
सच के रूप, जिस रूप में मन, विचार के रूप में स्वयं भ्रमित सोच को जन्म दे
विचार का रूप बनाकर प्रतिष्ठित, स्थापित, स्थिर कर, अपने मन के प्रभाव का
रूप सच के रूप में माना
एक शांत या शून्य का रूप अपना प्रभाव या प्रभाव के रूप में सामने उस
तक विचार के रूप अनुसार ही रहा था, जिसे मानव विचार का एक रूप व रूप का
नाम दे, न ही तो अपने शून्य रूपी स्वभाव अथवा शांत रूप को पाया, जिस कारण
वह शांत रूप अथवा शून्य रूप के प्रभाव अथवा स्वभाव को पहचान नहीं पाया
हर सांस का उपयोग मन व विचार के सच जानने तथा शांत या शून्य रूप
रहा! पर या ऐसा कह लें इसके प्रभाव में या इसके लिए, शांत भाव, शांत
स्वभाव या शून्य स्वभाव को न पहचान कर सांस-सांस पर ही सच माना, शांत व
शांत, शांत भाव, शांत व शून्य
इस वास्तविकता द्वारा शून्य ही प्रकाश रूपी ज्ञान के प्रकाश रूप ज्ञान से
अनभिज्ञ, मात्र ही उस सच को सच मान कर भ्रम भरा ही जीवन जी रहा था कि
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गयी कि वह सब कुछ जान कर भी अनजान बनता जा रहा था और वह भी अपनी माता जैसी
माता के इस लज्जित व्यवहार स्वरुप स्थिति से अनभिज्ञ बन अनजान ही हो कर इस प्रकार चुप
बैठनेवाले पर धिक्कार कर दिया या नहीं, सत्यकाम अपनी माता जैसे माता
पिता का आदर करें, अथवा जिस का विरोध किया गया वैसा!
सत्यकाम ने जब माँ से पूछा होगा तो माता पिता-संबन्ध का रहस्य भली भाँति
तो होगा
अर्थात् यह निश्चय रहा ही होगाकि, या तो विवाह रूप पिता-संबन्ध--नियम
का लोप होगा? अथवा उस से जो सन्तान हुआ होगा वह न हुआ? अथवा उस
समय वह न था? जिस बात का ज्ञान न रहा? जिस में न तो लज्जित होनेका
था, ओर न ही लज्जा युक्त बात थी।
यदि उस के विचार माता प्रति लज्जा से भरे न होते तो पिता की ही बात को
पिता सम्बन्धी ही न कह देता, बल्कि इस प्रकार दोनों सम्बन्ध लज्जा जनक हुए,
जिससे सत्यता ही कह दी, जिससे सब संशय मिट गया।
हे आर्य जनो, इस प्रकार असभ्यता को सत्य कह कर प्रचार तो न कर कर
संसार को ठगते? यह सत्यता का स्वरूप? इस सत्यता को धिक्?
