निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( १४६ ) ५ अ० २ पा० ३ खं०
'ते' तेरा 'परिचक्ष्यम्। (प्रख्यापनीयम्) बताने योग्य (रूप) भूत्
(भवति) है, (किन्तु और नहीं ?) 'यत्' जिस से 'प्र-ववक्षे'
कहता है—'शिपिविष्टः अस्मि' शिपिविष्ट हूं । (क्यों कि-
उदयकाल में जब तक कि-किरणों नहीं फूटती हैं, तब तक सूर्य
शेप या पुरुष के चिन्ह के समान होता है । इसी से वह अप्र-
ख्यात या अप्रख्यापनीय या न बताने योग्य है।) इसी से
हम कहते हैं—'मा' मत 'वर्षः' यह रूप (दिखाओ ) अपितु
'अस्मत्' हमारे आगे से 'एतत्' यह रूप 'अपगूह' छिपाओ ।
और 'यत्' जो या जैसा कि-तू 'समिये' (संग्रामे ) संग्राम में
'अन्यरूपः' दूसरे प्रकार के रूप वाला अर्थात्-रश्मिजाल युक्त
( प्रदीप्तरूप ) 'बभूथ' होता है, वह रूप दिखा ।
निरुक्तार्थः-हे विष्णो ! क्या तेरा यह अप्रख्यात या
अप्रख्यापनीय (नहीं प्रकट करने योग्य ) ही रूप है, जो तू
हमारे सामने कहता है-शेप (लिङ्ग) के समान लिपटा हुआ
हूं, यह-अप्रतिपन्नरश्मि (किरणों को नहीं प्राप्त हुआ हुआ)
अथवा प्रशंसा का नाम ही समझा जा सकता है-हे विष्णो !
क्या तेरा यही प्रख्यात या प्रख्यापनीय ( बताने योग्य ) रूप
है, जो तू कहता है-मैं शिपिविष्ट (प्रतिपन्नरश्मि) या बाल
किरणों वाला हूं । इस पक्ष में 'शिपि' नाम से किरणें कही
जाती हैं, उनसे आविष्ट या प्रवेश किया हुआ है ।
“मत यह रूप दिखाओ, किन्तु हमसे यह छिपाओ ।”
- 'वर्षः' यह रूप का नाम 'वृणोति' (ढकलेता है) (वृञ्
स्वा० उ०) कर्त्तृवाच्य धातु का है। जो अन्य रूपवाला तू - यहां 'वर्षः' शब्द का निर्वचन 'रूप' के पर्याय होने से
किया गया ।
हिन्दी निरुक्त ( १५० ) ५ अ० २पा० ४ खं०
संग्राम में संयतरश्मि ( किरणों के जालों से युक्त ) होता है ।
उसके ( प्रशंसा पक्षमें ) बहुत अधिक निर्वचन के लिये अगली
ऋचा है ॥ ३ (८) ॥
( खं० ४ )
[निघ०-] आघृणिः॥३६॥ पृथुज्रयाः ॥४०॥
(निरु०) “प्रतत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि
वयुनानि विद्वान् । तन्त्वा गृणामि तवसमत्व्या
न्क्षयन्तमस्य रजसः पराके ॥” (ऋ० सं० ५,
६, २५, ५)
तत्ते अद्य शिपिविष्ट ! नामार्यः प्रशंसामि, अ-
र्योऽहमस्मि-ईश्वरः स्तोमानाम् । अर्य त्वमसि-इति
वा । तं त्वा स्तौमि तवसम्-अतव्यान् । तवस-
इति महतो नामधेयम् । उदितो भवति । निवस-
न्तम्-अस्य रजसः पराके पराक्रान्ते ॥
‘आघृणिः’ आगतहृणिः ।
“आघृणे संसचावहै ।” (ऋ०सं०४,८,२१,१)
आगतहृणे संसेवावहै ।
‘पृथुज्रयाः’ पृथुजवः ।
“पृथुज्रया अमिनादायुर्दस्योः”(ऋ०सं०३,३,१३,२]
प्रामापयदायुर्दस्योः ॥ ४ ( ९ ) ॥
अर्थः-‘शिपिविष्ट’ ( हे विष्णो ! ) हे विष्णुदेव ! ‘अद्य’
हिन्दी निरुक्त (१५१) ५ अ० २ पा० ४ खं०
आज (मैं) 'ते' तेरे 'नाम' नामको 'प्रशंसामि' प्रशंसा करता
हूं, अर्थात् मैं उसे प्रशंसा योग्य अर्थ वाला ही समझता हूं,
जिसे और लोग बुरे अर्थवाला समझते हैं । ( क्योंकि- ) 'वयु-
नानि' तुम्हारे विषय के विज्ञानों को 'विद्वान्' जानने वाला
हूं । और 'अर्यः' (अहमस्मि) मैं अर्य हूं-(ईश्वरः स्तोमानाम्)
अर्थात् मैं स्तुतियों के गाने में समर्थ हूं—तुम्हारे गुणों का
जानकार हूं, इससे मैं प्रशंसा करता हूं । अथवा 'अर्यः' (त्वम्-
असि) तू मेरे ऊपर अनुग्रह करने के लिये समर्थ है, इससे
प्रशंसा करता हूं । [ यहां मन्त्र में 'तत् ते नाम' 'वह तेरा
नाम' ऐसी उक्ति नाम को प्रसिद्ध प्रशंसा योग्य होने की
