निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
हिन्दी निरुक्त ( ५० ) ४ अ० २ पा० ५ खं०
रुंगिक-] यह भी दूसरा [मनुष्यों का] 'शिर' इसी व्याख्यान से
है। क्यों कि ? इसके सब इन्द्रियें आश्रित हैं। 'संशूरणासः'
भगवान् आदित्य से मिले हुए हैं। 'शूर' शब्द गत्यर्थक 'शु'
(भ्वा० प०) धातु से है। [ क्यों कि ? वह शत्रुओं के साम्हने
चला ही जाता है, लौटता नहीं ।] 'दिव्यासः' द्युलोक में
पैदा हुए हैं । 'अत्याः' निरन्तर चलते ही रहते हैं, किन्तु
क्षणमात्र भी कभी नहीं ठहरते । 'हंसाः इव श्रेणिशो यतन्ते'
हंसों के समान श्रेणि (पङ्क्ति) बांध कर चलते हैं । 'हंस' क्यों?
वे मार्ग को हनन (गमन) करते हैं । 'श्रेणि' 'श्रिञ् सेवायाम्'
(भ्वा० उ०) धातु से है । 'यत्' जब वे 'अश्वाः' घोड़े 'दिव्यम्'
स्वर्ग के 'अज्मम्' मार्ग को 'आक्षिषुः' (उदय से अस्त पर्यन्त)
प्राप्त होते हैं ॥
'अश्वाः' पद के साथ तुल्य विभक्ति होने से 'ईर्म्मान्तास.' इत्यादि
पद अश्व के विशेषण है, "आत्माएव एषा रथो भवति आत्मा अश्व.” अर्थात्
'आत्मा ही इनका रथ होता है, और आत्मा ही अश्व'-इस युक्ति से सूर्यदेवता
का ही यह मन्त्र हो सकता है या होना चाहिये, किन्तु अश्व की स्तुति में
विनियुक्त हुआ है, यह ठीक नहीं? इसी प्रश्न का उत्तर देने के लिये भाष्यकार
समाधान करते हैं—
'आदित्य की स्तुति अश्व की होती है, क्यों कि-अश्व
आदित्य से गढ़ा गया है, या उत्पन्न हुआ है। "सूरादश्वं वस-
वो निरतष्ट" [ ऋ० सं० २, ३, ११, २ ] अर्थात्-वसुओं ने
अश्व (घोड़े) को सूर्य से गढ़ कर निकाला है यह निगम
भी है ॥ ५ (१३) ॥
हिन्दी निरुक्त ( ५१ ) ४ अ० २ पा० ६ खं०
(खं० ६)
[ निरु० ] $^{(१५)}$ "$^१$कायमानो वना त्वं यन्मातॄरजगन्नपः ।
नतत्तेअग्ने प्रमृषे निवर्त्तनं यद् दूरे सन्निहाभवः ॥"
[ ऋ० सं० ३, १, ५, २ ]
(भा०) 'कायमान' श्रायमानः । कामयमान इतिवा । वनानि त्वंयन्मातृः अपः-अगमः उपशाम्यन् । न तत्ते अग्ने प्रमृष्यते निवर्त्तनं, दूरे यत् सन्-इहभवसि जायमानः । "$^{(१६)}$लोधं नयन्ति पशुमन्यमानाः" । [ ऋ०सं० ३, ३, २३, ३ ] "शीरं पावकशोचिषम्" । [ ऋ०सं० ७, ११,११] पावकदीप्तिम् । 'अनुशायिनम्'-इतिवा । ' आशिनम्-' इतिवा ॥ ६ (१४) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ—हे भगवन् ! अग्ने ! 'यत्' जब 'त्वम्' तू 'वना' वनरूप अथवा ' अपः ' जलरूप 'मातृः' माताओं को 'कायमानः' देखता हुआ या इच्छा करताहुआ ' अजगन्' जाता है,तो 'तत्' वह 'ते' तेरा 'निवर्त्तनम्' मार्ग 'न' नहीं 'प्रमृषे' लुप्त होता। 'यत्' क्योंकि-'दूरे' 'सन्' दूर या नष्ट होता हुआ भी तू फिर
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१-“कायमानो वनात्वम्” इति विश्वामित्रस्येयमार्षम् । बृहती छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।
हिन्दी निरुक्त ( ५२ ) ४ अ० २ पा० ६ खं०
'इह' यहां काष्ठों में अरणि से अग्नि के रूपमें और जलमें
बिजली के रूपमें 'अभवः'। उत्पन्न हो जाता है ॥
निरुक्तार्थः- 'कायमान' (१५) देखता हुआ । अथवा इच्छा
करता हुआ । जब तू बन या काष्ठरूप और जलरूप माताओं
में शान्त होता हुआ लय हो जाता है। हे अग्नि देव ! वह
तेरा मार्ग लुप्त नहीं होता । क्योंकि-तू दूर (नष्ट) होता हुआ
भी फिर यहां (काष्ठ (अरणि) अथवा जल (मेघ) में) वह्नि
