निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त (१५७) ५ अ० २पा० ७ खं०
“एनाङ्गूषेण वयमिन्द्रवन्तः” (ऋ०सं०१,७,२३,४)
अनेन स्तोमेन वयम् इन्द्रवन्तः ॥ ७(११) ॥
'अध्रिगु' (४३) यह अनवगत और अनेकार्थ है ।
'अध्रिगु' मन्त्र होता है। क्यों कि-वह गो (वाणी) में
अधिकृत (स्थित) रहता है । अर्थात्-'अधिगु' शब्दसे 'अध्रिगु'
होता है । अथवा प्रशासन माना जासकता है कि-'अध्रिगु'
नाम वाला कोई देवताओं में शमन करने वाला देव विशेष
है, क्यों कि मन्त्र में शमन करने वाले के लिये ही 'अध्रिगो'
सम्बोधन आया है ।-
“अध्रिगो शमीध्वम्” अर्थात्-हे अध्रिगो ! तुम सब
शमन (पशु का संस्कार विशेष) करो । “सुशमि शमीध्वम्”
सुन्दर शमन हो, वैसे ही शमन करो “शमीध्वमध्रिगो !”
हे अध्रिगो ! तुम सब शमन करो ।
यहां मन्त्र में 'अध्रिगु' पद से संबोधन करके पुनः पुनः
शमन करने की प्रेरणा की गई है, इससे यही अवगम होता
है कि-शमन कर्म करने वाले का ही यह नाम है ॥
अग्नि भी 'अध्रिगु' कहा जाता है “हे अध्रिगो”
(अधृतगमन !) नहीं जाने वाले “शचीवः” हे (कर्मवन्)
कर्मवाले ! या कर्मवीर ! 'तुभ्यम्' तेरे लिये (स्तोकासः) घृत
और मेदा की विन्दुएं “श्चोतन्ति” झरती हैं । इस प्रकार
यहां 'अध्रिगो' सम्बोधन अग्नि को किया गया, इस से अग्नि
'अध्रिगु' है ॥
इन्द्र भी 'अध्रिगु' कहलाता है। क्योंकि=इसके गमन को
किसीने धारण नहीं किया है ।