हे आर्य जनो, यह बात सत्य सिद्ध हो तो इस विचार द्वारा कि असभ्यता
संसार में सब रूप सत्य ही हो जाय, सब संसार को ठगते, सब जग को ठग कर
सत्य का नाम दिया जाय महा अनर्थ! दो चार जन ऐसे होवें! इस के द्वारा जो चाहे
सो कह कर ठग लो, पर ऐसा सत्य जो जगत वासियों को भ्रष्ट करने वाला,
सज्जनों द्वारा स्थापित धर्म को बिगाड़ ही देगा, सब संसार को दुख देगा ही;
उस समय में सत्यकाम ने, अपने माता सम्बन्धी को; जिस प्रकार से, माता सम्बन्धी
था, यथावत स्वरूप दर्शाया
कि पिता जी के नाम-धाम का निश्चय न रहा, माता का नाम ही केवल था
उस समय के लोग माता के नाम से जानते
इस विचार से स्पष्ट पता लग रहा कि जाबालि गोत्र वंश परम्परागत चला
रहा जिससे कि उस समय प्रत्येक पुरुष अपने नामके साथ व वंश का नाम लेता, न
माता, न पिता, जिस से स्पष्ट ही होता कि जाबालि नाम कुलका था अथवा
उन का नाम, जिस से सम्भव है कि गौ नाम जाति वाचक संज्ञा से उस का
परिचय हो गया होय, वा जाबालि गोत्र था, सो पिता और मां, का गोत्र एक
रहा होगा, जिस से... ।
सत्य स्वरूप ज्ञान द्वारा यह भी निश्चय हो रहा जिस से कि सत्य स्वरूप
हो गया, जिस से यह भी स्पष्ट हो रहा, जिस से ज्ञात हो रहा जिससे समाज
सुख को प्राप्त करे, अन्यथा उस की बात से लज्जा थी, सब कुल की लज्जा का
उल्लंघन हो ही रहा था जिससे सत्यता समाप्त हो लज्जास्पद व्यवहार ही सिद्ध हो
सकता जिससे धर्म की रक्षा न हो, पर जाबालिका विचार लज्जा युक्त निश्चय
सत्यता की जड़ को ही हिला दिया गया था; सत्यता का प्रकाशक था, सत्यता
को प्रकाशित कर, सब सन्देह दूर हो सकते हैं स्पष्ट था।
इस व्याख्यान द्वारा भी सिद्ध यही होता कि जो कुछ कहा गया सो सत्य था।
जो सत्य की पराकाष्ठा थी और सब संशय मिटे!
विद्वानों का मत यह रहा कि जो सत्य रूप बात की गई सो ही मान्य और
सदा ग्रहण करने योग्य ही रहा, जिसे सब जन सत्य मान कर विचार करते हुए
इस प्रकार की सब शंका दूर करने में सफल सिद्ध हुए, जिस द्वारा, सत्य स्वरूप
की सब प्रकार से महत्ता ही को सिद्ध किया गया, केवल मात्र नाम से पिता रूप को
सब तरह से सत्य निश्चय ही माना था विद्याभ्यास हेतु सब जन की दृष्टि
सत्यता ही ग्राह्य रूप से प्रमाण का रूप थी जिससे कि सब का भला होना
सिद्ध हो जाता।
संसार के सब कार्य सत्य पर आधारित समझे गये, जिस तरह यह सिद्ध किया
गया रूप से ही सत्यता पूर्ण व्यवहार ही सब बातों का ही अवलम्बन रहा करता
था जिस हेतु सब को ही मानना ही पड़ता था कि जो कुछ जन--का संशय दूर
हुआ! सत्यता की विजय! सत्यता विजयी हो कर सब शंका मिटा, समाप्त कर
सत्यता प्रकाश को सब जन का रूप बन कर धर्म के पालन द्वारा जगत सुधार
सफल कार्य रूप सत्य द्वारा, सिद्ध होना ही सदा योग्य रहा
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जिसके हृदय भीतर स्वयं श्री राम विराजे हों और जिनके मन मस्तिष्क पर परमात्मा का प्रभाव
रहेगा, वो जीवन के प्रत्येक पथ दर्शक बन जाता और ज्ञान सब तक स्वयं पहुँचता ही जायेगा?
