निरुक्तम् (महर्षि यास्क मुनि - निघण्टु एवं वैदिक शब्द-व्युत्पत्ति सान्वय सटीक भाष्य)
Niruktam of Maharshi Yaska with Nighantu and Hindi Commentary
महर्षि यास्क मुनि द्वारा
४ ३ अ० १ पा० २ खं० ।
अर्थ ।
“परिषद्यं हि” न हि ग्रभाय “इति च ( २, ३
खं० ) एते त्रिष्टुभौ ।”
वसिष्ठ और अग्निके संवादमे हतपुत्र वसिष्ठने अग्निसे प्रार्थना
की कि 'मुझे पुत्र दे' । अग्निने वसिष्ठसे कहा कि-क्रीतक (खरीदा
हुआ) कृत्रिम (बनावटी) और दत्तक (गोदका) आदि पुत्र
बहुत हैं, उनमेंसे कोई पुत्र कर सकते हो । इस प्रकार अग्निसे
उत्तर पाकर वसिष्ठने दो ऋचाओंसे (अन्यजात (औरसे उत्पन्न)
पुत्रोंकी निन्दा करते हुए औरस (जो अपने वीर्यसे अपनी पत्नीमें
उत्पन्न होता है) पुत्र माँगा ।
'हि' यतः 'अरणस्य' अपगतोदकसम्बन्धस्य पर-
कुलजातस्य 'रिक्थः' यद्-अपत्याख्यं धनम् तत्-
'परिषद्यम्' परिहर्त्तव्यम् न पुत्रत्वेन परिकल्पयित-
व्यमित्यर्थः । यतः एवम् अतो ब्रूमः-'नित्यस्य'
'रायः' अपत्याख्यस्य धनस्य 'पतयः' स्वामिनः 'स्याम'
भवेम । हे 'अग्ने ।' 'न' 'शेषः' अपत्यम् 'अन्य-
जातम्-अस्ति' । 'अचेतांस्य' धर्मान् अश्रु तवत एव
तद् भवति । तस्मात् 'पथः' सन्मार्गात् अस्मान् मा
कथञ्चित् 'विदुक्षः' विदूदूषः प्रच्योवय इत्यर्थः । त्वं
देहि नः पुत्रम्-औरसम्-इत्यभिप्रायः ।
जिससे कि-उसका अपत्य (पुत्र) रूप धन जिसके साथ
अपना जलका सम्बन्ध नहीं अर्थात् दूसरे कुलमें पैदा हुआ है,
त्याज्य या पुत्र-भावसे मानने योग्य नहीं हैं। इस कारण कहते
हैं कि-इस नित्य (जो सदा हमारे सङ्ग रहे) पुत्ररूप धनके पति
या स्वामी होवें। हे अग्नि देव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ अपत्य नहीं
होता। अर्थात् जो ही उसे उत्पन्न करता है, उसीका वह होता
किन्तु दूसरेका नहीं। अनजानको ही वह सन्तोष मात्र है, कि-
यह मेरा अपत्य है पर वास्तवमे वह अपत्यका काम नहीं देता।
अतः हम कहते हैं कि-हमें हमारे बाप दादोंकी मर्यादासे मत
गिराओ। प्रयोजन यह कि-हमें औरस पुत्र दो।
[ निरुक्तार्थ ] [ १ म पा० ] क्योंकि अरण या जलके सम्बन्धसे
रहित पुरुषका रेक्ण या अपत्यधन छोड़ने योग्य है,या पास जाने
योग्य नहीं है। 'अरण' नाम अपार्णका है, अर्थात् जिसके साथ
जलका सम्बन्ध नहीं। 'रेक्ण' नाम धनका है। क्योंकि वह इस
लोकसे परलोकको जाते हुए या मरते हुएका यहीं रह जाता है,
या उससे वह खाली हो जाता है।
[ द्वि० पा० ] हम 'नित्य' जो अपने संगको कभी न छोड़े,
धनके पति होवें। जैसे कि बापके धनका स्वामी बेटा हो जाता है।
[ तृ० पा० ] हे अग्निदेव ! दूसरेसे उत्पन्न हुआ 'शेष' नहीं
है। 'शेष' यह नाम अपत्यका है। क्योंकि मरते हुएका वह शेष
(बचा हुआ) रह जाता है।
[ च० पा० ] 'अचेतयमान' या प्रमादीका वह होता है। हमें
उस मार्गसे मत अलग करो।
इसी अपत्य शब्दके निर्वचनके प्रसङ्गमें इस मन्त्रकी व्याख्या की
गयी है, और आगेका मन्त्र प्रसक्तानुप्रसक्त ही कहा गया है, इसी
अभिप्रायसे आचार्य कहते हैं—"तस्य उत्तरा भूयसे निर्वचनाय।"
अर्थात् उसी मन्त्रकी पर्याप्त (काफी) व्याख्याके लिये अगली
ऋचा है ॥२॥
६ ३ अ० १ पा० २ खं० ।
व्याख्या।
यद्यपि “परिषद्यं हि” यह ऋचा ‘अपत्य’ शब्दके निर्वचनमें
किसी अर्थको पुष्ट नहीं करती, इससे इसे यहां न पढ़ना चाहिये
था। [ व्याकरणके समान निरुक्तमें भी शब्दोंका ही अनुशासन
है, अतः शब्द ही उसके विषय हैं, उनके व्याख्यानमें उनके अर्थको
