निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६४ ) ५ अ० ३पा० १ खं०
'अप्सः' यह रूप का नाम है । 'अ-प्सा' ( निषेधार्थक 'अ'कार
पूर्वक 'प्सा' भक्षणार्थक ( अदा० प० ) धातु ) का है क्योंकि-
वह अप्सानीय या अभक्षणीय ( नहीं खाने योग्य ) है । क्यों ?
आदर्शनोय है, अर्थात्-साम्हने से खड़ा होकर नेत्र से देखने
योग्य ही है, किन्तु मुख से खाने योग्य नहीं । अथवा वह
स्वयम् प्रकाश-स्वभाव होने से किरणों से व्यापने योग्य नहीं
है । “देखने के लिये स्पष्ट (प्रकट) ही होता है”-यह शाकपूर्णि
आचार्य मानते हैं ।
जिससे कि-मन्त्रों में 'अप्सः' यह शब्द अभक्ष्य का
वाचक देखा गया है, इससे ठीक कहा है कि-“अपिवा अ-
प्स इति रूपनाम” क्योंकि-“अप्सोनाम” इस मन्त्र में
यह व्यापी या व्यापक का नाम है ॥ ( न्याय शास्त्र में भो
रूप को व्याप्यवृत्ति या अपने आधार में व्यापकर रहने वाला
गुण माना है । ) ॥
इस प्रकार 'अप्सरा' शब्द के 'अप्स' भाग की व्याख्या
हुई अब 'रा' भाग की व्याख्या करते हैं-
“तद्रा भवति रूपवती ” 'र' का यहां मतुप्प्रत्यय
के समान अर्थ है, अर्थात् 'वाला' । इससे 'तद्रा' उस ( रूप )
वाली या 'अप्स' वाली होनेसे 'अप्सरा' है । अर्थात् रूपवाली
अथवा 'रा (अदा०प०) धातु है, उसके योगसे 'अप्सरा' शब्द
होता है-अर्थात् 'अप्स' ( रूप ) को 'रा' ग्रहण करने वाली
होने से 'अप्सरा' है । अथवा विधाताने इसे 'अप्स' ( रूप )
'रा' दिया है. इससे यह 'अप्सरा' है ।
उस के दर्शन से मित्रावरुण देवताओं का वीर्य झरगया
था, उसको कहने वाली यह ऋचा है- ॥ १ ( १३ ) ॥