निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( १६१ ) ५ अ० २पा० ७ खं०
'शिमी' यह कर्म का नाम है। अथवा 'शम्' (चु० उ०)
धातु से है। अथवा 'शक्' ( स्वा० उ० ) धातु से है।
'ऋजीषी' सोम होता है। क्यों कि जो सोम के छानने
से खूखस बच जाता है, वह ऋजीष कहलाता है, तथा अलग
डाल दिया जाता है, उससे ऋजीषवाला होने से ऋजीषी सोम
है। तो भी इन्द्रका निगम है—
“ऋजीषी वज्री” अर्थात् ऋजीषवाला वज्र वाला ॥
इस के दो घोड़ों का ऋजीष और धान भाग होता है।
'धाना' क्यों ? भाड़में धारण किये हुए होते हैं। अथवा
फलक या तख्ते पर रखे हुए होते हैं ॥
“ हे इन्द्र ! 'ते' तेरे 'हरी' घोड़े ' धानाः ' धानों का
'बब्धाम्' खाएँ ( और 'ऋजीषम्' सोमके खूखस को 'उप-जिघ्र-
ताम्' सूंघें"-यह भी निगम है)।
'बब्धाम्' इस पद में भक्ष्यार्थक 'भस्' धातु है,वह आदि
अक्षर दोहरा कर लगे हुए बकार से उपधा ( अन्तिम अक्षर से
पूर्व अक्षर ) अकार को लेलेता (लोपकरदेता) है। ( “घसि-
भसोर्हलि ” ( पा० ६, ४, १०० ) सूत्र से अकार का लोप,
'त' का 'ध' और 'भ' का 'ब' होता है ) इस प्रकार 'बभस्'
धातु और 'ताम्' विभक्ति से ' बब्धाम् ' यह रूप बनता है।
सोम सब अक्षय वनों को ( व्यापता है।) इन्द्र को न
मानने वाले पहिले ही नष्ट हो जाते हैं। जो इन्द्र को नहीं
मानते, वे इसे तिरस्कार नहीं कर सकते बल्कि-पहिले ही
इसे अप्राप्त होकर नष्ट हो जाते हैं।
कोई आचार्य कहते हैं-यह “ आपान्तमन्युः
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