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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 154 में से

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इसके सिवाय इसके प्रत्येक विभाग पर एक-एक सौ हजार वीरोंका दल नियुक्त किया गया, जिससे कि
केवल एक दल किसी विपत्ति का शिकार न बने, और बाकी दल सहायता देकर उस विपत्ति स्वरूप
पहाड़ को चक ना चूर करने समर्थ हो सकें, इसीलिए प्रत्येक प्रकार से सोचा, विचारा प्रत्येक ने
जाना, कि अब लंका विजय का कोई प्रश्न नहीं
ना जाने वो दिन, वो घडी कब आएगी?
वो भी क्या शुभ दिन होगा? जिस दिन लंका विजय होगी?
ऐसा विचार के मन, में जो विश्वास उत्पन्न हुआ था उनका, सो वो सारा जाता
रहा, ना तो कभी लंका विजय हुई, और कभी होगी विजय
जब तक स्वयं राम जी दल बल के साथ हैं, तभी तक लंका विजय? फिर विजय तो
बाद बात रह गई?
वो कहते गए राम जी, ना कोई बात विचारने योग्य, ना कोई बात सोचने
योग्य ना ही कोई बात मन में ही संशय करने योग्य; सो जो कुछ बात सो तो केवल इन
सब बातों की चर्चा ना करने की ही केवल सो तो केवल इन सब बातों उपरांत केवल ही
वो निर्णय का समय आ गया, जिस दल द्वारा सब लोग आ--पहुंचे, चलो, समय से
चलें? इसलिए विभीषण स्वयं साथ गए इन सब के, विभीषण सब को साथ दिए हुए जा ही
रहे केवल उस स्थान की ओर
सो वो कहता गया, इस प्रकार केवल जा ही तो रहे विभीषण
सो उस दल का प्रत्येक जन जब तक वहां पहुंचा विभीषण सो वहां से पीछे
ना हट सका केवल आगे ही बढ़ गया सो इन सब दलों को उस समय तक वो सब कुछ ज्ञात
ना हुआ कि लंका में क्या हो रहा होगा, सो विभीषण तो जा चुका था लंका में
सो क्या कह सके कोई? विभीषण तो गया! दल आगे आया सो वो तो केवल यही
सब देखने में लगा गया कि कहो, लंका में क्या हो सकता? ना कोई बात
है, जो कुछ भी कहा जाएगा? सो उस दल का विचार तो जा रहा केवल दो
बातों, केवल इस बात का ध्यान रहा
राम विचार, राम केवल ध्यान लगा बैठ विभीषण के प्रस्थान--
उपरांत शांतमय--चित्त द्वारा केवल प्रभु की शरण लगा विभीषण जिस प्रकार,
स्वयं को समर्पण किया प्रभु सम्मुख सो, स्वयं को केवल ऐसा माना जिसके द्वारा
सब ही कार्य विधाता के आश्रित चले जा ही विभीषणके किए हुए सब ही
कार्य प्रभु के ही पद चरण में जा गिरे
सो कहा ना जा सके! जो केवल उस विभीषण विचारने विचार केवल
सत्य जान सदा विधाता सम्मुख विभीषणके विचार केवल ही केवल,
केवल प्रभु के नाम का सुमिरन विभीषण के द्वारा, उसी नाम के
विचार को मनन माना जा रहा, सदा ही आगे बढ़ रहा था लंका की ओर
सो ऐसा जान कर चलो ना, ऐसा विचार केवल राम जी को बार बार प्रभु
पुकारे
बार बार ना जाने केवल वो सोच, ऐसा मन सोच-सोच
विह्वल हो विभीषण चला गया लंका दिशा विभीषण के पद पग लंका दिशा
बढ़े, सदा केवल विवशता दिखाई
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