सूचना के लिये है । ] 'तम्' उस सर्वगुणसम्पन्न ईश्वर 'तवसम्'
(महान्तम्) बड़े 'अस्य' इस 'रजसः' अन्तरिक्ष लोक के 'पराके'
(पराक्रान्ते) दूरसे दूर स्थान में 'क्षयन्तम्' (निवसन्तम्) निवास
करते हुये 'त्वा' तुझको 'अतव्यान्' लघु (छाटा सा) मैं 'गृणा-
मि' स्तुति करता हूं ।
इस मन्त्र में 'शिपिविष्ट' नाम से विष्णु का संबोधन
करके उसके नाम की प्रशंसा की है, किन्तु प्रशंसनीय नाम को
न बताकर उसे ' तत् ' परोक्ष वाचक पदके द्वारा देवता को
स्मरण कराता है, स्यात् वह शिपिविष्ट ही हो । ऐसी प्रशंसासे
देवता अधिक संतुष्ट होतेहैं । क्योंकि—“ परोक्षप्रियाइवहि
देवाः ” ‘देवता परोक्ष-प्रिय जैसे होते हैं’ यह श्रुति है।
निरुक्तार्थः-हे शिपिविष्ट ! आज उस तेरे नाम की मैं
अर्य प्रशंसा करता हूं । मैं अर्य नाम ईश्वर या स्तोमों के
उच्चारण में समर्थ हूं । अथवा तू स्तोमों ( मन्त्रों ) का अर्य
नाम ईश्वर ( स्वामी ) है । उस तुझ महान् को मैं छोटा सा
हिन्दी निरुक्त ( १५२ ) ५ अ० २ पा० ५ खं०
स्तुति करता हूं । 'तवस' यह महत् ( बड़े ) का नाम है । क्यों
कि वह उदित ( प्रकाशित ) होता है । इस रजस् (अन्तरिक्ष)
लोक के पराके या पराक्रान्त ( दूर से बहुत दूर के ) स्थान
में निवास करते हुए को ॥ १ ॥
'आघृणि' (३६) क्या ? आगतहृणि । वह क्या ? जिस
में 'हृणि' प्रकाश या क्रोध आया हुआ हो ।
'आघृणे' (हे आगतहृणे) हे प्रकाश युक्त ! या क्रोध युक्त
( आवाम् )हम दोनों ' संसचावहै ' ( संसेवावहै ) आपस में
सेवाकरें ॥२॥
'पृथुज्रयाः' (४०) क्या ? पृथुजव । वह क्या ? बड़े वेग
वाला ।
'पृथुज्रयाः' बड़े वेग वाले ने 'दस्योः' शत्रु या मेघ के
' आयुः ' आयु को ' अमिनात् ' ( प्रामापयत् )। मिन लिया
(मांप लिया ) या नष्ट किया ॥ ३ ॥ ४ ॥ ( ६ ) ॥
(खं० ५)
(निघ०) अथर्युम् ॥४१॥
(निरू०) “अग्निंनरो दीधितिभिरण्योर्हस्तच्युती
जनयन्त प्रशस्तम् । दूरेदृशं गृहपतिमथर्युम् ॥”
( ऋ० सं० ५, १, २३, १ )
दीधितयः अंगुलयोभवन्ति । धीयन्ते कर्मसु ।
अरणी प्रत्युतः एने । अग्निः समरणात्, जायते ।
इतिवा । हस्तच्युती हस्तप्रच्युत्या । जनयन्त प्रशस्तं
दूरे दर्शनं गृहपति मतनवन्तम् ॥ ५ ॥
हिन्दी निरुक्त ( १५३ ) ५ अ० २ पा० ६ खं०
‘अथर्युर्’ (७१) क्या ? अतनवान् । वह क्या ? निरन्तर गमन वाला ।
अर्थः—‘नराः’ (मनुष्याः) मनुष्यों ने ‘दीधितिभिः’ अङ्गुलि-
यों से (योक्त्रम् उत्तरारणिं च परिगृह्य) योक्त्र (रस्सी) और
ऊपर की अरणि को पकड़ कर ‘हस्तच्युती’ हाथों से
बिलोते हुए ‘अरण्योः’ अरणियों से ‘प्रशस्तम्’ श्रेष्ठ ‘दूरेदृशम्’
दुर्लभ दर्शन ‘गृहपतिम्’ गार्हपत्य नाम ‘अथर्युम्’ गमनवान्
‘अग्निम्’ अग्नि को ‘जनयन्त’ उत्पन्न किया ।
इस प्रकार ‘अथर्यु’ शब्द ‘अत’ गत्यर्थक (भ्वा० प०)
धातु से है। क्योंकि-इस से इसकी शब्द समाधि है और
अग्नि का अधिकार है।
‘दीधिति’ अङ्गुलिएँ होती हैं। क्योंकि-ये कर्मों
में धारण की जाती हैं। ‘अरणी’ क्यों ? इनके प्रति अग्नि
अरण (गमन) करता है। अथवा इनके ‘समरण’ (समागम) से
अग्नि उत्पन्न होता है। ‘हस्तच्युती’ अर्थात् हाथों के चला-
ने से। प्रशस्त (श्रेष्ठ) को उत्पन्न किया। दूर में दिखाई देने
वाले गृहपति गृह के स्वामी अतनवान् (गमनवान्) को ॥५॥
(खंड ६)
[निघ०-] काणुका ॥ ४२ ॥
(निरु०-) “एकया प्रतिधा पिबत्साकं सरांसि त्रिंशतम्
इन्द्रः सोमस्य काणुका ।” (ऋ०सं० ६, ५, २९, ४)
