माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त)
Mati Kahai Kumhar Sun (Kabir Sakhi and Saint Stories)
ओशो (आचार्य रजनीश) द्वारा
स्रोत: माटी कहै कुम्हार सूं (कबीर साखी एवं संत दृष्टान्त) · राजयोग मेडिटेशन अकादमी / ओशो · 1974 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंजिससे कि यदि कोई बात कहूं और उसका ठीक उत्तर न मिले अथवा प्रतिकूल भी मिले तो मन--
को यह तो न हो सके कि यह सब कुछ एक ऐसे व्यक्ति द्वारा अपमानित किया जा रहा था जो
तो न केवल हर बात को ठीक समझता ही न था वरन् जान-बूझकर भी अन-
देखा
भी किए बिना केवल अपनी बात ऊपर रखने का ही यत्न करता रहता था; वस्तुतः
बात इसके सर्वथा विपरीत निकली क्योंकि मैं समझता हूँ कि शायद केवल दो चार
प्रतिशत ऐसे ही लोग, चाहे वे किसी भी स्थिति अथवा पद पर हों अथवा किसी
प्रकार के भी हों जो कि इस बात की सर्वतोभावेन चेष्टा, चाहे वह केवल अपने
को सिद्ध करने के लिए ही यत्न करते हों अथवा जैसा कि मैंने पहले भी कहा था
बातचीत आगे बढ़ सके या न केवल बातचीत आगे बढ़ सके बल्कि बात का कोई
निष्कर्ष भी? और कभी कभी स्थिति के पीछे छुपे रहस्य को स्पष्ट कर सकने में, जिसे
सच कहा जा सकता हो सहायक सिद्ध हो।
पर जो निष्पक्ष लोग होते हैं वे प्रायः सच बात को जानने के लिए ही उत्सुक
रहते हैं? पर अधिकांश के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसीलिए, सच
पूछो, तो परस्पर में, चाहे व्यक्तिगत हो, चाहे संस्था का, चाहे संगठन का
कोई भी संवाद बहुत कम ही ऐसा सफल सार्थक होता है? जिसे सार्थक कहें? संवाद से तो
केवल यही पता चल पाता है कि अमुक व्यक्ति क्या सोचता अथवा कहता है? दूसरा व्यक्ति क्या?
सोच कहता है?
पर दोनों मिलकर किसी बात को तय करने का तो कोई यत्न करते नहीं?
यह तो स्पष्ट ही रहता होगा कि जो सच तक नहीं जाते हैं वे सच तक पहुंच भी
नहीं सकते और सच तक न जाने, या पहुंचने की उत्कट इच्छा रखने वाले ही तो
किसी के साथ भी या परस्पर में भी एक दूसरे को लेकर सच तक पहुंचने का
कोई यत्न करें, ऐसा कम ही।
प्रत्येक व्यक्ति का यह केवल अपना ही अहंकार होता है कि केवल जो कुछ
उसने सोचा या कह दिया अथवा जैसा किया, उसको ठीक मान लिया जाय, जिसको
उसने ऐसा किया
तो स्वाभाविकता के विपरीत समझ लिया जा सकता था या फिर केवल यह कहा जा
सकता, कि जो उस समय हुआ, वह केवल समय के प्रभाव द्वारा स्वयं सिद्ध अथवा
प्रकट हुआ ही माना जा सकता था जिसका सारा श्रेय, जो भी स्थिति अपने को
सामने लाती है, उस समय के ही उस यत्न को ही जाता था।
ऐसा सच तो नहीं, पर जिस रूप द्वारा सच को तय है, या कहा जा सके
कि, उस समय जैसा यत्न हो भी सकता था या जो भी स्थिति थी वह सब सच
तक सच को, सच तक न पहुंचने पर, सच को ऐसा रूप दिया जाता था जिसे सच
ही माना जाना चाहिए।
पर सच के प्रति न जाने क्यों या सच के प्रति न लगन के कारण
हम अपने लिए ही ऐसा सच तय करने लगते हैं, जिससे कि ऐसा लगना संभव हो
निकलता चला जाय कि सच का तो आभास ही केवल लगता सा ही होता है, सच
का कोई रूप सार्थक सिद्ध करना चाहें, जिसे सब लोग सच के रूप में मान
सकें
तो ऐसा तो लगता ही नहीं है कि लोग इस बात के लिए तय हो कर चलें,
जिसे माना जा सके अथवा, सच तक जाने का यत्न न कर के केवल उस बात
को ही सच मान लिया जा सके? जिसका यत्न न किया जा सका हो। सच, तो
केवल एक ऐसी बात का विषय होकर रह जाता है।
सच को न मान कर, सच को त्याग कर केवल इस बात को तय कर पाना
कि ऐसा संभव हो सकता है अथवा नहीं? यह बात ही इस बात को न मान कर ही
अपने आप सामने आ कर खड़ी हो जाती है जिसे सच माना जा सके?
यद्यपि जो लोग केवल संगठन मात्र को ही सब कुछ मान कर चलते हों
उनका यह भी, अपना यत्न हो, कि केवल जो ही कहा जा रहा हो उसे ही
माना जाय, तो ऐसा तो सच न संगठन, जिसे सब लोग मानते हों केवल उसी
प्रकार सच मान लिया जायगा जैसा कि संगठन को सत्य के रूप में मान कर
लोग जो कुछ भी न मान कर ही सब कुछ के यत्न में लगे हैं... उनका तो
केवल यह प्रयत्न मात्र करना ही सच को सच न मान कर, जो कुछ सच को सच
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