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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 126, कुल 154 में से

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जिसका चित्त हमेशा स्वरूप मात्र ही रहा हो उसका इस संसार विषयक कैसा विचार रहा होगा
इसका क्या विचार?
इस विचारणा समय यह बात तो स्पष्ट रूप समझनी चाहिये कि यह कोई ऐसा
विचार, मात्र वैराग्य दर्शक या केवल संसार दशा का वर्णन ही, या वैराग्य साधन का
निरूपक नहीं हो या हो यह सब सच, पर इस योग्य पद के आत्म-ज्ञानी ऐसे
विचारशील की यथार्थ साक्षी दर्शक पद, सो पद ऐसा पद, जिसे सब संसार साक्षी
स्वरूप ग्रहण करना चाहिये! कारण कि विचार तो, चाहे सो मनुष्य जैसा मन में आया
वैसा कहसकता है, अर्थात् विचार तो मनुष्य मात्रका होता ही।
पर ज्ञानी, जिसे पद प्राप्त हुआ है, सो पद प्राप्ति पूर्वक जो जो बात अपने स्वरूप
विषयक स्मरण में आती, जिसे स्वरूप ही में जो मन था, जिसे ऐसा स्वरूप दृष्टि
सब जगह रहता सो सो भाव में जो ज्ञान रहता था उसे उस ज्ञान पूर्वक साक्षी के पद
निरूपणमें जो, जिसे साक्षी रूप ही स्वरूपस्थिति का भाव रहा।
सो विचारणा रूप ज्ञान साधन ऐसा ही साधन था जिससे यथार्थ ज्ञान दशा
ज्ञान को प्राप्त हो जाती थी, जिसे वैराग्य दशा कह कर ज्ञान की स्थिति निरूपक
भी कह सकते थे। इस विचार रूपी ज्ञान दशा को ज्ञान पूर्वक निरूपण हो सकता,
ऐसा विचार तो सब ज्ञानी जन, जिसे ज्ञान पद की प्राप्ति, जिसे ज्ञान स्वरूप दशा
सब स्वाभाविक दशा रूप सब ज्ञान साधन साधन में ज्ञान रहता था, स्वाभाविकता
ऐसी विचार दशा में सब ही पद की, सो ज्ञान दशा, सो सब अवस्था साक्षी रूप एक
पद मात्र स्थित सो, जिसे ज्ञान ही स्वरूप सो, जिसे तो संसार साक्षी ही सब
बात समझ में ही आती रही, विचार दशा तो ज्ञान रूप, विचार दशा ज्ञान
ही का स्वरूप साक्षी भाव रूप ज्ञान साधन रहता, जिसे ज्ञान दशा स्वतः
स्थित कही जाती
ज्ञानी को तो स्वाभाविकता ही, ज्ञानी को तो स्वाभाविकता रूप स्थिति सो प्राप्त ही
पद था, जिस ज्ञान दशा को ज्ञान पद रूप में विचार रूप से कथन किया गया जिससे
यथार्थ भाव रूप ज्ञान स्वरूप सब ज्ञान रहा, जिसे विचार रूप ज्ञान कथन किया
सो तो साक्षी रूप ही रहा सो, साक्षी ही स्वरूप
अब विचार रूप जो यह साखी क्या थी? उसके अर्थ का सब प्रकार सब
ही भाव था? जिसमें तो ज्ञान ही साधन रूप का भाव बताया, जिसमें तो ज्ञान रूप
सब ही भाव निरूपण हुआ जिससे ज्ञान का साधन सब ही ज्ञान रहा; जिससे साक्षी,
सब ज्ञान; जिससे सब ही स्वरूप पद के साधन रूप भाव का ही वर्णन,
जिसे ज्ञान ही साधन कहा, जिसे सब रूप से ज्ञान स्वरूप ही का सब भाव
समझ में आता रहा सो स्वाभाविकता का ज्ञान रूप क्या नहीं? उस ज्ञान
रूप दशा को ज्ञान दशा रूप रूप सब ही सो उस पद का ही भाव कहा जा
सकता, स्वाभाविकता से भरा सब ज्ञान था? हां हां! स्वरूप ही साक्षी रहा।
निरूपण अवस्था से साक्षी ही रहा। क्योंकि ऐसी सब अवस्था संसार दशा
से तो परे ही पद का पद रूप था जिससे संसार का रूप तो भिन्न रूप ही रहा, सो
सब साक्षी स्वाभाव स्वरूप स्वाभाविकता से भिन्न हो गया, सो ज्ञान स्वरूप
स्वाभाविकता ही।
जिसके चित्त में यह बात रही सो पद, जिस पद को ज्ञान दशा ही कहा जा
सो निरूपण तो ज्ञान स्वाभाविकता स्वरूप ही कहा जा सकता यह ज्ञान का भाव ही
सब रूप रहा, सो ज्ञान दशा स्वाभाविक ज्ञान दशा रही, सो ज्ञान तो ज्ञान रूप-
ज्ञान रूप स्वाभाव के ज्ञान ही से स्वाभाव से ज्ञान हो, सो सब ज्ञान स्वरूप
रहा, सो तो सो ज्ञान ही ही से स्वरूप भाव के स्वाभाविकता रूप से स्वरूप
स्वतः स्वाभाविक स्वाभाविक ही पद से हो सब हो गया, सो ज्ञान ही का ज्ञान
रहा
सो ज्ञान रूप ज्ञान स्वरूप रहा, सो ज्ञान सब दशा साक्षी का स्वाभाविक
ही ज्ञान दशा स्वतः सिद्ध सब ज्ञान कहा गया, जिसे ज्ञान सब प्रकार साक्षी
रूप ही रहा सब ही ज्ञान सब ज्ञान दशा साधन में सब ज्ञान का स्वरूप रहा
सो पद, निरूपक स्वरूप ज्ञान ही था, उस अवस्था का सब ही भाव, स्वाभाविकता
ही सब साधन का ज्ञान रहा ही स्वरूप ही था, जो स्वरूप दशा रूप कहा, सो
स्वरूप सब भाव रूप स्वरूप ही स्वरूप ही ज्ञान के स्वरूप दशा ही सो ही
ज्ञान सब रूप से ही ज्ञान दशा स्वाभाविक ही सो साक्षी रहा?
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