एकेन प्रतिधानेन अपिबत् साकं सह-इत्यर्थः ।
इन्द्रः सोमस्य काणुका, कान्तकानि इति वा ।
क्रान्तकानि इति वा । कृतकानि इतिवा ॥
इन्द्रः सोमस्य कान्त इतिवा । कणे घातइतिवा
२०
हिन्दी निरुक्त (१५४) ५ अ० २ पा० ६ सं०
कणेहतः । कान्तिहतः ।
तत्रएतद् याज्ञिका वेदयन्ते-त्रिंशत् उक्थपा-
त्राणि माध्यन्दिने सवने एकदेवतानि, तानि
एतस्मिन् काले एकेन प्रतिधानेन पिबन्ति, तानि
अत्र सरांसि उच्यन्ते ।
त्रिंशत् अपरपक्षस्य अहोरात्राः, त्रिंशत् पूर्व-
पक्षस्य,-इति नैरुक्ताः । तद्या एता श्चान्द्रमस्यः
आगामिन्यः आपोभवन्ति, रश्मयः ता अपरपक्षे
पिबन्ति । तथापि निगमो भवति । -
“यमक्षितिमक्षितयः पिबन्ति” इति । तं पूर्व-
पक्षे आप्याययन्ति तथापि निगमो भवति । -
“यथादेवा अंशुमाप्याययन्ति” इति ॥ ६ ॥
'काणुका' (४२) यह अनवगत और अनेकार्थ है । "कान्तकानि" "क्रान्तका-
नि" "कृतकानि' इत्यादि शब्दसमाधिए है ।
अर्थ-'इन्द्रः' इन्द्रने 'एकया' ( एकेन ) एक 'प्रतिधा '
( प्रतिधानेन ) चित्तके एक ही टिकाव से 'त्रिंशत्'तीस (३०)
'सोमस्य' सोम के 'सरांसि' सर या तडाग 'साकम्' ( सह ) एक
साथ ' अपिबत् ' पानकिये । कैसे सर ? ' काणुका ' ( कान्त-
कानि ) प्यारे अथवा ( क्रान्तकानि ) सोम से ऊपर तक भरे
हुये अथवा ( कृतकानि ) ऋत्विजों द्वारा संस्कार किये हुए ॥
अथवा 'काणुका' पद इन्द्रका ही विशेषण है, किन्तु सरों का
नहीं । कैसे ?
हिन्दी निरुक्त ( १५५ ) ५ अ० २ पा० ६ खं०
“इन्द्रः सोमस्य काणुका” (इन्द्रः सोमस्य कान्तः)
अर्थात् इन्द्र सोमका काणुका ( कान्त ) या प्यारा है, इसी से
उसने उसके सरों को पान किया । इस ( कान्त ) अर्थ में
'काणुका' शब्द की शब्द प्रतीति कैसी है ? 'कणो घातः' काम,
प्रार्थना, और कणे ये तीनों पद एक ही अर्थ के वाचक है ।
एवम्-कणोघात, कणोहत, और कान्तिहत ये तीनों समान अर्थ
को ही कहते हैं । जो अर्थ 'कणोहतः' से होता है, वही अर्थ
'काणुका' पद से होता है, अर्थात् पीने की इच्छा के समाप्त
होने तक इन्द्र सोम के सरों को पीता है। सोम के सरों को
पान कर लेने पर पान की इच्छा से रहित या तृप्त इन्द्र 'का-
णुका' शब्द का अर्थ है ।
इस मन्त्र में तीस (३०) सर कहे गये हे, व क्य हे, इसी को बताने
के लिये आचार्य पहिले याज्ञिकों के मत को दिखाते हैं—
“तहां मन्त्र में इस ‘त्रिंशत्’ (तीस ३०) पद में याज्ञिक
लोग यह अर्थ कहते हैं-माध्यन्दिन सवन (कर्म) में एक
देवता के तीस उक्थ-पात्र होते हैं । अर्थात् उस माध्यन्दिन
सवनमें उक्थ के तीन पर्याय होते हैं,और वे सभी इन्द्रदेवता
के होते हैं, उन तीनों ही में दश (१०) दश (१०) चमस
(पात्र) होते हैं, वे मिलकर तीस पात्र होजाते हैं । उन्हे इन्द्र
देवता एक काल में एक सड़ाके से पी जाता है। वे ही यहां
सर कहे जाते हैं” ।
दूसरा मत
“तीस अपर पक्ष ( कृष्ण पक्ष ) के दिन और रात्रि
होती हैं, तीस पूर्व ( शुक्ल ) पक्ष के” यह नैरुक्त आचार्य
कहते हैं । तब वहां जो ये चन्द्रमा में प्रतिपदा द्वितीया
आदि तिथियों में आने वाले ( आपः ) जल हैं, उन्हें कृष्ण
पक्ष में सूर्य की किरणें पी जाती हैं। वैसा भी यह निगम है-
यमक्षितिमक्षितयः पिबन्ति" अर्थात् जिस 'अक्षितिम्'
(अक्षय) चन्द्रमा को 'अक्षितयः' (अक्षय) सूर्य की रश्मिएं
पान करती हैं। बदीमें चन्द्रमाको पान करके वे सूर्यकी किरणें
फिर शुक्ल पक्ष (सुदी) आने पर उसे पुष्ट कर देती हैं।