फिर वास्तविकता कौन सी? तभी वास्तविकता यही होगी कि किसी जीवंत व्यक्ति को,
जो स्वयं को परमात्माका रूप समझ कर बैठा हुआ
ना जाने कितने विभिन्न विश्वासपात्रों पर यह जान लेता कि ईश्वर तो सबके मन
रूप घट भीतर ही घट घट वास करता ही रहता है। किन्तु इन घट घट को जब तक स्वयं
विषय से पूर्ण घट नहीं मिलता या जब स्वयं घट से तृप्त मन घट नहीं मिलता तब तक
ज्ञान उस विशाल सागर रूपी ना जाने उस परमात्मा के केवल जल प्रवाह रूपी अंश से युक्त
हो, केवल उस विशाल रस को प्राप्त नहीं होता, जिसे सब केवल मन भीतर ही जान लें।
जब तक सब स्वयं को विस्तृत ज्ञान रूपी घट नहीं बना लें, जिससे स्वयं केवल तृप्त ही,
केवल इस ज्ञान से शांत नहीं हो सकते ना केवल इस वास्तविकता के विषय रूप रस को जान
ही सकते। केवल ज्ञान से ही, ना जाने उस ज्ञान रूपी सागर का रस स्वयं ही मिलना
ही होता जिसे केवल भक्ति रसयुक्त कहा जाता-अर्थात् जिसे केवल भक्ति रूपी ज्ञान ही
कहा गया हो, जिसको सब केवल ज्ञान रूप में रस रूप मान केवल अपने मन से जान
लेते बस वही रस, जो ईश्वर के रस रूप ज्ञान को सब तक तक ज्ञान रूप स्वरूप केवल
भाव से युक्त होकर रहता है।
जिसको सब हर समय केवल भक्ति का रस रूप ही कहते हैं, जिसे ना जान
सकें तो, जिस रस बिना सब व्यर्थ, उस भक्ति रस का क्या रस?
जिसे ना केवल सब रस, जो परमात्मा का स्वरूप हो, जिसे केवल केवल ही
ज्ञान रस कहा, वो सब ज्ञान रूपी रस ही भक्ति कहला
जिसके रूप को केवल ज्ञान रस कहा, समझे? जिसे ना रस से ही कह, जो
केवल ज्ञान रूप ही माना जा सकता एकमात्र
केवल रस रूप ही कह सकते! जिसे ना रस ही ना कह, जिसे केवल
केवल ना केवल रस समझा जाए बल्कि रस ऐसा रूप हो, जो हर प्रकार
ज्ञान से युक्त ही केवल ज्ञान! जिसे ना केवल केवल सब प्रकार से हर ज्ञान
रूप ज्ञान को ना जान कर सब ही परमात्मा के रस स्वरूप का रस जान सके
वास्तविकता-पूर्ण रस केवल, केवल ना रस रूप केवल ही केवल भाव ज्ञान
रूप से ही जान कर सकते, जिसे ना केवल सब रूप से सब रूप ज्ञान
कहें
सब रस को जान केवल ना रस ही ज्ञान रूप रस को ना ही जान कर सब
ही रस मान लें, जो ज्ञान केवल ज्ञान का रूप सब ज्ञान
केवल ज्ञान ही सब ज्ञान रूप रस को जान कर ना केवल रस, जिसे
केवल ज्ञान रूप ज्ञान मान रस समझें, जिसे सब केवल ज्ञान ही रस ना मान
जान सब रहें, जिसे केवल रस ही ना मान कर सब केवल ज्ञान रूप सब जान
ज्ञान सब केवल कहें, जिसे सब केवल केवल ज्ञान
इसलिए केवल सब ज्ञान स्वरूप ही ना रस का रूप कहलाए, जिसे
केवल ज्ञान कह दें! ना केवल ना ही, इसलिए केवल ही, जिसे सब कहें, कह
भी दें!
इसलिए तो रस, जिसे, केवल ना रस रूप ज्ञान केवल कहना केवल केवल
ही केवल ज्ञान कहें? या केवल ज्ञान केवल ना केवल केवल ज्ञान केवल केवल
ही कहें? केवल रस ही कह कर केवल, उस रस रूप रस को केवल ना रस,
केवल ज्ञान केवल कहना ही! ना केवल केवल स्वरूप ही कह दिया, सब केवल
ज्ञान रस सब जान केवल ही केवल ना कह लें, ना सब केवल ज्ञान स्वरूप,
ज्ञान सब केवल ही केवल स्वरूप केवल केवल जान कर उस रस स्वरूप ना
स्वरूप ही ना कह दें? जिसे केवल ना 1 मान जान केवल ना ज्ञान केवल हो,
जिसे केवल ना 2 मान कर जान केवल हो, ना केवल ना सब ना केवल ही
केवल कहें?