पुष्ट करनेके लिये जो मन्त्र रखा जाता है वह वहाँ निगम नामसे
बोला जाता है और आवश्यक होता है, किन्तु यह ऋचा उस
कार्यको नहीं करती । ] तथापि ‘अपत्य शब्दके अर्थ अपत्य या
पुत्रके सम्बन्धकी एक ऐसी मार्मिक बातको यह ऋचा कहती है,
जो अपुत्र मनुष्य पुत्रकी लालसा रूप अग्निको बुझानेके अर्थ दत्तक-
कृत्रिम आदि पुत्र करते हैं, उन्हें याद रखने और विद्वानोंको हृदयङ्गम
करने योग्य है, ऐसा जान कर आचार्यने इसे यहाँ रख दिया है।
इसके अतिरिक्त यह भी इस ऋचाके द्वारा आचार्यने दिखाया कि,
जिस प्रकार स्मृतियोंमें धर्मके अनेक रहस्य विस्तारसे दिखाये हैं,
उसी प्रकार वेदमें भी वैसे ही रहस्य विस्तार पूर्वक हैं।
वसिष्ठजी इस मन्त्रमें अपने देवतासे दो प्रार्थनाएं (दरखास्तें)
करते हैं (क) हम नित्य (अपत्य) धनके पति हों। (ख) हमे
सच्चे मार्गसे भुलावा न दें। इन प्रार्थनाओंके ठहरानेमें तीन कारण
दिखाये हैं (क) असम्बन्धीका (अपत्य) धन परित्याज्य है (ख)
हे अग्ने ! अन्यजात अपत्य (पुत्र) नहीं होता। (ग) किन्तु वह
अचेतान (अनजान) को होता है।
अरण या अपगतोदक-सम्बन्ध ।—
“सपिण्डता तु पुरुषे सप्तमे विनिवर्त्तते ।
समानोदक-भावस्तु जन्मनाम्नो खेदने ॥”
[ मनु० ५, ६० ]
हिन्दी निरुक्त । ७
अर्थात्-सातवें पुरुष या पीढ़ीमे सापिण्ड्य पूरा हो जाता है,
और 'हमारे कुलमे अमुक नामका पुरुष हुआ'- इस प्रकार जन्म और
नामके परिज्ञान न रहनेसे समानका सम्बन्ध छूट जाता है ॥ २ ॥
(खण्ड ३)
[ निरु० ] “न हि ग्रभायारणः सुशेवोऽन्योदर्यो
मनसा मन्तवा उ । ऊधा चिदोकः पुनरित्स एत्यानो
वाज्यभीषाले तु नव्यः ॥” [ ऋ० सं० ५, २, ६, ३ ]
'न हि' ग्रहीतव्यः 'अरणः' सुसुखतमोऽपि ।
'अन्योदर्यो मनसाऽपि न मन्तव्यो-मम-अयम्-पुत्रः-
इति । अथ 'सः' 'ओकः' 'पुनः' एव तद् 'एति'
यतः आगतो भवति । 'ओकः' इति निवास नाम
उच्यते । 'एतु' 'नो' 'वाजी' वेजनवान् अभिषह
माणः सपत्नान् नवजातः स एव पुत्रः इति ।
अथ एतां दुहितृदायाद्ये उदाहरन्ति पुत्र-
दायाद्ये-इत्येके ॥-॥ ३ ॥
अर्थ ।
[ सं० मन्त्रार्थः ] “सुशेवः” 'सुसुखतमः' परि-
चारकः हितैषी अपि “अरणः” अपगतोदकसम्बन्धः
पुत्रः “नहि ग्रभाय” 'नहि ग्रहीतव्यः' “अन्योदर्यो
मनसा” 'अपि' “न” “मन्तवै ( उ )” 'मन्तव्यः'।
८ ३ अ० १ पा० ३ खं० ।
“अधः” अथ अतः “सः” तद् “ओकः” स्वं निवास
स्थानं स्वं वंशं वा “पुनः-इत्” ‘पुनरेव’ “एति”
‘आगतो भवति’ । यतः एवम्-अतो ब्रवीमि
‘स एव’ “नव्यः” ‘नवजातः पुत्रः’ य “वाजी”
‘वेजनवान्’ परेभ्यो भयदाता “अभीषाट्” अभि-
षहमाणः’ अभिभवन् सपत्नान् “नः” अस्माकम्
“ऐतु” आगच्छतु न परकीयः पुत्रः सङ्कल्पितः
इत्यर्थः ।
चाहे बहुत सुखका देनेवाला, सेवा करनेवाला और हितका
चाहनेवाला भी क्यों न हो, परन्तु जिसके साथ जलका सम्बन्ध न
हो उसे पुत्र कभी न बनाना चाहिये; तथा “अन्योदर्य” दूसरेके
डाले हुए वीर्य्यसे उत्पन्न हुआ या दूसरेकी पत्नीके पेटसे उत्पन्न हुआ
मनसे भी सङ्कल्प न करना चाहिये कि-यह मेरा पुत्र है । क्योंकि
फिर भी वह अपने उस पुराने घर या वंशमे आ जाता है । जिससे
कि-ऐसा है, इससे मैं कहता हूं कि-वह नव्य नवजात (नया पैदा
हुआ) पुत्र जो शत्रुअ का भय देनेवाला और उन्हे तिरस्कार करने
वाला हमें पुत्र मिले, अर्थात् दूसरेका पुत्र हमारा सङ्कल्पित या
वाञ्छित नहीं है ।
(नि० अ० ) नहीं ही लेना चाहिये, जिसके साथ जलका
सम्बन्ध नहीं, चाहे बहुत सुखदायी भी हो । दूसरेके पेटसे उत्पन्न
हुआ (पुत्र) मनसे भी न मानना चाहिये कि-यह मेरा है। क्योंकि