या बिजली के रूप में उत्पन्न हो जाता है ॥
(१६)
“लोधं नयन्ति पशु मन्यमानाः”(ऋ०सं० ३, ३, २३, ३)
अर्थात् लोभी को पशु के समान मानते हुए लेजाते हैं।
“शीरं (१७) पावक शोचिषम्” (ऋ०सं० ६, ७, ११, ११)
अर्थात् शीर या अनुशायी सब भूतों (प्राणियों) में प्रवेश कर
के शयन करने वाले को । अथवा सब प्राणियों में अशन (व्या-
पने वाले) को । 'पावक शोची' या अग्नि के समान दीप्ति
(तेज) वाले को स्तुति करता हूँ ॥ ६ (१४) ॥
व्याख्या ।
“लोधंनयन्ति” यह जिस ऋचा का टुकड़ा है, उसमें पुराना
प्रसिद्ध विश्वामित्र और वसिष्ठजी के इतिहास का एक अंश
है, उसकी भगवद्दुर्गाचार्य ने व्याख्या नहीं की । क्योंकि- भग-
वद्दुर्गाचार्य वासिष्ठ था और उसमें वसिष्ठ-की निन्दा है।
पहिले किसी समय विश्वामित्र ब्रह्मर्षि बनने के अर्थ बहुत
कालतक तप करके वसिष्ठ जी के पास गए कि- अब के बारमें
मुझे वे 'ब्रह्मर्षि' कहकर संबोधन करेंगे । किन्तु वहां उनसे
हिन्दी निरुक्त ( ५३ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
वैसे व्यवहार नहीं किया गया । अनन्तर विश्वामित्र अपने
तप के लोप के भय से वसिष्ठ को शाप विना दिये ही चुप चाप
लौटे । तब वसिष्ठ ने सोचा कि-इस वार इनका तप शाप से
नष्ट नहीं हुआ, अतः इनका तप नष्ट करना चाहिये इसी प्रयो-
जन से उनको बांध कर लाने के लिये अपने आदमी भेजे, वे
गए और विश्वामित्र को पकड़ कर वसिष्ठ के साम्हने ले चले,
उस समय विश्वामित्र उन पुरुषों से कहते हैं—
“ न सायकस्य चिकिते जनासो लोधं नयन्ति पशु-
मन्यमानाः । नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न
गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति” [ ऋ०सं० ३,३,२३,३ ]
अर्थात् हे जनों ! तुम ध्वंसकारी विश्वामित्र के मन्त्रगण
के सामर्थ्य को नहीं जानते, इसी से मुझ तपके लोभी को पशु
के समान बांधकर ले जाते हो । किन्तु वाजिन या विद्वान्
अवाजिन ( मूर्ख ) को उपहास नहीं करते और गधे को घोड़े
के साम्हने से नहीं ले जाते । प्रयोजन यह कि-मेरे मन्त्र बल
को न जान कर मुझे ले जाने की तुम बड़ी भूल करते हो । मैं
विद्वान् हूँ, उस मूर्ख वसिष्ठ की हांसी नहीं करना चाहता ।
एवम् घोड़े से गधे का साम्हना जैसा अनुचित है, वैसे मेरा भी
उस के साथ है ॥ ६, १७ ॥
( ७ खं० )
१ १८ १६
[निरु०] “कनीनकेव विद्रुधे नवे द्रुपदे अर्भके ।
१—“कनीनकेव विद्रुधे” इति वामदेवस्यार्षम् ।
[Header] हिन्दी निरुक्त ( ५४ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
बभ्रूयामेषु शोभेते ॥ ” [ऋ० सं० ३, ६, ३०, ७]
(भा०) 'कनीनके' कन्यके । 'कन्या' कमनीया
भवति । क्व-इयंनेतव्या'-इतिवा (कमनेन आनी-
यते इतिवा) कनतेर्वा स्यात् कान्तिकर्मणः । 'क-
न्ययोरधिष्ठानप्रवचनानि सप्तम्या एकवचनानि' इति
शाकपूणिः । विद्धयो दारुपाद्योः । 'दारु' दृणाते-
र्वा । द्रूणातेर्वा । तस्मादेव 'द्रु' । 'नवे' नवजाते ।
'अर्भके' अवृद्धे । ते यथा तदधिष्ठानेषु शोभेते,
एवं बभ्रूयामेषु शोभेते। बभ्रोः अश्वयोः संस्तवः।
'इदं च मे अदात्, इदंच मे अदात्'- इति
ऋषिः प्रसंख्याय आह—
“सुवास्त्वा अधि तुग्वनि”२० [ऋ० सं० ६, १, ३५, ७]
(भा०) 'सुवास्तु' नदी । 'तुग्व' तीर्थं भवति । तूर्णं
मेतत् आयन्ति । कुविन्नंसन्तेमरुतः पुनर्नः”२१
[ऋ० सं० ५, ४, २८, ५]
(भा०) पुनर्नो नमन्ते मरुतः ।
