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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 154 में से

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समय ज्यादा था अथवा विचार ज्यादा गहरा अथवा इन सब बातोंके ऊपर भी जो समय का स्वामी
परमात्मा था उसकी यह प्रेरणा थी? रामलाल सहसा जाग तो उठे परन्तु उनका मन जैसे
खो-सा गया था! उन्होंने सोचा, 'क्या मैं मरूँगा?
जब तक भगवान् की इच्छा होगी तब तक ही यह सब कुछ मुझे दिखाई देगा। परन्तु
केवल मेरे मर जाने पर ही संसार बन्द तो नहीं हो जायेगा। यह संसार तो चलता ही रहेगा।
यह विचार आते ही वह घबरा गये। उन्होंने सोचा 'यदि मुझे अपनी मृत्युका ही भय होता,
अहम्मन्यता होती, ईर्ष्या-द्वेष होता तो, सम्भवतः सहसा जागकर मैं डरता अथवा दुःखी
पर यह दुःखदायिनी शान्ति कैसी?
जब संसार का अन्त नहीं होता अथवा जब तक संसार के सब पदार्थों का अन्त नहीं
होता केवल जीवन समाप्त हो सकता है। जीवन समाप्त हो जाने पर जो कुछ है उसका क्या
होगा? केवल इतना ही नहीं, यह सुख, शान्ति और आनन्द जो आज तक मैंने इस संसार
के सब सुख और सारे आनन्द एक-एक करके तो मुझे मिले नहीं। आज केवल उनका विचार
आया, और सारा जीवन ही आनन्द से भर उठा--तो आनन्द कैसा होगा? इस प्रकार सोचते
ही सही, जिस शान्ति स्वरूप आत्मा का ध्यान आ जाने पर आनन्द मिल ही जाता? पर केवल शान्ति!
शान्त रहकर क्या होगा नहीं! क्या यह शान्ति किसीकी होगी? केवल ही सब, कभी-कभी, शान्ति
विश्रामके लिये होती है। पर जीवन केवल शान्ति!
सब प्रकार चिन्तन करने पर भी कोई निष्कर्ष न निकल-सका केवल यह निष्कर्ष निकल रहा
था कि मृत्यु का भय नहीं था और न ही जीवन की लालसा। मृत्यु के बाद क्या संसार नष्ट
नहीं होता यह चिन्ता सताती, चिन्ता भी नहीं, तो क्या चिन्तित? जीवन का भय नहीं अथवा
केवल जीवन एक न समाप्त, केवल ही सब चिन्ता अथवा भय का रूप बन कर सब कुछ खोता
जा रहा था यह सोच अथवा विचार उस जीवन को शान्ति प्रदान करने के स्थान पर एक अजीब
अशान्ति दे रहा था। शान्ति अथवा जीवन जिस प्रकार भी समाप्त हो जाता तो मन को शान्ति तो
थी!
जो कुछ घट रहा था अथवा विचारित था, सब का सब मन का रूप बना हुआ था।
उस पर भी जब मन कुछ सोच न रहा था परिणामतः एक प्रकार शान्ति का जन्म हो रहा
था न वह सुख था और न दुःख, केवल मन शांत था।
जीवन केवल सुख और दुःख दोनों का नाम नहीं था। न यह सुख का ही परिणाम
था, न केवल दुःख का। जब तक जीवन में सुख और आनन्द मिल रहा था तब तक केवल
सुख और आनन्द प्राप्त करनेका प्रयास हो रहा था, केवल उसीमें लगा हुआ था।
जब शान्ति मिली अथवा ऐसा लगा, कि जीवन तो, सब कुछ व्यर्थ था, सब
कुछ जो चिन्तन कर सोचा जा रहा था उसका कोई परिणाम नहीं निकला था, जब सब व्यर्थ, तो
यह विचार ही क्यों उत्पन्न हो रहा था? केवल इतना नहीं विचार-मुक्त हो जाने पर जिस
सत्य, ही का नाम आनन्द अथवा शान्ति हो यह विचार भी तो केवल शान्तिदायिनी ही अथवा
सब कुछ व्यर्थ, तो यह सब परिणाम ही विवशताका रूप था। यदि, केवल ही सब सुख
का नाम था अथवा यदि यह विचार-मुक्त ही होना शान्ति का रूप था तो चिन्ताएँ किस-
प्रकार से उत्पन्न होंगी, विचार-मुक्त रूप ही यदि सब चिन्ता का, केवल शान्ति किस-
रूप से उत्पन्न होगी। सब कुछ तो मन का ही तो व्यापार, केवल शान्ति भी
तो अस्वाभाविक, केवल अपने मन अथवा विचार का रूप होगा--तो यह विचार? अथवा
अस्वाभाविक? यदि सब कुछ ही शान्ति रूप हो गया अथवा हो सके, तो फिर चिन्ता अथवा
अस्वाभाविक चिन्ता का क्या अर्थ!
वास्तविकता रूप को जानने का प्रयास ही शायद उस शान्ति का कारण था, जिसे
वह इस प्रकार केवल भय समझ रहा था। भय से ही शान्ति उत्पन्न हो रही थी।
जो भी कुछ घटित होता था, पर सब कुछ केवल विचार मात्र था। जीवनका
चरम लक्ष्य तो अपने स्वरूप को ही जानना था। उस स्वरूप अवस्था तक पहुँच कर केवल
शान्ति थी।
क्या शान्ति मात्र थी? या उस शान्त स्वरूप स्थिति में शान्त रूप का आनन्द भी
था अथवा केवल शान्त ही सब कुछ था। यदि केवल शान्त ही सब कुछ था तब तो शान्ति के
उपरान्त शान्ति का ही जीवन में आनन्दमय स्वरूप स्वयं बन ही जाता होगा। वह जो कुछ
था या शान्ति का जो स्वरूप था उस शान्ति मात्र से ही सब कुछ रूप में उस परमात्मा
स्वरूप आत्मा का ही सब कुछ अनुभव होने लगा।
जो कुछ सत्य था अथवा न था उस रूप में केवल शान्ति ही तो सत्य बन कर सब कुछ
का कारण बन जाती थी। जो उस परमात्मा का ही केवल दूसरा रूप था। केवल शान्ति ही, सब
विचार शून्य हो कर अपना स्वरूप प्राप्त कर सकती।
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