वैसा भी यह निगम है।— "यथा देवा अंशुमाप्याय-
यन्ति" अर्थात् जिस प्रकार ये सूर्य की किरणें 'अंशुम्'
चन्द्रमा को 'आप्याययन्ति' पुष्ट करती हैं, हे यजमान ! उसी
प्रकार 'देवाः' देवता तुझे पुष्ट करें ॥ ६ ॥
(खं० ७)
[नि०] अध्रिगुः ॥४३॥ आङ्गूषः ॥४४॥
(निरु०) अध्रिगुर्मन्त्रोभवति । गवि अधिकृतत्वात्
अपिवा प्रशासनमेव अभिप्रेतं स्यात्, तच्छब्दवत्त्वात्
"अध्रिगो शमीध्वं सुशमि शमीध्वं शमीध्वमध्रिगो"
इति ॥ अग्निरपिअध्रिगुः- उच्यते।"तुभ्यंश्चोतन्त्य-
ध्रिगोशचीवः ।"
अधृतगमनकर्मवन् ।
इन्द्रोऽपि अध्रिगुः उच्यते ॥
"अध्रिगाव ओहामिन्द्राय" (ऋ०सं० १, ४, २७, १)
इत्यपि निगमो भवति ।
आङ्गूषः स्तोम आघोषः ।
हिन्दी निरुक्त (१५७) ५ अ० २पा० ७ खं०
“एनाङ्गूषेण वयमिन्द्रवन्तः” (ऋ०सं०१,७,२३,४)
अनेन स्तोमेन वयम् इन्द्रवन्तः ॥ ७(११) ॥
'अध्रिगु' (४३) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
'अध्रिगु' मन्त्र होता है। क्यों कि-वह गो (वाणी) में
अधिकृत (स्थित) रहता है । अर्थात्-'अधिगु' शब्दसे 'अध्रिगु'
होता है । अथवा प्रशासन माना जासकता है कि-'अध्रिगु'
नाम वाला कोई देवताओं में शमन करने वाला देव विशेष
है, क्यों कि मन्त्र में शमन करने वाले के लिये ही 'अध्रिगो'
सम्बोधन आया है ।-
“अध्रिगो शमीध्वम्” अर्थात्-हे अध्रिगो ! तुम सब
शमन (पशु का संस्कार विशेष) करो । “सुशमि शमीध्वम्”
सुन्दर शमन हो, वैसे ही शमन करो “शमीध्वमध्रिगो !”
हे अध्रिगो ! तुम सब शमन करो ।
यहां मन्त्र में 'अध्रिगु' पद से संबोधन करके पुनः पुनः
शमन करने की प्रेरणा की गई है, इससे यही अवगम होता
है कि-शमन कर्म करने वाले का ही यह नाम है ॥
अग्नि भी 'अध्रिगु' कहा जाता है “हे अध्रिगो”
(अधृतगमन !) नहीं जाने वाले “शचीवः” हे (कर्मवन्)
कर्मवाले ! या कर्मवीर ! 'तुभ्यम्' तेरे लिये (स्तोकासः) घृत
और मेदा की विन्दुएं “श्चोतन्ति” झरती हैं । इस प्रकार
यहां 'अध्रिगो' सम्बोधन अग्नि को किया गया, इस से अग्नि
'अध्रिगु' है ॥
इन्द्र भी 'अध्रिगु' कहलाता है। क्योंकि=इसके गमन को
किसीने धारण नहीं किया है ।
“'अभ्रिगवे' (अधृतगमनाय) दूसरेसे नहीं धारण किये हुए
गमन वाले 'इन्द्राय' इन्द्र के लिये 'ओहम्' मैं (हवियों को
देता हूँ ।) इस प्रकार इन्द्रका विशेषण होनेसे 'अभ्रिगु' इन्द्र
का नाम है ॥
'आङ्गूषः'(४४) यह अनवगत है । स्तोम ( मन्त्र समूह ) अर्थ है । 'आघोषः'
यह शब्दसमाधि है ।
'आंगूष' क्या ? स्तोम ( मन्त्रसमूह ) । वह क्यों ? आघोष
( फैलकर गूंजने वाला ) है ।
“एन” (अनेन) इस “आङ्गूषेण”(स्तोमेन) मन्त्र समूह
से “वयम्” हम “इन्द्रवन्तः” इन्द्र वाले हैं ॥ इस प्रकार
`यह मन्त्र में 'आङ्गूष' शब्दसे स्तोम कहा गया है ॥ (११) ॥
(निघ०-) आपान्तमन्युः ॥४५ ॥ श्मशा
॥४६॥
[निरु०-] “आपान्तमन्युस्तृपलप्रभर्मा धुनिः शिमी-
वाञ्छरुमाँ ऋजीषी । सोमो विश्वान्यतसा वनानि
नार्वागिन्द्रं प्रतिमानानि देभुः ॥” (ऋ० सं० ८, ४,
१४, ५)
आपतितमन्युः तृप्रप्रहारी क्षिप्रप्रहारी (सिप्र-
प्रहारी) सोमोवा इन्द्रोवा ॥
'धुनि.' धुनातेः ।
'शिमी'-इति कर्मनाम । शमयतेर्वा। शक्नोतेर्वा ।
ऋजीषी सोमः, यत् सोमस्य पूयमानस्य अति-
रिच्यते तत् ऋजीषम्,-अपार्जितं भवति, तेन ऋ-
जीषी सोमः ॥
अथापि ऐन्द्रो निगमो भवति-“ऋजीषी वज्री”
( ऋ० सं० ४, २, ११, ४ ) इति । हर्योः अस्य स
भागः, धानाश्च इति ॥
'धानाः' भ्राष्ट्रे हिता भवन्ति । फलेहिता भवन्ति