'नसन्त' (२२) इति उपरिष्टाद् (१२ अ०) व्या
ख्यास्यामः । “ये ते मदा आहनसो विहायसस्ते-२३
भिरिन्द्रं चोदय दातवे मघम् ।” (ऋ० सं० ७, २, ३३, ५)
हिन्दी निरुक्त ( ५५ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
(भा०) ये ते मदा आहननवन्तो वञ्चनवन्तः,
तैः-इन्द्रं चोदय दानाय मघवम् ॥ ७ (१५) ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थः-हे इन्द्र! ‘विद्रधे’ (१८) बहुत दृढ ‘नवे’ नवीन
‘अर्भके’ ठीक परिमाण से युक्त ‘द्रुपदे’ खड़ाऊंओंके ऊपर चढ़ी
हुईं ‘कनीनका’-‘इव’ दो कन्याओंके समान ‘यामेषु’ घुड़शाल
में ‘बभ्रू’ भूरे रंग वाली घोड़ियें ‘शोभेते’ सुहाती हैं ॥
निरुक्तार्थः-‘कनीनका’ दो कन्याएं । ‘कन्या’ क्यों? कम-
नीय (वाञ्छनीय) होती है । [ सभी उसे चाहते हैं ] अथवा
‘कहां यह पहुंचाना चाहिये’ यह उस के अर्थ पिता चिन्ता
करता है । अथवा कमन (सुन्दर वर) से आनयन की जाती
है (लाई जाती है) । अथवा इच्छार्थक ‘कन्’ (स्वा०प०)
धातु से है ।
‘‘‘विद्रधे’ ‘नवे’ ‘द्रुपदे’ ‘अर्भके’ ये चारों पद
कन्याओं के अधिष्ठान (खड़ाओं) के जनाने वाले
सप्तमी के एकवचन हैं’’ यह शाकपूणि आचार्य मानतेहैं ।
‘विद्धयोः’ नीचे से घोड़े के खुर के आकार में घड़ी हुईं,
‘दारुपाद्योः’ दो काष्ठकी पादुकाएं (खड़ाऊँ जोड़ी) इस प्रकार
अर्थ का अनुसन्धान कर के यास्काचार्य उक्त चारों पदों को
द्विवचनान्त मानते हैं ।
‘दारु’ शब्द ‘दृ’ विदारणे (क्र्या० प०) धातु से है ।
अथवा ‘द्रू’ (क्र्या० प०) धातु से है । उसी धातु से ‘द्रु’ शब्द
है । ‘नवे’ नई बनी हुईं ‘अर्भके’ अवृद्ध या बड़ी नहीं (ठीक
हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ४खं०
परिमाण से बनी हुई) । वे दो कन्याएं जिस प्रकार उन
अधिष्ठानों ( खड़ाऊँओं ) पर शोभित होती हैं, उसी प्रकार
यामों (अश्वशालाओं) में बभ्रु (बादामी रंगकी) घोड़िएं शो-
भित होती हैं [यह-] बभ्रु वर्ण वाली घोडियों की स्तुति है ॥
व्याख्या ।
“कनीनकेव” [ऋ०सं० ३,६,३०,७] यह मन्त्र ‘विद्रुधे’
(१८) ‘द्रुपदे’ (१९) इन दो पदों के उदाहरण में दिया है ।
‘विद्रुध’ नाम विवृढ या विशेष दृढ का, और ‘द्रुपद’ ‘द्रु’ वृक्ष,
उसके बने हुए पद ( पैर ) का है । इन पदों की विभक्ति के
वचनमात्र में शाकपूणि और यास्क के मत का भेद है । मन्त्र
में जैसे रूप दिए हुए हैं, वे व्याकरण में एकवचन और द्विव-
चन में समान ही सिद्ध होते हैं । और अर्थ भी दोनों प्रकार
से संगत होता है । इसी से दोनों ही मत सफल हो जाते हैं ।
‘तुग्वनि’ (२०) शब्द के निगम की भूमिका—
[ निरुक्तार्थ- ] ‘यह मुझे दिया’ ‘यह मुझे दिया इस
प्रकार ( त्रसदस्युराजा के दान की ) गणना करके ( काण्व
सोभरि ) ऋषि कहता है—
( “उतमे प्रयियोर्वयियोः ) “सुवास्त्वा अधि
तुग्वनि” ( तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्
वसुर्दानां पतिः ” [ ऋ० सं० ६, १,३५, ७ ] ॥
अर्थात्- ( और ‘प्रयियु’ जिसपर चढकर चलते हैं, अश्व
२०
आदि धन ) सुवास्तू नदी के ‘तुग्वनि’ तीर्थपर ( मुझे दिया
‘वयियु’ विनाहुआ वस्त्र आदि धन मुझे दिया । तीन सप्तति
( ७० ) अर्थात् दोसौ दश (२१०) गौओंके आगे चलने वाला
हिन्दी निरुक्त ( ५७ ) ४ अ० २ पा० ७ ख०
'श्याव' श्याम वर्ण वृषभ (सांड) 'भुवद्-वसु' धनों को उत्पन्न
करने वाले 'दियांनां पतिः' दान योग्य धनों के स्वामी त्रसद-
स्यु ने मुझे दिया ॥
