निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दी निरुक्त ( ६३ ) ४ अ० ३ पा० १ खं०
‘नूच’ (३१) इति च ।
“अद्याचि॒न्नूचि॒त्सद॑पोनदी॒नाम्” [ ऋ० सं० ४,
७, २, ३, ]
(भा०) अद्यच पुराच तदेव कर्म नदीनाम् ।
“नूच॒ पुरा॑च॒ सद॑नं रयी॒णाम्” [ऋ०सं०१,७,४,२]
भा०-) अद्यच पुराच सदनं रयीणाम् । ‘रयिः’-
इति धननाम । रातेर्दानकर्मणः ॥ १ (१७) ॥
अनुवादः ।
निरुक्तार्थः-‘सुविते’ (२८) इस के ‘सुइते’ ( सुन्दर गए
हुए में ) सूते (जनता है) इस प्रकार दो समानरूप शब्द हैं ।
जिससे सुन्दर गमन और प्रजा या जनने अर्थ में होता है ।
“सुविते माधाः” अर्थात् हे तानूनप्त्र! तू ‘मा’ मुझे ‘सुविते’
नाम ‘सुगते’ सुगत स्थान में ( जहां गमन सुगमन हो, ) ‘धाः’
धारण कर, अथवा ‘सुविते’ नाम ‘सूते’ प्रजा या सन्तान में
धारण कर जिससे कि-मैं बहु-सन्तान होऊं यह भी निगम
होता है । [ निगम और भी बहुत हैं, यह ‘भी’ से सूचित
होता है । ]
‘दयतिः’ (२६) शब्द अनेकार्थ है । उदाहरण—
“नवेन पूर्वं दयमानाः स्याम” [य०वा०२८,१६]अर्थात्
“ ‘नवेन’ नए धान्य से ‘पूर्वम्’ पुराणे धान्य की
‘दयमानाः’ रक्षा करते हुए ‘स्याम’ हम होवें ।”