इति वा ।
“बब्धां ते हरी धाना उप ऋजीषं जिघ्रताम् ॥”
इत्यपि निगमो भवति ।
आदिना अभ्यासेन उपहितेनउपधामादत्ते ।
बभस्तिः अत्तिकर्मा । सोमः सर्वाणि अतसानि
वनानि । न अर्वाक्-इन्द्रं प्रतिमानानि दम्भ्नुवन्ति
यैः (ये) एनं प्रतिमिमते न-एनं तानि दम्भ्नुवन्ति,
अर्वागेव एनमप्राप्य विनश्यन्ति-इति ॥
इन्द्रप्रधाना-इत्येके नैघण्टुकं सोमकर्म उभयप्र-
धाना इत्यपरम् ॥
'रमशा' शु अश्नुते इतिवा । श्माश्नुते इतिवा ॥
“अवरमशा रुधद्द्वाः ।” (ऋ० सं० ८, ५, २६, १) ।
अवारुधत् रमशा वाः-इति ॥ ८ ( १२ ) ॥
इति पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयः पादः समाप्तः॥ ५, २ ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६० ) ५ अ० २ पा० ७ खं०
‘आपास्तमन्धु’ ( ४५ ) यह अनवगत है और पक्ष में अनेकार्थ है।
‘आपातितमन्यु’ यह अगम है।
अर्थ:- ‘आपास्तमन्धुः’ संग्राम में शत्रुओं द्वारा उत्तेजित
अथवा क्रोधित हुआ हुआ ‘तृपलप्रभर्मा’ (तृपप्रहारी = क्षिप्र-
प्रहारी) शीघ्र प्रहार करनेवाला सोम अथवा इन्द्र-‘धुनिः’
(यदि सोम है।) पात्रों का कंपाने वाला (यदि इन्द्र)
शत्रुओं का कंपाने वाला ‘शिमीवान्’ अपने अधिकार-युक्त
कर्मवाला ‘शरुमान्’ हिंसावान् ‘ऋजीषी’ (सोम पक्षे-) खूखस-
वाला (इन्द्र पक्षे-) जिस के घोड़ों का ऋजीष (खूखस) भाग
होता है, (इस प्रकार आधी ऋचा सोम अथवा इन्द्र की है।)
(केवल सोम पक्ष में ३रा पाद्-) ऐसे गुणों से युक्त ‘सोमः’
सोम ‘विश्वानि’ सब ‘अतसा’ (अतसामि) कभी न घटने
वाले ‘वनानि’ वनों को अथवा जलों को अपनी महिमा से
व्यापन करता (व्याप लेता) है। क्यों कि वह उन का
अधिपति है। इस प्रकार पहिले के साके के दो पादों को ले
कर तीन पाद् सोम के होते हैं। (केवल इन्द्र पक्ष में ४था
पाद्-) ‘इन्द्रम्’ इन्द्र को ‘न प्रतिमानानि’ नहीं मान
(स्तुति) करने वाले ‘अर्वाक्’ पहिले ही (इन्द्र के मिलने से)
‘देभुः’ दब जाते (तिरस्कृत हो जाते) हैं। इस प्रकार इस
मन्त्र में तीन पाद् सोम के और तीन पाद् इन्द्र के हैं, तथा
यह मन्त्र दो देवताओं का (उभय दैवत) है॥
निरुक्तार्थ:- ‘आपातितमन्यु’ आगिरा है क्रोध जिस को,
तृपप्रहारी क्षिप्र (शीघ्र) प्रहार करने वाला अथवा सोम
अथवा इन्द्र॥
‘धुनि’ कंपाने वाला। ‘धुञ्’ कम्पनार्थक (स्वा० उ०)
धातु का है।
हिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ५ अ० २पा० ७ खं०
'शिमी' यह कर्म का नाम है। अथवा 'शम्' (चु० उ०)
धातु से है। अथवा 'शक्' ( स्वा० उ० ) धातु से है।
'ऋजीषी' सोम होता है। क्यों कि जो सोम के छानने
से खूखस बच जाता है, वह ऋजीष कहलाता है, तथा अलग
डाल दिया जाता है, उससे ऋजीषवाला होने से ऋजीषी सोम
है। तो भी इन्द्रका निगम है—
“ऋजीषी वज्री” अर्थात् ऋजीषवाला वज्र वाला ॥
इस के दो घोड़ों का ऋजीष और धान भाग होता है।
'धाना' क्यों ? भाड़में धारण किये हुए होते हैं। अथवा
फलक या तख्ते पर रखे हुए होते हैं ॥
“ हे इन्द्र ! 'ते' तेरे 'हरी' घोड़े ' धानाः ' धानों का
'बब्धाम्' खाएँ ( और 'ऋजीषम्' सोमके खूखस को 'उप-जिघ्र-
ताम्' सूंघें"-यह भी निगम है)।
'बब्धाम्' इस पद में भक्ष्यार्थक 'भस्' धातु है,वह आदि
अक्षर दोहरा कर लगे हुए बकार से उपधा ( अन्तिम अक्षर से
पूर्व अक्षर ) अकार को लेलेता (लोपकरदेता) है। ( “घसि-
भसोर्हलि ” ( पा० ६, ४, १०० ) सूत्र से अकार का लोप,
'त' का 'ध' और 'भ' का 'ब' होता है ) इस प्रकार 'बभस्'