व्याख्या ।
यहां दान के सम्बन्ध से 'सुवास्तु' शब्द नदी का वाचक
होता है क्योंकि-नदी पर दान करना प्रसिद्ध है । और नदी
के सम्बन्ध से ही 'तुग्वन्' शब्द तीर्थ का वाचक होता है ।
भाष्यकार ने इस प्रकार से यह भी सूचित किया कि-निगम
(मन्त्र) के अर्थके निश्चयार्थ सूक्त का अर्थ भी देख लेना चाहिए
जिस ऋचा में सौभरि ऋषिने त्रसदस्यु के दान की बड़ाई
पहिले की है, वह ऋचा—
“ अदान्मे पौरुकुत्स्यः पञ्चाशतं त्रसदस्युर्वधूनाम् ।
मंहिष्ठो अर्य्यः सत्पतिः” [ ऋ० सं० ६, १, ३५, ६ ]
यह ऋचा कण्वके पुत्र सौभरि ऋषि की है । वह कहता
है कि-'मंहिष्ठ', बड़ा पूजनीय 'अर्य्य', ईश्वर 'पौरुकुत्स्य'
बहुत शत्रुओं की मारने वाले का पुत्र 'त्रसदस्यु' दस्युओं
(डाकुओं) को डराने वाले राजा ने 'पञ्चाशत्' पचास ( ५० )
'वधू' ब्याहने योग्य कन्याएं 'मै' मुझे 'अदात्' दी हैं ॥
इन दोनों ऋचाओं में नदी तीर्थ पर दान करने की
महिमा और कन्याओं के दान की महिमा तथा एक पुरुष को
अनेक वधू देने की महिमा आती है । ऐसे दानों को वेद में
ढूंढने वालों के लिये ये ऋचाएं पूरा सन्तोष देने वाली हैं ।
निरुक्तार्थ-'नमन्त' (२१) शब्द का निगम—
“कुविन्नं सन्ते मरुतः पुनर्नः” (ऋ०सं०५,४,२८,४)।
८
हिन्दी निरुक्त ( ५८ ) ४ अ० २ पा० ८ खं०
अर्थात्-'मरुतः' मरुत् देवता 'नः' हमारे अर्थ 'पुनः' फिर
'कुचित्' बहुत 'नंसन्ते' वर्षा आदि उपकार से झुकते हैं ।
'नंसन्त' (२२) आगे १२वें अध्याय में व्याख्यान करेंगे ।
आहनसः (२३) शब्द का निगम—
“येतमदा” ०० ( ऋ० सं० ७, २, ३३, ५ )
अर्थात् हे सोम ! 'ये' जो 'ते' तेरे 'मदाः' मद 'आहनसः'
बहुन्न या मोहित करने वाले 'विहायसः' और बड़े हैं, 'तेभिः'
उन मदों से ' मघम् ' धन को 'दातवे' देने के अर्थ 'इन्द्रम्'
इन्द्रदेव को 'चोदय' प्रेरणा कर (जिससे कि-वह उन्मत्त होकर
हमें धन दे । ) ७ ( १६ ) ॥
१ ( ८ खं० )
[निरु०] “उपो अदर्शि शुन्ध्युवो न वक्षो नोधा
इवाविरकृत प्रियाणि । अद्मसन्न ससतो बोधय-
न्ती शश्वत्तमागात्पुनरेयुषीणाम् ॥” [ ऋ० सं०
२, १, ७, ४ ]
( भा० ) उपादर्शि 'शुन्ध्युवः' । 'शुन्ध्युः' आ-
दित्योभवति । शोधनात् । तस्यैव वक्षो भासा-
ध्यूढः ( म् ) इदमपि इतरद् 'वक्षः' एतस्मादेव ।
अध्यूढं काये । शकुनिरपि शुन्ध्युरुच्यते । शोध-
नादेव । उदकचरो भवति । आपोऽपि 'शुन्ध्यवः'
१ “ उपो अदर्शि ” इति कक्षीवतः आर्षम् । औषसी ।
त्रिष्टुप् छन्दः । प्रातरनुवाकाश्विनयोः शस्यते ।
हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ८खं०
उच्यन्ते । शोधनादेव । 'नोधा' ऋषिर्भवति । नवनं
दधाति। स यथा कामान् आविष्कुरुते, एवम् उषाः
रूपाणि आविष्कुरुते । 'अद्मसत् (२४)' । 'अद्म'
अन्नंभवति । अद्मसादिनी-इतिवा। अद्मसानिनी
इतिवा । ससतोबोधयन्ती “शश्वत्तमागात्पुनरे-
युषीणाम् ।” (स्वपतो बोधयन्ती ।) शाश्वतिक-
तमा आगात् पुनरेयुषीणाम् ।
“तेवाशीमन्त इष्मिणः” (२५) [ऋ० सं०
१,६,१३,६] ईषणिनः-इतिवा । एषणिनः-इतिवा ।
आर्षणिनः-इतिवा 'वाशी' इतिवाङ्नाम । वाश्यते
इतिसत्याः ।
“शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय
वाहः (२६) कृणवाव जुष्टम् ।” [ऋ०३,३,१९,३]
अभिवहनस्तुतिम् अभिषवणप्रवादो स्तुतिं
मन्यन्ते । ऐन्द्री त्वेव शस्यते ।
'परितक्म्या' (२७) इति उपरिष्टाद्व्याख्या-
स्यामः ॥ ८ ( १६ ) ॥
इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ ४, २ ॥
अनुवादः ।
मन्त्रार्थ-यह उषा 'शुन्ध्युवः' आदित्य के मण्डल में
'वक्षः' छाती के 'न' समान 'उप' उपश्लिष्ट या चिपकी हुई
हिन्दी निरुक्त ( ६० ) ४ अ० २ पा० ८ खं०
'अदर्शि' दिखाई देती है। [ क्योंकि उषा (सबेरे की लाली)
के पीछे ही आदित्य-मण्डल उदय हो जाता है । ] 'नोधाः'
नोधस् ऋषि के 'इव' समान ( यह उषा ) 'प्रियाणि' प्यारी
वस्तुओं को 'आविः-अकृत' प्रकट करती है । 'अद्मसत्' अन्न
( रसोई ) बनाने वाली स्त्री के 'न' समान 'ससतः' सोए हुओं
को 'बोधयन्ती' जगाती हुई 'पुनः-एयुषीणाम्' जा कर फिर
आने वालियों में मुख्य 'शश्वत्तमा' सदा रहने वालियों में से
एक यह उषा 'अगात्' आती है ॥
निरुक्तार्थ—शुन्ध्यु ( आदित्य ) के लगी हुई दिखाई
देती है । 'शुन्ध्यु' आदित्य होता है। क्यों शोधन से । [अर्थात्
जो कुछ भी अशुद्ध होता है, उसे अपनी किरणों से शुद्ध कर
देता है । ] उसी आदित्य का वक्षस् ( छाती ) प्रकाश से
पूर्ण है ।
यह दूसरा ' वक्षस् ' (मनुष्य की छाती) भी इसी से है ।
क्योंकि वह काय ( शरीर ) में अध्यूढ ( जमा हुआ ) है ॥
शकुनि (पक्षी) भी 'शुन्ध्यु' कहलाता है। क्यों ? शोधन
से ही । जिससे कि- वह जलमें विचरता है। जल भी 'शुन्ध्यु'
कहलाते हैं । क्यों ? शोधन से ही । ( अपवित्र वस्तु से लिपे
हुए वस्त्र आदि जलसे शुद्ध हो जाते हैं।)
'नोधस्' ऋषि होता है। क्योंकि-वह नवन या स्तोत्र को
धारण करता या रचता है। वह जैसे कामों ( वाञ्छाओं ) को
प्रकट करता है, उसी प्रकार उषा रूपों को प्रकाश करती है ।
'अद्मसत्' ( २४ ) । 'अद्म' अन्न होता है । अर्थात् अद्म-
मादिनी अन्न को सुधारकर रखने वाली, या अद्मसानिनी
अन्न को सानने वाली रसोई बनाने वाली स्त्री (अद्मसत् कह
हिन्दी निरुक्त ( ६१ ) ४ अ० २ पा० ८ खंड
लाती है ।) सोतेहुओं को जगाती हुई । फिर आनेवालियों
में से एक सदा रहने वाली ( उषा ) आती है ।
'इषिभयः' (२५) का निगम—
"तेवाशीमन्त इषिमिणः" (ऋ०सं०१,६,१३,६)
अर्थात्—'ते' वे मरुत् 'वाशीमन्तः' वाग्मी या वाणी वाले
'इषिम्णः' गमनवाले या इच्छा वाले हैं ।
निरुक्तार्थ- 'ईषणिनः' गमनवाले । अथवा 'एषणिनः'
इच्छा वाले । अथवा 'आर्षणिनः' अभिमुख (संमुख) भाव से
सब पदार्थों के द्रष्टा या देखने वाले ।
'वाशी' यह वाक् (वाणी) का नाम है । 'वाश्यते'
चाही जाती है, इस कर्मवाच्य क्रिया से है ।
'वाहस्' (२६) यह अनवगत पद है, पक्ष से अनेकार्थहै, उसका उदाहरण—
"शंसाध्वर्यो००" ऋ० सं० ३, ३, १६, ३)
अर्थात् हे अध्वर्यो ! तू आ, मुझे प्रतिगिरा (प्रतिवचन)
दे, हम दोनों स्तोत्र करें । इन्द्रके लिये 'वाहस्' (२६) स्तोत्र
करें (या सोमोदक-पूर्ण अधिषवण फलक (पात्र) करें ।)
कोई आचार्य अभिषवण (सोमोदक पूर्ण फलक) की
स्तुति मानते हैं । किन्तु इन्द्र देवता के लिये ही (यहऋचा)
शस्त की जाती है । ('वाहस्' शब्द के व्याख्यान के अति-
रिक्त इस मन्त्र के संबन्ध में आचार्य इतना ही और कहना
चाहते हैं, यह अभिप्राय है ।)
'परितक्म्या' (२७) इस शब्द की व्याख्या निरुक्त के
११वें अध्याय में "किमिच्छन्ती सरमा प्रेद मानट्"
[ऋ०सं० ८, ६, ५, १,] इस मन्त्र में करेंगे ।
इति चतुर्थाध्यायस्य द्वितीयः पादः॥
हिन्दी निरुक्त ( ६२ ) ४ अ० ३ पा० १ खं०
चतुर्थेऽध्याये
तृतीयः पादः
( १ खं० )
[निरु०-] 'सुविते' (२८) । सुइते। सूते । सुगते।