वह उस स्थानको फिर भी आ जाता है, जहाँसे वह आया हुआ
होता है। ‘ओकस्’ यह निवासका नाम कहा जाता है। मिले
हिन्दी निरुक्त । ε
हमें शत्रुओंको डरानेवाला और तिरस्कार करनेवा ला वही नवीन
पैदा हुआ पुत्र ।
अब उस ऋचाको कन्याके दायभागित्वमे उदाहरण देते हैं और
कोई पुत्रके दायभागित्वमें ॥ ३ ॥
व्याख्या ।
पहिली ऋचामें अरणका पुत्र त्याज्य बतलाया है और इस
ऋचामे स्वयम् अरण ही त्याज्य पुत्र कहा है किन्तु दोनोंका
अभिप्राय एक ही है। क्योंकि अरणका पुत्र भी अरण ही होगा।
इसी प्रकार पूर्व ऋचामें अन्य जातकी पुत्रताका निषेध है, और
इस ऋचामे अन्योदर्यका निषेध है। इन दोनोंका भी परिणाम
एक ही अर्थमें होता है। क्योंकि अन्य का जात तभी हो सकता है,
जब कि वह दूसरेके क्षेत्रमे बीज बोता है। ओर अन्यका उदर भी
वही है जो बोनेवालेकी स्त्रीका उदर नहीं है।
अन्यजात अन्योदर्य तथा अरण पुत्रका निषेध दोनों मन्त्रोंमें
एककी अपेक्षा एक बहुत ही बलपूर्वक करता है। एक कहता है
कि- अन्यजात पुत्र ही नहीं है, और दूसरा कहता है कि अन्योदर्य-
को मनसे भी नहीं सोचना। केवल पूर्वमन्त्रसे इस मन्त्रमें नयी
बात यह कही है कि—अन्यजात पुत्र फिर भी समय पाने पर अपने
पुराने ठिकाने ही चला जाता है। जो अभिमान मनुष्यको अपने
गर्भाधान करनेवालेसे होता है, दूसरेसे कभी नहीं होता। यह
मन्त्रकी मर्मोक्ति है। इसके अतिरिक्त यह भी है कि-चाहे वह
सेवा आदि गुणोंसे युक्त हो तो भी उसे नहीं लेना। इसमें प्रकृति-
की महिमाकी दुस्तरता दिखाई है। क्योंकि-उसे गुणवान्को
मोहित करनेमे भी कोई परहेज नहीं है।
२
१० ३ अ० १ पा० ४ खं० ।
इस मन्त्रके चतुर्थ पादमें यह भी सूचित किया कि—जो अपना
औरस-पुत्र होता है, उसे ही अपने बाप दादोंके बैर भँजानेका
आग्रह होता है तथा उसीसे बापकी इच्छा पूरी होती है।
इस विचारे पुराने वेदने तो कितने ही बलके साथ अन्यजात
या अन्योदर्य पुत्रकी निन्दा की, पर नये वेदको जो एक स्त्रीको
ग्यारह पतियोंकी पत्नी बनाता है इसकी क्या परवाह होगी ? उसके
हिसाबमे तो अन्य पत्नीका अपनी पत्नी होना कोई बड़ी बात ही
नहीं है ॥ ३ ॥
•
( खण्ड ४ )
[ निरु० ] “शासद्वह्नि र्दुहितु र्नप्त्यङ्गाद्विद्वाँ
ऋतस्य दीधितं सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेक-
मृञ्जन् संशग्म्येन मनसा दधन्वे ॥” [ ऋ० सं०
३, २, ५, १ ]
प्रशास्ति वोल्हा सन्तान कर्मणे 'दुहितुः' पुत्र-
भावम् । 'दुहिता' दुर्हिता दूरे हिता । दोग्धेर्वा ।
नप्तारमुपागमद् दौहित्रिं पौत्रमिति विद्वान् प्रजनन-
यज्ञस्य रेतसो वा । अङ्गादङ्गात्सम्भूतस्य हृदयादधि
जातस्य मातरि प्रत्यृतस्य विधानं पूजयन्-अवि-
शेषेण मिथुनाः पुत्राः दायादाः इति । तदेतद्-ऋक्
श्लोकाभ्यामुक्तम् :—
हिन्दी निरुक्त । ११
“अङ्गादङ्गात्सम्भवसि हृदयादधि जायसे। आत्मा
वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्” इति ।
[ गो० गृ० सू० २, ८, २१ ]
“अविशेषेण पुत्राणां दायो भवति धर्मतः ।
मिथुनानां विसर्गादौ मनुः स्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥
‘न दुहितरः’ इत्येके । तस्मात् ‘पुमान् दाया-
दोऽदायादा स्त्री’-इति विज्ञायते । तस्मात् स्त्रियं
जातां परास्यन्ति न पुमांसम्-इति च । स्त्रीणां
दान विक्रयातिसर्गा विद्यन्ते न पुंसः । ‘पुंसोऽपि’
इत्येके । शौनः शेपे दर्शनात् । ‘अभ्रातृमती वादः’-
इत्यपरम् । ( असूर्या यन्ति जामयः सर्वा लोहित-
वाससः । ) अभ्रातर इव योषास्तिष्ठन्ति हतवर्त्मानः