धातु और 'ताम्' विभक्ति से ' बब्धाम् ' यह रूप बनता है।
सोम सब अक्षय वनों को ( व्यापता है।) इन्द्र को न
मानने वाले पहिले ही नष्ट हो जाते हैं। जो इन्द्र को नहीं
मानते, वे इसे तिरस्कार नहीं कर सकते बल्कि-पहिले ही
इसे अप्राप्त होकर नष्ट हो जाते हैं।
कोई आचार्य कहते हैं-यह “ आपान्तमन्युः
२१
हिन्दी निरुक्त ( १६२ ) ५ अ० ३ पा० १ खं०
ऋचा इन्द्र को ही प्रधानता से कहती है, सोम कर्म गौणता से
है। ( इस मतमें तीसरे पाद में सोम-कर्म उपमा होजाता है।
जिस प्रकार सोम सब अक्षय धमों को व्यापता है, उसी प्रकार
“आपान्तमन्यु” आदि सकल विशेषणों वाला इन्द्र सब
जगत् को व्यापता है। इस प्रकार चारों ही पाद इन्द्र देवता
के हो जाते हैं।) ‘दोनों देवताओं की प्रधानता है’ यह
दूसरा मत है॥
‘इमशा’ (४६) यह अनवगत है। ‘श्वाशिनी’ या ‘श्माशिनी’ यह अवगत है
‘श्वाशिनी’ शीघ्र खाने वाली या शीघ्र व्यापन करने वाली कुल्या अथवा नदी
है। ‘श्माशि’ श्म (शरीर) को व्यापन करने वाली नाड़ी होती है। इस प्रकार
इसके भिन्न २ प्रकार से विभाग करने से यह ( श्मशा ) शब्द अनेकार्थ भी
होता है।
‘श्मशा’ अथवा ‘शु-अश्नुते’ जलदी व्यापन करती है।
अथवा ‘श्म-अश्नुते’ शरीर को व्यापती है।
“अवश्मशा रुधद्वाः”
‘वाः’ जल या रस ‘श्मशाः’ नदियों को या नाड़ियों को
‘अवरुधत्’ आवरण करेगा ॥ ( इस प्रकार इस मन्त्रमें ‘श्मशा’
शब्द नदी या नाड़ी का नाम होता है ) ॥
इति हिन्दीनिरुक्ते पञ्चमाध्यायस्य द्वितीयःपादः समाप्तः ॥५,२॥
तृतीयः पादः।
( खं० १ )
[निघ०-] उर्वशी ॥ ४७ ॥
[निरु०-] उर्वशी अप्सराः। उरु-अभ्यश्नुते। उरु-
भ्यामश्नुते। उरुर्वा वशोऽस्याः ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६३ ) ५ अ० ३ पा० १ खं०
अप्सराः, अप्सारिणी । अपिवा अप्स इति रूप
नाम । अप्सातेः । अप्सानीयं भवति । आदर्शनि-
यम् । व्यापनीयंवा । स्पष्टं दर्शनाय-इति शाक-
पूणिः ॥
यत्-अप्सैः-इति अभक्षस्य । “अप्सो नाम”
इति व्यापिनः ।
तद्रा भवति, रूपवती, तत् अनया आत्तम्-इतिवा
तत्-अस्यै दत्तम्-इतिवा ॥
तस्या दर्शनात् मित्रावरुणयो रेतश्चस्कन्द, तद-
भिवादिनी एषा ऋग् भवति ॥ (१३) ॥
'उर्वशी'(४७) शब्द अनवगत है । 'अप्सरा' यह अर्थ-कथन है । 'उर्वभ्या-
श्नुते' ( उरु ( महत् ) बड़े यश को व्यापन करती है ।) यह व्युत्पत्ति है ।
अथवा 'उरुभ्याम्' 'अश्नुते' (जांघों से मैथुन धर्म में पुरुष को व्याप्त लेती है ।
अर्थात्--'उर्वाशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । अथवा 'उरुः अस्याः वश.'
क्यों कि--महान् काम (प्रयोजन) इस के वश (अधीन) है इससे यह
'उरुवशिनी' होने से 'उर्वशी' कही जाती है । ये शब्द-समाधिएं है ॥
अर्थ-'उर्वशी' (४७) अप्सरा है । क्यों कि-'उरु' बहुत
(यश) को अशन (व्यापन) करती है । (या-) उरुओं (जांघों) से
पुरुष को अशन (व्यापन) करती है । अथवा उरु (महान्)
काम इसके वश है ॥
'अप्सराः' क्यों ? अप्सारिणी या जल के प्रति नित्य ही
सरण (गमन) करती है । (क्यों कि वह उससे उत्पन्न हुई है,
इससे वही उस का प्रिय है ।) इस से 'अप्सरा' है । अथवा
हिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ५ अ० ३पा० १ खं०
'अप्सः' यह रूप का नाम है । 'अ-प्सा' ( निषेधार्थक 'अ'कार
पूर्वक 'प्सा' भक्षणार्थक ( अदा० प० ) धातु ) का है क्योंकि-
वह अप्सानीय या अभक्षणीय ( नहीं खाने योग्य ) है । क्यों ?