ना ज्ञान केवल ही ना रस है, जिसे केवल ज्ञान ही ना रस ज्ञान ही कहा
हो, रस-रूप केवल, स्वरूप, केवल ही केवल रस ही रस केवल रूप स्वरूप
केवल केवल ही ज्ञान रूप ज्ञान केवल ना ज्ञान ज्ञान सब ही कहलाए केवल,
जिसे रस, केवल रस, ना ज्ञान कह कर, सब रस रूप से ही रस स्वरूप ही जान
स्वरूप ही स्वरूप ना ज्ञान ना ज्ञान कह, ना स्वरूप का रूप ज्ञान स्वरूप
ज्ञान केवल स्वरूप ना ज्ञान कह
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□□ □□□--□□□□□□, □□□□□, □□□□, □□□□□□□□□ □□ □□□□□□ □□□ □□□ □□ □□□□□□ □□
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□□□□ □□□? □□ □□ □□□□ □□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□
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□□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□ □□□□□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□□□□,
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□□□□□□□□□□□□ □□, □□□ □□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□--□□□□□□□□ □□ □□ □□ □□□□
□□□□ □□□--□□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□, □□□□□□ □□□□; □□□□□□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□ □□□ □□□ □□□□□□□□ □□□□ □□□, □□□ □□□□□□□□□□□□ □□□□ □□□, □□□
□□□□□□□□□□□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□
□□□□□□ □□□□, □□□□ □□ □□ □□□ □□□□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□
□□□ □□ □□ □□ □□ □□□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□□□ □□□□ □□□ □□ □□□ □□□□
□□□□ □□□□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□□□ □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□ □□□□ □□ □□□ □□, □□
□□□□ □□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□ □□□□ □□ □□□ □□ □□□□ □□ □□□□ □□□□ □□ □□□□
□□□□ □□ □□□ □□□□ ( □□□□), □□□□□ □□□□ □□ □□ □□□□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□ □□□□
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□□□ □□□□□ □□□□ □□□□□ □□ □□□□ □□□ □□□ □□□□□ □□ □□□ □□, □□ □□ □□□□□□ □□, □□
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कथा समाप्त कर जब पंडित सुखदेव अपनी घर की ओर चले तो देखा, कि केवल दो चार जन
पीठ पीछे चले आते हैं। वे तो सब इस बात को भली भांति जानते थे। परन्तु इन चार पांचों
सज्जनों को ऐसी अमूल्य कथा सुनकर बड़ा विस्मय और आनन्द हुआ था, जिससे सुखदेव जी
चले, तो इन चार पांच ने कहा, पंडित जी! कृपा कर यदि आप कुछ दिन इस कथा का
विचार हमें भी सुना दें तो बहुत ही हम पर कृपा होवेगी, पंडित जी बोले कि इस
बात का अधिकार सब लोगों कोनहीं
पर जो जन प्रेम पूर्वक भगवान् की ओर मन फेरें, और शास्त्रोक्त नियमों द्वारा
अपने मन को उस ओर लगावें उनको ही, इस विचार शास्त्र का, ज्ञान हो या विचार हो
सक्ता है। सो तुम लोग घरबार छोड़कर साधु होने का यत्न करो, जिससे मुक्ति मिले वा
इस कथा का लाभ मिले? सो अब तुम इन कथाओं द्वारा कुछ तो भी लाभ हुआ? क्या
हुआ, लाभ न हुआ?