अभ्रातृका इव योषास्तिष्ठन्ति सन्तान कर्मणे पिण्ड
दानाय हतवर्त्मानः इति । अभ्रातृकाया अनिर्वाहः
औपमिकः । तस्य-उत्तरा भूयसे निर्वचनाय ॥ ४ ॥
अर्थः ।
“शासद्वह्नि” रिति एषा त्रिष्टुप् । ऐन्द्रं सूक्तं
वैश्वामित्रम् । माध्यन्दिने सवने उक्थ पर्याये
१२ ३ अ० १ पा० ४ खं० ।
अच्छावाकस्य यच्छस्त्रम्-अभिजित्द्विश्वजिदादिषु
अहीनकेषु अहः सु अहीनसूक्तं नाम तत्रेयं शस्यते ।
“न जामये तान्व” ( ६ खं० ) इति द्वयमपि अनयैव
समानार्ष विनियोग दैवतच्छन्दस्का ।
( मन्त्रार्थः ) “वह्नि” 'वोढा' उद्बोढा स्त्रियाः
'सन्तानकर्मणे' अर्थाय"दुहितुः” या स्वस्यां भार्यायां
जायते पुत्री तस्याः 'पुत्रभावं' 'इवमेव मे पुत्रः'
इति भावं “शासत्” 'प्रशास्ति' प्रख्यापयति प्रज्ञा-
पयति इत्यर्थः । कथं पुनर्जायते प्रशास्ति-इति ? ।
उच्यते-इतः । यस्मात् “नप्ताङ्गात्” 'नप्तारमुपागमत्'
उपागच्छति चेतसा, दौहित्रं पौत्रमिति । कीदृशः ?
“ऋतस्य” 'प्रजननयज्ञस्य' 'रेतसो वा “विद्वान्”
अभिज्ञः किं कुर्वन् ? “दीधितिं”'विधानं'“सपर्यन्”
अविशेषेण पुत्रदुहित्रोर्गर्भाधानेतिकर्त्तव्यतां पूजयन्
सञ्जानन्नित्यर्थः । “पिता” ‘यत्र” यस्मिन् काले
“दुहितुः” ‘अप्रत्तायाः’ प्रदानात्-प्राक्-इत्यर्थः
“सेकं” 'रेतः सेकं' जामातरम् “ऋञ्जन्” 'प्रार्जयति'
प्रकल्पयति तदा तस्मै दुहितरं ददत् “संशग्म्येन”
संगमेन विगतापुत्रत्वसन्तापेन “मनसा” चेतसा
हिन्दी निरुक्त । १३
“दधचे” ‘आत्मानं सन्दधाति’ यदत्र पुत्रिकायाम्
अपत्यमुत्पत्स्यते तन्मम’ इति सन्धारयति इत्यर्थः ।
स्त्रीका पति जो उसका ब्याहने वाला है, उसमें होनेवाली पुत्रीमें
सन्तान कर्मके अर्थ पुत्रभावको मानता है, या प्रसिद्ध करता है ।
[ अर्थात् ] मनसे इस बातको पक्की कर लेता है कि—इस होनेवाली
पुत्रीमें जो पुत्र होगा ( दौहित्र ) वह मेरा पौत्र ( पोता ) होगा ।
[ क्योंकि ] वह गर्भाधान यज्ञ अथवा वीर्यके सम्बन्धको जाननेवाला
तथा विधानका माननेवाला है । प्रयोजन यह कि—जिस मन्त्र
और जिस विधानसे पुत्रके उत्पन्न करनेमें वीर्यका स्थापन होता है,
उसीसे पुत्रीके उत्पन्न करनेमें भी । [ उत्तरार्द्ध ] जिस कालमें
कन्याके दानसे पहिले वरको जामाता ( जँवाई ) बनाता है, उस
समय उसे कन्या देता हुआ अपुत्रताके सन्तापसे रहित मनसे यह
धारणा दृढ़ कर लेता है कि—इस कन्यामें जो पुत्र होगा वह
मेरा होगा ।
( निरुक्तार्थ ) ब्याहनेवाला पति सन्तानके अर्थ अपनी स्त्रीमें
उत्पन्न होनेवाली दुहिता ( कन्या ) में पुत्रभावको मान लेता है ।
‘दुहिता’ नाम दुर्हिताका है, अर्थात् जो दूर रहती हुई भी पिताके
लिये हित-शुभ चाहनेवाली होती है । ‘अथवा’ ‘दुह’ प्रपूरणे
( अदा० उ० ) धातुसे है । क्योंकि—वह प्रार्थना स्वभाव होनेके
कारण नित्य ही पितासे धनको दोहती रहती है । दौहित्रको
नप्ति या पौत्र मानता है । गर्भाधानके यज्ञ अथवा वीर्यको जानने-
वाला है । अङ्ग अङ्ग ( सब अङ्गों ) से, हृदयके अनुस्मरणसे उत्पन्न
एवम् माताके प्रति गये हुए वीर्यके विधान को आदर करता हुआ,
‘समानतासे कन्या और पुत्र दोनो दायाद या धनके उत्तराधिकारी
हैं'—मानता है । सो यह दो ऋचा-श्लोकों से कहा गया है—
१४ ३ अ० १ पा० ४ खं० ।
"अङ्गादङ्गाद्" इस ऋचाको बाप परदेशसे आकर पुत्रके मस्तक-
में पढ कर सूंघता है। यह अनुष्टुप् छन्द है। पुत्रसे कहता
है—'हे पुत्र ! तू मेरे अङ्ग अङ्गसे हुआ है। और तू मेरे हृदयसे