आदर्शनोय है, अर्थात्-साम्हने से खड़ा होकर नेत्र से देखने
योग्य ही है, किन्तु मुख से खाने योग्य नहीं । अथवा वह
स्वयम् प्रकाश-स्वभाव होने से किरणों से व्यापने योग्य नहीं
है । “देखने के लिये स्पष्ट (प्रकट) ही होता है”-यह शाकपूर्णि
आचार्य मानते हैं ।
जिससे कि-मन्त्रों में 'अप्सः' यह शब्द अभक्ष्य का
वाचक देखा गया है, इससे ठीक कहा है कि-“अपिवा अ-
प्स इति रूपनाम” क्योंकि-“अप्सोनाम” इस मन्त्र में
यह व्यापी या व्यापक का नाम है ॥ ( न्याय शास्त्र में भो
रूप को व्याप्यवृत्ति या अपने आधार में व्यापकर रहने वाला
गुण माना है । ) ॥
इस प्रकार 'अप्सरा' शब्द के 'अप्स' भाग की व्याख्या
हुई अब 'रा' भाग की व्याख्या करते हैं-
“तद्रा भवति रूपवती ” 'र' का यहां मतुप्प्रत्यय
के समान अर्थ है, अर्थात् 'वाला' । इससे 'तद्रा' उस ( रूप )
वाली या 'अप्स' वाली होनेसे 'अप्सरा' है । अर्थात् रूपवाली
अथवा 'रा (अदा०प०) धातु है, उसके योगसे 'अप्सरा' शब्द
होता है-अर्थात् 'अप्स' ( रूप ) को 'रा' ग्रहण करने वाली
होने से 'अप्सरा' है । अथवा विधाताने इसे 'अप्स' ( रूप )
'रा' दिया है. इससे यह 'अप्सरा' है ।
उस के दर्शन से मित्रावरुण देवताओं का वीर्य झरगया
था, उसको कहने वाली यह ऋचा है- ॥ १ ( १३ ) ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६५ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
( खं० २ )
(निघ०-) वयुनम् ॥ ४८ ॥
[निरु०] “उतासि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या
ब्रह्मन्मनसोऽधिजातः। द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन
विश्वेदेवाः पुष्करेत्वाऽददन्त ॥” [ ]
अप्यसि मैत्रावरुणो वसिष्ठोर्वश्या ब्रह्मन्! मनसो
ऽधिजातः, द्रप्सं स्कन्नं ब्रह्मणा दैव्येन ।
द्रप्सः संभृतः । प्सानीयोभवति । सर्वे देवाः
पुष्करे त्वा अधारयन्त ॥
‘पुष्करम्’ अन्तरिक्षम् । पोषति भूतानि ।
उदकं पुष्करम् । पूजाकरम् पूजयितव्यम् । इद
मपि पुष्करम्-एतस्मादेव । ‘पुष्करं’ वपुष्करंवा ।
पुष्पं पुष्पतेः ॥
‘वयुनं’ (४८) वेतेः । कान्तिर्वा । प्रज्ञा
वा ॥ २ (१४) ॥
“उतासि” यह ऋचा पुत्रसहित वसिष्ठ की आर्ष है, और उसी की अथवा
इन्द्र की स्तुति है ।
अर्थः-हे ‘वसिष्ठ!’ ‘उत’ (अपिच) और भी (त्वम्)
तू ‘मैत्रावरुण’ मित्रावरुण देवताओं का पुत्र है । किससे ?
‘उर्वश्याः’ उर्वशी अप्सरासे । क्या संघर्ष या मैथुन से ? हे
‘ब्रह्मन्’ ‘मनसः ‘अधिजातः’ मनसे हुआ है । क्या निर्बीज ?
‘द्रप्सं-स्कन्नम्’ वीर्य (मित्रावरुणों का) गिरा, (उर्वशीके दर्शन
से ।) 'दैव्येन' देवताओं की निजकी वस्तु 'ब्रह्मणा' ऋग्यजुः,
साम-रूप वेदसे स्तुति करते हुए 'विश्वे-देवाः' सब देवताओं
ने (यह वीर्य पृथ्वी में न गिरे इस लिये) 'त्वा' तुझे (उस
वीर्य के साथ) 'पुष्करे' (घड़े के ऊपर) जल या अन्तरिक्ष
में 'अददन्त' धारणकिया ।
'द्रप्स' वीर्य क्यों ? 'द्रप्स' कहलाता है । 'द्रप्स' क्या !