प्रजायामिति वा । “सुविते माधा ।” [ य०वा०सं०
५, ५ ] इत्यपि निगमो भवति ।
'दयतिः' (२९) अनेककर्मा । “नवेन पूर्वं दय-
मानाः स्याम” [य०वा० २८, १६] इति उपदयाकर्मा
१“य एक इद् विदयते वसु” [ऋ०सं० १, ६, ६, २]
इति दानकर्मा वा विभागकर्मा वा । दुर्वर्तु र्भीमो
दयते वनानि” [ऋ०सं० १, ६, ८, ५] इति दहति
कर्मा । 'दुर्वर्तुः' दुर्वारः । “विदद्वसुर्दयमानो
विशत्रून्” [ऋ०सं०३,२,१५,१] इति हिंसाकर्मा ।
“ इमे सुता इन्दवः प्रातरित्वना सजोषसा
पिबतमश्विना तान् । अहं हि वामूतये वन्दनाय
मां वायसो दोषा दयमानो अबूबुधत् ” ॥
'दयमान' इति ।
'नूचित्' (३०) इति निपातः पुगणनवयोः ।
१ “यएक इद् विदयते वसु” इति राहुगणस्य गोतमस्या-
र्षम् । ऐन्द्री । उष्णिक् ।
हिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ३ पा० १ खं०
‘नूच’ (३१) इति च ।
“अद्याचि॒न्नूचि॒त्सद॑पोनदी॒नाम्” [ ऋ० सं० ४,
७, २, ३, ]
(भा०) अद्यच पुराच तदेव कर्म नदीनाम् ।
“नूच॒ पुरा॑च॒ सद॑नं रयी॒णाम्” [ऋ०सं०१,७,४,२]
भा०-) अद्यच पुराच सदनं रयीणाम् । ‘रयिः’-
इति धननाम । रातेर्दानकर्मणः ॥ १ (१७) ॥
अनुवादः ।
निरुक्तार्थः-‘सुविते’ (२८) इस के ‘सुइते’ ( सुन्दर गए
हुए में ) सूते (जनता है) इस प्रकार दो समानरूप शब्द हैं ।
जिससे सुन्दर गमन और प्रजा या जनने अर्थ में होता है ।
“सुविते माधाः” अर्थात् हे तानूनप्त्र! तू ‘मा’ मुझे ‘सुविते’
नाम ‘सुगते’ सुगत स्थान में ( जहां गमन सुगमन हो, ) ‘धाः’
धारण कर, अथवा ‘सुविते’ नाम ‘सूते’ प्रजा या सन्तान में
धारण कर जिससे कि-मैं बहु-सन्तान होऊं यह भी निगम
होता है । [ निगम और भी बहुत हैं, यह ‘भी’ से सूचित
होता है । ]
‘दयतिः’ (२६) शब्द अनेकार्थ है । उदाहरण—
“नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम” [य०वा०२८,१६]अर्थात्
“ ‘नवेन’ नए धान्य से ‘पूर्वम्’ पुराणे धान्य की
‘दयमानाः’ रक्षा करते हुए ‘स्याम’ हम होवें ।”
हिन्दी निरुक्त ( ६४ ) ४ अ० ३ पा० १ खंड
यह उपद्या या रक्षा अर्थ में है।
“यएक इद् विदयते वसु” [ ऋ० सं० १, ६, ६, २ ]
अर्थात् “'यः' जो 'एकः-इत्' एक ही (इन्द्र) 'वि'
नाना प्रकार से 'वसु' धन को 'दयते' देता है या
बांटता है।” इस प्रकार अथवा दान अर्थ में है, अथवा
विभाग (बांटने) अर्थ में है।
“दुर्वर्तुर्भीमो दयते वनानि” [ऋ० सं० ४, ६,
८, ५]। अर्थात् “'दुर्वर्तुः' नहीं हटने वाला 'भीमः'
सब प्राणियों को भय देने वाला अग्नि 'वनानि'
वनों को 'दयते' जलाता है” इस मन्त्र में दाह अर्थ
में है।
“विदद्वसु र्दयमानो विशत्रून्” [ऋ० सं० ३, २,
१५, २] अर्थात् “'विदद्वसुः' जिसे सब धन प्राप्त
हैं, वह इन्द्र 'वि' अनेक प्रकार 'शत्रून्' शत्रुओं
को 'दयमानः' मारता हुआ” इस मन्त्र में हिंसा अर्थ
में है।
“ इमे सुता इन्दवः दयमानो अबूबुधत् ”
अर्थात् हे अश्विना ! अश्विनौ ! 'इमे' ये 'सुताः' निचोड़े हुए
'इन्दवः' सोम हैं तुम दोनों 'सजोषसा' प्रीतियुक्त 'मातरि-
त्वना' प्रातःकाल ही गमन करने वाले इन्द्र के साथ 'तान्'
उन सोमरसों को 'पिबतम्' पीओ। 'हि' क्योंकि 'अहम्' मैं
'क्रतवे' वाञ्छित सिद्धि के लिये 'वाम्' तुम दोनोंकी 'अन्दनाय'
वन्दना करता हूं, या वन्दना के लिये उद्यत हूं । 'दयमानः'
आकाश देश से नीचे की ओर उड़ते हुए 'वायसः' काक ने
'दोषा' रात्रिके समय 'माम्' मुझे 'अबूबुधत्' नींद से उठाया ।