हुआ है। तू पुत्रके नामसे मेरा आत्मा ही है। सो तू सौ
वर्ष जी ।"
"स्त्री और पुरुषरूप जो पुत्र उनका धर्मके अनुसार समानतासे
दाय होता है। यह स्वयम्भूके पुत्र मनुने सृष्टिके आरम्भमें
कहा है।"
कोई धर्मवेत्ता कहते हैं कि—"कन्याएँ दायभागिनी नहीं
होतीं।" "इससे पुरुष दाय (पैतृक-सम्पत्ति) का भागी होता
है, स्त्री 'अदायादा' दायकी अधिकारिणी नहीं होती" यह इस
ब्राह्मणके विचारसे प्रतीत होता है। [दूसरा ब्राह्मण] ["क्योंकि
हवन कर्मसे स्थालीको अलग कर देते हैं, फिर उससे होम नहीं
करते" काष्ठके पात्रको अलग नहीं करते फिर उसीसे होम करते
हैं"] "इससे उत्पन्न हुई हुई स्त्री (कन्या) को अलग कर देते हैं या
दूसरेको दे डालते हैं, किन्तु पुरुषको नहीं" ["इससे पुरुष ही
बापके धनका स्वामी बनता है, कन्या नहीं"] और स्त्रियोंके दान,
विक्रय (बेचना) और अतिसर्ग (त्याग) हैं, पुरुषके नहीं।
क्योंकि वह दूसरेको दे दी जाती है, और वैवाहिक शुल्कसे
बेच दी जाती है। जैसा कि—सुभद्राहरणमें भगवान् कृष्णने
कहा है:—
"विक्रयश्चाप्य पत्यस्य मतिमान् को न मंस्यते ।
स्वल्पो वाथ बहुर्वाऽपि विक्रयस्तावदेव सः ॥"
(महाभारत)
हिन्दी निरुक्त । ३५
अर्थात् “बल-परीक्षा आदि रूपसे जो कन्या दी जाती है, यह
अपत्य (सन्तान) का बेचना ही है, कौन बुद्धिमान् इसे न मानेगा।
थोड़ा हो या बहुत, वह विक्रय ही हुआ ।
अतिसर्ग नाम त्यागका है । क्योंकि—बन्धुओंसे कन्या
छोड़ दी जाती है, स्वयंवरमें जिसे गर्व हो वह तुझे ले लेवे, या जो
तुझे अच्छा लगे उसे तू ले ले । सो यह क्षत्रियोंका ही स्वयंवर
धर्म है, और वर्णोंका नहीं। किन्तु यह और वर्णोंके लिये भी
प्रमाण है, कि-कन्याओंका दाय नहीं होता। इससे कन्या
दायभागिनी नहीं होती ।
और धर्मवेत्ता मानते हैं कि—पुरुषके भी विक्रियादि हैं।
क्योंकि वेदमें शुनः शेपके आख्यानमें देखा जाता है। अर्थात् जो
यह कहा है कि ‘दान, विक्रय और अतिसर्गके कारण स्त्रीका दाय
नहीं’ यह व्यभिचारी हेतु है । क्योंकि—दान, विक्रय और अति-
सर्ग पुरुषके भी अवश्य हैं। जैसे कि—बारह पुत्रोंमें दत्तक और
क्रीतक पुत्रोंका होना वेदके और महाभारतके शुनः शेपके आख्यान-
में उसके दान और विक्रय, एवम् विश्वामित्रके द्वारा मधुच्छन्द
आदि पुत्रों का त्याग प्रसिद्ध है । इससे इन हेतुओंको दोनों ओर
होनेके कारण दोनोंका दायभागित्व समान है।
उपर्युक्त मन्त्रसे जो कन्याका धनभागित्व आता है, “यह
भ्रातासे रहित कन्याके लिये है—” यह अन्य आचार्य-मत है।
अर्थात् जिस कन्याका भाई नही होता, वही पिताके धनकी
स्वामिनी होती है, किन्तु भाई वाली नहीं। क्योंकि—पिताको
पिण्ड देने वाले पुरुषोंके रहते हुए स्त्री धन नहीं पा सकती क्यों
कि वह दूसरेके वंशको बढ़ाती है, इस कारण वह अर्थभागिनी
नहीं होती। और अभ्रातृका (भाईसे रहित) कन्यामें यह
विशेष है, कि उसके बापको दूसरा पुत्र नहीं है, इस कारण उसके
१६ ३ अ० १ पा० ४ खं० ।
अर्थ पिण्डदान आदि कार्योंमें दौहित्र (दोहता) ही खड़ा होता
है, अतः अभ्रातृका ही धनकी अधिकारिणी होती है। जैसा कि
कहा है—
“पिता उत्सृजेत् पुत्रिकाम्-अनपत्योऽग्निं प्रजा-
पतिंच इष्ट्वा अस्मादर्थमपत्यम्-इति संवाद्य अभि-
सम्भानमात्रं पुत्रिका”-इति एकेषाम् ।
अर्थात् ‘पुत्ररहित पिता अग्नि और प्रजापतिका यजन करके
‘इससे मुझे पुत्र अर्थ है’, यह ठहरा कर पुत्रिकाको छोड़े, पुत्रिका
नाम मात्रै है, (वस्तुतः मेरा यह बेटा ही है) यह कोई आचार्योंका
मत है ।
