माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजिसके हृदय भीतर स्वयं श्री राम विराजे हों और जिनके मन मस्तिष्क पर परमात्मा का प्रभाव
रहेगा, वो जीवन के प्रत्येक पथ दर्शक बन जाता और ज्ञान सब तक स्वयं पहुँचता ही जायेगा?
फिर वास्तविकता कौन सी? तभी वास्तविकता यही होगी कि किसी जीवंत व्यक्ति को,
जो स्वयं को परमात्माका रूप समझ कर बैठा हुआ
ना जाने कितने विभिन्न विश्वासपात्रों पर यह जान लेता कि ईश्वर तो सबके मन
रूप घट भीतर ही घट घट वास करता ही रहता है। किन्तु इन घट घट को जब तक स्वयं
विषय से पूर्ण घट नहीं मिलता या जब स्वयं घट से तृप्त मन घट नहीं मिलता तब तक
ज्ञान उस विशाल सागर रूपी ना जाने उस परमात्मा के केवल जल प्रवाह रूपी अंश से युक्त
हो, केवल उस विशाल रस को प्राप्त नहीं होता, जिसे सब केवल मन भीतर ही जान लें।
जब तक सब स्वयं को विस्तृत ज्ञान रूपी घट नहीं बना लें, जिससे स्वयं केवल तृप्त ही,
केवल इस ज्ञान से शांत नहीं हो सकते ना केवल इस वास्तविकता के विषय रूप रस को जान
ही सकते। केवल ज्ञान से ही, ना जाने उस ज्ञान रूपी सागर का रस स्वयं ही मिलना
ही होता जिसे केवल भक्ति रसयुक्त कहा जाता-अर्थात् जिसे केवल भक्ति रूपी ज्ञान ही
कहा गया हो, जिसको सब केवल ज्ञान रूप में रस रूप मान केवल अपने मन से जान
लेते बस वही रस, जो ईश्वर के रस रूप ज्ञान को सब तक तक ज्ञान रूप स्वरूप केवल
भाव से युक्त होकर रहता है।
जिसको सब हर समय केवल भक्ति का रस रूप ही कहते हैं, जिसे ना जान
सकें तो, जिस रस बिना सब व्यर्थ, उस भक्ति रस का क्या रस?
जिसे ना केवल सब रस, जो परमात्मा का स्वरूप हो, जिसे केवल केवल ही
ज्ञान रस कहा, वो सब ज्ञान रूपी रस ही भक्ति कहला
जिसके रूप को केवल ज्ञान रस कहा, समझे? जिसे ना रस से ही कह, जो
केवल ज्ञान रूप ही माना जा सकता एकमात्र
केवल रस रूप ही कह सकते! जिसे ना रस ही ना कह, जिसे केवल
केवल ना केवल रस समझा जाए बल्कि रस ऐसा रूप हो, जो हर प्रकार
ज्ञान से युक्त ही केवल ज्ञान! जिसे ना केवल केवल सब प्रकार से हर ज्ञान
रूप ज्ञान को ना जान कर सब ही परमात्मा के रस स्वरूप का रस जान सके
वास्तविकता-पूर्ण रस केवल, केवल ना रस रूप केवल ही केवल भाव ज्ञान
रूप से ही जान कर सकते, जिसे ना केवल सब रूप से सब रूप ज्ञान
कहें
सब रस को जान केवल ना रस ही ज्ञान रूप रस को ना ही जान कर सब
ही रस मान लें, जो ज्ञान केवल ज्ञान का रूप सब ज्ञान
केवल ज्ञान ही सब ज्ञान रूप रस को जान कर ना केवल रस, जिसे
केवल ज्ञान रूप ज्ञान मान रस समझें, जिसे सब केवल ज्ञान ही रस ना मान
जान सब रहें, जिसे केवल रस ही ना मान कर सब केवल ज्ञान रूप सब जान
ज्ञान सब केवल कहें, जिसे सब केवल केवल ज्ञान
इसलिए केवल सब ज्ञान स्वरूप ही ना रस का रूप कहलाए, जिसे
केवल ज्ञान कह दें! ना केवल ना ही, इसलिए केवल ही, जिसे सब कहें, कह
भी दें!
इसलिए तो रस, जिसे, केवल ना रस रूप ज्ञान केवल कहना केवल केवल
ही केवल ज्ञान कहें? या केवल ज्ञान केवल ना केवल केवल ज्ञान केवल केवल
ही कहें? केवल रस ही कह कर केवल, उस रस रूप रस को केवल ना रस,
केवल ज्ञान केवल कहना ही! ना केवल केवल स्वरूप ही कह दिया, सब केवल
ज्ञान रस सब जान केवल ही केवल ना कह लें, ना सब केवल ज्ञान स्वरूप,
ज्ञान सब केवल ही केवल स्वरूप केवल केवल जान कर उस रस स्वरूप ना
स्वरूप ही ना कह दें? जिसे केवल ना 1 मान जान केवल ना ज्ञान केवल हो,
जिसे केवल ना 2 मान कर जान केवल हो, ना केवल ना सब ना केवल ही
केवल कहें?
ना ज्ञान केवल ही ना रस है, जिसे केवल ज्ञान ही ना रस ज्ञान ही कहा
हो, रस-रूप केवल, स्वरूप, केवल ही केवल रस ही रस केवल रूप स्वरूप
केवल केवल ही ज्ञान रूप ज्ञान केवल ना ज्ञान ज्ञान सब ही कहलाए केवल,
जिसे रस, केवल रस, ना ज्ञान कह कर, सब रस रूप से ही रस स्वरूप ही जान
स्वरूप ही स्वरूप ना ज्ञान ना ज्ञान कह, ना स्वरूप का रूप ज्ञान स्वरूप
ज्ञान केवल स्वरूप ना ज्ञान कह
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