'रेतस्' संज्ञक रस पुरुष के सब अङ्गोंसे संभृत या इकट्ठा
किया हुआ होता है। अथवा 'क्षानीय' या स्त्रीयोनिका भक्ष-
णीय है। इस प्रकार 'द्रप्स' शब्द भरणार्थक भृञ् (स्वा०उ०)
धातु से या भक्षणार्थक 'प्सा' (अदा० प०) धातु से है।
'पुष्कर' अन्तरिक्ष होता है। क्यों कि-वह भूतों (प्राणि-
ओं) को अवकाश दान से पोषण करता है। अथवा उदकं
(जल) पुष्कर होता है। क्योंकि-उससे पूजा की जाती है, इस
से 'पूजाकर' होने से 'पुष्कर' है। अथवा स्वयम् (आप ही)
पूजनीय होने से पुष्कर है। यह पुष्कर (कमल) भी इसी से
है। क्यों ? पुष्कर कहलाता है, वह भी पूजाकर (पूजा का
साधन) या स्वयम् सुन्दर होने से पूजनीय है। अथवा 'वपु-
ष्कर' होने से पुष्कर है। क्यों कि-व्यवहार में लाने पर भी
वपुष् (शरीर) वान् हो रहता है।
'पुष्प' शब्द 'पुष्प' फूलने अर्थ में (दि० प०) धातु से है।
क्योंकि-वह फूलता है।
'वयुन' (४८) शब्द अनैकार्थ और अनवगत है। 'वी'
(अदा० प०) धातु से है। 'वेन' यह न्याय्य है। कान्ति
अथवा प्रज्ञा (बुद्धि) अर्थ है ॥ २ (१४) ॥
हिन्दी निरुक्त ( १६७ ) ५ अ० ३ पा० २ खं०
व्याख्या ।
“उतासि” ऋचा में वसिष्ठ के जन्म के साथ ‘उत’ (भी) पद
लगाया है, जिससे वसिष्ठ के नीचे वाली ऋचा में वर्णन किये
हुए और दो जन्मों की सूचना होती है ।
“विद्युतो॒ ज्योतिः॒ परिसं॒जिहा॑नं मित्रा॑वरुणा॒
यदप॑श्यतां त्वा । तत्ते॒ जन्मोंतै॒कं व॑सिष्ठाग॒स्त्यो॒ यत्
त्वा॒ विश॑ आजभा॒र (ऋ० सं० ५, ३, २३, ५ )
अर्थात् हे ‘वसिष्ठ!’ ‘यत्’ जो ‘मित्रावरुणा’ (मित्रावरुणौ)
मित्रावरुण देवताओं ने ‘विद्युतः’ विशेष रूप से देदीप्यमान
( चमकीली ) उर्वशी से ‘परि-संजिहानम्’ चारों ओर फैलती
या उत्पन्न होती हुई ‘ज्योतिः’ ज्योति को (ज्योति के रूप से)
‘त्वा’ तुझे ‘अपश्यताम्’ देखा, ‘तत्’ वह ‘ते’ तेरा ‘एकम्’ एक
‘जन्म’ जन्म है । ‘उत’ और ‘अगस्त्यः’ अगस्त्य ‘यत्’ जो
‘त्वा’ तुझे ‘विशः’ ( मनुष्यान् ) मनुष्यों के प्रति ‘आजभार’
( आहृतवान् ) लाया, यह तेरा दूसरा जन्म है ॥
इस प्रकार “उतासि” और “विद्युतः” इन दोनों
मन्त्रों में वसिष्ठ जी के तीन जन्म बताए गए हैं । पहिला
जन्म–उर्वशी से निकली हुई ज्योति मित्रावरुण देवताओं को
दिखाई दी । दूसरा जन्म–अगस्त्य के द्वारा मनुष्य जाति में
है, इसमें यह नहीं प्रतीत होता कि–यह मैथुनजन्म है या
अमेथुन ? और तीसरा जन्म–उर्वशी के दर्शन से मित्रावरुण
देवताओं का वीर्य गिरता हुआ सब देवताओं ने देखा और
उसे मन्त्रों के द्वारा स्तुति करके जल या अन्तरिक्ष में रखा ।
यहां जो तीसरा जन्म है, उस से मन्त्र के आधिभौतिक
अर्थ के पक्ष में एक ऐसे विज्ञान की सूचना भी मिलती है,
जिसमें गर्भाशय से अन्यत्र भी वीर्य रक्षित हो कर शरीर को
उत्पन्न कर सकता है, अस्तु, अमेथुन सृष्टि पर अविश्वास करने
वाले वैदिक इस पर ध्यान देवें । पुराणों में भी वसिष्ठ जी की
उत्पत्ति उर्वशी से कही गई है, वह भी प्रपृच्छ है ।
मन्त्रों का विषय अनेक प्रकार का होता है-यहाँ पर
“उतासि” मन्त्र का वसिष्ठ ही ऋषि (वक्ता) है, और उसी
के लिये 'असि' यह मध्यम पुरुष या 'युष्मद्' (तू) शब्द है,
यह परस्पर विरुद्ध है, कि-वही वक्ता और वही श्रोता ?
किन्तु मन्त्र नित्य हैं, इन में यह दोष नहीं है, वास्तव में
कोई श्रोता और वक्ता हो तो यह दोष आसकता है । किसी
बात को किसी तरह भी कहने में वेद स्वतन्त्र है अथवा स्वयम्
पुरुष भी अपने आपे को कभी कुछ कहने लगता है, उसी
प्रकार यह मन्त्र भी है ॥ २ (१४) ॥
(खं० ३)
(निघ०-) वाजपस्त्यम्॥४६॥ वाजगन्ध्यम्
॥५०॥ गध्यम् ॥ ५१ ॥ गधिता ॥ ५२ ॥
कौरयाणाः ॥ ५३ ॥ तौरयाणाः ॥ ५४ ॥
अह्रयाणाः ॥ ५५ ॥ हरयाणाः ॥ ५६ ॥
आरितः ॥ ५७ ॥ ब्रन्दी ॥ ५८ ॥
(निरु०-) “स इत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुन-
वच्चकार । (ऋ० सं० ४, ६, ११, ३)