यह अर्थ एक मन्त्रकी उपमासे भी आता है :—
“अमूर्या यन्ति जामयः सर्वा लोहितवाससः ।
अभ्रातर इव योषा स्तिष्ठन्ति हतवर्त्मनः ।”
[ अथ० सं० १, १७, १ ]
यह ऋचा अथर्ववेदकी है। इसका स्त्रियोंके प्रदर (योनिसे
निरन्तर रक्तका बहना) रोगके रोकनेवाले कर्ममें विनियोग
होता है ।
इन सब नाड़ियोंके मार्ग रुके, और ये रक्तको निरन्तर न बहाष,
जैसे बिना भाईकी सब बहिने स्त्रियें लाल वस्त्रोंसे बापके घरमें ही
सन्तानके पिण्डदानरूप कर्मके लिये रुके हुए मार्ग होकर ठहर
जाती हैं ।
इस मन्त्रकी उपमासे अभ्रातृका कन्याके विवाहका निषेध आता
है। इसकी विस्तृत व्याख्याके लिये अगली ऋचा है ॥ ४ ॥—”
हिन्दी निरुक्त । १७
व्याख्या ।
इस खण्डमें कन्याके धनभागित्वमें चार मत दिखाये हैं :-
( क ) पुत्रके समान कन्या भी पिताके धनकी भागिनी होती है ।
( ख ) पुरुष ही पिताके धनका स्वामी होता है, किन्तु स्त्री नहीं ।
क्योंकि-उसके दान, विक्रय और त्याग होते हैं, पुरुषके नहीं ।
( ग ) शुनः शेप और मधुच्छन्द आदिके दृष्टान्तसे पुरुषमें भी दान
आदि दोष हैं, इससे दोनों स्त्री पुरुष पिताके धनके स्वामी
समान हैं । ( यह मत प्रथम मतकी पुष्टि मात्र है । )
( घ ) जिस कन्याके भाई नहीं होता, वही अपने पिताके धनकी
स्वामिनी होती है । क्योंकि—उसके विवाहका निषेध
होनेसे वह पिताके ही वंशको बढ़ानेवाली, और उसीके
घरमें रहनेवाली होती है ।
यह चतुर्थ आचार्यका सम्मत है । और इसी पर सब वाक्यों-
की सङ्गति होती है । अन्य मतोंमे किसीको भी माननेसे
दूसरे पक्षके प्रमाण रुष्ट हो जाते हैं, किन्तु इस मतमें जो कन्याको
धन दिलाने वाले प्रमाण हैं, वे अभ्रातृमती कन्याको दिला देते
हैं । सुतराम् इस पक्षमें सब प्रमाणोंको अवकाश मिल
जाता है ।
अभ्रातृमतीको जो पुरुष विवाहता है, वह किसी अन्य लोभसे
काम्य-विवाह करता है, किन्तु उसे अपने वंशकी वृद्धिके लिये दूसरा
विवाह भी करना होता है । अथर्वकी ऋचामें जो कन्याओंको
“लोहितवाससः” “हतवर्त्मानः” ये दो विशेषण दिये हैं, वे
अभ्रातृका कन्याके लिये वरकी दुर्लभताको स्पष्टरूपसे सूचित कर
रहे हैं। क्योंकि—उनकी सन्तान उनके पिताओंकी ही होती है,
इस लिये कोई वर सहजमें उनके निकट नहीं आता तथा विना ही
कारणके एक व्यर्थ स्त्रीका विवाह करे, और फिर दूसरी स्त्रीका भी
३
१८ ३ अ० १ पा० ५ खं० ।
अपने सन्तान कर्मके लिये करे, क्यों ? इसी गौरवके टंटेसे वे
पिताके घरमें ही रजस्वला हो जाती हैं तथा उनके मार्ग या फाटक
बन्द हो जाते हैं ।
पक्षान्तरमें इससे यह भी आता है कि--जो भ्रातृमती कन्याएँ
होती हैं, उन्हें पहिलेसे ही वर मिल जाते हैं तथा उन्हें पिताके
घरमें रक्तवस्त्र नहीं होना पड़ता । इससे कन्याके विवाहका मुख्य-
काल रजोदर्शनसे पहिले ही है। यह मन्त्रके उक्त पदोंसे निकलतो
हुई घृणासे आता है। इस पर उन्हें भी ध्यान देना चाहिये जो
लड़कीके अठारह वर्षसे ऊपर विवाहके पक्षपाती तथा वेदिक
हैं ॥ ४ ॥ •
( खण्ड ५ )
[ निरु० ] “अभ्रातेव पुंस एति प्रतीची गर्त्ता-
रुगिव स नये धनानाम् । जायेव पत्य उशती सुवासा
उषा हस्रेव निरिणीते अप्सः॥” [ ऋ०स० १,१,२४,७]
अभ्रातृका-इव पुंसः पितॄन्-एति अभिमुखी,
सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय न पतिम् । गर्त्तारोहिणी-
इव धनलाभाय दाक्षिणाजी । गर्त्तः सभास्थाणुः ।
गृणातेः । सत्यसंगरो भवति । तं तत्र या-अपुत्राया-
अपतिका, सा आरोहति । तां तत्र अक्षैः-आघ्नन्ति,
सारिक्थं लभते ।
