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सर्वकोश
माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)

Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)

ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा

स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)

DevanagariHindipublished154 पृष्ठ

पृष्ठ 127, कुल 154 में से

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महाराज को तो ऐसा काम करना ही नहीं था जिससे उन पर कोई दोष
लगाया जाय कि महामहोपाध्याय के साथ अन्याय किया? इसलिए महाराज शांत हो
कर बैठ गये और सब ओर मुँह पर हाथ धरके शांति छाती ही रही। क्यों जी, यह क्या
लीला है, विद्याशंकराचार्य जी, शांत हो, शांत हो महाराज अपने पर दोष लगाने
का भय तो करें? भला जो महाराज हैं, सब तरह का भय उन्हें ही क्यों न हो?
पराक्रमियों को तो सब बात सोच कर ही काम मन में धारना योग्य समझना चाहिए,
जिससे कि किसी का कुछ अनिष्ट न हो।
पंडित बालशास्त्री सब बात महामहोपाध्याय शास्त्र का ही, जो महाराज कहे उसी
बात सत्य समझ कर बैठे रहे। और जो सभा में अन्य जन थे वे सब तो महामहोपाध्याय
के स्वरूप के प्रकाशमान होने से सब दबे थे, परंतु जो थे पंडित
जी के, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, सो वे ऐसे भरके कि मानों अब ही, महाराज को,
पंडितों को खा ही, पर मुंह पर हाथ धरके जो महाराज शांत हुए इससे उन लोगों
महामहोपाध्याय की ओर जो कुछ भी शब्द करने की शक्ति नहीं रही। क्यों कि ऐसा ही
सभा का नियम ही बन गया था कि, विद्याशंकराचार्य आज्ञा बिना जो कोई
शास्त्रार्थ करे उसको दंड दिया जाय? विद्याशंकराचार्य, विद्याशंकराचार्य, महाराज की
जय! बस सब लोग तो जयकारा ही जयकारा करने लगे। पीछे जब यह बात तय पाई
कि कल को फिर सभा होगी और विद्याशंकराचार्य जब आज्ञा दे तब बात करना। जब कोई
न बोले तो किसी प्रकार शास्त्रार्थ हो, सो पंडित बाल शास्त्री तो महामहोपाध्याय के सामने
ऐसे, कि जैसे दीपक सूर्य के सामने प्रकाश करना चाहे, न कभी बोल
सके और न कोई शास्त्रार्थ हो सका, पर पंडित लोग मुंह में ही बात करते ही रहे
कि, पंडित जी को, किसी तरह भी हम लोग विजय करें पर महामहोपाध्याय
ऐसे न थे कि जिन्हें कोई परास्त कर सके, क्यों कि महाविद्वान् ही वे थे।
पर पंडितों को जो दुःख, उससे विद्या-विजयी महाराज प्रसन्न हुए, सो सब लोगों
को भोजन का प्रबंध करने की आज्ञा
देकर सब लोगों को विदा कर महाराज ने सोचा कि कैसे हो? जो जो पंडित
थे सो सब लोग कहने लगे कि जो महाराज ने किया वही हो गया कि हम लोग हार ही
गये। ऐसा कह कर, सब लोग घर को प्रस्थान किया!
काशीराज ने, पंडित बाल शास्त्री जी, स्वामी विशुद्धानन्द जी, और राजा शिव-प्रसाद जी
सब को एक ओर ले जाकर सलाह की कि कल--को विजय प्राप्त कैसे होगी, पंडित बाल
शास्त्री, स्वामी विशुद्धानन्द, स्वामी स्वरूपानन्द, स्वामी विशुद्ध भारती, पंडित तारा-
चरण इन सबने कहा, चिंता मत करो! काशीराज और पंडित बालशास्त्री,
काशीराज की जय जय होवे! ऐसा कहकर सबने विश्राम किया।
उधर तो ऐसा, पर इधर स्वामी दयानंद, पंडित भीमसेन दोनों ही विचार ही में
पडे कि क्या होगा? अब तो कल शास्त्रार्थ का समय आ गया परंतु, अब क्या हो
सकता है? महाराज जी का सिद्धांत सर्वथा सत्य ही है पर कल क्या होगा सो
कल ही देखना क्या होता है? सब लोग इस सोच में
चिंता करने के रहे, पर स्वामी जी को कोई, चिंता नहीं थी कि कल,
क्या होगा सो देखा जायगा।
उधर जो, काशीराज और पंडित, इन दोनों को भय व डर व्यापता, कि कहीं
कल को हमारी हार न हो जाय। तब तो सब काम बिगड़ जाय, सब काशी भर में बदनामी
फैल जाय कि हार गये।
काशीराज जी, सब सनातन धर्मियों को बुला कर, चिंता मत करो जी,
ऐसा सबने कहा, कल ऐसा ही होगा कि जैसा काशीराज
चाहें सो, काशीराज वैसा ही कर देना; ऐसा सबने कहा। जब काशीराज
आज्ञा दे तब शास्त्रार्थ बंद कर देना और फिर जय जय पुकार कर उठ जाना। तब तो हम
लोग सब विजय पा जांयगे और महामहोपाध्याय परास्त हो जायंगे और सब लोग कहेंगे
कि दयानन्द हार गया। और कोई दयानन्द का सत्कार न करेगा, ऐसा ही सब लोग ठहरा
कर अपने अपने घर को गये, कल जैसा स्वामी जी शास्त्रार्थ में करेंगे वैसा
सब कुछ न मानेंगे, सब लोग उठ कर चले जांयगे।
सब ही लोग जानते थे कि, स्वामी जी के साथ शास्त्रार्थ में जीत होना अति
कठिन था क्योंकि वे बड़े भारी पंडित थे, ऐसा काशीराज ने भी सब लोगों से कह
दिया था। इस बात को सबने मान लिया और अपने अपने स्थान पर चले
गये।
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