इस मन्त्र में 'दय' धातु का गति अर्थ है । [ इस मन्त्र में काक
के स्पर्श की अशुभ सूचकता और उस की शान्ति के लिये
अश्विनीकुमारों की स्तुति है। यह भी एक शकुन शास्त्र का
मूल है ॥ 'नूचित्' (३०) यह निपात पुराण और नवीन अर्थ
में है । और ' नूच ' ( ३१ ) यह भी इन्ही दोनों अर्थों में है
[ उदाहरण ] “अद्याचित्”०० [ऋ० सं० ४, ७, २, ३] अर्थात्
'अद्याचित्' अब 'नूचित्' पहिले 'तत्' वही 'नदीनाम' नदियों
का 'अपः' कर्म है ।
“नूच पुराच सदनं रयीणाम् ।” [ऋ० सं० १,
७, ४, २] 'नूच' अब 'पराच' और पहिले 'रयीणाम्' धनों का
'सदनम्' स्थान है । 'रयि' यह धन का नाम है । दानार्थक
'रा' (अदा० प०) धातु से है । १ ( १७ ) ॥
( २ खं० )
१ (३३) (३२)
[निरु०] “विद्याम तस्यतेवयमकूपारस्य दावने ।”
[ऋ० सं० ४, २, १०, २]
(भा०) विद्याम तस्य ते वयम्-अकुपरणस्य
दानस्य । आदित्योऽपि 'अकूपारः' उच्यते । अकू-
पारो भवति दूरपारः । समुद्रोऽपि ' अकूपारः '
१ “विद्याम तस्य” इति अत्रे भौमस्य द्वयमार्षम् ।
अच्छावाकस्य तार्तीयसवनिके आवापे नियुक्ता ।
६
हिन्दी निरुक्त (६६) ४ अ० ३ पा० २ खं०
उच्यते। अकूपारो भवति महापारः। कच्छपोऽपि
'अकूपारः' उच्यते। 'अकूपारः' 'न कूपम्-ऋच्छति'
इति। 'कच्छपः' कच्छंपाति। कच्छेन पाति-इतिवा।
'कच्छः' खच्छः, खच्छदः। अयमपि-इतरो नदी-
कच्छ एतस्मादेव। कम्-उदकं तेन छाद्यते।
(३४)
“शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ० सं०
३, ८, १५, ३]
(भा०) निश्यति शृङ्गे रक्षसो विनिक्षणाय।
'रक्षः' रक्षितव्यम्-अस्माद् रहसि। क्षणोति-इतिवा
रात्रौ नक्षते-इतिवा।
(३५)
“अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०७,५,३१,७]
(भा०) सुतुकनः, सुतुकनैः-इतिवा। सुप्रजाः, --
सुप्रजोभिः-इतिवा।
(३६)
“सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम् ।”
[ य० का सं० वा सं० २८, ५]।
(भा०) सुप्रगमनाः २ (१८) ॥
अनुवादः।
'दावने' (३२) (दानस्य) और 'अकूपारस्य' (३३) (अकुपरणस्य) इन दो
अनवगत पदों का निम्न—
हिन्दी निरुक्त ( ६७ ) ४ अ० ३ पा० २ खं०
“विद्याम”०० [ ऋ० सं० ४, २, १०, २ ] अर्थात् हम
'तस्य' उस 'ते' तेरे 'अकूपारस्य' अकुपरण ( जिस की पूर्त्ति
निन्दित नहीं है ) 'दावने' दान की 'विद्याम' जानते हैं ।
निरुक्तार्थ-हम उस तेरे उत्तम दान को जानते हैं । आदित्य
भी 'अकूपार' कहा जाता है । 'अकूपार' क्यों? दूर पारं ( जिस
का पार या किनारा दूर है )। है । समुद्र भी 'अकूपार' कहा
जाता है। क्यों कि अकूपार नाम महापार या विस्तृत पार
वाला होता है । कछुआ भी 'अकूपार' कहा जाता है। क्यों
कि वह कूप को (अल्प जल के कारण) नहीं जाता है (किन्तु
बहुत फैले हुए जल को ही जाता है ।)
'कच्छप' क्यों ? 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट को 'प' नाम
रक्षा करता है । [ क्योंकि वह किसी वस्तु को भी देख कर
अपने शरीर में ही मुख को छिपा लेता है । 'कच्छ' नाम मुख-
संपुट अर्थ में प्रसिद्ध है । ] अथवा कच्छ नाम कटाह ( कड़ा
ही ) से और अङ्गों को 'प' नाम रक्षा करता है । [ क्यों कि
वह कुछ भी देख कर अपने सब अङ्गों को कटाह ( कड़ाही
जैसे अङ्ग ) में प्रवेश करके कूर्म के रूप से अवस्थित हो जाता
है। अथवा 'कच्छ' नाम मुखसम्पुट से 'प' नाम पीता है । ]
'कच्छ' क्यों ? जिससे कि-'खच्छ', है । 'खच्छ' क्या !