[ गर्त्तप्रसक्तम्- ] श्मशानसञ्चयोऽपि गर्त्त।
उच्यते । गुरतेः । अपगूर्णो भवति । श्मशानं
हिन्दी निरुक्त । १६
श्मशयनम् । श्मशरीरम् । शरीरं शृणातेः । शम्नाते
र्वा । श्मश्रु लोम । श्मनि श्रितं भवति । लोम
लुनाते र्वा । लीयते र्वा ।
“नो परस्या विष्कुर्यात्, यदुप॒रस्या विष्कुर्याद्
गर्त॑ष्ठाः स्यात् प्रमायुको यजमानः ।”—
इत्यपि निगमो भवति । रथोऽपि गर्त॑ उच्यते ।
गृणातेः स्तुतिकर्मणः । स्तुततमं यानम् । -
“आरोहथो वरुण मित्र गर्त॑म् ।”
[ ऋ० सं० ४, ३, ३१, ३ ]
इत्यपि निगमो भवति । जायेव पत्ये कामय-
माना सुवासा ऋतुकालेषु उषाः हसना इव
दन्तान् विवृणुते रूपाणि इति । चतस्रः उपमाः ।
“नाभ्रात्रीमुपयच्छेत तोकं ह्यस्य तद् भवति”-
इति अभ्रातृकायाः उपयमनप्रतिषेधः प्रत्यक्षः पितुश्च
पुत्रभावः । [ उत्तरार्द्धव्याख्या खं० ४ ] पिता यत्र
दुहितुः-अप्रत्ताया रेतः सेकं मार्जयति सन्दधाति-
आत्मानं सङ्गमेन मनसा-इति । अथ-एतां जाम्या
ऋक्यप्रतिषेधे—उदाहरन्ति । ज्येष्ठं पुत्रिकायाः
इत्येके ॥ ५ ॥
२० ३ अ० १ पा० ५ खं० ।
अर्थः ।
“अभ्रातेव” इति दीर्घतमः पुत्रस्य कक्षीवत
आर्षम् । त्रिष्टुप् । औषसी । प्रातरनुवाकाश्विनयोः
शस्यते ।”
(मन्त्रार्थः) [ १ म-पा० ] “अभ्राता इव”
'अभ्रातृका' कन्या यथा दत्ता अपि पित्रा,
स्वीकृताऽपि भर्त्रा, पुनः “पुंसः” 'पितॄन्' पितृवंशमेव
“प्रतीची” 'अभिमुखी' 'सन्तानकर्मणे पिण्डदानाय'
“एति” आगच्छति, 'न' 'पति' पतिवंशमित्यर्थः ।
एवम् उषाः अपरकाले रात्रां नभः आरोहति ।
[ द्वि० पा० ] “धनानां” “सनये” लब्धये काचिद्
दाक्षिणात्या स्त्री “गर्तारुक्-इव” यथा गर्तं सभास्था-
णुम् आरोहति तथा उषाः अपि नभः आरोहति । [ तृ०
पा० ] “जाया-इव” जाया यथा “पत्ये” भर्त्रे “उशती”
कामयमाना “सुवासाः” भूत्वा ऋतुषु आत्मानं
दर्शयति, तथा उषाः अपि आत्मानं जनानां दर्शयति ।
[ च० पा० ] “हस्रा-इव” काचित् हसनशीला स्त्री
यथा आत्मनो दन्तान् दर्शयति, तथा उषाः अपि
आत्मनोऽन्तर्गतानि सर्वद्रव्याणां रूपाणि दर्शयति ।
हिन्दी निरुक्त । २१
शार्वरेण तमसा दिग्धानि सर्वद्रव्याणि प्रकाशोदकेन
धौतानिव करोतीत्यर्थः ॥
भाई बिना की कन्या जिस प्रकार पिताकी दी हुई होकर भी,
और पतिकी स्वीकारकी हुई होकर भी, सन्तान कर्म पिण्डदानके
लिये अपने बापके वंशमें ही आ जाती है। किन्तु पतिके घरमें
नहीं, उसी प्रकार उषा रात्रिके पिछले पहरमें आकाशमें चढ़ जाती
है। जिस प्रकार कोई दाक्षिणात्या (दक्षिण देशकी) स्त्री, जो
पति और पुत्रसे हीन है, धनकी प्राप्तिके लिये गर्त या सभास्थाणु
(चबूतरा या तख्त) पर चढ़ जाती है, उसी प्रकार उषा आकाशमें
चढ़ जाती है। जिस प्रकार काम-युक्त नारी ऋतुकालमें सुन्दर
वस्त्र धारण कर पतिको अपना रूप दिखाती है, उसी प्रकार उषा
भी मनुष्योंको अपना रूप दिखाती है। और जिस प्रकार हास्य
स्वभाववाली कोई स्त्री हँस कर अपने दाँतोंको दिखाती है, उसी
प्रकार उषा अपने भीतर छुपे हुए सब द्रव्योंके रूपोंको दिखाती है।
नि० अ०—जिस प्रकार भाई बिनाकी स्त्री सन्तान कर्म
पिण्डदानके लिये अपने पिताके वंशके सम्मुख आती है, किन्तु
पतिके घर नहीं। जैसे दक्षिण देशकी (पति-पुत्र-विहीन) स्त्री
धनके लाभार्थ गर्त पर चढ़ती है। 'गर्त' नाम सभास्थाणु (पासे
डालनेके तख्त) का है। 'गृ' निगरणे (क्र्या० प०) धातुसे
है। क्योंकि वह सत्यसङ्गर होता है। अर्थात् प्राय करके उस
पर कितव या जुआरिये 'सत्य-यह यहाँ पर गिरा है, यह नही