पंडित जी! ज्ञान लाभ हुआ। परन्तु हम तो गृहस्थी हैं। यदि आप कहें तो हम
ज्ञान पावें, जिससे सब काम काज करते हुये मुक्ति पावें। सुखदेव जी बोले
केवल ज्ञान शास्त्रोक्त वा बड़े महात्मा पुरुषों शास्त्रार्थों से मुक्ति का अधिकारी
हो सकता।
सुखदेव बोले ज्ञान? कैसा ज्ञान यह तो केवल कथा को तो सुख पूर्वक कही कि
जिससे जो मनुष्य कथा सुने उस को कुछ लाभ होना चाहिये--ज्ञानियों को कथा क्या सुने,
जब ज्ञान से मनुष्य पारलौकिक सुख पायेगा, फिर कथा से क्या? सुखदेव जी बोले अच्छा
तुम चलो, कल से ही विचार! कल को, चार! सज्जन पंडित जी का उपदेश,
जिस से मुक्ति प्राप्त होती सुखदेव उपदेशक, चार-पांच गृहस्थ जन विचार सुनने
को आये, जब इन को ज्ञान का उपदेश हो रहा था और वे सब बड़े ध्यान से ज्ञान
कथा सुनते ही विचार रहे, सुखदेव बोले यह संसार माया जाल क्या सुख इस संसार
का है, सो विचार विचारने से ज्ञान होगा।
तब पहला सज्जन बोला, तो महाराज! मुक्ति किस प्रकार हो? क्या कर्म द्वारा मुक्ति
होगी? क्या कर्म निष्काम निष्कर्म कर्म से मुक्ति होगी? कर्म सब करते संसार धर्म
काम सब ही निष्काम कर्म अपने कर्तव्य कर्म अनुसार भगवान् अर्पण करें? फिर
महाराज जी ने कहा--कर्म सब छोड़ देने चाहिये सब ही पापो का रूप हैं, कर्म सब ही
बन्धन शास्त्रोक्त कर्म भी पाप रूप ही ज्ञान के बिना सब अविद्या जाल जिस से
आवा-गमन बन्धन सब जीवात्मा भोग रहे हैं, सुखदेव बोले केवल संन्यासी
होगा? अब दूसरा जन बोले सुखदेव जी यह बात, सब लोग विचारने योग्य समझें,
सब लोग अपना कर्म त्याग संन्यासी अथवा संन्यासी ज्ञान को सब त्याग दें, सुखदेव बोले हां,
त्याग धर्म सब से श्रेष्ठ है, सब त्याग ही मुक्ति है, केवल संन्यासी ही मुक्ति
है, दूसरा विचार सब मिथ्या है।
सो चारों सज्जन उस दिन ज्ञान सुखदेव जी द्वारा सुन कर अपने घर गये।
दूसरे दिन प्रातः, इन सबने अपने अपने घर में सब प्रकार का भोजन बना कर सुखदेव
जी के निवास पर जा कर थाल बड़े प्रकार सजाये भोजन सुखदेव जी के आगे रख सब अपने
ही हाथ से खिलाने लगे और सुखदेव जी बड़े प्रेम से खा रहे थे, तब उन चारों
में पहले जन ने कहा कि हे महाराज जी, आप ज्ञान द्वारा उस निराकार
ज्ञान का विचार कर भोजन जो कर रहे हैं यह सब अविद्या और माया जाल का
साधन है, यह ज्ञान-वान् पुरुषों द्वारा निषिद्ध कर्म केवल इस ही बात द्वारा सुख
भोगने रूप यह कर्म रूप पाप, ज्ञान का विरोधी है। सो भोजन का त्याग होना
चाहिये यह सुन सुखदेव जी बोले, कि भोजन का त्याग केवल प्राण त्याग रूप पाप
कर्म का ही कारण बन कर पाप रूप ज्ञान है, ज्ञानवान् तो सब पदार्थों को
खा कर केवल उस द्वारा ही ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी बन सकता क्योंकि त्याग तो
केवल मन का ही है।
उन्होंने फिर कहा महाराज जी भोजन शास्त्रोक्त मर्यादा से यदि त्यागें, तब
भगवान् का ही भजन वा ज्ञान रूप मन में ध्यान लग कर मुक्ति होगी?
त्याग भी धर्म, वा अधर्म नहीं! संन्यासी केवल ही संन्यास का स्वरूप ही
स्वरूप।
सो ज्ञान केवल कथन मात्र सब संसार केवल इस संसार ज्ञान विचार मात्र ही का
केवल दो स्वरूप हैं, पहला तो ज्ञान! दूसरा शास्त्रोक्त नियमों का, संन्यासी
त्याग केवल ही, सब संन्यास मात्र विचार, सब ज्ञान चर्चा, सब संन्यासी विचार
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