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सर्वकोश
निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)

Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary

महर्षि यास्क मुनि द्वारा

DevanagariHindipublished1,282 पृष्ठ

पृष्ठ 475, कुल 1282 में से

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पृष्ठ 475

हिन्दी निरुक्त ( ५६ ) ४ अ० २ पा० ४खं०
परिमाण से बनी हुई) । वे दो कन्याएं जिस प्रकार उन
अधिष्ठानों ( खड़ाऊँओं ) पर शोभित होती हैं, उसी प्रकार
यामों (अश्वशालाओं) में बभ्रु (बादामी रंगकी) घोड़िएं शो-
भित होती हैं [यह-] बभ्रु वर्ण वाली घोडियों की स्तुति है ॥
व्याख्या ।
“कनीनकेव” [ऋ०सं० ३,६,३०,७] यह मन्त्र ‘विद्रुधे’
(१८) ‘द्रुपदे’ (१९) इन दो पदों के उदाहरण में दिया है ।
‘विद्रुध’ नाम विवृढ या विशेष दृढ का, और ‘द्रुपद’ ‘द्रु’ वृक्ष,
उसके बने हुए पद ( पैर ) का है । इन पदों की विभक्ति के
वचनमात्र में शाकपूणि और यास्क के मत का भेद है । मन्त्र
में जैसे रूप दिए हुए हैं, वे व्याकरण में एकवचन और द्विव-
चन में समान ही सिद्ध होते हैं । और अर्थ भी दोनों प्रकार
से संगत होता है । इसी से दोनों ही मत सफल हो जाते हैं ।
‘तुग्वनि’ (२०) शब्द के निगम की भूमिका—
[ निरुक्तार्थ- ] ‘यह मुझे दिया’ ‘यह मुझे दिया इस
प्रकार ( त्रसदस्युराजा के दान की ) गणना करके ( काण्व
सोभरि ) ऋषि कहता है—
( “उतमे प्रयियोर्वयियोः ) “सुवास्त्वा अधि
तुग्वनि” ( तिसृणां सप्ततीनां श्यावः प्रणेता भुवद्
वसुर्दानां पतिः ” [ ऋ० सं० ६, १,३५, ७ ] ॥
अर्थात्- ( और ‘प्रयियु’ जिसपर चढकर चलते हैं, अश्व
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आदि धन ) सुवास्तू नदी के ‘तुग्वनि’ तीर्थपर ( मुझे दिया
‘वयियु’ विनाहुआ वस्त्र आदि धन मुझे दिया । तीन सप्तति
( ७० ) अर्थात् दोसौ दश (२१०) गौओंके आगे चलने वाला