खच्छद् खच्छद् अर्थात् ख नाम आकाश को छादन करता है ।
[ क्योंकि वह मध्यमें स्थिर होता है । यह भी दूसरा नदी-
कच्छ इसी निर्वचन से है । 'क' जल उस से छादन होता है ।
'शिशीते' (३४) का निगम-
“शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे” [ऋ०सं०३, ८, १५, ३].
अर्थात्-अग्नि देव 'रक्षसे' राक्षस के 'विनिक्षे' विनाश के अर्थ
यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का देवनागरी में पंक्ति-वार लिप्यन्तरण दिया गया है:
हिन्दी निरुक्त ( ६८ ) ४ अ० ३ पा० ३ खं०
'शृङ्गे' सींगों को ' शिशीते ' पैनाता है । [ जिस प्रकार वृष
(बैल) तटोंको फोड़ता हुआ अपने सींगों को पैनाता (तीक्ष्ण
करता) है, उसी प्रकार अग्नि काष्ठों को जलाता हुआ अपनीं
ज्वालाओं को तीक्ष्ण करता है । ]
निरुक्तार्थ—राक्षस के विनाश के लिये सींगों को तीक्ष्ण
करता है । 'रक्षस्' क्यों ? इस से एकान्त देश में रक्षा करना
योग्य होता है । अथवा रात्रिकाल में वह 'नक्षते' विचरता है ।
'सुतुके' (३५) अनवगत शब्द का निगम—
“अग्निः सुतुकः सुतुकेभिरश्वैः” [ऋ०सं०७,५३१, ७]
अर्थात्—'अग्निः' हे अग्ने ! (प्रथमान्त पद सम्बोधन में बदला
जाता है । क्योंकि-मन्त्रमें 'आवक्ष' मध्यम पुरुष की क्रिया है ।)
तू 'सुतुकेभिः' (सुतुकनैः) सुन्दर गमनकरने वाले 'अश्वैः' घोड़ों
से 'सुतुकः' (सुतुकनः) सुन्दर गमन करने वाला है ।
'सुप्रायणा.' (३६) इस अनवगत पद का निगम—
“सुप्रायणा अस्मिन् यज्ञे विश्रयन्ताम्” [ य० का०
सं० वा० सं० २८, ५ ] । अर्थात् 'अस्मिन्' इस 'यज्ञे' यज्ञ
में ('दुरः' ) द्वार 'सुप्रायणाः' ' सुप्रगमनाः ' अच्छे प्रकार से
गमन करने योग्य ' विश्रयन्ताम् ' खुलें ॥ २ (१८) ॥
( ३ खं० )
( ३७ )
[निरु०] “देवा॑नो॒ यथा॑ सद॒मिद्वृधे अस॒न्नप्रायुवो
रक्षितारो॑ दि॒वेदि॑वे” ॥ [ ऋ०सं० १, ६, १५, १ ]
१—“देवानो यथा” इति गौतमस्य इयमर्षम् । अग्निष्टोमे
महाव्रते तृतीयसवने वैश्वदेवे शस्त्रे शस्यते ।
(भा०) देवा नो यथा सदावर्द्धनायस्युः, 'अप्रा-
युषः'(३७) अप्रमाद्यन्तः रक्षितारश्च अहनिअहनि ॥
‘व्यवनः’ ( ३८ ) ऋषिर्भवति । च्याचयिता
स्तोमानाम् । 'च्यवानम्'- इति । अप्यस्य निगमा
भवन्ति ।
“युवं च्यवानं सनयं यथा रथं पुन र्युवानं
चरथाय तक्षथुः ॥” [ ऋ० सं० ७, ८, १५, ४ ]
(भा०-) युवां च्यवनं सनयं पुराणं यथा रथं
पुन र्युवानं चरणाय ततक्षथुः । ‘युवा’ प्रयोति
कर्माणि । ‘तक्षतिः’ करोतिकर्मा ॥
'रजः' (३९) रजतेः । ज्योतिः रजः उच्यते ।
उदकं रजः उच्यते । लोकाः रजांसि उच्यन्ते ।
असृगहनी रजसी उच्येते । (“रजांसि चित्रा
विचरन्ति तान्यव” इत्यपि निगमो भवति ) ॥
‘हरः’ ( ४० ) हरतेः । ज्योति र्हरउच्यते ।
( उदकं हर उच्यते । ) लोकाः हरांसि उच्यन्ते ।
( असृगहनी हरसी ) उच्येते । “प्रत्यग्मे हंसा हरः
शृणीहि” [ ] इत्यपि निगमो
भवति । ) ॥
“'जुहुरे' (४१) विचितयन्तः” (ऋ०सं०४,१,११,२) ।