गिरा',—इस प्रकार सत्य शब्दको बहुत बोलते हैं। जो झूठके
लिये होता है, इसीसे वह सत्यसङ्गर और गर्त है। वहाँ उसे वह
स्त्री आरोहण करती है, जो पति और पुत्रसे रहित है। उस स्त्रीको
वहाँ अक्षों या पासोंसे ताड़न करते है (और) वह पतिके भागको
प्राप्त होती है।
२२ ३ अ० १ पा० ५ खं० ।
[ गर्त्त के प्रसङ्ग से ] श्मशान सञ्चय या मुरदे जलानेकी चबूतरी
भी 'गर्त्त' कहाती है। 'गुरी' उद्यमने (तु० आ०) धातुसे है।
क्योंकि—वह अपगूर्ण या लोकके विनाशके अर्थ उद्यत जैसा होता
है। अर्थात् वहाँ पर जो पिशाच आदि भूत रहते हैं, वे मनुष्योंकी
मृत्युको माँगते रहते हैं, और उनके मरने पर प्रसन्न होते हैं।
[ व्याख्यानके प्रसङ्गसे ] 'श्मशान' श्मशयनसे है। क्योंकि—
वहाँ 'श्म' शयन करता है। क्योंकि वह मरे हुएका वहाँ पर फेंक
दिया जाता है। 'श्म' नाम शरीरका है। 'शरीर' 'शॄ' हिंसायाम्
(क्र्या० प०) धातुसे है। 'श्मश्रु' नाम लोम (रोम) का है।
क्योंकि वह 'श्म' (शरीर) में आश्रित रहता है। 'लोम' शब्द
'लूञ्' छेदने (क्र्या० उ०) धातुसे है। अथवा 'लीङ्' श्लेषणे
(दि० आ०) धातुसे है। [क्योंकि—वह छेदन किया जाता है,
अथवा शरीरमें लगा हुआ रहता है।]
[ गर्त्त शब्दकी श्मशान वाचकता पर निगम ]
"ऊपरको न उघाड़ना चाहिये, यदि ऊपरको उघाड़े, तो यजमान
श्मशानमें सोवे, या मर जावे।" यह भी निगम है। [अपि
शब्दसे और निगमोंकी सम्भावना भी दिलाते हैं।] रथ भी 'गर्त्त'
कहलाता है। स्तुति-अर्थमें 'गृ' (क्र्या० प०) धातुसे है।
क्योंकि वह और यानोंसे सुखदायी यान (सवारी) है, अतः अधिक
प्रशंसा योग्य है।
[ रथ अर्थमें निगम ]
“आरोहथो मित्र" इत्यादि । "हे मित्र ! हे वरुण ! तुम
दोनों गर्त्त या रथ पर चढ़े हुए हो।" यह भी निगम है।
जिस प्रकार ऋतुकालमें कामयुक्त स्त्री सुन्दर वस्त्र धारण कर
पतिको रूप दिखाती है। जिस प्रकार हसना स्त्री दाँतोंको
२४ ३ अ० १ पा० ५ ख० ।
अभ्रातृमतोवादके अनुसार "शासदद्वन्हिः" इसके पूर्वार्द्ध का
अर्थ :-
उसी अभ्रातृमती कन्याका जो पुत्र है, उसीको पुत्रिका विधानके
द्वारा अपना अभिनिवेश या अभिमान कर लेनेसे अपुत्र नाना अपना
पौत्र मानता है। किन्तु अन्य भाईवाली कन्याओंके पुत्रोंको नहीं।
ऐसा न माननेसे सभी विवाहने वाले अपुत्र होंगे, तथा उससे
विवाहका परिश्रम व्यर्थ ही होगा। और पुत्रिकाके पिताकी भी
भार्या दूसरेकी कन्या है, इससे उसमें भी जो कन्या होगी, वह
नाना ही की होगी किन्तु दूसरे पुत्रिका पिताकी नहीं। यह सब
बात अनिष्ट है। इस कारण जोही कन्या अभिनिवेश पूर्वक पुत्रिका
की जाती है, उसीका पुत्र मातामहका होता है सब कन्याओंका
नहीं। और वह दायकी स्वामिनी होती है किन्तु भ्रातृमती नहीं।
इसीलिये "पिता यत्र" इत्यादि उत्तरार्द्ध कहा है।
पुत्रिका—जो अपुत्र पिता अपनी कन्याको इसलिये दूसरेको
देता है कि—उसके पुत्रको वह ले लेगा, वह कन्या पुत्रिका
कहलाती है।
अभ्रातृकाके पुत्र नानाके मुख्य पौत्र हैं और भ्रातृमती कन्याके
भी पुत्र कहीं लोक और वेदमें नानाके पौत्र कहे जाते हैं, किन्तु वे
गौणपौत्र हैं और अपने पिताके मुख्य पुत्र हैं।
जबकि अभ्रातृका कन्याका पिता उसका पुत्रिका धर्मसे विवाह
कर दे और बादमें उसके पुत्र हो जावें तो धनके विभाग कालमें
ज्येष्ठ भ्राताका जो भाग है वह उस पुत्रिकाको मिलेगा और सब
पुत्रोंको यथा भाग धन मिलेगा। किन्तु और सब कन्याएँ भाग
रहित ही होती हैं। सोही इस अगली ऋचासे कहा जाता है, जिस
प्रकार कि-अन्य कन्याओंका भाग नहीं है।